फोटो toriavey.com से साभार
पहले हमारे गाँव में लाल दवाई मिलती थी. और गाँव ही क्या पूरे मुल्क में चला करती थी यह लाल दवाई. चाचा नेहरू से लेकर चचा जान तक सब दीवाने थे इसके. आजकल के पूंजी के बच्चे क्या जाने ये सब.
पता नहीं क्या जादू था लाल दवाई में! इधर कम्पोण्डर बोतल में लाल दवाई भरता था, उधर बुखार नीचे आने लगता था. ज्यों-ज्यों शीशी में लाल दवाई ऊपर चढ़ती, त्यों-त्यों थर्मामीटर में पारा नीचे उतरता. फिर हाथ में बोतल पकड़ते ही लगता था – निरी ताक़त आ गई हो जैसे.
पूरे देश मे डॉक्टर भर-भर के लाल दवाई बांटते थे. हमें तो लगता था कि हमारा खून भी इसी लाल दवाई के चक्कर में लाल हुआ है. सब को लाल सलाम भी ठोंकते थे हम.
चिंटू के पापा को तो इत्ती पसन्द थी की दाल, रायते सब में लाल दवाई मिला के खाते थे. चिंटू लाल दवाई में ब्रेड डुबो-डुबो के खाता था और मैं लाल दवाई में रीठा ,आँवला, शिकाकाई मिला कर बाल धोती थी.
सरकार का कहना था- ‘हर मर्ज़ की दवा है -लाल दवाई’
राहत सी तो लगती थी पर मर्ज़ ठीक नहीं होता था. थोड़े-थोड़े दिन में जाकर लाल दवाई की बोतल ले आते थे. समझ नहीं आता था कि हम बीमार हैं इसलिये लाल दवाई पी रहे हैं, या हमें लाल दवाई पीनी है इसलिये हम बीमार हैं.
बाद में आयुर्वेद वाले वैद्य जी मिले. उन्होंने कहा -‘कहाँ तुम ये लाल दवाई के चक्कर में पड़ रहे हो? ये लाल दवाई ही तुम्हारा मुख्य रोग है. देश को मानसिक-शारीरिक बीमार करने के लिये ही ये लाल दवाई सोवियत संघ से भिजवाई गई थी. एक बार इसका ज़हर शरीर मे फैल गया तो समझो गए काम से. इसकी लत बहुत बुरी है अफीम की तरह. मेरे पास इसका उपचार है. आयुर्वेद और पंचकर्म जैसी राष्ट्रीय सांस्कृतिक चिकित्सा पद्धतियों से इसका इलाज सम्भव है.’
कमाल बात ये है की इस देश में उपचार सब बताते हैं, पर रोग कोई नहीं पूछता.
वैद्य जी ने धौति, शंखप्रक्षालन, कुंजल, रीढ़ स्नान, आदि करवाये. वैद्य जी के पास इन सब चीज़ों का सामान था और ग्राहकों की कमी थी. एक दिन वैद्य जी बोले की पूरे शरीर का शोधन हो गया बस थोड़ी सी लाल दवाई और रह गई है जिसके लिये एनिमा देना होगा. चिंटू के पापा घबरा गये. बोले कि थोड़ी बहुत लाल दवाई शरीर मे रहे भी तो कोई नुक़सान नहीं है. पड़ी रहेगी किसी कोने में.
वैद्य जी से इलाज के बाद शर्माजी बहुत बदल गए. एकादशी पूनो का व्रत रखते, सन्ध्या वंदन करते, मंदिर जाते. सब तिथियाँ, प्रदोष उन्हें याद रहते थे.
पर मर्ज़ जैसे का तैसा ही रहा.
फिर एकदिन अमरीका से एक डॉक्टर साहब आये. उन्होंने पर्चे पर विटामिन, मिनरल की गोली लिखी. साथ ही टीवी का बड़ा रिचार्ज, दो जीबी डेली वाला डेटा प्लान , हर शाम मॉल की सैर के लिये भी कहा.
अब मर्ज़ का तो नहीं पता, परन्तु शर्मा जी प्रसन्न बहुत रहते हैं. सारे डेली सोप भी देखते हैं.
मूलतः ग्वालियर से वास्ता रखने वाले प्रिय अभिषेक सोशल मीडिया पर अपने चुटीले लेखों और सुन्दर भाषा के लिए जाने जाते हैं. वर्तमान में भोपाल में कार्यरत हैं.
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