अशोक पाण्डे

रड़गाड़ी रागस – जोहार की लोककथा

महीना नवम्बर का था. जोहार घाटी के सभी लोग वापस अपने शीतकालीन घर यानी मुनस्यारी आ चुके थे.

व्यापार के उद्देश्य से तिब्बत गए एक व्यापारी को वापस लौटने में विलम्ब हो गया था. वह भेड़-बकरियों के अपने रेवड़ के साथ अकेला ही मुनस्यारी के रास्ते पर था. उस दिन जब शाम हुई वह रड़गाड़ी पड़ाव पहुंच पाया था. रड़गाड़ी से मुनस्यारी कोई तीसेक मील दूर रह जाता है. वहीं एक चट्टान के समीप रात बिताने का फैसला किया.

भेड़-बकरियों को ठिकाने पर इकठ्ठा करने के बाद रात के भोजन की व्यवस्था के लिए वह लकड़ियाँ लाने पास के जंगल की तरफ चला गया. जब वह वापस अपने अस्थाई डेरे पर पहुंचा उसने देखा कि वहां एक आदमी पहले से बैठा हुआ है. व्यापारी को खुशी हुई कि चलो रात काटने के लिए एक साथी मिल गया.

दोनों में शुरुआती अभिवादन और बातचीत के बाद जान-पहचान हो गयी और दोनों मिलकर भोजन बनाने में सन्नद्ध हो गए. खाना बनाते हुए व्यापारी ने देखा कि उसका साथी ठीक वैसा ही कर रहा था जैसा वह करता जाता. व्यापारी को अपनी दादी-नानी से सूनी हुई कथाएँ याद हो आईं और वह समझ गया की उसके डेरे का मेहमान और कोई नहीं बल्कि रड़गाड़ी रागस के नाम से कुख्यात वही वनमानुस-राक्षस था जिससे सारी घाटी के लोग त्रस्त थे.

व्यापारी को पहले तो भय लगा लेकिन उसे तुरंत यह भी अहसास हुआ कि अगर अगर उसके भयभीत होने का पता रड़गाड़ी रागस को लग गया तो वह उसे पकड़ कर मार डालेगा. व्यापारी बहादुर था और दुनिया भर में घूम चुकने के बाद वह काफी बुद्धिमान भी हो चुका था. उसने सोचा कि इस आपत्ति का सामना चालाकी और बहादुरी के साथ ही किया जा सकता है.

व्यापारी ने पास ही धरे बकरी की पीठ पर लादे जाने वाले थैले करबच को खोला और उसमें से सूखी हुई चर्बी का का एक टुकड़ा निकालकर उसे आग पर गरम किया और उसे अपने हाथ-पैरों पर मलने लगा. रड़गाड़ी रागस ने भी वैसा ही किया.

अब व्यापारी ने थोड़ी अधिक चर्बी निकाली और उसे भी गर्म कर अपनी छाती पर मलना शुरू किया. मेहमान ने भी वैसा ही किया. अब व्यापारी ने आग से एक जलती हुई लकड़ी निकाली और उसे अपनी छाती के पास ले जाकर वहां जूंएं देखने का अभिनय करने लगा.

रड़गाड़ी रागस ने फिर वैसा ही किया. ऐसा करते ही उसकी छाती के बालों में आग लग गयी और वह “अब कां जौं! अब कां जौं!” (अब कहाँ जाऊं! अब कहाँ जाऊं) चीखता हुआ आग के इर्द-गिर्द दौड़ने-भागने लगा. इससे उसके पूरे शरीर ने आग पकड़ ली.

चतुर व्यापरी ने अब उससे कहा – “आग बुझानी है तो सामने बह रही नदी में जा!”

दर्द से बेहाल रड़गाड़ी रागस ने तेज़ बहाव वाली गोरी नदी में कूद लगा दी और उसी में डूब कर उसका अंत हो गया.

इस प्रकार अपनी बहादुरी और बुद्धिमत्ता से जोहारी व्यापारी ने रड़गाड़ी रागस के आतंक का सफाया किया. जब मुनस्यारी पहुँच कर उसने इस बारे में अपने लोगों को बताया तो लोगों ने प्रसन्न होकर उसे अपने कन्धों पर उठा लिया और समूची जोहार घाटी में उसका बड़ा नाम हुआ.

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

Recent Posts

हिमालय के गुमनाम नायक की कहानी

इस तस्वीर में आपको दिख रहे हैं "पंडित नैन सिंह रावत" — 19वीं सदी के उन महान…

2 weeks ago

भारतीय परम्परा और धरती मां

हमारी भारतीय परंपरा में धरती को हमेशा से ही मां कह कर पुकारा गया है. ‘माता…

3 weeks ago

एटकिंसन : पहाड़ आधारित प्रशासन का निर्माता

तत्कालीन नार्थ वेस्टर्न प्रोविनेंस यानी उत्तर प्रदेश के जिस ब्रिटिश अधिकारी ने उन्नीसवीं शताब्दी के…

3 weeks ago

बीमारी का बहम और इकदँडेश्वर महाराज का ज्ञान

संसार मिथ्या और जीवन भ्रम है, मनुष्य का मानना है वह जीवों में श्रेष्ठ व बुद्धिमान…

4 weeks ago

शकटाल का प्रतिशोध

पिछली कथा में हमने देखा कि कैसे योगनंद सत्ता तक पहुँचा, शकटाल ने अपने सौ पुत्र…

4 weeks ago

बजट में युवाओं के लिए योजना का ढोल है पर उसकी गमक गुम है

उत्तराखंड के आय व्यय लेखे 2026-27 को समझते हुए यह आशंका उभरती है की क्या…

2 months ago