फोटो सुनील पन्त
भारत और नेपाल की सीमा पर पिथौरागढ़ जिला मुख्यालय से तकरीबन 68 किमी. पर जौलजीबी कस्बा बसा है. सीमावर्ती क्षेत्र होने के कारण एक जमाने में यहीं से नोटिफाइड एरिया शुरू होता था. गोरी नदी पर बने पुल को पार कर दायीं तरफ मुड़ते ही बने चैक पोस्ट पर सभी वाहनों की तसल्लीबक्श चैकिंग होती और केवल स्थानीय या इनर लाइन परमिटधारियों को आगे धारचूला की तरफ जाने की अनुमति होती थी. वर्तमान में नोटिफाइड एरिया ब्यांस घाटी के छियालेक से शुरू होता है. जौलजीबी को पूर्वी भोटांतिक क्षेत्र का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है इसके बायीं ओर गोरी नदी से साथ आगे बढ़कर जोहार घाटी और दायी ओर काली-धौली नदियों के साथ चौदास, ब्यास व दारमा घाटियों तक पहुंचा जा सकता है. पुल से करीब एक किलोमीटर की दूरी पर जौलजीबी का छोटा सा बाजार है. बाजार के दायीं ओर दो सौ मीटर ढलान पर उतरने पर काली और गोरी नदियों के संगम किनारे बड़ा सा तप्पड़ है, जिसपर जौलजीबी का ऐतिहासिक मेला पर लगता है. यहीं शिव का प्राचीन ज्वालेश्वर मंदिर भी अवस्थित है. काली नदी के दूसरी ओर नेपाल है तथा नदी पर बना कच्चा झूला पुल दोनों देशों को जोड़ता है. Jauljibi Mela
जौलजीवी मेले को प्रारम्भ करने का श्रेय अस्कोट के पाल ताल्लुकदार स्व. गजेन्द्रबहादुर पाल को जाता है. उन्होंने यह मेला सन् 1914 में प्रारम्भ किया था. स्कन्द पुराण में भी वर्णित है कि मानसरोवर जाने वाले यात्री को काली-गोरी के संगम पर स्नानकर आगे बढ़ना चाहिये. इसलिए मार्गशीर्ष माह की वृश्चिक संक्रान्ति को मेले का शुभारम्भ संगम पर स्नान से होता था. वर्ष 1974 तक पाल रियासत के वारिसों के हाथ में जौलजीबी मेले की बागडोर रही. बाद में वर्ष 1975 में यूपी सरकार ने मेले को अपने हाथों में ले लिया और तभी से ये मेला देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के जन्मदिन पर 14 नवम्बर से मनाया जाने लगा. 2007 से इस मेले के आयोजन को पर्यटन एवं संस्कृति मंत्रालय, उत्तराखंड शासन ने ले लिया. Jauljibi Mela
फोटो सुनील पन्त
यद्यपि शुरुवाती दौर में यह मेला धार्मिक दृष्टिकोण से ही प्रारम्भ हुआ लेकिन धीरे-धीरे इसका स्वरुप व्यवसायिक बनता गया. सप्ताह भर चलने वाले मेले के व्यापारिक महत्व को देखते हुए तिब्बत, जोहार, दारमा, ब्यास के शौका व्यापारी और पश्चिमी नेपाल से लोग अपने स्थानीय उत्पादों के साथ आने लगे. इस मेले में पश्चिमी नेपाल से शहद और घी प्रमुख रूप से लाया जाता था. भारतीय क्षेत्र से धारचूला-मुनस्यारी तहसीलों के भोटिया वर्ग के व्यापारी सांभर खाल, चँवर- पूँछ, कस्तूरी, जड़ी-बूटियों और ऊनी वस्त्र जैसे- दन-कालीन, चुटका, थुलमा, ऊनी पॅखी आदि बेचने हेतु मेले में लाते थे.
तराई-भाबर से आने वाले व्यापारी वर्ग काष्ठ यन्त्र हल, जुआ, ठेकी आदि लाते थे. नेपाल के हुमला -जुमला के व्यापारी जौलजीबी पार मैदान में घोड़ों का बाजार लगाते थे और नेपाल के घोड़ों की मेले में खास डिमांड रहती थी. कपड़ा, नमक, तेल, गुड़, हल, निंगाल के बने डोके, तांबे के फौले, काष्ठ उपकरण-बर्तन आदि यहाँ प्रचुर मात्रा में बिकते थे. मेले के आयोजन से सीमांत क्षेत्र के लोगों के आपसी भाईचारे के चलते तिब्बत और नेपाल से रोटी बेटी के संबंध जुड़ने लगे.
1962 में चीनी आक्रमण से पूर्व मेले में तिब्बत और नेपाल के व्यापारियों की सक्रिय भागीदारी होती थी. लेकिन भारत चीन युद्ध के बाद से तिब्बती व्यापारियों और कौतिक्यारों का जौलजीबी मेले में आना बंद हो गया. आज भले ही तिब्बती व्यापारी इस अन्तर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक-व्यापारिक मेले में शिरकत नहीं करते लेकिन भारत-चीन के मध्य होने वाले स्थलीय व्यापार के जरिये भारतीय शौका व्यापारियों द्वारा तिब्बत से आयात किया गया माल जौलजीबी मेले में बेचा जाता है. इस मेले में तिब्बती सामान की भारी खरीद होती है. पिछले 10-15 सालों से इस मेले में मेरठ, लुधियाना, कानपुर, कोलकाता के व्यापारियों तथा हल्द्वानी, बरेली, रामनगर और टनकपुर मण्डियों के आढ़तियों की आमद लगातार बढ़ी है. अब परम्परागत वस्तुओँ के स्थान पर आधुनिक वस्तुओं का क्रय-विक्रय ज्यादा होने लगा है. मेले में जिला बाल विकास, खादी ग्रामोद्योग, उद्यान विभाग, सूचना विभाग, जनजाति विकास विभाग कृषि-बागवानी आदि विभागों द्वारा स्टॉल तथा प्रदर्शनी भी लगाई जाती है. इसके अतिरिक्त झूले-सर्कस आदि के साथ-साथ स्थानीय विद्यालयों के छात्र-छात्राओं द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाता है. Jauljibi Mela
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यहाँ बहने वाली काली नदी जिसे नेपाल में महाकाली नाम से जाना जाता है, भारत और तिब्बत जो जोड़ने वाले लिपुलेख दर्रे के पास स्थित कालापानी से निकलती है. काली नदी भाभर में बनबसा (चम्पावत) तक भारत-नेपाल के बीच अन्तराष्ट्रीय सीमा बनाते हुए बहती है. इसी नदी पर दुनियां का दूसरा सबसे ऊँचा बांध पंचेश्वर नामक जगह पर बनाने की तैयारी है. जिसकी 134 वर्ग किलोमीटर की झील में 31 हजार से ज्यादा लोग व 130 सम्पन्न गांव विस्थापित होंगे और हजारों हेक्टेयर जंगल, उपजाऊ खेतों तथा अनेक सांस्कृतिक-ऐतिहासिक विरासतों के साथ तीन देशों की साझी संस्कृति का प्रतीक जौलजीबी मेला क्षेत्र भी हमेशा के लिए डूबने की जद में है. Jauljibi Mela
सुनील पन्त
रुद्रपुर में रहनेवाले सुनील पन्त रंगकर्म तथा साहित्य की दुनिया से लम्बे समय से जुड़े हुए हैं.
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