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क्या आप भी हाईस्कूल की मार्कशीट वाला नकली जन्मदिन मनाने को विवश हैं?

ईजा (माँ) ये हाईस्कूल की मार्कशीट में लिखी जन्मतिथि तो बाज्यू/काक ज्यू (पापा/चाचा जी) एडमिशन के टाइम ऐसे ही लिखा आए थे लेकिन मेरी असल जन्मतिथि क्या है? ये एक ऐसा सवाल है जो 90 के दशक तक उत्तराखंड के गाँवों में पैदा हुए अधिकतम युवा अपने घर में आज भी पूछते ही हैं. वो एक ऐसा समय था जब परिवार संयुक्त और बड़े हुआ करते थे और बच्चे के पैदा होने पर जन्म प्रमाणपत्र बनवाने जैसी कोई चीज नहीं हुआ करती थी. अधिकतर बच्चे घर में ही नॉर्मल डिलीवरी से पैदा होते थे. बच्चा पैदा होने के साथ ही मॉं अगले दिन से घर के बाहर का सारा काम बखूबी संभाल लेती थी. रुढ़िवादी सोच के चलते नामकरण तक घर के आंतरिक काम करने की इजाजत मॉं को नहीं होती थी.

शायद पढ़े-लिखे न होने या ग्रामीण परिवेश में उन दिनों जन्मदिवस न मनाए जाने के कारण मॉं-बाप बच्चे की जन्मतिथि लिखने से ज्यादा मौखिक ही याद रखते थे. बच्चे के बड़े होने के साथ ही जन्मदिन की ये तारीख भी मॉं-बाप के दिमाग से मिटती चली जाती और ये जिम्मा अक्सर आमा (दादी) को सौंप दिया जाता कि वो ये सब याद रखे. आमा तो फिर आमा ठैरी. बुढ़ापे में उसे अपनी रखी चीजें याद नहीं रहने वाली हुई फिर इन गुजरती तारीखों का तो क्या ही कहना. आमा को बस इतना याद रहता कि नाती के नमान (नामकरण) के दिन आया कौन-कौन था.

स्कूल में एडमिशन के समय छोटे काक ज्यू को भेज दिया जाता और वो जन्मदिन के कॉलम में अक्सर 01/01/1990 टाइप का ही कुछ लिख आते. इस 1990 में भी उम्र के लिहाज से दो साल कम ही होते. पैदाइश सन 1988 की होगी तो घर वाले पहले ही काक ज्यू से कह देंगे – “द्वी साल कम लेखा बेर आए ला” (दो साल कम लिखवा के आना रे). इस दो साल कम लिखवाने के पीछे प्रमुख दो ही कारण हुआ करते. एक तो घर वालों को लगता कि लड़का हाईस्कूल और इंटर में एक-एक बार तो जरूर फेल होगा और दूसरा फौज में भर्ती होने की उम्र बची रहेगी.

अक्सर यही होता है कि ईजा से जन्मदिवस की तारीख पूछो तो वह कहेगी – “अरे बाबू तारीख तो याद नहीं है मुझे लेकिन जिस दिन तू पैदा हुआ ठैरा ना उसके ठीक तीन दिन बाद तेरे बाज्यू दिल्ली से छुट्टी लेकर घर आए ठैरे. एक बार अपने बाज्यू से पूछ तो उन्हें याद होगी.” अब बाज्यू के हाल तो ऐसे हुए कि उन्हें अपनी शादी की तारीख याद नही ठैरी तो बेटे के पैदा होने की कहॉं से होगी. बाज्यू भी इस अभेद्य सवाल को आमा या फिर पुज्यू (बुआ) की तरफ को सरकाते हुए कहेंगे – “यार तू मेरे से पूछने वाला हुआ ये सब. मुझे कहॉं से पता होगा. बड़ी मुश्किल से छुट्टी का जुगाड़ कर के तो तेरे नमान के लिए आया ठैरा उस समय. तेरी ईजा, आमा या पुज्यू को तो पता होगा. ये सब तो तब यहीं थे ना.” बेटा भी मन ही मन सोच में डूबा हुआ सोचता – उन्हें ही पता होता तो आपसे पूछता क्या?

आमा से जन्मतिथि पूछने पर अक्सर एक ही तरह का जवाब सुनने को मिलता – “तुम्हारी ये अंग्रेजी तारीख-वारीख तो मेरी समझ में नही आने वाली हुई नाती लेकिन जब तू पैदा हुआ ना बाबू तो अषाढ़ का महीना था. तेरि कैंज और पुज्यू ले आया भै नमान में उनूथे पुछ तारीख (तेरी मौसी और बुआ भी आई थी नामकरण में उससे पूछ तारीख)”. अक्सर कई सालों बाद मिलने वाली बुजुर्ग आमाएँ तो इतना लाड़-प्यार दिखाएँगी की तबीयत खुश हो जाए. मिलते ही कहेंगी – “नाती कति ठुल हैगेहे तू! नूनान दैख्यो भै त्वेखन (नाती कितना बड़ा हो गया है तू! छोटा सा देखा था तुझे). तेरे तो नमान में भी आए ठैरे हम.” इतना सुनते ही आपके मन में एक आस जगती की इस आमा को तो मेरे जन्म की तारीख पक्का पता होगी. जैसे ही पूछो कि आमा आपको पता है मैं किस तारीख को पैदा हुआ था? आमा तपाक से उत्तर देगी – “होय प अषाढ़ में भयो भये तू (हॉं फिर आषाढ़ में हुआ ठैरा तू).”

बुबू (दादा जी) तो लगभग सभी के गाय की तरह ही हुए जिनकी आमा के सामने कभी एक न चली. बुबू से कभी कोई बात पूछ भी लो तो वो आमा की तरफ इशारा कर कहेंगे – “मैं खन के पत ना भै नाती. सब तेरी आम देखनी भे. तेई थैं पुछ (मुझे कुछ पता नहीं हुआ नाती. सब तेरी आमा देखने वाली हुई. उसी से पूछ).” जन्मतिथि जानने की एक और उम्मीद नामकरण किये हुए पंडित से रहती जिसके पास बच्चे की पूरी जन्म कुंडली होती. लेकिन ये उम्मीद भी तब धूमिल हो जाती जब यह पता चलता कि जिस पंडित ने आपका नामकरण किया था वो अब इस दुनिया में ही नही रहा. उसके वारिसों से पूछो तो वो कहेंगे आषाढ़ के हिसाब से नई कुंडली बना देते हैं आपकी. जन्मदिन की तारीख में क्या रखा है. सन तो मालूम ही होगा आपको अपने जन्म का? वैसे भी पुराने दस्तावेज पिताजी के गुजरने के साथ ही इधर उधर कहीं गुम हो गए हैं.

इतने जतन के बाद भी जब जन्मदिन की तारीख एक रहस्य ही रह जाती है तो आप अपना ब्रह्मास्त्र इस्तेमाल करते हैं और वो ब्रह्मास्त्र होता पुज्यू (बुआ) और कैंजा (मौसी). कैंजा से पूछो तो वो कहेगी-“तारीख तो मुझे भी याद नहीं है बाबू लेकिन जब तेरा नमान हुआ ना तब मेरा खिल्लू पेट में था. खिल्लू आब 17 सालो छ ते हिसाबेलि तू लगालि तेरि उमर कति होलि? (खिल्लू अब 17 साल का है. इस हिसाब से तू लगा ले तेरी उम्र कितनी होगी?).” अंतिम उम्मीद, पुज्यू के पास जाओ तो उसकी धुँधली यादों और मांथे पर आई सिकन से लगता की वो तारीख को डी-कोड कर लेगी लेकिन आखिर में पुज्यू कहेगी – “बाबू अषाढ़ो महन छ्यू एत्ती याद छ मैके (बाबू आषाढ़ का महीना था इतना तो याद है मुझे) और हॉं जब मैं तेरे नमान में आई थी तब ये मेरा दीपू 5-6 महीने का मेरी गोद में था. इस हिसाब से तू दीपू से 5-6 महीने छोटा हुआ बस. एक काम कर तू दिल्ली वाली बुआ को फोन कर के भी पूछ तो शायद उसे याद हो क्योंकि उसका राजू भी तेरे पैदा होने के आसपास ही हुआ ठैरा इसलिए तो तेरे नमान में भी नहीं आई ठैरी वो.”

इस तरह की लाख कोशिशों के बीच आज भी हजारों हजार उत्तराखंडी नौजवान इसी उधेड़बुन में अपना हाईस्कूल की मार्कशीट वाला नकली जन्मदिन मनाते हैं कि शायद कभी कहीं से कोई ऐसी आमा, पुज्यू या कैंजा निकल आए जो उनके जन्मदिन की असल तारीख उन्हें बता सके.

नानकमत्ता (ऊधम सिंह नगर) के रहने वाले कमलेश जोशी ने दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक व भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबन्ध संस्थान (IITTM), ग्वालियर से MBA किया है. वर्तमान में हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के पर्यटन विभाग में शोध छात्र हैं.

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