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शराब से मोहब्बत, शराबी से घृणा?

इन दिनों उत्तराखंड के मिनी स्विट्जरलैंड कौसानी की शांत वादियां शराब की सरकारी दुकान खोलने न खोलने पर गरमाई हुई है. हैरत इस बात पर भी है कि कई ऐसे महानुभाव भी यहां शराब की दुकान खोलने को उचित ठहरा रहे हैं जो इससे दूर रहते हैं. शराब के पक्ष में कई तरह के कुतर्क दिए जा रहे हैं. मसलन, इससे पर्यटकों की आमद बढ़ेगी तो व्यवसाय में वृद्वि होगी. शराब के लिए गरूड़व-सोमेश्वर की दौड़ खत्म हो जाएगी तो शराबियों का पैसा बचेगा. अवैध शराब बिकना बंद हो जाएगी. सरकार को राजस्व मिलेगा. रोजगार में वृद्वि होगी.
(Protest Against Liquor Shops in Kausani)

शराब के पक्षधर अपनी बुलंद आवाज में शराब की खिलाफत की आवाज को दबाने की पुरजोर कोशिश में लगे हुए हैं. इनमें से कई पढ़े-लिखे युवाओं ने तो अब सरला-लक्ष्मी आश्रम की खिलाफत करने में अपनी आत्मा की शर्म-हया को भी शराब की खाली बोतल के साथ कूड़े में फैंक दिया है. पद्मश्री राधा बहिन के साथ ही आश्रम वालों पर कीचड़ उछालते इन्हें शर्म भी नहीं आती है. बड़ी ही बेशर्मी से वो शराब की दुकान खुल जाने पर पहला ग्राहक होने की बात प्रचारित करते नहीं थक रहे हैं. ये तबक़ा गुजरे इतिहास को मानने को तैयार ही नहीं है कि, सरला-लक्ष्मी आश्रम की नींव किन आदर्शों पर पड़ी थी. महात्मा गांधी की शिष्या सरला बहन ने 1946 में जब इसे गांधीवादी बुनियादी शिक्षा और ग्रामीण लड़कियों को सशक्त बनाने के आदर्शों पर स्थापित किया था तब शायद उन्होंने इस बात की कल्पना भी नहीं की होगी कि भविष्य में इस तरह के आदर्श विहिन तबके से भी एक लड़ाई लड़नी होगी.

पद्मश्री राधा बहिन

शराब प्रेमी पक्षधर इस बात को भी बखूबी जानते हैं कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान 1929 में महात्मा गांधीजी कौसानी को आते समय जब चनौदा में रुके थे तब उनके साथ उनके सहयोगी और प्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शांति लाल त्रिवेदी भी थे. तब गांधीजी ने चनौदा में एकत्र हुए लोगों से विदेशी कपड़े त्यागकर खुद के बनाए कपड़े पहनने का आह्वान भी किया था. महात्मा गांधीजी की प्रेरणा से ही शांति लाल त्रिवेदी ने 1937 में यहां आकर क्षेत्रीय गांधी आश्रम की स्थापना की. तब उस जमाने के गांधीजी और शांति लाल त्रिवेदी के आपसी पत्राचार के पत्रों की धरोहर भी कौसानी के एक प्रतिष्ठित परिवार ने संजो रखे हैं.
(Protest Against Liquor Shops in Kausani)

गांधीजी जब कौसानी आए तो वो यहां कुछ दिनों के लिए ठहरे थे और उन्होंने इस स्थान को आध्यात्मिक चिंतन और लेखन के लिए उपयुक्त पाया. कौसानी प्रवास के दौरान, गांधीजी ने श्रीमद्भगवद्गीता पर आधारित अपनी प्रसिद्ध पुस्तक अनाशक्ति योग भी लिखी. यह पुस्तक निष्काम कर्मयोग और आध्यात्मिक अनुशासन पर आधारित है जिसमें गीता के संदेश को सरल भाषा में उन्होंने लिखा. गांधीजी के विचारों से प्रभावित होकर ही यहां अनाशक्ति आश्रम की स्थापना की गई. गांधीजी की यादों को संजोए हुए यह आश्रम इस बात का गवाह है. गांधीजी की कौसानी यात्रा केवल एक पर्यटन भ्रमण नहीं थी, बल्कि यह उनके आध्यात्मिक चिंतन, सामाजिक सुधार और स्वदेशी आंदोलन के प्रचार का महत्वपूर्ण हिस्सा रही थी.

इस धरती पर अब शराब की दुकान खोलने के लिए सीना ताने जो तबका आ रहा है वो यह सब क्यों भूल रहा होगा? बड़े-बड़े कुतर्क देते हुए उनका कहना है कि शराब की दुकान खुलने से गांधीजी के सिद्धांतों और यहाँ की ऐतिहासिक पहचान को कोई ठेस नहीं पहुँचने वाली है.

आध्यात्मिक शांति और प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लेने के लिए कौसानी आने वालों के लिए उनकी नजर में कोई मायने नहीं हैं. उन्हें इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ने वाला कि कौसानी को मिनी स्विट्ज़रलैंड वाली पहचान पर असर पड़ सकता है. इस बात को किनारे रख दिया जा रहा है कि शराब की दुकान खुलने के बाद स्थानीय युवाओं में नशे की प्रवृत्ति बढ़ सकती है. अपराध बढ़ेंगे. घरेलू हिंसा, सड़क दुर्घटनाएँ और सार्वजनिक स्थानों पर झगड़े फसाद भी बढ़ जाएंगे. महिलाओं और परिवारों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने से सामाजिक ताने-बाने पर बुरा असर होगा. शराब की दुकान खुलने से धार्मिक और सांस्कृतिक माहौल भी प्रभावित होगा ही.
(Protest Against Liquor Shops in Kausani)

शराब प्रेमियों को इससे कोई मतलब नहीं कि कौसानी जैसे ऐतिहासिक, धार्मिक और पर्यटन स्थलों पर शराब की दुकान खोलना स्थानीय संस्कृति, पर्यावरण और सामाजिक व्यवस्था के लिए नुकसानदायक हो सकता है. कौसानी के चौराहे पर मुनादी करते हुए वो कुतर्क देते हैं कि बिहार, गुजरात, मिज़ोरम, नागालैंड, लक्षद्वीप, मणिपुर में शराब पर पूर्ण या आंशिक प्रतिबंध लागू होने के बाद भी वहां महंगे दाम पर शराब गुपचुप ढंग से बिकती है और कौसानी में भी अवैध शराब महंगे दामों में बिकती है तो इसके लिए सरकारी दुकान का होना जरूरी है.

इस बात को ये लोग किनारे कर दे रहे हैं कि शराब के ज़हर से समूचे उत्तराखंड के घर-परिवार बर्बाद होते चले जा रहे हैं. वो ये बात भी नहीं समझना चाहते हैं कि शराब केवल एक मादक पदार्थ नहीं बल्कि एक धीमा ज़हर है जो न केवल व्यक्ति की सेहत बल्कि उसके पूरे परिवार और समाज को भी बर्बाद कर देता है. शराब की लत हर किसी को आर्थिक, शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रूप से कमजोर बना देती है. ये बात वो नहीं समझ पाएंगे कि जब घर का कोई सदस्य शराब की गिरफ्त में आ जाता है तो पूरे परिवार को इसकी क्या कीमत चुकानी पड़ती है. शराब का लती व्यक्ति आर्थिक तंगी होने पर घर की मूलभूत जरूरतें भी पूरी नहीं कर पाता है. बच्चों की शिक्षा और भविष्य के बारे में उसे कोई ख्याल नहीं रहता.

शराब का लती का स्वभाव धीरे-धीरे आक्रामक हो जाता है और वह छोटी-छोटी बातों पर भी गुस्सा करने लगता है, जिससे घर में अशांति फैल जाती है. कई बार शराबी व्यक्ति अपने परिवार पर शारीरिक हिंसा भी करता है, जिससे परिवार के अन्य सदस्य मानसिक तनाव और अवसाद का शिकार हो जाते हैं. शराबी की सामाजिक प्रतिष्ठा खत्म तो होती ही है और लोगों के दूरी बनाने पर वह अकेलापन महसूस कर और अधिक शराब पीने लगता है.
(Protest Against Liquor Shops in Kausani)

शराब की दुकान खोलने के पक्षधर ये बात तो जानते ही होंगे कि शराब शरीर को भी अंदर से खोखला करते चली जाती है. किसी का भी लीवर, हृदय, किडनी और दिमाग तो पत्थर का बना नहीं होता है कि जिस पर शराब का कोई असर न हो. इन्हें ये तब सही लगेगा कि जब समाज में शराबी व्यक्ति की पहचान एक गैर-जिम्मेदार और अविश्वसनीय इंसान के रूप में होने लगे. क्या तब ये सही रहेगा जब शराबी की नौकरी या व्यवसाय भी प्रभावित हो और शराब के नशे की हालत में किए गए गलत फैसलों के कारण उसका अपना करियर समेत घर परिवार ही बर्बाद हो जाए और वक्त से पहले उसकी मौत ही हो जाए?

गुजरात, बिहार में शराब के प्रचलन की बात कहने वालो कभी विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े भी ढूंढ लो ना. डब्लूएचओ के मुताबिक शराब की वजह से हर साल लाखों लोगों की मौत हो रही है. इधर उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष पीसी तिवारी ‘नशा नहीं रोजगार दो’ अभियान के तहत उत्तराखंड के विभिन्न स्थानों पर नुक्कड़ सभाएं कर लोगों को जागरूक करने में लगे हैं.

उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष पीसी तिवारी

वहीं सामाजिक संगठन भी चिल्लाते रह जाते हैं कि शराब का सेवन व्यक्ति, परिवार और समाज के लिए हानिकारक है. इससे न केवल स्वास्थ्य बल्कि नैतिकता और सामाजिक स्थिरता पर भी बुरा असर पड़ता है. बावजूद इसके उनकी आवाजें सरकारों के कानों तक नहीं पहुंच पाती हैं. शराब के पक्षधरो क्या तुम्हें पता भी है कि अक्सर लोग शराब इसलिए पीते हैं क्योंकि वे अपनी वास्तविकता से भागना चाहते हैं. अक्सर लोगों के जीवन में जब आनंद नहीं होता और वो अंदर से अपने में खालीपन महसूस करता है, तो वह नशे का सहारा लेता है. और धीरे-धीरे उसकी यह लत बन कर रह जाती है.
(Protest Against Liquor Shops in Kausani)

शराब से आनंद के बजाय यदि कोई व्यक्ति सच में आनंद और शांति चाहता है, तो उसे ध्यान-मेडिटेशन की ओर बढ़ना चाहिए क्योंकि ध्यान एकमात्र तरीका है जो नशे की लत से मुक्ति दिला सकता है. ध्यान व्यक्ति को अंदर से खुश और संतुष्ट करता है, जिससे उसे किसी बाहरी चीज़ की जरूरत नहीं रहती.

वैसे यह कहना मुश्किल ही है कि शराब के पक्षधर कभी इस बात को समझ पाएंगे कि शराब एक कृत्रिम साधन है जो क्षणिक राहत देती है लेकिन यह वास्तविक समाधान नहीं है. नशा तो इंसान को उसके सच्चे स्वभाव से और दूर कर देता है. लगभग सभी धर्मों में शराब का सेवन हानिकारक माना गया है.

शराब केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक विकृति का प्रतीक है. हिंदू धर्मग्रंथों, बाइबल, कुरान और बौद्ध धर्म में इसे त्याज्य माना गया है. बावजूद इसके यदि कुछ लोग इसे अपनाना ही चाहते हैं, तो कम से कम इसकी बुराइयों को समाज में न फैलाएं. कौसानी जैसी आध्यात्मिक और ऐतिहासिक भूमि को शराब की चपेट में लाने का प्रयास न केवल यहाँ की संस्कृति को दूषित करेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को भी अंधकारमय बना देगा. बावजूद इसके तुमने शराब रूपी विष्ठा को ग्रहण करने या लोगों को करवाने की ठान ही ली है तो मजे से इस विष्ठा का ग्रहण करो. लेकिन. इसे ग्रहण करने व करवाने के उपरांत समाज में अपने मुंह से विष्ठा की बू को कतई न फैलाना.
(Protest Against Liquor Shops in Kausani)

बागेश्वर में रहने वाले केशव भट्ट पहाड़ सामयिक समस्याओं को लेकर अपने सचेत लेखन के लिए ख़ास जगह बना चुके हैं. ट्रेकिंग और यात्राओं के शौक़ीन केशव की अनेक रचनाएं स्थानीय व राष्ट्रीय समाचारपत्रों-पत्रिकाओं में छपती रही हैं.

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