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सिद्धार्थ शुक्ला- एक मौत जो छोड़ गई जिंदगी के सवाल कई

ईश्वर अगर किसी को सिद्धार्थ शुक्ला जैसी सफलता देने की पेशकश करे, तो हर आदमी हाथ फैलाकर ईश्वर की ओर दौड़ेगा. लेकिन अगर उन्हें साथ में यह कह दिया जाए कि जब वे सफलता के शीर्ष पर होंगे, तो उनसे जिंदगी को छीन लिया जाएगा, तो तय है कि सब ईश्वर की ओर पीठ करके उलटे पांव दौड़ पड़ेंगे. क्योंकि दुश्वारियों और संघर्षों के बावजूद जिंदगी तो बनी ही रहनी चाहिए, मौत की कीमत पर सफलता का कोई खरीदार नहीं हो सकता. यह जीवन के नियमों के खिलाफ है.
(Sidharth Shukla)

सिद्धार्थ शुक्ला की मौत उनके चाहने वालों को सन्न कर गई. न सिर्फ सन्न कर गई, बल्कि वे डर गए. जिंदा रहने का वह यकीन जो उन्हें रोज रात को सोते हुए सुबह का सूरज देखने को लेकर आश्वस्त करता था, वह चरमरा उठा. सांसारिक पैमानों पर हर मायने में एक सफल व्यक्ति जो इतना सुडौल दिखता था, जो जिम में वर्कआउट करता था, उसे 40 की जवां उम्र में हार्ट अटैक कैसे हो सकता है? यह बात फिटनेस की ओर ध्यान न देने वाले और जिम में जाकर फिटनेस करने वाले, दोनों तरह के लोगों को परेशान कर रही थी. लेकिन अगर दिल के स्पेशलिस्ट डॉक्टरों से बात की जाए, तो कोई भी डॉक्टर जिम में जाकर शरीर की मांसपेशियों को बड़ा और ताकतवर बनाने को फिट होना नहीं कहेगा. अलबत्ता कोई अगर जिम कभी नहीं भी जाता, पर नियमित वॉक करता है, जॉगिंग करता है, सुबह जल्दी उठता है, सात्विक भोजन करता है, खुश रहता है, काम और आराम के बीच संतुलन बनाकर चलता है, ध्यान, योग और प्राणायाम का नियमित अभ्यास करता है, तो उसे जरूर फिट कहा जा सकता है. उसके मामले में इस बात को लेकर आश्वस्त रहा जा सकता है कि उसका दिल यूं अचानक धोखा नहीं देगा.

यह बहुत अफसोस की बात है कि पतंजलि के इस देश में लोगों को मन को साधने की ट्रेनिंग नहीं दी जाती. सच यह है कि मेडिटेशन ही हमें उस एनजाइटी से बचा सकता है, जो आधुनिक जीवन में अपने हजार रूपों में चारों ओर से हम पर हमला करती रहती है. सिद्धार्थ शुक्ला की दुखद आकस्मिक मौत से साबित होता है कि हमारा दिल कभी यह नहीं देखता कि हम कितने सफल हैं, हमारे बैंक में कितना पैसा है, हमारा दुनिया में कितना नाम है, पर वह यह जरूर देखता है कि हम अक्सर शराब की पार्टियां करते हैं या नहीं, हम तामसिक भोजन करते हैं या नहीं, पूरे-पूरे दिन काम करते रहते हैं या आराम के लिए भी वक्त निकालते हैं. वह यह भी देखता है कि हम कितना और क्या सोचते रहते हैं.

इस बात को समझ लें कि दिल के लिए सबसे सुकून के पल वे होते हैं, जब हम गुजरते हुए लम्हे पर सवार होकर जीते हैं. हम जब खुश होते हैं, तो हमारा दिल हमसे ज्यादा खुश होता है. कभी खुशी के किसी पल में दिल की धड़कनें सुनने की कोशिश कीजिए. आप पाएंगे कि आपकी सांस की सरगम पर दिल तबले की तरह धमक रहा है. सांसों की सरगम और दिल की धमक से जब जिंदगी का संगीत निकलता है, तो वह अमृत की तरह आपके शरीर की कोशिकाओं में प्रवेश करता है. अमृत का काम ही है मृत्यु को भगाना. तब मृत्यु आपसे कोसों दूर बनी रहती है.
(Sidharth Shukla)

सिद्धार्थ के जीवन में वह सब कुछ था, जो दिल को सांस की सरगम पर धमकने से रोकता था. निस्संदेह उसके पास बाहर से देखने में एक बलिष्ठ शरीर था. पर यह बात जान लें कि शरीर बाहर से दिखने में नहीं, बल्कि भीतर से बलवान होना चाहिए. आप कितनी लंबी सांस रोक पाते हैं, विपरीत स्थितियों में भी अपनी पॉजिटिव सोच की ताकत का उपयोग कर खुद को गुस्से, चिंता, घबराहट जैसे इमोशंस से कैसे बचा पाते हैं, घरवालों और दोस्तों से मिलने वाले प्रेम के बदले उन्हें कई गुना ज्यादा प्रेम लौटाकर अपने मन को कैसे अहोभाव से भरे रखते हैं, अपनी इंद्रियों को नियंत्रण में रखते हुए कैसे खुद को भोग-विलास और व्यसनों से बचाएं रखते हैं, यह तय करता है कि आप भीतर से कितने बलवान हैं.

सिद्धार्थ शुक्ला को ये सारी बातें समझ में तो आईं, पर उसने थोड़ी देर कर दी. इस खूबसूरत नौजवान में प्रतिभा की कोई कमी न थी, पर वह बाहरी खुशी और सांसारिक सफलताओं की तलाश में शरीर की हदों को लांघता चला गया और अपने चाहने वालों को बहुत दुखी कर गया. काश, सिद्धार्थ आनंद की खोज में कभी अपने ही भीतर की यात्रा पर भी निकलता. तब शायद वह समझ पाता कि बाहरी चकाचौंध भरी दुनिया असल में कितनी अंधकार भरी है. अंधकार के उन थपेड़ों में सांस की सरगम से जुदा होकर कमजोर पड़ चुके दिल का चिराग आखिर कब तक जलता.
(Sidharth Shukla)

-सुंदर चंद ठाकुर

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कवि, पत्रकार, सम्पादक और उपन्यासकार सुन्दर चन्द ठाकुर सम्प्रति नवभारत टाइम्स के मुम्बई संस्करण के सम्पादक हैं. उनका एक उपन्यास और दो कविता संग्रह प्रकाशित हैं. मीडिया में जुड़ने से पहले सुन्दर भारतीय सेना में अफसर थे. सुन्दर ने कोई साल भर तक काफल ट्री के लिए अपने बचपन के एक्सक्लूसिव संस्मरण लिखे थे जिन्हें पाठकों की बहुत सराहना मिली थी.

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