फोटो: सुधीर कुमार
(पिछली क़िस्त: मैं बना चौबीस रोटियों का डिनर करने वाला भिंडी पहलवान)
हमारे समय में बीएससी दो साल का होता था. 1989 में जिस वर्ष मैंने बीएससी किया और करने के बाद दिल्ली चला गया क्योंकि वहां मेरे बड़े भाई को दिल्ली सरकार के तहत टीचर की नौकरी मिल गई थी, दो साल की डिग्री को तीन साल करने के लिए ब्रिज कोर्स शुरू किया गया. इसलिए मुझे एक और साल की पढ़ाई पूरी करने के लिए दिल्ली से लौटकर आना पड़ा. इसे लिंक कोर्स कहा गया. हालांकि मैं लिंक कोर्स कर रहा था, पर अब मैं पूरा ध्यान इस बात पर दे रहा था कि मुझे कोई सरकारी नौकरी मिल जाए. (Sundar Chand Thakur Memoir 68)
इनमें सबसे ऊपर था फौज में अफसर बनना क्योंकि ऐसा करके मैं खुद को अपने पिता का अफसर बनने का सपना पूरा करने के गौरव से भर सकता था. मेरे बाज्यू यानी ताऊजी के बेटे भूपाल ने भी बीए कर लिया था और अब वह जीप चलाने के साथ-साथ बीएड करने की भी तैयारी कर रहा था.
हमने एक बार फिर किराए पर कमरा लिया क्योंकि पुराना कमरा दिल्ली जाते हुए मैंने छोड़ दिया था. इन दिनों मैं हमेशा ही सामान्य ज्ञान की किताबें और प्रतियोगिता दर्पण, सीएसआर जैसी पत्रिकाएं पढ़ता रहता था. उनमें दिए गए पिछले वर्षों के पेपर हल करना और फिर यह देखना कि मेरे कितने नंबर आते हैं, मेरा टाइम पास का सबसे बड़ा जरिया था.
मैं हमेशा ऐसी कोई न कोई पत्रिका बगल में दबाए हुए चलता था. मैंने उस साल सीडीएस के अलावा उन दिनों प्रचलित असिस्टेंट कमांडेंट, इनकम टैक्स इंस्पेक्टर आदि की परीक्षाओं के लिए भी आवेदन किया था. मैंने बारहवीं के बाद एनडीए का एग्जाम भी दिया था पर फेल हो गया. तभी से मेरे मन में भविष्य को लेकर बहुत डर समा गया था कि मैं आखिर कभी कोई परीक्षा पास भी कर पाऊंगा या नहीं. इस डर के चलते मैंने अब अपने समय को खोटा करना बिल्कुल बंद कर दिया था. शायद यही वजह थी कि जब परीक्षाओं का परिणाम आया तो मैं सिर्फ सीडीएस ही नहीं बल्कि पैरा मिलिट्री फोर्स में असिस्टेंट कमांडेंट सहित चार-पांच अन्य लिखित परीक्षाओं में भी पास हो गया था.
सीडीएस के जरिए मुझे ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकैडमी मद्रास के लिए चुना गया था, पर अभी मेरा एसएसबी इंटरव्यू होना था. यह वही इंटरव्यू था जिसमें मेरे पिता सात बार फेल हुए थे. इसलिए एक मनोवैज्ञानिक डर तो बना ही हुआ था. इंटरव्यू देने मैं इलाहाबाद गया. मेरे बैच में 55 लड़के थे. एसएसबी इंटरव्यू चार दिन तक चलता है और इसमें कई हिस्से होते हैं. मैंने अपनी ओर से सभी में भरपूर जोश और उतने ही होश के साथ भाग लिया.
मुझे याद है मेरा चेस्ट नंबर 17 था. जब परिणामों की घोषणा की जा रही थी, तो मुझसे पहले जिसका नाम आया, उसका चेस्ट नंबर 15 था. मुझे लगा कि अगला नंबर 17 तो होने से रहा. मेरे दिल की धड़कनें बहुत बढ़ चुकी थीं. और एक पल के बाद मैंने सुना सामने अफसर ने मेरा ही नंबर पुकारा था. चेस्ट नंबर 17!! उसके बाद तो मुझे कुछ सुनाई देना ही बंद हो गया. 55 में से चार लड़कों का चयन हुआ था. उस हॉल से बाहर निकलकर मैं किसी अदृश्य ताकत के अधीन आ हवा में उछला. वो मारा! उस रात मेरी डायरी के पन्ने का पहला वाक्य यही था.
फौज में अफसर बनने के बाद कभी वैसी फुर्सत में पिथौरागढ़ जाना नहीं हो पाया, जैसी फुर्सत में मैं वहां पढ़ते हुए रहा करता था. आज भी मैं पिथौरागढ़ जाने को तरसता रहता हूं क्योंकि जैसे-जैसे नौकरी के झमेलों में फंसता गया और रिटायरमेंट के समय ज्यादा पैसे मिलने के लालच में मैंने अपनी प्रिविलेज लीव को बचाना शुरू किया, मेरा वहां जाना कम से कमतर होता गया. पिछली बार मैं चार साल पहले वहां गया था. हालांकि मुझे लगता है कि जैसे-जैसे मेरी नौकरी और परिवार की जिम्मेदारियां कम होती जाएंगी, मेरा पिथौरागढ़ जाना बढ़ता जाएगा.
वहां कई दृश्य ऐसे हैं, जो मुझे कभी नहीं भूलते. मैं उन जगहों पर बार-बार जाना चाहता हूं. इनमें सबसे पहली जगह है भैलोंत जहां रहकर मेरे पिताजी ने दसवीं की पढ़ाई की थी. पिथौरागढ़ से थलकेदार जाने के रास्ते में करीब तीन-चार किमी की चढ़ाई और जंगल के रास्ते चलने के बाद हम यहां एक छोटी-सी पहाड़ी की चोटी पर पहुंचते हैं. यहां से पूरे पिथौरागढ़ का विहंगम दृश्य दिखाई देता है.
पहली बार मां मुझे और मेरी छोटी बहन को जब भैलोंत और उसके बाद यहां से चार-पांच किलोमीटर और आगे अपने मायके ज्ञालपानी ले गई थी, तो हम जंगल में भटक गए थे. मां ने हमें अपने बचपन के किस्से सुनाए हुए थे कि कई बार कैसे उनके पीछे भालू भी पड़ गया था. उनके साथ की एक लड़की को तो भालू ने थप्पड़ मारकर गिरा भी दिया था.
बाघ और जंगली सुअर भी हुआ करते थे वहां. वह जंगल बहुत घनघोर था. हाथ को हाथ न सूझता था. हम करीब आधे घंटे तक भटकते रहे. उस दौरान मेरे भीतर जो झंझावात चलता रहा, उसे मैं कभी नहीं भूला. मैं तब बारह साल का रहा हूंगा. मुझे अपनी चिंता तो हो ही रही थी, बहन को लेकर मैं ज्यादा चिंतित था.
मां और बहन के साथ मैं ही अकेला मर्द था, जिस पर किसी भी अनचाही स्थिति में अपनी सूझबूझ और ताकत के साथ उन दोनों को बचाने की जिम्मेदारी थी. संभवत: ऐसा सोचकर मेरी घबराहट और बढ़ रही थी. पर मुझे मां के साथ होने का सुकून था. उसे मैंने हमेशा बहुत निडर महिला की तरह देखा है. उसने अपनी साथियों को अपनी आंखों के सामने घास काटते हुए पहाड़ों से गिरते देखा है, लोगों को सांप के काटने से मरते, बाघ को गाय-भैंस के बच्चे उठाते देखा है. (Sundar Chand Thakur Memoir 68)
मां ने वे सारी घटनाएं मुझे सुनाई हुई थीं. मेरे लिए वे घटनाएं किस्सों की तरह थीं, जिन्हें सुनकर मुझे लगता था कि मां बचपन से ही बहुत बहादुर रही है. इसीलिए उसे कभी कुछ नहीं हुआ. जंगल में भटकते हुए कई बार हम पेड़ों और झाड़ियों के बीच इतना भीतर तक चले गए कि दिन की रोशनी ही गायब हो गई. उस दौरान जंगली वनस्पतियों की जो गंध मेरे नसूढ़ों में घुसी, वह कभी स्मृति से नहीं गई.
मां ने जल्दी ही रास्ता खोज निकाला पर उस दिन हम सूर्यास्त के बाद ही मां के गांव ज्ञालपानी पहुंच पाए. इसके लिए हमें पहले बहुत खड़ी चढ़ाई चढ़नी पड़ी और फिर उतनी ही खतरनाक ढलान पर उतरना पड़ा.
एक जो दूसरा दृश्य मुझे रह-रहकर याद आता है वह है दिउरी भनार जाने का. पिथौरागढ़ में चंडाक के पीछे जहां मौष्टिमाणु का मेला लगता है, जिस मेले में एक बार मैंने जुआ खेलकर पांच रुपये के बीस रुपये बनाए थे और सारे जीते हुए पैसे हाथ के हाथ ही खाने की चीजों में फूंक डाले थे, यहीं से एक मिट्टी की कच्ची सड़क जाती है, जिस पर दो-तीन घंटे चलने के बाद भनार पहुंच पाते हो. यहां मेरी एक बुआ रहती थी, जिसके खुरदुरे हाथों का स्पर्श कभी भूलता नहीं क्योंकि मैं उनसे हमेशा कई-कई साल बाद मिलता था और इतने लंबे वक्फे तक उनके भीतर मेरे प्रति इतना स्नेह भर चुका होता था कि बिना हथेलियों को मेरे गालों को छुआए, वह बाहर निकल नहीं पाता. मुझे यह भी लगता था कि वह मेरे प्रति इतना स्नेह दिखाकर असल में अपने भाई यानी मेरे पिता को ही प्रेम कर रही होती थी क्योंकि पिता दो बहनों में सबसे छोटे और वे भी उनसे बहुत कम मिल पाते थे.
बहरहाल, मौष्टिमाणु से समतल सड़क पर लंबी दूरी चलने के बाद पहाड़ की ढलान आती थी और इस ढलान पर चीड़ के पेड़ के सूखे पत्ते जिन्हें पहाड़ में पिरूल कहा जाता है, मखमल की तरह बिछे रहते थे. इन पर आप कितनी ही सावधानी से चलें, आपका फिसलना तय होता है. मैं इस ढलान पर उतरते हुए हर कदम पर यह सुनिश्चित करता हुआ चलता था कि मेरा कदम इन पत्तों पर पड़ने के बाद जब फिसलेगा, तो उसके पास फिसलने की पर्याप्त जगह हो. कई जगह एक ओर पहाड़ी नाला या खाई भी आ जाती थी. वहां मुझे रास्ते पर बैठकर आगे सरकना पड़ता था. उस जंगल के रास्ते पर इतना सन्नाटा रहता था और चीड़ के पत्तों की सांय-सांय के अलावा पेड़ों से चिपटे हुए मटमैले कीड़ों की आवाज का शोर सन्नाटे को और गहरा करता था. वहां अगर आप ऊपर से आवाज लगा दो, तो वह पूरा जंगल लांघकर नीचे रामगंगा नदी पार दूसरे पहाड़ से जाकर टकराती थी. (Sundar Chand Thakur Memoir 68)
मैं सिर्फ दो ही बार बुआ से मिलने इस जगह आया. लेकिन इस पहाड़ से नीचे उतरकर उनके घर तक पहुंचने की यात्रा मुझे हमेशा याद रही. जैसे-जैसे उनका घर नजदीक आता था, नसूढ़ों में मालटे की खुशबू भरती जाती थी क्योंकि उनके घर के चारों ओर मालटे के बेहिसाब पेड़ थे. यहां किरमोड़े और हिसालू की झाड़ियां भी बेहिसाब थीं, जिनके बारे में मैं पहले लिख चुका हूं.
इन दो जगहों के अलावा रामेश्वर से हिलने वाला पुल पार कर राड़ीखूटी गांव के बीच से निकलकर रामगंगा नदी के साथ-साथ चलते हुए अपने गांव खड़कू भल्या की ओर जाना भी मैं कभी नहीं भूल सकता क्योंकि पांचवी-छठी में जब मैं पहली बार होश आने के बाद इस तरह पैदल अपने गांव गया था, नदी के उस नीले पानी ने मुझे हमेशा के लिए अपने आकर्षण में बांध लिया था. मैं रास्ते में जहां गांव के लड़के किसी समय नदी के एक गहरे हिस्से में तैरा करते थे, एक बड़े पत्थर पर बैठकर पानी में पैर डालता.
रामेश्वर के पास तो मैं अल्मोड़ा की ओर से आने वाली सरयू नदी को पैदल चलकर ही पार कर लेता था. वहां किनारे पर जलती हुई चिताएं रहती थीं, जिनकी ओर मैं बहुत कौतुहल से देखता था. मेरा मन करता था कि मैं पास जाकर देखूं मृत शरीर कैसे जलता है, पर मैं जानता था मेरे साथ चल रहे बड़े लोग मुझे ऐसा कतई न करने देंगे. ये बड़े लोग मुझे खुद नदी भी पार नहीं करने देते थे. वे मुझे कंधे पर बैठाकर नदी पार करवाते थे. लेकिन नवीं कक्षा में आने के बाद मैं खुद ही नदी को पार करने के रोमांच से गुजरता था.
कई बार ऐसा होता कि सरयू का पानी बहुत मटमैला दिखता, रामगंगा का बिल्कुल साफ. मैं मंदिर के पास बैठकर इन दो रंग के पानी को बहुत गौर आपस में मिलते हुए देखता. मुझे पहाड़ में सर्दियों के दिनों में सुबह का पाला भी याद आता है. ठुलीगाड़ में रहते हुए सुबह मुझे जब फारिग होने के लिए गाड़ के किनारे जाना होता, तो घास पर जमे पाले में मेरे ही पहले कदम पड़ते. उस पाले पर मेरे पैरों के निशान इस तरह बनते जैसे मैं समंदर के किनारे गीली रेत पर चल रहा हूं. कई बार लौटते हुए मैं पहले से पड़े पैरों के निशान के ठीक ऊपर पैर रखता हुआ लौटता, खुद को यह चुनौती देता हुआ कि जब पलटकर देखूं तो ऐसा लगे कि पाले पर कोई सिर्फ एक ओर ही चला है. यह सर्दियों में ठंड में खड़ी कार के शीशों पर बाहर से पड़ी ओस की पर्त पर नाम लिखने जैसा ही खेल था. इस खेल को खेलते हुए मुझे फारिग होने में लगे समय का पता नहीं चलता था.
एक ऐसा ही खेल मैं फर्न के पत्तों से भी खेलता था, जिन्हें उलटा करके हाथ के पिछली ओर त्वचा पर देर तक चिपकाए रखने से वहां पत्ते का सफेद निशान छूट जाता था. स्कूल जाते हुए साथी बच्चों के साथ अक्सर इस बात को लेकर प्रतिस्पर्धा होती थी कि कौन हाथ पर कितनी भरपूर सघन छाप बना सकता है.
ऐसे और भी कई दृश्य हैं पहाड़ में मेरे जीवन के जो मेरी चेतना में रचे-बसे हैं और जब तब किसी न किसी बहाने से अतीत से कूदकर बाहर चले आते हैं. कभी कोई गंध उन्हें बाहर ले आती है, कभी कोई स्मृति. हालांकि मैं आज भी मौका मिलने पर पहाड़ जाता हूं और अब मेरे मन में हिमालय की ऊंचाइयों को देखने, जानने, वहां वक्त गुजारने की जबरदस्त इच्छा है.
1991 में बीएससी का लिंक कोर्स करने के बाद मैं पिथौरागढ़ छोड़कर दिल्ली में आरके पुरम आ गया, जहां बड़े भाई ने एक कमरा किराए पर लिया हुआ था. यहां रहते हुए ही मैंने फौज में अफसर बनने का इंटरव्यू दिया और पास हुआ. यहां से कुछ ही महीनों बाद मैंने तत्कालीन मद्रास के लिए ट्रेन पकड़ी. छत्तीस घंटे की यात्रा के बाद मैं मद्रास पहुंचा.
ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकेडमी के गेट से प्रवेश करते हुए मैं फख्र से फूला जा रहा था. इससे आगे की कहानी मेरे उपन्यास ‘पत्थर पर दूब’ में मिलेगी. पर फौजी जीवन की शुरुआत मेरे पहाड़ों के जीवन का अंत नहीं था क्योंकि मैं जानता हूं कि अंतत: तो मैं पहाड़ ही लौटूंगा. अपनी एक कविता ‘जानना’ की कुछ पंक्तियों के साथ मैं अपनी बात खत्म करूंगा और आप सबसे विदा ले रहा हूं. पहाड़ में मेरे जीवन की कहानी को फिलहाल यहीं विराम दे रहा हूं.
मैं पहाड़ों को जन्म से जानता हूं
अपने पिता की तरह
मैं पेड़ों को अपनी मां की तरह जानता हूं
उन्होंने कभी दगा नहीं दिया, कहीं छोडक़र नहीं गए वे
उन्होंने हमेशा मेरा इंतजार किया
…समाप्त
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कवि, पत्रकार, सम्पादक और उपन्यासकार सुन्दर चन्द ठाकुर सम्प्रति नवभारत टाइम्स के मुम्बई संस्करण के सम्पादक हैं. उनका एक उपन्यास और दो कविता संग्रह प्रकाशित हैं. मीडिया में जुड़ने से पहले सुन्दर भारतीय सेना में अफसर थे.
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पहाड़ी जंगल का वर्णण पढ़ कर बचपन की यादें ताज़ा हो गयी, तब नानी और दादी के साथ छूट्टियों में गाँव जाना हो पता था।
आत्मीय जीवनी को नमन