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‘अश्लील’ अफ़साने लिखने वाली अम्मा की सालगिरह है आज

पिछले बरस आज के दिन गूगल पर सफ़ेद साड़ी में लिपटी एक महिला का डूडल लगाया गया था.  गूगल पिछले कुछ बरसों से इतिहास की धूल फांक रहे उन लोगों पर एक डूडल उनके जन्मदिन पर आधी रात को पोस्ट कर देता है जिन्हें हम सभी को याद रखना चाहिए. आधुनिक उर्दू के चार अफसानागोई के चार स्तंभ माने जाते हैं मंटो, कृष्ण चंदर, राजिंदर सिंह बेदी और चौथी वही सफ़ेद साड़ी वाली महिला यानी इस्मत चुगतई.

इस्मत चुगताई उर्दू की मशहूर लेखिका थीं जिन्हें इस्मत आपा नाम से भी जाना जाता है. आज 21 अगस्त को उनकी 108वीं जयंती है. कुछ लोग उनका जन्म 15 अगस्त को भी मानते हैं. इस्मत का जन्म उत्तर प्रदेश के बदायूं में हुआ था. इस्मत चुगताई दस भाई बहन थे जिनमें इस्मत का नौवां नंबर था. उनके पिता सरकारी महकमे में थे इसलिए उनका जीवन अलग-अलग शहरों में बीता. उनके बड़े होने तक उनकी बहनों का ब्याह हो चुका था सो भाइयों के साथ ही इस्मत बड़ी हुई. भाईयों के साथ बड़े होने के कारण इस्मत गुल्ली डंडा और फुटबाल की जबरदस्त शौकीन हुआ करती थीं.  इस्मत ने अपने लेखों और कथाओं में महिलाओं की समस्याओं को एक नए ढंग से प्रस्तुत करने के लिए जानी जाती हैं.

इस्मत की सबसे विवादित कहानी लिहाफ है. लिहाफ के चलते उनके ऊपर लाहौर हाई कोर्ट में अश्लीलता फैलाने का मुक़दमा चला था. इसा मुकदमे को बाद में खारिज कर दिया गया. लिहाफ भारतीय साहित्य में लेसबियन प्रेम पर आधारित पहली कहानी मानी जाती है. 1942 में आदाब-ऐ-लतीफ में पहली बार लिहाफ छपी थी. यह अपने पति के समय को तरसती एक महिला की कहानी है.

इस्मत की पहली कहानी फसादी थी जो उर्दू की प्रतिष्ठित पत्रिका साक़ी में शाया हुई थी. उनका देहावसान २४ अक्टूबर 1991 को मुंबई में हुआ. उनकी इच्छानुसार इस्मत का दाह संस्कार किया गया था.

उनके प्रमुख कहानी संग्रह छुई-मुई, एक बात, कलियां,शैतान आदि हैं उनके उपन्यास टेढ़ी लकीर, दिल की दुनिया, मासूमा, जंगली कबूतर आदि हैं. इस्मत की आत्मकथा का नाम है –  कागजी है पैरहन.

उनकी दिलकश शैली की झलक के तौर पर पेश है लिहाफ का एक अंश –

जब मैंने बेगम जान को देखा तो वह चालीस-बयालीस की होंगी. ओफ्फोह! किस शान से वह मसनद पर नीमदराज़ थीं और रब्बो उनकी पीठ से लगी बैठी कमर दबा रही थी. एक ऊदे रंग का दुशाला उनके पैरों पर पड़ा था और वह महारानी की तरह शानदार मालूम हो रही थीं. मुझे उनकी शक्ल बेइन्तहा पसन्द थी. मेरा जी चाहता था, घण्टों बिल्कुल पास से उनकी सूरत देखा करूँ. उनकी रंगत बिल्कुल सफेद थी. नाम को सुर्खी का ज़िक्र नहीं. और बाल स्याह और तेल में डूबे रहते थे. मैंने आज तक उनकी माँग ही बिगड़ी न देखी. क्या मजाल जो एक बाल इधर-उधर हो जाए. उनकी आँखें काली थीं और अबरू पर के ज़ायद बाल अलहदा कर देने से कमानें-सीं खिंची होती थीं. आँखें ज़रा तनी हुई रहती थीं. भारी-भारी फूले हुए पपोटे, मोटी-मोटी पलकें. सबसे ज़ियाद जो उनके चेहरे पर हैरतअंगेज़ जाज़िबे-नज़र चीज़ थी, वह उनके होंठ थे. अमूमन वह सुर्खी से रंगे रहते थे. ऊपर के होंठ पर हल्की-हल्की मूँछें-सी थीं और कनपटियों पर लम्बे-लम्बे बाल. कभी-कभी उनका चेहरा देखते-देखते अजीब-सा लगने लगता था, कम उम्र लड़कों जैसा.

उनके जिस्म की जिल्द भी सफेद और चिकनी थी. मालूम होता था किसी ने कसकर टाँके लगा दिए हों. अमूमन वह अपनी पिण्डलियाँ खुजाने के लिए किसोलतीं तो मैं चुपके-चुपके उनकी चमक देखा करती. उनका कद बहुत लम्बा था और फिर गोश्त होने की वजह से वह बहुत ही लम्बी-चौड़ी मालूम होतीं थीं. लेकिन बहुत मुतनासिब और ढला हुआ जिस्म था. बड़े-बड़े चिकने और सफेद हाथ और सुडौल कमर तो रब्बो उनकी पीठ खुजाया करती थी. यानी घण्टों उनकी पीठ खुजाती, पीठ खुजाना भी ज़िन्दगी की ज़रूरियात में से था, बल्कि शायद ज़रूरियाते-ज़िन्दगी से भी ज्यादा.

रब्बो को घर का और कोई काम न था. बस वह सारे वक्त उनके छपरखट पर चढ़ी कभी पैर, कभी सिर और कभी जिस्म के और दूसरे हिस्से को दबाया करती थी. कभी तो मेरा दिल बोल उठता था, जब देखो रब्बो कुछ-न-कुछ दबा रही है या मालिश कर रही है.

कोई दूसरा होता तो न जाने क्या होता? मैं अपना कहती हूँ, कोई इतना करे तो मेरा जिस्म तो सड़-गल के खत्म हो जाय. और फिर यह रोज़-रोज़ की मालिश काफी नहीं थीं. जिस रोज़ बेगम जान नहातीं, या अल्लाह! बस दो घण्टा पहले से तेल और खुशबुदार उबटनों की मालिश शुरू हो जाती. और इतनी होती कि मेरा तो तख़य्युल से ही दिल लोट जाता. कमरे के दरवाज़े बन्द करके अँगीठियाँ सुलगती और चलता मालिश का दौर. अमूमन सिर्फ़ रब्बो ही रही. बाकी की नौकरानियाँ बड़बड़ातीं दरवाज़े पर से ही, जरूरियात की चीज़ें देती जातीं.

बात यह थी कि बेगम जान को खुजली का मर्ज़ था. बिचारी को ऐसी खुजली होती थी कि हज़ारों तेल और उबटने मले जाते थे, मगर खुजली थी कि कायम. डाक्टर,हकीम कहते, ”कुछ भी नहीं, जिस्म साफ़ चट पड़ा है. हाँ, कोई जिल्द के अन्दर बीमारी हो तो खैर.” ‘नहीं भी, ये डाक्टर तो मुये हैं पागल! कोई आपके दुश्मनों को मर्ज़ है? अल्लाह रखे, खून में गर्मी है! रब्बो मुस्कराकर कहती, महीन-महीन नज़रों से बेगम जान को घूरती! ओह यह रब्बो! जितनी यह बेगम जान गोरी थीं उतनी ही यह काली. जितनी बेगम जान सफेद थीं, उतनी ही यह सुर्ख. बस जैसे तपाया हुआ लोहा. हल्के-हल्के चेचक के दाग. गठा हुआ ठोस जिस्म. फुर्तीले छोटे-छोटे हाथ. कसी हुई छोटी-सी तोंद. बड़े-बड़े फूले हुए होंठ, जो हमेशा नमी में डूबे रहते और जिस्म में से अजीब घबरानेवाली बू के शरारे निकलते रहते थे. और ये नन्हें-नन्हें फूले हुए हाथ किस कदर फूर्तीले थे! अभी कमर पर, तो वह लीजिए फिसलकर गए कूल्हों पर! वहाँ से रपटे रानों पर और फिर दौड़े टखनों की तरफ! मैं तो जब कभी बेगम जान के पास बैठती, यही देखती कि अब उसके हाथ कहाँ हैं और क्या कर रहें हैं.

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