संतोष कुमार तिवारी के काव्य संकलन ‘अपने-अपने दंडकारण्य’ पर एक संक्षिप्त टिप्पणी (Review of Santosh Kumar Tiwari Book Amit Srivastava)
कवि का ये दूसरा काव्य-संग्रह है जिसमें जीवन की विविध भाव-भंगिमाओं को समेटती सौ से ज़्यादा संख्या में कविताएं हैं जो निस्संदेह कवि की यात्रा का अगला पडाव हैं. कविताएं कलेवर में छोटी हैं लेकिन प्रभाव में नहीं. ये कविताएं विचारों के पेंच में नहीं फंसतीं, जैसा कि समकालीन कविता में बहुतायत से पाया जाता है, बल्कि विचारों का सरलतम अनुवाद प्रस्तुत करती हैं जो दरअसल जीवन का सहज अनुवाद सा हो जाता है. आज का जीवन जटिल है, आवश्यक रूप से जीवनानुभव भी जटिल ही होगा लेकिन कविता इस अनुभव को सरलतम रूप में किस तरह से बताती चलती है यह भी कविता की आलोचना का महत्वपूर्ण बिंदु होना चाहिए. इन कविताओं से गुजरते हुए हर उस संत्रास, संशय, आपद स्थितियां, शोषण का अनुभव होता जाता है जो आज आमजन के जीवन में उपस्थित हैं लेकिन बहुत ही सहजता के साथ. (Review of Santosh Kumar Tiwari Book Amit Srivastava)
ज़िन्दगी का सबसे बेहतरीन लम्हा
संशयों में गुज़र गया
कवि का काल भूमंडलीकरण का काल है. नब्बे के दशक के बाद से देश में जिस तेजी से आर्थिक उदारीकरण की नीतियाँ लागू हुईं प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या इन नीतियों ने जिस बराबरी, आर्थिक-सामाजिक उन्नति, रोजगार के अवसर आदि का वायदा किया था वो उतनी ही तेजी से आम जनता को मिलीं या नहीं? कवि भी इस प्रश्न से अछूता नहीं रह सकता. रहना भी नहीं चाहिए क्योंकि कविता किसी भी समय के आमजन के दुःख-सुख की अभिव्यक्ति होती है. तब, जब देश एक तरफ सेंसेक्स में उछालें मार रहा है देश की दो तिहाई जनता की रोटी का आधार कृषि मौसम ही नहीं सरकारी नीतियों की मार भी झेल रही है. ऐसे में कवि का प्रश्न कि क्या ये किसानों की आत्महत्या का मौसम है परिस्थितियों की पूरी विडम्बना को एक ही झटके में नंगा कर दे रहा है- (Review of Santosh Kumar Tiwari Book Amit Srivastava)
खेतों में फसल के बजाय
चिता का धुंवा कौंध रहा
ये किसानों की
आत्म-हत्या का मौसम है?
कवि का मासूम प्रश्न यहीं नहीं रुकता कवि को जहां-जहां से जवाब की उम्मीद है वहां मौन है न केवल सत्ता या सरकार बल्कि खुद जनता अपनी दुर्दशा की ज़िम्मेदार है लोकतंत्र की इससे बड़ी विडम्बना क्या होगी?
ठण्ड से हुई मौत का
सरकार के पास नहीं होता कोई ब्यौरा
भूख से हुई मौत पर
सड़क से संसद तक सन्नाटा है
यद्यपि व्यवस्था परिवर्तन के विद्रोही रास्तों की तरफ कवि का प्रत्यक्ष इशारा नहीं है और पूरे कविता-कर्म से कहीं भी इसकी स्पष्ट गूँज नहीं सुनाई देती लेकिन फिर भी जब कवि ये कहता है-
बुझी हुई आग को
थोड़ी हवा चाहिए
फिर क्या, दहक उठेगी ठंडी पड़ी आग
तब कवि इशारों में बहुत कुछ कह उठता है. तमाम संशयों के बावजूद कवि का संघर्ष विराम नहीं लेता बल्कि हर बार नई ऊर्जा के साथ उपस्थित होता है नए संघर्ष के लिए. अगर पंक्तियों के बीच पढने की जहमत पाठक उठाता है तो उसे मिलता है एक सतत चलने वाला संघर्ष जिसकी मंजिल और कुछ नहीं वरन सार्वकालिक मानवीय मूल्य हैं. (Review of Santosh Kumar Tiwari Book Amit Srivastava)
अयोध्या में मन्दिर मस्जिद साथ रहे
साथ साथ रहें राम और रहीम
रामायण और कुरआन
हिन्दू और मुसलमान
इंसान और इंसान
कवि ने जिस भाषा, प्रतीक और बिम्बों का सहारा लिया है वो भी आमजन के जीवन से गहराई से जुड़े हुए हैं. कहीं भी चमत्कार पैदा करने का अनावश्यक प्रयास नहीं है. भाषा प्रवाहमय है और भावों का भार उठाने में सक्षम है. कहीं-कहीं ऐसा ज़रूर लगता है कि कुछ कहते-कहते कवि अपने को रोक ले रहा है. किंचित स्थानों को छोड़ दिया जाए तो ये किसी सीमा अथवा पूर्वाग्रह की वजह से नहीं होता बल्कि इससे मौन का सौन्दर्य और शक्ति ही परिलक्षित होती है.
सूरज डूबता नहीं
जिस दिन डूब जाएगा वह
उसके साथ-साथ धरती और अम्बर दोनों डूब जाएंगे
समकालीन कविता की भाषा खासी जनतांत्रिक हुई है उसने पुराने अभिज्यात्य को तोड़ा है, टकसालीपन से बाहर आई है जनता के ज़्यादा करीब हुई है. नई प्रौद्योगिकी से जीवन में आए बदलावों को उसी की भाषा में अभिव्यक्त करने की चुनौती भी कविता उठा रही है. यद्यपि प्रयोग का आग्रह समकालीन कवियों में कहीं कहीं टेक्नीकल शब्दों को जानबूझ कर कविता में घुसा देने से दुरूह भी बना दे रहा है लेकिन ये प्रवित्ति संतोष जी की कविता में नहीं दिखती.
यात्रा कितनी लम्बी क्यों न हो
नाप ही लेते चरण जब निकल पड़ते
ज़िन्दगी में प्यार
नमक जितना अनिवार्य है
कविताएं सहज हैं ये बार-बार कहने वाली बात है क्योंकि लगातार उलझते जीवन में अगर अनुभूति के स्तर पर सब गडमगड है ये बहुत आवश्यक है कि अभिव्यक्ति साफ़ और स्पष्ट हो सहजता का मतलब सपाटबयानी नहीं है कविता कई स्तरों में खुलती है
अपने ही घर में किराएदार की तरह रहती है
अपने ही पैरों की आहट से डरी सहमी
सबसे बुरी बात है
अच्छी लड़की होना
किस तरह से बुरी लड़की होना अच्छी लड़की होने से अच्छा है और ज़रूरी है आज के ज़माने में. कितनी सरलता से फेमिनिज़्म या फेमिनिज़्म की छोटे-छोटे आयामों को कविता में समेटा जा सकता है, ये पंक्तियाँ इसे दिखाती हैं.
वर्तमान जीवन एक स्तरीय नहीं है. जीवन एक स्तरीय कभी नहीं रहा लेकिन वर्तमान जटिल जीवन में तमाम ऐसे विषय उपस्थित हैं जिनपर कवि का मौन अथवा आवश्यक गहरी दृष्टि का अभाव खलता है. उसी तरह से ये भी कहा जा सकता है कि कवि शिल्प के स्तर पर भी कुछ और तोड़-फोड़ करता तो कविता अधिक समृद्ध होती चलती. लेकिन फिर भी कुल मिलाकर कवि का ये एक उम्मीद जगाता संग्रह है. निस्संदेह भविष्य में हमें बहुत कुछ बेहतरीन पढ़ने को मिलेगा. संतोष कुमार तिवारी सहजता, सरलता के साथ अपने कवि-कर्म के प्रति सजग कवि हैं. उनकी दृष्टि साफ़ है और प्रतिबद्धता स्पष्ट. (Review of Santosh Kumar Tiwari Book Amit Srivastava)
मेरी कवितायेँ जब्त होंगी उस दिन
सज़ा मिलेगी कि
मैंने कविता में दलाली की भाषा से
परहेज क्यों किया
कविता कभी रुकती नहीं. समकालीन कविता बहुत कम समय में, फॉर्म और कंटेंट दोनों के स्तर पर, बहुत ज़्यादा प्रयोगों के कारण जानी जाएगी. आशा की जा सकती है कि कवि इन प्रयोगों का भरपूर उपयोग करते हुए अपने बंधे-बंधाए क्लीशे को तोड़ते हुए भविष्य में और अच्छी रचनाओं के साथ पाठकों के बीच जाएगा. तब तक इस संग्रह का स्वाद लिया जाना चाहिए.
-अमित श्रीवास्तव
समीक्षित किताब: अपने अपने दण्डकारण्य
लेखक: संतोषकुमार तिवारी
लेखक के बारे में: सम्प्रति प्रवक्ता हिन्दी, राजकीय इंटर कॉलेज, ढिकुली, रामनगर, उत्तराखण्ड
संपर्क: 09411759081. santoshtiwari913@gmail.com
प्रकाशक: नमन प्रकाशन, 4231/ 1 अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली - 02
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अमित श्रीवास्तव. उत्तराखण्ड के पुलिस महकमे में काम करने वाले वाले अमित श्रीवास्तव फिलहाल हल्द्वानी में पुलिस अधीक्षक के पद पर तैनात हैं. 6 जुलाई 1978 को जौनपुर में जन्मे अमित के गद्य की शैली की रवानगी बेहद आधुनिक और प्रयोगधर्मी है. उनकी तीन किताबें प्रकाशित हैं – बाहर मैं … मैं अन्दर (कविता) और पहला दखल (संस्मरण) और गहन है यह अन्धकारा (उपन्यास).
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