संस्कृति

कुमाऊनी रामलीला के तबला उस्ताद: मास्साब मनोहर लाल

पिछले छः दशक से भी अधिक समय से रामलीलाओं में तबला वादक के रूप में भागीदारी कर रहे मनोहर लाल मास्साब, भवाली के लिए कोई अनजान चेहरा नहीं हैं. मुक्तेश्वर के पास सुनकिया के गांव से भवाली तक का उनका सफर संघर्षों की एक लम्बी दास्तां हैं. निहायत अभावों के बीच पले-बढ़े मनोहर मास्साब ने कक्षा 5 तक की स्कूली शिक्षा अपने गांव से पूरी की. संगीत के प्रति लगाव उन्हें सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा खींच लाया.

मनोहर मास्साब बताते हैं कि संगीत का ककहरा उन्होंने अल्मोड़ा घराने के उस्ताद गुलाम अली से सीखा और तीन वर्ष के रियाज के बाद तबला वादक के रूप में रामलीलाओं में अपनी उपस्थिति दर्ज करायी. प्रारम्भ के 7 वर्षों में उन्होंने मुक्तेश्वर की रामलीला में तबला वादन का कार्य किया. मुक्तेश्वर की रामलीला की उस समय पूरे क्षेत्र में अपनी अलग पहचान थी. लेकिन तबला वादन से आजीविका चलाना संभव नहीं था और मनोहर लाल मास्साब भवाली से लगभग 3 किमी दूर नगारीगांव – तिरछाखेत में आकर बस गये. संगीत साधना के साथ-साथ वे भवाली में टेलरिंग की दुकान खोलकर अपनी रोजी-रोटी भी चलाते रहे और विभिन्न कार्यक्रमों में अपनी सहभागिता भी देते रहते. तब एक नाटक “छोटी बहू” में उन्होंने छोटी बहू बनकर महिला किरदार की भूमिका को भी बखूबी निभाया. इसके अतिरिक्त कुमाऊनी लोकगीत, गजल व कव्वाली के गायन में भी वे गहरी रुचि रखते हैं.

उम्र के इस पड़ाव में भी गीत-संगीत में ऊंचे स्वर खींचने पर जब मैंने उनसे उनकी उमर जाननी चाही तो उन्होंने जेब में हाथ डालते हुए अपना आधार कार्ड मेरे हाथ में थमा दिया. आधार कार्ड के अनुसार उनकी पैदाइश का वर्ष 1942 देखकर मैं चौंक गया. 15 अगस्त से प्रारम्भ हुई भवाली की रामलीला की तालीम में वे बिना गैरहाजिरी के रात 10-11 बजे तक रहते हैं और रात को ही लगभग 3 किमी दूर अपने घर जाते हैं. वे बताते हैं कि नौकरी की तलाश में उन्होंने गीत एवं नाटक प्रभाग के भी चक्कर काटे, लेकिन ऐनवक्त पर उनके कागज कहीं गुम हो गये और वे यह अवसर भी चूक गये.

पिछले 50 सालों से वे निर्बाध रूप से भवाली की रामलीला में तबला वादक के रूप में अपनी सेवाऐं दे रहे हैं. बीच के 7-8 वर्षों में जब भवाली की रामलीला किन्हीं कारणों वश बाधित रही तब भीमताल तथा नौकुचिया ताल की रामलीलाओं से उनको बुलावा आता रहा.

पुरानी यादों को ताजा करते हुए वे अपने झोले से एक प्रमाणपत्र निकाल कर दिखाते हैं जिसमें उन्हें श्री राम सेवक सभा नैनीताल द्वारा आयोजित ’’रामलीला प्रतियोगिता’’ में भी तबला वादन के लिए प्रथम पुरस्कार से नवाजा गया.

भवाली में जोशी बर्तन भण्डार उनका बैठने का मुख्य अड्डा है, रामलीला कमेटी से जुड़े अन्य पदाधिकारी शाम के वक्त इस दुकान पर अक्सर मिल जाया करते हैं. उनकी उपस्थिति में जब भी उनके तबला वादन की चर्चा होती है, तो कुछ लोग परिहास में चुटकी लेते हुए कह दिया करते हैं, “मास्साब नहीं भी आ पाये तो वैकल्पिक व्यवस्था हो जायेगी.” यह बात महज विनोदवश उन्हें चिढ़ाने के मकसद से कही जाती है. इस पर खीज कर मास्साब के मुंह से रक्षात्मक मुद्रा में एक ही शब्द निकलता है ’’बुला लो किसी को,  मैं भी देखता हूं. दिल्ली से भी किसी तबला वादक को बुला लो तुम्हारी भवाली की रामलीला में तबला नही बजा सकता.’’ बैठे लोगों के बीच हंसी का ठहाका लगता है, दूसरे ही पल वे मेरी ओर मुखातिब होकर कहने लगते हैं “ये कण्टर बजाने वाले  लोग कला की कद्र क्या जानें.” गुस्से से तिलमिलाते हुए दुकान से बाहर निकल जाते हैं लेकिन कुछ देर बाद पुनः उन्हें बिना किसी नाराजी के दुकान की सीढ़ियां चढ़ते देखा जा सकता है और हाय-परिहास का सिलसिला पुनः शुरू हो जाता है.

जब उनके योगदान की सराहना की जाय तो कहते हैं – “मेरा यह योगदान भगवान राम के चरणों में एक तुच्छ भेंट है और यह सब मेरे गुरू की कृपा का परिणाम है.”

भवाली की रामलीला का जिक्र हो और मास्साब मनोहर लाल चर्चा में न हों तो यह उनके प्रति ज्यादती होगी. पिछले पांच दशकों से भवाली की रामलीला मंचन में तबला वादक के रूप में अपना सहयोग दे रहे, वे शहर व उससे सटे गांवों में किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं.

सन् 1942 में मुक्तेश्वर के पास सुनकिया गांव में जन्मे मनोहर लाल वर्तमान में भवाली के पास तिरछाखेत गांव में रहते हैं. निहायत अभावों के बीच टेलर मास्टर के रूप में अपनी जीविका चलाने के साथ-साथ उनका कला के प्रति बचपन से ही रूझान रहा. उन्होंने अल्मोड़ा घराने में तीन साल तक संगीत की बारीकियां सीखीं और फिर जुट गये अपनी कला को निखारने में. मंच चाहे रामलीला का हो यह अन्य कोई सांस्कृतिक आयोजन मास्साब मनोहर लाल तबला वादक के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने से कभी चूके नहीं. मुक्तेश्वर से अपनी इस कला यात्रा की शुरूआत करते वे नैनीताल,  भीमताल,  नौकुचियाताल आदि शहरों व कस्बों में रामलीला मंचन में तालीम से लेकर मंचन तक समर्पित भाव से सेवा देते आये हैं.

हम तो ईश्वर से यही प्रार्थना करते हैं कि मनोहर लाल मास्साब वर्षों-वर्षों तक अपने हुनर का प्रदर्शन रामलीला में करते रहें. ईश्वर उनको दीर्घायु दे. मनोहर लाल मास्साब द्वारा राग ‘ विहाग’ में गाये गये गीत का ऑडियो सुनिये :

भवाली में रहने वाले भुवन चन्द्र पन्त ने वर्ष 2014 तक नैनीताल के भारतीय शहीद सैनिक विद्यालय में 34 वर्षों तक सेवा दी है. आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से उनकी कवितायें प्रसारित हो चुकी हैं.

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Sudhir Kumar

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