फोटो : pinterest.com से साभार
ये पूरा कार्य किसी फ़ौज के अभियान से कम नहीं होता. वही पदसोपान, वही अनुशासन,वही रणनीति, वही जोश और वही जज़्बा. (Satire Priy Abhishek)
बिल्कुल नए रंगरूट के तौर पर हमें सबसे पहले ‘छुड़इया’ का काम दिया गया. मैनपुरी के चौथियाना मोहल्ले की छत पर जब मामा ने पहली बार कहा – तुम छुड़इया देओ तो हमारा सीना उसी तरह गर्व से फूल गया जिस तरह जब नाना जी ने पहली बार दावत में कहा था – तुम पानी परसो- तब फूला था. हम जग से नहीं, किसी विश्वकप से पानी परस रहे थे. अहा! क्या गौरवपूर्ण क्षण था. पानी के जग की तरह हमने पतंग को भी किसी विश्वकप की तरह उठाया. हमारे हाथ कांप रहे थे.
छुड़इया! ये शब्द कर्ता भी है, और क्रिया भी. जो छुड़इया दे वो भी छुड़इया, और जो दिया जाय वो भी छुड़इया. पतंग को सीने से लगाकर उल्टे कदमों से चलते हुए, हम छत के इस छोर से उस छोर पर पहुँचे. मामा ने मांजा खींचा और आवाज़ लगाई- छोड़ो! हमने खुद उछलते हुए दोनों हाथों से पतंग को हवा में उछाला. हमारे दिल में सरसराहट सी करती हुई, सर्र की आवाज़ के साथ पतंग हवा में ऊपर की ओर उसी तरह से गई, जैसे भूमि पर कोई सर्प जाता है. शायद उस आवाज़ ने, दिल की उस सरसराहट ने ही नज़ीर को नज़्म लिखने के लिये मजबूर कर दिया होगा.
इससे पहले सभी रंगरूट मामा के साथ बजरिया पतंग खरीदने जाते. मामा एक-एक पतंग को उठा कर देखते, तीलियों की लोचशीलता और कागज़ की मजबूती की जाँच करते. फिर चार-पांच पतंग खरीद लेते. साथ में थोड़ा मांजा और सद्दा भी. ये क्रिया लगभग हर रोज़ दुहराई जाती. उत्तर प्रदेश में पतंगबाज़ी एक नित्यकर्म है. वह कोई यदा-कदा त्यौहारों पर किया जाने वाला अनुष्ठान नहीं है.
घर की छत पर आकर पतंग के कन्ने बांधे जाते. मामा बड़ी सावधानी से बालिश्त-अंगुल से दूरी नापते, सींक से दोनों ओर छेद कर के कन्ने बांधते. फिर कन्नो से पतंग को उठा कर किसी स्वर्णकार की तरह संतुलन की जांच करते. और हम इस अद्भुत अभियांत्रिकी को मुग्ध भाव से ताकते रहते. कुछ दिन ये सब चलता रहा. फिर एक दिन हमें परिवीक्षा अवधि में ही पदोन्नति प्रदान कर दी गई.
उस दिन एक वरिष्ठ रंगरूट अनुपस्थित था, तो मामा ने हमें चरखी पकड़ा दी. चरखी प्रभारी पतंगबाज़ से ठीक नीचे का पद है. इसे लेफ्टिनेंट पतंगबाज़ या अतिरिक्त (एडिशनल) पतंगबाज़ भी कह सकते हैं. जैसे किसी मशीनगन की पोस्ट पर तैनात कोई सहायक हो. चरखी प्रभारी की ज़िम्मेदारी होती है कि वह निरन्तर पंतगबाज़ के पीछे चले. ढील देने के लिये तत्काल सद्दा उपलब्ध कराए और खींचने पर तुरंत चरखी में सारा सद्दा-मांजा लपेटे. उसे ज़मीन पर, लोगों के पैरों के नीचे न आने दे. उसे उलझने न दे. पर चरखी प्रभारी की असली परीक्षा तब होती जब पतंग कटती. (Satire Priy Abhishek)
अगर क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो लूट के वास्तविक आंकड़े एकत्र करता तो सर्वाधिक लूट के मामले पतंग और मांजे के ही निकलते. परन्तु ये लूट उसी तरह सौहार्दपूर्ण होती हैं जैसे शादी में दूल्हे के जूते की चोरी. लूटने वाला, और लुटने वाला दोनों ही इसे अपराध नहीं, पतंगबाज़ी का अनिवार्य अनुष्ठान मान कर चलते हैं. पतंग कटते ही चरखी प्रभारी का दायित्व होता है कि वह चरखी जल्दी-जल्दी लपेटे. पतंगबाज़ और चरखीनवाज़, दोनों की ये कोशिश रहती थी कि ज़्यादा-से-ज्यादा सद्दा वापस प्राप्त कर लिया जाय. अगर पतंग कटने के बाद आधा सद्दा भी वापस मिल गया तो यह बहुत बड़ी उपलब्धि होती. और मांजा?
जिस तरह शमशान की ओर गई लकड़ी कभी वापस नहीं लौटती, उसी तरह कटी पतंग के साथ गया मांजा भी कभी वापस नहीं लौटता. रेलवे की तरह किसी की छत से गुजरता मांजा भी उसकी निजी संपत्ति है. जिसे वह ‘अबे मांजा!’ कह कर चौंकने का अभिनय करते हुए फट से तोड़ने का अधिकारी होता है. और यदि अपनी पतंग कटने की बजाय दूसरे की पतंग काट ली तो?
बक्काट्टे की आवाज़ से पूरा मोहल्ला गुंजायमान हो जाता और हमारी पतंग सिकन्दर की तरह अगली पतंग से भिड़ने चल देती. ये पतंगबाज़ी तब तक चलती जब तक तक उधर से कोई पौरस न मिल जाए. या आंगन से नानी की गालियां न सुनाई देने लगें. इस प्रशिक्षण में दूसरा महत्वपूर्ण कोर्स होता था पतंग लूटने का. (Satire Priy Abhishek)
पतंग लूटना कला भी है और विज्ञान भी. एक ओर जहाँ इसमें पतंग कट के गिरने की गति, वायु की दिशा, उसका वेग और उसके अनुसार पतंग के गिरने के स्थान का अनुमान करना होता है. वहीं दूसरी ओर दादागिरी-दबंगई, चकमा देने का अभिनय भी करना होता है. नौसिखिये अपनी निगाहें पतंग पर टिकाए रहते कि पतंग गिरे तो उसे लूटें. वे पतंग के पीछे भागते. सिद्ध (लिजेंड) अपनी निगाह पतंग पर नहीं उसके लटकते मांजे पर टिकाते. हम पतंग लूटने के लिए लहराती पतंग पर त्राटक करते रहते और लिजेंड मांजे से पतंग को अपने कब्जे में कर लेते. और कटी पतंग अगर बराबर वालों में फंस गई तो किसी के हिस्से में मकां आया, किसी के हिस्से में दुकां आई की तर्ज़ पर किसी के हिस्से में कागज़ आया, किसी के हिस्से में सींक आई, मै सबसे छोटा था मेरे हिस्से में वापसी की लीक आई वाला मामला होता. फ़िर एक दिन प्रशिक्षण में सबसे गौरवान्वित करने वाला क्षण आया.
उस दिन हल्की-हल्की हवा चल रही थी. मामा पतंग उड़ा रहे थे और हम चरखी पकड़े थे. चरखी पूरी खुली थी और पतंग हवा में तनी हुई इतरा रही थी. अचानक ही मामा ने कहा -तुम नैक जे पतंग पकड़ो, हम अभैं नीचे से आत हैं. इतना बोल कर मामा ने पतंग की डोर हमारे हाथ में पकड़ा दी और खुद नीचे चले गए. डोर में कंपन हो रहा था और उसके साथ हमारा हाथ और दिल भी हल्का-हल्का कांप रहा था. लग रहा था कि कहीं पतंग हमें ही ना उड़ा ले जाए. वह किसी चपला-चंचला सी हमारे हाथ से छूटकर आकाश में और ऊपर जाने को बेचैन थी. हमने पतंग को बहुत ही धैर्य और साहस से थामे रखा. मामा लौट कर के आए और उन्होंने पतंग अपने हाथ में ले ली. हमें पतंगबाज़ो की दुनिया में कमीशन मिल गया था.
कुछ महीनों बाद उसी छत पर एक छोटे बच्चे को हमने पतंग पकड़ाते हुए कहा- जब हम कहें तब छोड़ दियो. (Satire Priy Abhishek)
प्रिय अभिषेक
मूलतः ग्वालियर से वास्ता रखने वाले प्रिय अभिषेक सोशल मीडिया पर अपने चुटीले लेखों और सुन्दर भाषा के लिए जाने जाते हैं. वर्तमान में भोपाल में कार्यरत हैं.
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