उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवाएं पटरी से उतर चुकी हैं. खास तौर से भौगोलिक विषमताओं वाले यहां के पर्वतीय क्षेत्रों में मातृ एवं शिशुओं की देखभाल के सरकारी इंतजाम अति दयनीय दशा में हैं. पहाड़ के दुर्गम क्षेत्रों के हालात और भी ज़्यादा खराब हैं. यहां के प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र स्वयं गंभीर रूप से बीमार हैं. इन केंद्रों मे पानी व बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं होने से ही अंदाजा लगाया जा सकता है यह केन्द्र किस तरह संचालित हो रहे होंगे. इन बीमार प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों व अस्पतालों पर आश्रित रोगी सिर्फ भगवान भरोसे ही आते हैं. (Primary Health Center of Inaccessible Hilly Areas are Seriously Ill)
इसका प्रत्यक्ष उदाहरण उत्तराखंड के बागेश्वर जिले से समझा जा सकता है. यहां की जनसंख्या 2011 की जनगणना के अनुसार 2,59,898 है. जिसमें 1,35,572 महिलाएं हैं. उक्त जिले में मात्र एक एल्ट्रासाउन्ड की मशीन है जिसके टैक्नीशियन भी यदा-कदा ही मिला करते है. इसी जनपद की काफलीगैर तहसील में बागेश्वर ब्लॉक का सबसे अधिक जनसंख्या वाला असों मल्लाकोट गांव है. इस गांव की जनसंख्या लगभग 2600 है. गांव के लोगों के बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए यहां एक एएनएम सेंटर स्थापित किया गया है, लेकिन यहां नियुक्त एएनएम माह में एक या दो बार ही आती हैं. वह गांव की जगह शहर में ही रहने को प्राथमिकता देती हैं. हालांकि इसके पीछे सबसे बड़ा कारण एएनएम सेंटर में सुविधाओं की कमी का होना है. सेंटर पर बिजली और पानी का उचित प्रबंध भी नहीं है. मुख्य सड़क गांव से 4 से 5 किलो मीटर दूरी पर है.
ऐसे में आपातकाल में रोगियों को सड़क तक डोली में उठाकर लाया जाता है. रास्ते इतने संकरे हैं कि जान जोखिम में डालकर लोग मुश्किल से एएनएम सेंटर तक पहुंचते हैं, परन्तु वहाँ पहुंचने के बाद उन्हें अधिकतर ताला लगा ही दिखता है. ग्रामीणों का कहना है कि यहां एक फार्मासिस्ट आते हैं लेकिन वह 11 बजे के बाद सेंटर पर कभी भी मौजूद नहीं रहते हैं.
इस संबंध में एएनएम बबीता गोस्वामी का कहना है कि वह अधिकतर समय फील्ड में रहती हैं, उनके पास 5 गांव असों मल्लाकोट, तरमोली, सीमतोली-2, पाना व किसरोली की ज़िम्मेदारी है. जिनमें उन्हें फील्ड वर्क करना होता है. यही कारण है कि वह एएनएम सेंटर में नियमित नहीं बैठ पाती हैं. उनका कहना है कि आवास जनपद मुख्यालय में होने के कारण वह गांव में रात्रि सेवा नहीं दे पाती हैं.
वहीं ग्राम प्रधान नन्दन सिंह असवाल ने बताया कि उनके गांव में कई घर खाली हैं जहां वह स्वास्थ्य कर्मियों को आवास उपलब्ध कराने के लिए तैयार हैं, परंतु फार्मासिस्ट और एएनएम गांव में रहने को तैयार नहीं हैं. इससे दोपहर बाद या रात में किसी भी गर्भवती महिला को आपातकालीन अवस्था में गाड़ी बुक कर 38 किलोमीटर दूर जनपद मुख्यालय बागेश्वर ले जाना पड़ता है या कभी कभी 80 किलोमीटर दूर अल्मोड़ा जाना पड़ता है. इस दौरान उसकी जान को खतरा बना रहता है. यदि एएनएम गांव में ठहरे तो प्रसव के लिए प्राथमिक सहायता मिलना संभव हो सकता है.
सरकारी स्तर पर भगवान भरोसे निर्भर पूरे इलाके में दायी मां के नाम से प्रसिद्ध जयंती देवी ही गर्भवती महिलाओं की एकमात्र आस हैं. जो पिछले 35 वर्षों से इस पूरे इलाके में दायी का काम करते हुए प्रसव के काम में दक्ष हो चुकी हैं. वह दिन-रात हर समय उपलब्ध रहकर गर्भवती महिलाओं की देखभाल व प्रसव का कार्य बड़ी कुशलता से कर रही हैं.
जयंती देवी
यह एक बड़ी बिडम्बना है कि प्रशिक्षित एएनएम, डॉक्टर व फार्मासिस्ट जिस कार्य का वेतन लेते हुए भी करने में असमर्थ हैं, उसी कार्य को दायी जयंती देवी अपना धर्म समझते हुए सेवाभाव से कर रही हैं. जयंती देवी बताती हैं कि वह अब तक असों मल्लाकोट, किसरौली, सिरसोली, तरमोली, पाना व मयो गांव के लगभग 3500 से अधिक बच्चों का जन्म घर पर ही सफलतापूर्वक करा चुकी हैं और आज तक एक भी प्रसव कराने में असफलता नहीं मिली है. उन्होंने बताया कि असम राइफल्स मणिपुर मेें सेवारत अपने पति मोहन सिंह मनकोटी के साथ रहने के दौरान उनके पड़ोस में रहने वाली एक नर्स ने उन्हें अपने साथ आर्मी अस्पताल में सहायिका के रूप में कार्य करना सिखाया. इस दौरान उन्होंने 10 वर्षों तक निरंतर आर्मी अस्पताल में प्रसव संबंधी कार्य सीखा और धीरे-धीरे इसमें निपुणता हासिल कर ली. पति के सेवानिवृत्त होने के बाद गांव में रहने पर उन्होंने गर्भवती महिलाओं की मदद करनी शुरू की.
स्वास्थ्य सेवा की ऐसी कुव्यवस्था केवल इसी गांव तक ही सीमित नहीं है बल्कि इस गांव से 15 किलोमीटर दूर बोहाला में भी यही स्थिति है. जहां मातृ एवं शिशु कल्याण केन्द्र में दांतों की डॉक्टर के अलावा कोई अन्य डॉक्टर उपलब्ध नहीं हैं. हालांकि हरियाणा निवासी वह दंत चिकित्सक भी अपना इस्तीफा देने को तैयार है. सड़क की जर्जर अवस्था होने के कारण गांव के बीमार मरीज़ों को डोली में ऊपर सड़क तक लाया जाता है और किसी तरह अल्मोड़ा या हल्द्वानी के अस्पतालों तक पहुंचाया जाता है. बांस के डंडों और ग्रामीणों के कन्धों पर चल रही है उत्तराखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था
इस संबंध में सामाजसेवी व राजकीय इंटर कॉलेज के अध्यक्ष शंकर सिंह ने बताया कि क्षेत्र में कोई डॉक्टर न होने से मामूली रोगों के उपचार के लिए भी लोगों को अन्यत्र जाना पड़ता है. स्थानीय निवासी 75 वर्षीय रतन सिंह मनकोटी ने बताया कि उनकी पत्नी को बुखार था, जिसके लिए क्षेत्र में कोई डॉक्टर उपलब्ध नहीं था. वहीं शहर ले जाने के लिए कोई सरकारी व्यवस्था भी नहीं है. ऐसे में 12000 रूपए में टैक्सी बुक कर वह जाने को मजबूर हो गए. इस संबंध में फार्मासिस्ट का तर्क है कि असों गांव में एएनएम सेंटर पर पानी व बिजली की व्यवस्था नहीं होने के कारण प्रसव नहीं कराया जाता है. जिसके लिए उच्चाधिकारियों के साथ कई बार पत्राचार भी किया गया. जिसके बाद विभाग द्वारा सर्वे कराया गया, परन्तु कोई कार्य नहीं हुआ. आशा वर्कर गंगा असवाल का कहना है कि उसे गर्भवती महिलाओं को अल्ट्रासांउड करना होता है, परन्तु जिले में एकमात्र अल्ट्रासाउंड मशीन है, उसमें भी स्पेशलिस्ट यदा-कदा ही आते हैं. जब मरीज़ का नम्बर लगाया जाता है तो उसे कई दिनों के बाद का नंबर दिया जाता है. इससे बचने के लिए परिजन गर्भवती महिलाओं को अन्य जिलों में ले जाकर अल्ट्रासाउंड व अन्य जांच कराने पर मजबूर होते हैं.
उत्तराखड के पर्वतीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य व्यवस्था की खस्ताहाल दशा कई बार देखने को मिल जाती है. पिथौरागढ़ जिले की गंगोलीहाट तहसील के गांव पिलखी निवासी तिनराम को देर रात सीने में तेज दर्द हुआ. परिजन उन्हें गंगोलीहाट ले गये, जहां से उन्हें राजकीय अस्पताल हल्द्वानी के लिए रेफर कर दिया गया. इसके बाद तिनराम को टैक्सी बुक कर दर्द झेलते हुए लगभग साढ़े 6 घंटे की यात्रा कर 197 कि.मी. दूर तराई स्थित हल्द्वानी के सुशीला तिवारी राजकीय अस्पताल आना पड़ा. उनकी मुसीबत यहां आकर तब और बढ़ गई, जब उन्हें पता चला कि यह अस्पताल सिर्फ कोरोना मरीजों के इलाज के लिए आरक्षित है. गरीबी रेखा से नीचे किसी तरह जीवन-निर्वाह कर रहे परिजन घर से जल्दबाजी में बीपीएल कार्ड साथ लाना भूल गये थे, हालांकि आयुष्मान कार्ड साथ में होने की वजह से कुछ राहत मिली. गरीब तिनराम के परिजनों ने अपने एक परिचित की मदद से उन्हें हल्द्वानी के एक निजी अस्पताल में भर्ती करा दिया. जहां रात भर आइसीयू में रखा गया और सुबह अस्पताल वालों ने उन्हें 70 हजार रुपये का बिल थमा दिया. गरीबी की मार झेल रहे इस परिवार के लिए यहाँ आयुष्मान कार्ड भी काम नहीं आया.
चरमराती स्वास्थ्य व्यवस्था पर बागेश्वर के ज़िलाधिकारी विनीत कुमार ने भी अंसतोष जताया. उन्होंने असामल्लाकोट के एएनएम सेंटर के लिए मुख्य चिकित्सा अधिकारी से बातचीत कर त्वरीत कार्यवाही करने के निर्देश भी दिया. परन्तु एक माह से अधिक समय हो जाने के बाद भी उक्त सेंटर पर कोई भी कार्यवाही नहीं हुई है. बहरहाल देवभूमि के नाम से प्रसिद्ध उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में खस्ताहाल स्वास्थ्य व्यवस्था एक तरफ जहां इस क्षेत्र के लचर प्रशासनिक व्यवस्था को दर्शाता है वहीं दूसरी ओर सरकार की उदासीनता पर भी सवाल खड़ा करता है. पूरे जिले में हृदय, बच्चों के डॉक्टर एक या दो ही हैं. ऐसी स्थिति में यहां के लोगों का जीवन किस प्रकार कठिनाइयों से गुज़रता होगा, इसकी कल्पना करना भी मुश्किल है. यही कारण है कि गांवों के लोग पहाड़ पर अपनी पैतृक ज़मीन और घर को छोड़कर नीचे मैदानी इलाकों में स्थाई रूप से बस चुके हैं. इससे तिब्बत (चीन) से लगा पूरा सीमांत इलाका बहुत तेजी से जनशून्य होता जा रहा है. यदि सरकार इस विशाल सीमा क्षेत्र में चिकित्सा, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, संचार की अच्छी सेवाएं उपलब्ध नहीं कराती तो यह आगे चलकर निश्चित ही देश की सुरक्षा के लिए बहुत हानिकारक साबित हो सकता है.
-चरखा फीचर
बागेश्वर, उत्तराखंड के बसंत पाण्डे का यह लेख हमें चरखा फीचर द्वारा भेजा गया है.
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