पावेल कुज़िन्स्की का चित्र
थोथा देई उड़ाय-2
मुझे इस बात की भी कोफ़्त है खुद से, कि आज तक मेरा कलियुगी महासंस्कार नहीं हुआ. मॉडर्न वेदाज़ में जिसे ट्रोलिंग कहा गया है. हुआ तो वाइरल भी नहीं कभी, पर ज़्यादा बड़ी इच्छा तो ट्रोल होने की है. उड़ते आप दोनों में हैं लेकिन एक फुग्गा है, एक पतंग. ट्रोलर्स का उपकार बड़ा है समाज पर. वाइरल होने में क्या है, हुए और बस हो गए. ट्रोलिंग प्रारब्ध का फल है. ट्रोलर्स आपकी माँ-बहन, आपकी जाति, धर्म, आपकी टोपी, कुर्ते के रंग, कल आप कहाँ थे, परसों कहाँ से होते हुए आपके पिछले जन्मों तक हो आते हैं. ट्रोल होने का मतलब आपको बनाने वाले समस्त अवयवों, छिति-जल-पावक-गगन-समीरा का वाइरल होना है. इसीलिए शायद जैसे राम के साथ लक्ष्मण से पहले रावण का स्मरण हो आना स्वाभाविक है, ट्रोलिंग के साथ वाइरल का याद आना स्वाभाविक है. सोशल मीडिया की धरा अपर दोनों साथ-साथ जन्में जुड़वा भाइयों की तरह. फिर एक को प्राण उठा ले गया, एक को जीवन! इस वाक्य का हिंदी फिल्मों से ही लेना-देना समझा जाए. अब दोनों जवान, गबरू हो गए हैं और अगर वर्दी का अंतर न हो, तो अंदरखाने दोनों एक जैसी ही तबियत के लगते हैं.
दो फूल साथ फूले, किस्मत जुदा जुदा है
एक शाह नामवर है, एक राह का गदा है
गदा मतलब फ़क़ीर. बस इतना सा अंतर है. हैं दोनों ही अत्यंत आवश्यक संस्कार. कहते हैं, एस सौ आठ यग्य करने के बराबर लाभ मिलता है. पता नहीं. एन्ड रिज़ल्ट देखने के बाद ही बताया जा सकता है कि किससे किसको फायदा हुआ, किसको किससे नुकसान. वैसे वाइरल और ट्रोलिंग में अश्वमेघ कौन सा है राजसूय कौन सा इसमें ज़रा विवाद है.
इन दोनों के होते मैं संस्कृतिकरण की दौड़ में पिछड़ा हुआ महसूस करता हूँ. ऐसा लगता है कि कोलावरी डी के ज़माने में अभी झिंगालाला हू हू करवा रहा हूँ. मैंने ही शायद उस लायक कोई बात ही नहीं की. न तो तो कभी कोई कायदे का गाना गाया, कि दिलों का सूटर बन जाऊं, न ही, कभी इतना इररेशनल हो पाया कि लगे जैसे जे एन यू होकर आया हूँ. वर्ना ट्रोल करने वालों को कौन सा अपना-पराया देखना है. उनके नेटवर्क के पांचों डंडे टकाटक रहते हैं. आपने कोई ऐसी-वैसी बात की, उनकी चुंडी, जो कि स्पाइक्स के बीच फर्स्ट एमन्ग दी इक्वल्स की तरह शोभायमान रहती है, तत्काल खड़ी हो जाती है. आपकी बात लपक लेती है, चढ़ा देती है, उड़ा देती है.
बात निकली नहीं कि उन्हें अचानक लगने लगता है कि समाज की गली से गुज़रते वक्त, थूकने के अलावा भी उनका कोई योगदान होना चाहिए. फिर इसके ऊपर चढ़ के ये भाव आता है कि हमारा तो हमारा, उसका भी तो योगदान हो. ये समाज सेवा का उत्तर आधुनिक संस्करण है. अहं ब्रह्मास्मि से एक स्टेप आगे वयं ब्रह्मास्मि टाइप. बस वहीं से उस ब्रह्म वाक्य का भी जनन होता है ‘तब तुम कहाँ थे?’
वाजिब प्रश्न है. मैं तैयार हूँ इस प्रश्न के लिए. मुआफ़ी मांग लूंगा. मेरी ग़लती से पिछले जन्म का डाटा डिलीट हो गया था, चित्रगुप्त को ठीक-ठाक करके मुझे दुबारा जनम दिलवाने में टाइम लग गया. वैसे भी उन्हें कौन सा मेरा जवाब सुनना है. वो तो अगली ट्रोलिंग की तैयारी करने में लगे होंगे.
उन्हें अर्थव्यवस्था की भी जानकारी है, राजनीति की भी और धर्म से तो खैर चोली दामन का रिश्ता है ही. ये अलग बात है कि बताना मुश्किल है कि इन दोनों में चोली के रोल में कौन है और दामन में कौन. उन्हें रेप पर बोलना ज़रूरी है, मून मिशन पर भी, सेना पर भी. वो किसी की चुप्पी पर भी बोलते हैं, बोलने पर भी. वो इस बात से परेशान रहते पाए गए कि मरने के बाद वो क्यों नहीं बोलता. उसी को उठाते-जगाते ही इन्हें शायद भान हुआ कि लोचा इतिहास लेखन में है, उसे दुरुस्त करना होगा. इनके पास फावड़ा कुदाल था ही. खुदाई चालू कर दी. पुनर्व्याख्या? हुंह! रिसरेक्शन ऑफ हिस्ट्री. उत्खनन में इतना माल निकल गया है कि एक नई सभ्यता बस जाएगी. अभी सेटल होने में थोड़ा वक्त लगेगा तब जाकर लोगों को पता चलेगा कि हिस्ट्री नॉट ओनली रिपीट्स इटसेल्फ बट आल्सो कट्स, कॉपीज़, एंड पेस्ट्स टू!
लिखने में ज़्यादा वक्त लगेगा ऐसी पवित्र भावना मन में रखते हुए उन्होंने फोटो पर भी साइड बाई साइड काम किया. वास्तु कला और काष्ठ कला पर भी करते पर एक तो उसमें खामखाँ शारीरिक ऊर्जा का ह्रास होगा जिसके लिंचिंग-विन्चिंग आदि में बेहतर इस्तेमाल के मौके हैं अभी. दूसरा, भवन निर्माण कला पर पिछले सालों का अनुभव अच्छा नहीं रहा इसलिए अभी रुके हैं.
इतिहास लिखते-लिखते ही इन्होंने गालियों के समाजशास्त्र पर भी पुरस्कराना काम किया है. ट्रेडिशनल गालियों के साथ एक नई, जोड़े वाली गाली ईज़ाद की है. सेक्युलर-लिबरल. इतिहास गवाह है, हालांकि उसकी हरकतों की वजह से उसे उसे गवाही देने बुलाया नहीं जाता, कि सैकड़ों महान गालियों में शब्द युग्म वाली गालियाँ तो कई हैं लेकिन, युग्म में दोनों ही शब्दों से ऐसी मौलिक महक नहीं निकलती जितनी इनसे. कमल दल फूले टाइप लगने लगता है. कभी-कभी अतिरिक्त सुगंध के लिए ‘सो कॉल्ड’ का स्प्रे मार देते हैं लोग. लीजिये भौंरे भी झूल गए. आप गंग-जमुन, अधिकार-फदिकार, तर्क-कुतर्क जैसी कोई अहमकाना बात कीजिये देखिये टप्प से नवाज़े जाएंगे इन अलंकरणों से.
आगे आने वाली पीढ़ियों को अभी से शुक्रिया अदा करना शुरू कर देना चाहिए. आप पबजी खेलते रहिए, इनकी कृपा सालों तक आपके पीछे-पीछे आती रहेगी. क्योंकि वर्तमान में फैले इतिहास के मलबे से ये आपका सुनहरा भविष्य बना रहे हैं. इनका इतना बड़ा योगदान है समाज, ख़ासकर न्यूली एमर्ज्ड `सोशल समाज’ पर, कि लिखने के लिए मैं सब धरती कागद करूँ, लिखनी सब बनराय, सात समुद्र की मसि करूँ तब भी न लिखा जाएगा. मुझे कोफ़्त है खुद पर कि मैं ऐसा नहीं कर पा रहा हूँ.
मुझे इस बात की भी कोफ़्त है कि… मैं अक्सर भूल जाता हूँ कि खुद से इतनी कोफ़्त होने से आदमी कोफ्ता हो जाता है.
डिस्क्लेमर- ये लेखक के निजी विचार हैं.
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अमित श्रीवास्तव
उत्तराखण्ड के पुलिस महकमे में काम करने वाले वाले अमित श्रीवास्तव फिलहाल हल्द्वानी में पुलिस अधीक्षक के पद पर तैनात हैं. 6 जुलाई 1978 को जौनपुर में जन्मे अमित के गद्य की शैली की रवानगी बेहद आधुनिक और प्रयोगधर्मी है. उनकी दो किताबें प्रकाशित हैं – बाहर मैं … मैं अन्दर
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