शीर्षक थोड़ा अटपटा है. धैर्य रखिए, पूरा पढ़ने के बाद समझ में आएगा. ‘अतिथि देवो भव:’ हमारी प्राचीन भारतीय परम्परा का सूत्र-वाक्य है. बचपन से हम सुनते आ रहे हैं कि अतिथि को ईश्वर का स्वरूप मानकर आदर-सत्कार करना चाहिए.
(Satire by Ashutosh Mishra)
अतिथि दो प्रकार के होते हैं- एक वो, जिन्हें देखते ही अंतरात्मा से सेवा-भाव की भावना उत्पन्न हो जाती है. यदि उनकी सेवा में कोई कमी रह गयी, तो भले ही शिष्टाचारवश वे कोई शिकायत न करें, लेकिन अपने मन में अपराधबोध उत्पन्न हो जाता है.
दूसरे प्रकार के वे अतिथि होते है, जो ‘आवत ही हरसे नहीं नैनन नहीं सनेह, तुलसी तहॉ न जाइए कंचन बरसे मेघ’ को तिलांजलि देकर ज़बरदस्ती घर में आ जाते हैं. आ क्या जाते हैं, घुस जाते हैं. सरल शब्दों में एकदम निर्लज्ज, लतखोर. माफ़ कीजिएगा, अतिथि के लिए असंसदीय शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए. लेकिन अतिथि तो अतिथि है. स्वागत-सत्कार का मामला तो बनता ही है. समृद्ध भारतीय संस्कृति में जीवों (जीवाणु, विषाणु, पता नहीं क्या-क्या) पर दया रखने की बात कही गई है. एक प्रकार से दर्जा प्राप्त मंत्री की तर्ज पर इंसानों के समकक्ष मान्यता दी गयी है.
इसी संदर्भ में आज मैं चर्चा कर रहा हूँ कि जबरन अतिथि बने कोरोना का स्वागत कैसे करें? लेकिन इससे पहले यह जानना ज़रूरी है कि इस चिपकू अतिथि से कैसे बचें? तो समझ जाइए कि ये कोरोना निहायत ही आवारा क़िस्म का विषाणु है. चौबिसों घंटे मेज़बान की तलाश में बाज़ार में आवारागर्दी करता है. वहीं पर मटरगश्ती करते मेज़बान को पकड़कर बिन बुलाया मेहमान बन जाता है. इसलिए आप सभी से अनुरोध है कि बाज़ार में न निकलें. घर पर रहें. कोरोना घर पर आने में संकोच करता है. शर्मिला जो है !
(Satire by Ashutosh Mishra)
अब चर्चा करते हैं स्वागत-सत्कार के बारे में-
1. इसे हल्के में न लें, लेकिन इसे लेकर टेंसन भी न लें. फ़िक्र और बेफ़िक्री के बीच में इसे डाल दें. अतिथि के साथ घर में आइसलेशन् में चलें जाए. बाहर जाएँगे, तो उसे बुरा लगेगा. कहेगा, “बिल्कुल मैनर नहीं है इसमें. मेहमान को बाहर का चक्कर लगवा रहा है.”
2. जैसे ही पता चले कि ये हमारे शरीर में आ गया है, तो जैसे विशिष्ट अतिथि के चरण धोने की सनातन परंपरा रही है, उसी तरह से गरम पानी से गरारे करना शुरू कर दें. ध्यान रहें ! कोरोना जी चीन से चलकर आये हैं. बेचारे थके होंगे. अत: बार-बार गरारे करें.
3. अतिथि का स्वागत में गर्म जल पेश करें. मतलब बार-बार गर्म जल को पीजिए. कोरोना को स्नान के लिए स्टीम-बाथ दीजिए. बेचारा बहुत छोटा है लेकिन पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित है.
4. कोरोना जी के आने की सूचना तत्काल अपने चिकित्सक को दें. समझ जाइए कि चिकित्सक महोदय कोरोना के हलवाई हैं. फिर कोरोना को हलवाई की दुकान से चार-पाँच दवा लाकर खिलाइए. मतलब स्वयं खाइए. बेचारा परजीवी है. आप खाएँगे, तभी तो उसे कुछ मिलेगा.
(Satire by Ashutosh Mishra)
5. पूर्ण एवं पौष्टिक आहार लें. कोरोना को हल्दी वाला दूध भी पसंद है, रात में उसे दूध ज़रूर दें. कोरोना अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग रहता है. अत: उसे प्रोटीन-युक्त आहार, बिटामिन्स, खनिज-फनिज जैसे तत्व भी दें.
6. लोगों की शिकायत है कि कोरोना के कारण गंध और स्वाद ग़ायब हो जा रहा है. यह शिकायत उन लोगों की है, जो लगातार खिचड़ी-दलिया, लौकी-तोरी पर निर्भर हो जा रहे हैं. अरे यार ! समझने की बात है, खिचड़ी-दलिया, लौकी-तोरी तो खुद ही गंधहीन-स्वादहीन है. सो दो-तीन दिन में एक बार स्वादिष्ट पकवान से भी कोरोना को भोग लगवाना चाहिए. स्वाद-गंध सब वापस आ जाएगा. समझ रहें है न !
7. अतिथि को आराम की ज़रूरत होती है. अत: उसे आराम देने के लिए भरपूर नींद लें. अर्थात् हमें साबित करना होगा कि हम ‘घोड़े बेचकर सोने वाले देश’ के वो नागरिक है, जिन्हें चुनाव के समय माननीय मतदाता कहा जाता है, बाद में भले लतियाया जाता है.
(Satire by Ashutosh Mishra)
8. कोरोना को नकारात्मक समाचार से नफ़रत है. नकारात्मक ख़बरें सुनते ही वो हमारे हृदय के पास जाकर उछल-कूद करने लगाता है. तदनुसार, अनुरोध है कि टीवी-सीबी, मरने-मारने की ख़बरें, फ़ेसबुक व्हाटसप के अधकचरा ज्ञान से तुरंत दूरी बनायें.
9. आक्सीमीटर और थर्मामीटर से गेस्ट के मूवमेंट पर नज़र गड़ाए रखें. समझ जाइए कि ये दोनों रॉ के एजेंट हैं. हर छ:-आठ घंटे पर इन दोनों को गेस्ट का पता लगाने के लिए दौड़ा दीजिए. यदि पता चले कि कोरोना गुंडागर्दी पर उतर गया है, तो इसे लेकर तुरंत थाने पहुँचाए. यह अस्पताल को थाना मानता है, क्योंकि चाइना का माल होने के कारण ‘डिफ़ॉल्टी’ है.
10. सातवें दिन से बारहवें दिन तक इस पर सतर्क निगाह लगा दीजिए. आराम करते-करते यह अचानक आक्रामक हो जाता है. इन दिनों सेटिंग गड़बड़ाने से यह अपने को मेहमान की जगह शत्रु मानने लगता है.
बहुत हो गया. इतने सत्कार से तो इसे पैदा करने वाला इंसान ‘अघा-कर’ मर जाएगा. इसकी क्या बिसात !
तेरहवें दिन कोरोना जी की ‘तेरहवीं’ हो जाएगी. पन्द्रहवें दिन सूतक ख़तम.अब आप अतिथि से मुक्त होकर सम्पूर्ण घर को नैनीताल का मालरोड मानकर घर में ही विचरण कर सकते हैं. ईश्वर ऐसे अतिथि से सबको बचायें. घर में रहें, सुरक्षित रहें.
(Satire by Ashutosh Mishra)
–आशुतोष मिश्रा
14 नवम्बर 1979 को बलिया जिले के ग्राम गरया में जन्मे आशुतोष उच्चतर न्यायिल सेवा में अधिकारी हैं. ‘राजनैत’ उनका पहला उपन्यास है.
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