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नये ट्रैफिक नियमों के बाद चौराहे पर काबिलियत दिखाने को लालायित हैं पुलिस वाले

आज चौराहों पर बडी हलचल है.  पुलिस, ट्रैफिक पुलिस और उनके सहयोगी होमगार्ड वाले मुस्तैदी से तैनात हैं. ऐसा नहीं है कि ये पहले तैनात नहीं होते थे पर अब ऐसा लगता है सरकार ने इनको परमाणु हथियारों  से लैस कर दिया हो. सभी का आत्मविश्वास चरम पर है. 

मोटर साइकिल, कार वाले, बेकार गाड़ी वाले ऐसे सड़क पर निकले हैं जैसे नई बहू जेठ और ससुर जी से नजरें बचाकर चलती है.  या जेठ और ससुर जी के आगे संभल संभल कर कदम चलाती है कि न जाने क्या गलती हो जाय.

मुख्य चौराहों के आस-पास की गलियां बाईपास बनकर गुलजार हो रही हैं. गलियों से निकलकर चौराहा बचाकर जाना कुछ ऐसा ही है जैसे पंडित जी को बुलाकर शनि की दशा के लिए जाप करवाना. होना कुछ नहीं दिल की तसल्ली हो जाती है. कुछ कर्तव्यनिष्ठ पुलिस के जवान गली के मोड़ पर भी तैनात हैं. और हकीकत ये है कि न जाप आपको शनि के प्रकोप से बचाता है न ही कट मारना आपको जुर्माने से बचाएगा.

अगर आप पुलिस की मुस्तैद नजरों से किसी कारण बच गये तो यकीन जानिये आप अपने को दुनियां का सबसे चालाक आदमी समझते हैं और मन में ये भाव उमड़ने लगता है कि पुलिस आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकती बस दिमाग होना चाहिये. और घर जाकर आप अपनी इस चालाकी से बच जाने की घटना को अपनी पत्नी को जरूर सुनाते हैं जिसके अनुसार आपके पास दिमाग नाम की चीज है ही नहीं.

बकौल पत्नी दिमाग तो हमेशा जीजाजी के पास ही पाया जाता है. आप पत्नी की ये धारणा समाप्त करने पर उतारू हो जाते हैं. अपने समर्थन के लिए आप बच्चों को बीच में जरूर बैठाते हैं.  और भविष्य के लिए आप इस घटना को संजो के रखना चाहते हैं ताकि आप अपने नाती-पोतों को सुनाकर खुद को अपने युग का सबसे जीनियस साबित कर सकें. खैर ये तो थी ट्रैफिक नियम पर फंसने और बचने की दास्तान. आगे बढते हैं.

पुलिस विभाग में अलग ही अफरा-तफरी का माहौल है. अब तक चौराहों पर थकाऊ-उबाऊ और धूल खाने की पर ड्यूटी से बचने वाले कर्मी अचानक ट्रैफिक संचालन की ड्यूटी की मांग करने लगे हैं जैसे फौजी अपनी वीरता दिखाने के लिए सरहद पर पोस्टिंग मागता है. कुछ पुलिस के जवान तो यहां तक कह रहे हैं कि साहब इतने साल आफिस में कलम घिसते हो गये अब तो चौराहे पर ड्यूटी लगवा दो.

साहब अपनी काबिलियत दिखाने का मौका दे दो. यह कुछ ऐसा ही दृश्य है मानो दुर्गम के मास्साब सुगम में आने को बेताब हैं. सुना तो यहां तक गया है कि चौराहों पर किन कर्मियों की तैनाती होगी उनके लिए सिफारिशी फोन मन्त्री से लेकर अधिकारियों के तक आने लगे हैं. 

मेरा पड़ोसी जो ट्रैफिक पुलिस का सिपाही है, चौतीस साल होने को आये रिश्ता नहीं हो पा रहा है, अचानक नया ट्रैफिक नियम आने से जन्मपत्रियों की बहार आ गयी. सुना है डाक्टर, इन्जीनियर लडकियों के रिश्ते आने लगे हैं.

प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी में लगे युवा आई. ए. एस. की तैयारी छोड़कर पुलिस कास्टेबल भर्ती परीक्षा की उपकार प्रकाशन की गाइड खरीदने बुक स्टोर की तरफ भागते नजर आ रहे हैं. 

लेखक लोग प्रेमचन्द की नमक के दारोगा की तर्ज पर ट्रैफिक का दारोगा पर कहानी लिखने लग गये हैं. क्या पता कोई कालजई रचना निकल जाय. कुछ लेखकों ने बकायदा ट्रैफिक का दारोगा और ट्रैफिक हवालदार शीर्षक रजिस्टर्ड भी करवा दिया है. 

आगे बढते हैं अब आते हैं चालान पर. अभी तो ट्रैफिक नियम तोडने पर ही चालान है भविष्य में ये भी जोड़ा जा सकता है कि आपके बाल हैलमेट से बाहर हो तो चालान. दाढी नहीं बनाई तो चालान वगैरह वगैरह.

चालान की राशि काफी सोच समझ कर रखी गयी है ताकि कल को ये कहा जा सके कि हमारे यहां चालान से जमा राशि पाकिस्तान के सकल घरेलू उत्पाद से ज्यादा है. देखो देश तरक्की कर रहा है हम इतना ज्यादा चालान हंस-हंस कर भुगत सकते हैं. पब्लिक की जेब में पैसा है तभी तो दे पा रहे हैं. हो सकता है कि बार बार ट्रैफिक नियम तोड़ने वाले किसी सरफिरे और बड़े बाप के लड़के को देश की अर्थब्यवस्था में महती योगदान के लिए कोई पीतल पदक से सम्मानित किया जाय. 

फाइनैन्स कम्पनियां होम लोन प्रापर्टी लोन के साथ चालान लोन के इश्तिहार आपके घर की दीवार पर चिपका जाय और आप पहले की तरह गाली निकाल कर इसे फाडें नहीं वरन सावधानी पूर्वक निकाल कर अपने जरूरी कागजातों में संभाल कर लेमिनेशन करके रख ले ताकि वक्त बेवक्त काम आये. इनका मोबाइल नम्बर भी सेव कर लें अपने फोन पर.

अब किसी का बेटा बाप से नाराज होकर घर छोडने की धमकी नहीं देगा. बीबी नाराज होकर मायके नहीं जाएगी, बस एक ट्रैफिक तोड़ने की एक छोटी सी धमकी देकर मामला सुलटा लेंगे. पड़ोसी आपका अहित करने के लिए आपको बद्दुवा नहीं देगा आपकी गाड़ी ले जाकर बीच चौराहे रेड सिग्नल तोडकर आ जाएगा. आप भरते रहो अपने कर्मो के फल.

वर्तमान में हरिद्वार में रहने वाले विनोद पन्त ,मूल रूप से खंतोली गांव के रहने वाले हैं. विनोद पन्त उन चुनिन्दा लेखकों में हैं जो आज भी कुमाऊनी भाषा में निरंतर लिख रहे हैं. उनकी कवितायें और व्यंग्य पाठकों द्वारा खूब पसंद किये जाते हैं. हमें आशा है की उनकी रचनाएं हम नियमित छाप सकेंगे.

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Girish Lohani

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