फोटो: सोशियल मीडिया से साभार
लोग अपने कालेज के दिन याद करते हैं. जवानी के दिनों पर चर्चा करते हैं पर मुझे लगता है पहाड़ी लोग अपने स्कूल के समय को याद करते हैं. उसमें भी हमारी कलम-दवात और पाटी (तख्ती) वाली पीढी. अगर दिन के स्कूल हुए तो ईजा हमें नहलाकर और सुबह के स्कूल हुए तो जल्दीबाजी में मुख में पानी लगा कर हमें तैयार करती थी. एक बात जरूरी जो थी वो हुई हमारे सिर पर तेल चुपड़ना वो भी सरसों का. तेल भी इतना कि आजकल के तथाकथित हैल्थ कॉन्शस लोगों का एक टैम का भुटण हो जाय साग में. सर्दियों में भले ही हमें हफ्ते में एक बार नहलाया जाय पर स्कूल जाते समय हथेली भर कर रोज तेल चुपड़ कर हमारे बालों पर कंघी जरूर की जाती थी.
(School Memoir Vinod Pant)
तेल को सिर पर लगाने के बाद उसी हाथ से हमारे मुंह पर भी वही तेल चुपड़ दिया जाता ताकि हमारे गाल या मुंह न फटें. ईजा या आमा लोगों का मानना था कि तेल डालने से आखों की रोशनी बढती है. दिमाग में तरावट रहती है मुझे तो ये बात सही भी लगती है. ग्रामीण बच्चों की आखें एकदम सही रहती थी और बागेश्वर, अल्मोड़ा, नैनीताल शहरों में रहने वाले हमारे हमउम्र अधिकतर बच्चों की आँखों में चश्मा चढा रहता था.
तब पहाड़ की ग्रामीण महिलाओं के जिम्मे सारी गृहस्थी का काम था तो हमें तैयार करने में हमसे बड़ी बहनों का सहयोग भी रहता था. दीदी लोग अपने बहिन भाईयों को तैयार करते क्योंकि उन्हें खुद भी तैयार होना होता था इसलिए हमारे जरा भी नखरे या लापरवाही में कूट भी देते. बाल बनाते वक्त तो लगभग बालों को उचेड़ ही देते. रोने पर जा खुद कर ले की तड़ी होती.
एक चीज मुझे अचंभित करती है कि आजकल के बच्चों की नाक क्यों नहीं बहती. यह बदलाव ग्लोबल वार्मिग के कारण है या कुछ और इस पर शोध होना चाहिये. हमारे समय तो हम बच्चों की नाक से छ्वा फूटा रहता था. ले हतौड़ा, मार फतौड़ा चलता रहता पूरे दिन या बाबाजी वाला योग- अन्दर लो, बाहर लो. सांस अन्दर तो वो भी अन्दर सांस बाहर तो वो भी बाहर. दिन भर सुणुक्क-सुणुक्क का संगीत बजाते रहते थे हम.
अब आती हमारी नाश्ते की बारी. यह कम ही होता था कि भीतर गोठ के काम के बीच ईजा या आमा को हमारे लिए रोटी बनाने का समय मिले. हम तो रात की बासी रोटी जांती पर गरम करके बड़े स्वाद से खा लेते. साथ में होता था मूली का कच्चा थेचुवा, धनिये का नमक, भांग का नमक, घी या मठ्ठा या कभी कभी डली वाला नमक. हम उसकी कटक लगाकर भी खा जाते. गुड़ या मिश्री के साथ भी चल जाती थी रोटियां. और तो और गरम दूध में डुबोकर भी खाई है हमने रोटी. कभी रात का बचा हुवा साग हुवा तो रोटी के बीच में डालकर रोल बनाकर खा लेते. कभी स्कूल के लिए देर हो रही होती तो रोटी का रोल खाते खाते दौड़ लगा देते थे.
(School Memoir Vinod Pant)
कभी क्या स्कूल के लिए लेट तो हम अक्सर होते ही थे. सुबह उठने में तो हम नखरे ही करते. ईजा हमें जगाकर गाय दूहने चली जाती हम फिर सो जाते ईजा कभी प्यार से कभी गुस्से से जगाती थी पर हम तो एकाद थप्पड़ के बाद ही उठते. रोते-रोते गधेरे जाते वापस आकर आज ईसकूल नै जान्यू का डायलाग मारते.
घर से रोज सुबह स्कूल जाने का मन भले ही न हो पर जब घर से निकलते तो एक-दो दोस्तों से मिलते ही हमारा मन बदल जाता था. फिर स्कूल जाना अच्छा लगने लगता. शुरुआत यानी पहली दूसरी क्लास में तब पाटी चलती थी और साथ में कमेट की दवात और गाबी या निगालू की कलम.
तख्ती को गले में लटकाकर दूसरे हाथ में कमेट की दवात लिए नीली बुकसट और खाकी पेन्ट जिसकी तशरीफ में एक दो महिने बाद टल्ली आ जाती. टल्ली का रंग लाल हरा नीला पीला कुछ भी हो सकता था. यही सब पहने हम बहुत खुश होकर चलते थे. हां घर से चलते समय हम अपने दोस्तों को धात जरूर लगाते- ऐ हरि, ऐ गुड्डू आओ रे. यदि कोई सहपाठी आगे चले गये तो हम पीछे से धात लगाते- ओ परुलि , ओ हेंमा.. रुको रे… मी ले ऐगेयू.
साथ-साथ चलने में आनन्द आता. भले रास्ता कम हो या ज्यादा हम जो पाटी लटकाकर चलते उसका दोस्तों से कम्पटीशन होता था कि किसकी पाटी ज्यादे काली और घुटी है. रीठे के दाने से घुटाई कर चिकना बनाते. टार्च के खराब सैल को फोड़कर या केतली या तवे से मोस् निकालकर पाटी को मोस्याते यानी काली करते. एक दवात में कमेट डालकर घोलते फिर उल्टी कलम से उसको मिलाते, फैंटते थे. गाबी की या निगालू या पय्यां की कलम बनाया करते. बांज की कलम की मनाही थी- बांज-बांज बिद्या नांश, की कहावत प्रचलित जो थी.
कक्षा तीन से कापी और स्याही की दवात चलती थी. स्याही की टिक्की स्वास्तिक या वी कम्पनी की होती थी. कलम की नोक कक्षा एक दो के मुकाबले अब कापी के हिसाब से पतली बनती थी. कापी कैपिटल कम्पनी की अच्छी मानी जाती. एक हल्की क्वालिटी की जो सरकारी राशन की दुकान पर मिलती थी जिसे हम छेरु कापी कहते. एक पन्ने पर लिखो तो स्याही अगले पन्ने तक पहुंच कर खराब कर देती. वो सस्ती थी इसलिए खरीद ली जाती थी. कापी के बीच में मोरपंखी नामक पत्ते रखना अनिवार्य था विद्या इसी से आती थी. कापी किताब पर पैर लगने पर मान्यता थी कि विद्या माता नाराज हो जाएगी. हालाकि हर झूठी कसम हम विद्या माता की ही खाते थे. सच्ची कसम अपनी ईजा बाबू की खाते थे. तब विद्या का सही उच्चारण भी हमारे लिए बिध्या माता हुवा करता था.
(School Memoir Vinod Pant)
प्रार्थना करते समय हम लयबद्ध तरीके से समूह में पेन्डुलम की तरह हिला करते थे. प्रार्थना के बाद भारत मेरा देश है और हर भारतवासी हमारे भाई बहन हैं, की प्रतिज्ञा भी रोज लेते थे. हाफटाइम का हमें इन्तजार रहता था. कपड़े की बॉल और बांज के बैट से क्रिकेट चलता था. बॉल भ्योव घुरीना बड़ा खलता था तब. गिल्ली डन्डा, अड्डु, आईस-पाईल, ऊँच-नीच जैसे खेल होते. हाफटाइम होने पर हाट्टाईम हैगे कहकर चिल्लाते हुए भागते और हाफटाइम खत्म होने पर हाट्टाईम पुरी गे कहकर वापस क्लास में दौड़ पड़ते.
क्लास में चटाई हो न हो हमें फरक नही पड़ता. माट् में भी बड़े ठाट से बैठ जाते. जब हम दवात में डोब डालकर कलम छटकाते तो खुद के साथ बगल वाले बच्चे के पेन्ट शर्ट पर माडर्न आर्ट बन जाता. पाठ याद न होने पर जमकर कुटाई होती पर ये बात हम घर पर नहीं बताते थे वरना घर पर पिटाई का रिवीजन जरूर हो जाता था.
एक खास बात और हमें प्राइमरी में तब अनौपचारिक तौर पर पहाड़ी माध्यम में पढाया गया था जैसे – एक बोट में पांच आम छी तीन झड़ ग्याय कतुक बच? या यो कविता में कवि कूण लागि रौ, टाइप से.
आजकल बच्चे डाक्टर,आई ए एस, इन्जीनियर, वकील बनने के सपने देखते हैं हम तो केमू के ड्राइवर बनना चाहते थे. सोचते कि ड्राइवर के मजे हैं. सब जगह फ्री में घूम लेता है. गाड़ी की सवारी करता है सो अलग या मास्टर बनना चाहते थे ताकि हमारी जो कुटाई हो रही है मास्टर बनकर हम भी बच्चों को कूटें और हमारा बदला पूरा हो सके.
स्कूल से छुट्टी पर ऐसे भागते घर को मानो पीछे पुलिस पड़ी हो या गोठ से किसी ने बकरिया एक साथ खोल दी. घर पहुंचने पर कढाई या पतीले में भात रखा होता. उसे तताकर खाते नीचे जो कुटूणि लगी होती उसके लिए बहिन भाईयों से लड़ पड़ते. होमवर्क नाम की चीज होती नहीं थी तो हम खाते ही खेलने को दौड़ लगा देते.
ओओओओओ… गुड्डु… आ रे खेल करुल, की आवाज के साथ.
(School Memoir Vinod Pant)
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वर्तमान में हरिद्वार में रहने वाले विनोद पन्त ,मूल रूप से खंतोली गांव के रहने वाले हैं. विनोद पन्त उन चुनिन्दा लेखकों में हैं जो आज भी कुमाऊनी भाषा में निरंतर लिख रहे हैं. उनकी कवितायें और व्यंग्य पाठकों द्वारा खूब पसंद किये जाते हैं. हमें आशा है की उनकी रचनाएं हम नियमित छाप सकेंगे.
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