फोटो: सुभाष तराण
विगत 9 सितंबर को भारतीय पर्वतारोहण से मिस्टर पाणिग्रही का फोन आया, बताने लगे कि आगामी 14 सितंबर से 5 अक्टूबर तक चलने वाले हाई अल्टिट्यूड पिंडारी – मिलम ग्लेशियर क्षेत्र में चलने वाले खोज अभियान मे आपको बतौर सदस्य शामिल किया गया है. उन्होंने आगे बताया कि आधिकारिक चिट्ठी आपके ई-मेल पर भेज दी गयी है. इस अभियान के लक्ष्य और उद्देश्य क्या है, यह बात पूछने पर उन्होने कहा कि इस बारे में आपको यहाँ आने के बाद बता दिया जाएगा.
दफ्तर की जरूरी कागजी कार्यवाही हो जाने के बाद मैं 14 सितंबर को 10 बजे भारतीय पर्वतारोहण संस्थान पहुँच गया. उस दिन वहाँ अवकाश था. मिस्टर पाणिग्रही को फोन किया तो पता चला कि इस अभियान मे शिरकत करने वाले सदस्यो में से अभी तक कोई आई एम एफ नही पहुँचा है. उन्होंने कहा, आप अभी लौट जाईए. लोग शाम तक या कल सुबह तक ही आएगें. उनके आते ही आपको खबर कर दी जाएगी. मैने उनसे अभियान के लीडर के बावत पूछा तो पता चला कि ओ एन जी सी मे बतौर अधिशासी अभियंता कार्यरत निर्मल कुमार इस अभियान के लीडर होंगे. मै निर्मल से पहले कभी मिला तो नही था लेकिन मैने निर्मल के बारे में सुना जरूर था.
जो लोग पर्वतारोहण के बारे मे जानते है और रूचि रखते है उनके बीच निर्मल अपनी अलग पहचान रखता है. जम्मू कश्मीर के डोडा जिले के शीरी गाँव के साधारण से किसान माता पिता के इस बेटे की कहानी बडी ही रोचक, अनूठी और प्रेरणादायक है. सरकारी स्कूल से पढाई लिखाई करने के बाद जहां इस लडके नें ए आई इ इ इ परीक्षा पास कर एन आई टी श्रीनगर में मैकेनिकल इंजीनियरिंग में दाखिला पाया और वहीं 2011 में यह ओ एन जी सी जैसे ख्यातिलब्ध प्रतिष्ठान में कैंपस सिलेक्शन पाकर आज एक्जिक्यूटिव इंजिनीयर हो गया है. पहाड़ चढने के प्रति अपने जूनून के चलते निर्मल 2013 में पर्वतारोहण से जुड़ा और अगले कुछ सालों में एवरेस्ट, कंचनजंघा और मनास्लू जैसी दुनियां की ऊँची चोटियों पर सफल आरोहण कर सनसनी फैला दी.
मिस्टर पाणिग्रही से मैने निर्मल का फोन नंबर ले लिया था. अगले दिन सुबह मैने निर्मल को फोन किया. वह देर रात आई एम एफ पहुँच चुका था. आगे की योजना के बारे मे पूछने पर मृदुभाषी निर्मल ने बताया कि सभी सदस्यो के आने के बाद ही आगे की रणनीति पर विचार किया जाएगा. मेरी दिल्ली मे रिहायश होने के चलते उसने मुझसे कहा कि जब सभी लोग यहाँ एकत्र हो जाएंगे, वो मुझे फोन कर बुला लेगा. लगभग आधा घंटा ही बीता होगा कि पाणिग्रही का फोन आ गया. कहने लगे, आई एम एफ आ जाईए, कुछ लोग वहाँ पहुँच चुके है. उनसे मुलाकात हो जाएगी. मुझे यह बात जम गयी. अगले एक घंटे के अंदर मे आई एम एफ में था.
आई एम एफ के डाईनिंग हॉल में मिस्टर पाणिग्रही ने जिन पाँच लोगों से मेरी मुलाकात करवाई उनमें निर्मल कुमार, जम्मू कश्मीर पुलिस के निरीक्षक राम सिंह सलाखिया, उत्तराखंड के बडकोट के चित्र मोहन सिंह, बागेश्वर के जगदीश भरती, देहरादून के सृजन डंगवाल और नोएडा से अशोक शामिल थे. यह सभी लोग अभियान में जा रही टीम का हिस्सा थे. मिस्टर पाणिग्रही ने बताया कि लीडरशिप मे फेर बदल किया गया है. इस अभियान के लीडर अब कर्नल सत्य पाल मलिक होंगे. निर्मल अभियान के तकनीकी पार्ट को लीड करेगें . फौरी जान पहचान के बाद तय यह हुआ कि अब अगले दिन यानी कि सोमवार को अभियान के लीडर के आने के बाद ही आगे की कार्यवाही पर विचार विमर्श किया जाएगा.
सोमवार 16 सितंबर को कर्नल मलिक से आई एम एफ में हम सभी की मुलाकात हुई. कर्नल मलिक सेना मे रहते हुए सियाचिन क्षेत्र में रहने के साथ साथ दार्जीलिंग और गुलमर्ग के पर्वतारोहण संस्थानों में उप प्रधानाचार्य रह चुके हैं. 12 सदस्यो के इस अभियान दल में कर्नल मलिक के अलावा निर्मल, राम सिंह, चित्र मोहन सिंह, जगदीश, सृजन, अशोक, मध्य प्रदेश के पिपरिया से चंद्रशेखर शर्मा और दिल्ली पुलिस से सुरेश को मुझ सहित दिल्ली से रवाना होना था जबकि उत्तराखंड से संबध रखने वाले बाकी दो सदस्यों विजय रौतेला और त्रिभुवन महरा को बागेश्वर से टीम मे शामिल होना था.
आपसी बातचीत के बाद के बाद इस अभियान का पर्यवेक्षण देख रहे आई एम एफ के अमित चौधरी ने हम सभी को ब्रीफिंग के लिए आई एम एफ के मीटिंग हॉल मे बुला लिया. सभी का परिचय हो जाने के बाद अमित चौधरी इस अभियान के लक्ष्य और उद्देश्य पर आ गये. नन्दा देवी पर्वत श्रंखला में जा रहे इस अभियान को उन्होंने दो भागों मे बांटने की सलाह दी. पहले भाग में मई माह के दौरान हिम स्खलन में दबे पर्वतारोहियो के दल के लीडर मार्टिन मोरेन के शव को ढूँढना था और दूसरे भाग मे उस अनाम चोटी (6477) पर आरोहण करना था जिस पर जाते हुए मार्टिन मोरेन का वह दल दुर्घटनाग्रस्त हो गया था.
हम सभी के लिए यह एक बेहद चुनौतीपूर्ण अभियान था. हिमालय के जिस क्षेत्र मे हमे अपनी कार्यवाही को अंजाम देना था वह क्षेत्र विजय रौतेला और चंद्र शेखर के अलावा हम सभी के लिए अजनबी था. हमारे दल मे विजय रौतेला और चंद्र शेखर ही ऐसे सदस्य थे जो मई माह के दौरान दुर्घटनाग्रस्त पर्वतारोहियों की खोज के लिए भेजे गये अभियान का हिस्सा रह चुके थे. किसी भी किस्म की फौरी राहत और मदद के आश्वासन के साथ अमित चौधरी ने हम सभी को शुभकामनाएं दी तथा हमे अभियान के दौरान 24 घंटे फोन पर उपलब्ध रहने का भरोसा दिया. उसके बाद का समय आई एम एफ के स्टोर से पर्वतारोहण से संबधित जरूरी सामान जारी करवाने मे निकल गया. अगले दिन इस अभियान के लिए जरूरी खरीददारी करने के बाद हम लोग शाम के वक्त बागेश्वर के लिए रवाना हो गये.
सितंबर 18 की सुबह हमारा दल बागेश्वर पहुँच गया था. यहाँ पर त्रिभुवन महरा और विजय रौतेला भी टीम में शामिल हो गये थे. दिन भर अभियान से संबधित छिटपुट खरिदारियों का दौर चलता रहा. विजय ने हिमालय के उच्च भूभाग पर अभियान दल की सहायता के लिए हेप ( हाई अल्टिट्यूड पोर्रटर्स) और रसोईए की व्यवस्था कर ली थी. बागेश्वर से खरकिया तक गाडी और वहाँ से आगे बेस कैंप तक पोर्टर्स का जिम्मा पिंडर घाटी के अंतिम गाँव खाती के युवा खिलाफ सिंह को दे दिया गया था. शाम को बागेश्वर के स्थानीय मित्रों से मुलाकात हुई. जहाँ भाई रमेश कृषक ने स्थानीय बाजार से परिचित करवाने के साथ साथ बागेश्वर के कुली बेगार आंदोलन के ऐतिहासिक स्थल और बाघ नाथ मंदिर के दर्शन करवाए वहीं एक्टिविस्ट पंकज पांडे और उनके साथियों से मिल कर बहुत अच्छा लगा.
इन सबों के अलावा पत्रकार मित्र केशव भट्ट से भी मिलना हुआ. पर्वतारोहण के खासे जानकार केशव नन्दा देवी पर्वत श्रंखला मे होने वाली हर एक गतिविधि पर बहुत ही बारीक नजर रखते है. वे जन और प्रकृति के सरोकारों के प्रति संवेदनशील रहकर सोशल मीडिया और अखबारों में बेवाक होकर लिखते रहते है. मई माह मे मार्टिन मोरेन की अगुवाई वाले दल की दुर्घटना के दौरान लिखे लेख मे उन्होंने स्थानीय प्रशासन को आड़े हाथों लिया था. इस लेख मे उन्होंने स्थानीय प्रशासन के संवेदनहीन, गैर जिम्मेदाराना और बेवकूफी भरे फैसलों की तार्किक आलोचना करते हुए उसे कटघरे मे लाकर खडा कर दिया था.
अगले दिन सुबह तीन जीप मे सामान सहित लदकर बागेश्वर से खरकिया के लिए प्रस्थान किया गया. यह गाड़ियां भराडी (कफकोट) से आगे जाकर आधे रास्ते तक ही जा पा रही थी. वहाँ पिछले कई दिनों से रास्ता टूटा हुआ था. वहाँ से हमें दूसरी तरफ जाकर गाड़ियां बदलनी थी. हमारे पास काफी सामान था, लिहाजा इस तरफ से उस तरफ सामान पहुंचाने मे काफी समय लग गया. दिन का भोजन करने के बाद हम लोग तकरीबन 4 बजे खरकिया पहुँचे.
बागेश्वर से कफकोट तक की सडक तो फिर भी ठीक ठाक सी ही थी लेकिन वहाँ से आगे खरकिया तक सडक की दशा बहुत दयनीय थी. उत्तराखंड के इन दूरस्थ क्षेत्रों की सड़के इस राज्य के विफल राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व का जीता जागता प्रमाण है. पहाड़ो की इन दूरगामी बसासतों मे बने रहने की पहली और आखिरी शर्त यही है कि आपको यहाँ अपने दम पर जिंदा रहना होगा. जहाँ तक उत्तराखंड की सरकार की बात है तो वो केवल तराई के शहरों के कल्याण के लिए प्रतिबद्ध है. पहाडों के प्रति उत्तराखंड सरकार की यही उदासीनता यहाँ के पहाड़ी क्षेत्र से पलायन का मुख्य कारण है.
खरकिया अदद दो चार दुकानों और होटलों सहित कुछ रिहायशी घरों की बसासत है . यहाँ सड़क मार्ग की हद खत्म हो जाती है. यहाँ से आगे आपको परिवहन के लिए मानव सभ्यताओं के पुरातन साधनों के सहारे आगे बढ़ना होता है. आज से लगभग सवा सौ साल पहले रोमांच और अनुसंधान पसंद अंग्रेज बहादुरों ने पिंडारी जीरो प्वांईट तक अश्व मार्ग का निर्माण किया था लेकिन आज स्थिति यह है कि अक्टूबर महीने मे भी खरकिया से आगे सामान ढोने के लिए पोर्टर्स ही एकमात्र विकल्प है. प्रदेश की तराई के अर्द्ध विकसित शहरों में बैठे नेताओं, नौकरशाहों और टेक्नोक्रेटों को इस बात से फर्क ही नही पड़ता कि पर्यटन के लिए प्रसिद्ध उत्तराखंड की इन घाटियों को कैसे लोक अनुकूल बनाया जाय.
खरकिया पहुंचते की पोर्टरों के लिए लोड बनाने का काम शुरू हो गया था. अभियान मे शिरकत कर रहे पर्वतारोहियों के व्यक्तिगत सामान के अलावा कुल मिलाकर 23 अतिरिक्त बोझ बने. एक बोझ का वजन 22 किलो रखा गया. जिसके एवज में प्रत्येक पोर्टर को 3500 रूपये देने तय किए गये.
अगले रोज अल सुबह नाश्ते से फारिग होकर पैक लंच के साथ अगले गंतव्य के लिए प्रस्थान किया गया. वाछम और दऊ के बाद दिन का अगला पड़ाव खाती गाँव था. सड़क से पाँच किलोमीटर की पैदल दूरी पर बसे इस गाँव के होटलो मे बनने वाली पाउडर के दूध की चाय और बंजर हो रहे खेत यह बताते है कि यहाँ के लोंगो ने पशु पालन और खेती बाडी को लगभग छोड ही दिया है. पिंडारी की तरफ जाने वाले मुख्य पैदल मार्ग के नीचे बसा लगभग ढाई हजार मीटर की ऊंचाई पर बसा खाती गाँव काफी साफ सुथरा दिखाई पडता है. खाती गाँव का 1890 मे निर्मित डाक बंगला बताता है कि सदी भर पहले से ही हिमालय की तरफ इस रास्ते पर बडे बडे सरकार परस्त अभियान जाते रहे हैं. डाक बंगले के सामने ही प्रकाश का होटल है. विजय ने प्रकाश से परिचय करवाया. होटल के दरवाजे पर कूड़ेदान, जिसमे प्लास्टिक का कचरा पडा था, से मालूम पड रहा था कि इस गाव के लोग अजैविक कूड़े के उन्मूलन को लेकर लेकर कितने सतर्क है.
चाय का आर्डर देकर हम लोग होटल मे बैठ गये. आस पास की साफ सफाई और कूडेदान को देखकर जब मैने प्रकाश की तारीफ की तो वो कहने लगा, यह जागरूकता यहाँ के बाशिंदों मे भारतीय पर्वतारोहण संस्थान के द्वारा इस घाटी मे चलाए जा रहे सफाई अभियानों के चलते आई है. हम साल भर का प्लास्टिक कचरा इकठ्ठा कर रखते है जिसे साल मे एक बार आई एम एफ के लोग लेकर जाते है. प्रकाश की बात बात खत्म हुई तो हमारे साथ बतौर हेप जा रहे जातुली गाँव का दिनेश बोल पड़ा, हमारे गाँव मे तो सफाई को लेकर समिति बनाई गयी है. जिसके पदाधिकारी महीने मे दो बार गाँव के प्रत्येक घर के शौचालय और आस पास का निरिक्षण करते है और किसी भी घर की हद में गंदगी या कचरा पाए जाने पर उस पर एक हजार रूपया बतौर जुर्माना बबूल करते हैं. यही नही, यदि कोई व्यक्ति गाँव मे शराब पीकर शोर शराबा करता है तो उसके लिए जुर्माने की रकम पाँच हजार तय है.
होटल की दीवार पर चस्पा बहुत सारी तस्वीरों मे से एक तस्वीर की तरफ ऊँगली से इशारा करते हुए विजय ने कहा, यह रहे मार्टिन मोरेन. उन्हे कुमाऊँ हिमालय बहुत पसंद था. इस गाँव मे मार्टिन मोरेन कई दशको से आते जाते रहें है. खाती गाँव के बच्चो, युवाओं और बुजुर्गों के साथ खडे इस दिवंगत पर्वतारोही की तस्वीर इस बात की तस्दीक़ कर रही थी कि हिमालय के इस भूभाग और यहाँ के बाशिंदो को लेकर यह व्यक्ति कितना संवेदनशील और दोस्ताना रहा होगा. चाय पीने के बाद हम लोगों ने प्रकाश से विदा ली और आगे बढ गये.
खाती गाँव से द्वाली की दूरी लगभग बारह किलोमीटर है. गाँव से आगे मामूली चढाई चढने के बाद रास्ता दूसरी तरफ पिंडर घाटी मे उतार देता है. सन् 2013 तक यह रास्ता नदी के एक तरफ से ही द्वाली तक जाता था लेकिन 2013 की आपदा ने इस रास्ते को तहस नहस कर रख दिया. उसके बाद नया रास्ता नदी पार की तरफ से बनाया गया. पिंडर नदी पर बने झूला पुल को पार करने के बाद हम लोग नदी के बहाव के विपरीत आगे बढने लगे. खाती गाँव से आगे निकलते ही मौसम की आँख मिचौनी शुरू हो गयी थी. हरे भरे जंगल, लहराती रिंगाल और घास के बीचों बीच, हल्की फुल्की बूंदाबांदी में ही हम लोग कुशल नटों की तरह उफनती पिंडर और काफनी गाड़ पर लकडी के लट्ठों को रखकर बनाए गये अस्थाई पुलों को पार करते हुए अपने रात के अगले पड़ाव द्वाली पहुँच गये.
द्वाली पिंडर और काफनी गाड़ के संगम पर बसा एक उजाड़ सा ठौर है. पिंडर नदी के दोनो तरफ की भूस्खलन से उधड़ रही पहाडियों के बीच में स्थापित द्वाली में दो चाय की बंद दुकानों, जो शायद कभी खुलती हो, और दो यात्री शेड्स के अलावा कुमाऊँ मण्डल निगम का एक उजाड़ सा रेस्ट हाउस, जंगलात महकमे की खंडहरनुमा चौकियां और लोक निर्माण विभाग का एक वीरान सा डाक बंगला, जिसको सौ साल से भी पहले अंग्रेज अफसरों ने अपने हिमालयी अभियानों के मद्देनजर यहाँ बनवाया था, विद्यमान है. डाक बंगले के सामने आंगन मे लगा लोहे का साईन बोर्ड, जिसमे पिंडारी और काफनी की दूरी के अलावा इमर्जेंसी के दौरान चिकित्सकीय सहायता के लिए 108 और जिलाधिकारी, बागेश्वर और परगना अधिकारी कफकोट के पद नामों से संपर्क करने करने के हास्यास्पद निर्देश लिखे गये है. दूर संचार के क्रांतिकारी दौर में यह साईन बोर्ड स्थानीय प्रशासन की संवेदन हीनता का जीवंत उदाहरण है. रात द्वाली मे गुजारने के बाद अगली सुबह हमारा दल अपने अगले पड़ाव पिंडारी बेस कैंप की तरफ चल पडा.
द्वाली से पिंडारी की दूरी लगभग ग्यारह किलोमीटर के आसपास है. द्वाली और पिंडारी के बीच पडने वाला अगला पड़ाव फुरकिया है. द्वाली से पाँच किलोमीटर की दूरी पर कुमाऊँ मण्डल विकास निगम द्वारा बेतरतीब तरीके से विकसित करने की कोशिश के चलते यह स्थान पर्यटक स्थल कम और कोई डंप यार्ड ज्यादा लगता है. सीजन के दौरान यह घाटी पर्यटको और पर्वतारोहियो से गुलजार रहती है. लेकिन मजाल है कि स्थानीय प्रशासन और सरकार ने कुछ ऐसा किया हो जिससे यहाँ आने वालों को सुविधाएँ और उन्हे रैवेन्यू मिल जाता.
बहरहाल, फुरकिया के बाद हमारा अगला पड़ाव पिंडारी बेस कैंप था. ऊँचाई बढने के कारण यहां से आगे का सफर काफी कठिन हो जाता है. यहां से आगे चढाई और हवा में कम होती ऑक्सीजन पर्वतारोहियों के हुनर की प्रारंभिक परीक्षा लेनी शुरू कर देती है. ट्री लाइन के खत्म होते होते जांघों पर ही नही फेफडों पर भी जोर पडने लगता है.
पूरी पिंडर घाटी को लोहे और कंक्रीट के सहारे विकसित करने वाले लोक निर्माण विभाग के अभियंताओं की समझ देख कर सर पीटने का मन करता है. लोहे के खंबों, चादरों और छड़ों से बने रैन शेल्टर, बेंच और बेरीकेटर, जो हर साल बर्फ के बोझ और स्खलन से टूट कर बेकार हो जाते है, हर साल बजट को ठिकाने लगाने का आसान तरीका है. इस घाटी मे रोड़ हेड से बेस कैंप तक 200 रुपये प्रति किलो वजन की ढुलाई है. लोहे और सीमेंट को इतनी दूर ढोकर पहुँचाने से अच्छा होता कि इस घाटी मे जो इतनी अच्छी गुणवता के पत्थर है, गारे के साथ उनका उपयोग कर यात्री शेड, बेंच और सुरक्षा दीवारें बनाई जाती. इससे जहाँ शहरों से ढोए जाने वाले लोहे और सीमेंट की एवज मे खर्च होने वाले से बजट मे बचत होती वहीं इस पैसे से स्थानीय कामगारों के लिए शिला शिल्प के विकास और रोजगार के बेहतर मौके उपलब्ध हो जाएंगे.
पिंडारी मे बेस कैंप नदी के दूसरी तरफ नदी पार कर स्थापित किया जाता है. एक समय था जब बेस कैंप पिंडारी जीरो प्वाईंट के पास ही बनाया जाता था. लेकिन 2013 में आई आपदा ने वहां से तख्ता कैंप तक जाने वाले रास्ते को तबाह कर उसे खाई मे तब्दील कर दिया है. वर्तमान बेस कैंप तक जाने के लिए नदी में उतर कर पार जाना ही एक मात्र विकल्प है. पहुंचने को हुए तो साथी विजय ने पिंडारी में रह रहे बाबा धर्मानन्द से मिलने की बात कही. विजय इस ईलाके मे काफी समय से आते रहता है. बाबा और विजय की दोस्ती बहुत पुरानी है. रुक रुक कर अभी भी बारीश हो ही रही थी. हालांकि थकान काफी हो गयी थी लेकिन हमारे पास काफी वक्त था. सो हम लोग बाबा पिंडारी मे बाबा धर्मानन्द के आश्रम की तरफ हो लिए.
एक चट्टान के बाहर पत्थरों की जुगलबंदी से बनाये गये उनके इस आश्रम के मुख्य द्वार पर जाते ही सामने मंदिर नुमा कमरे मे सबसे पहले मां नन्दा की मूर्ती पर नजर ठहर जाती है. मुख्य द्वार से अंदर घुसते ही दांयी ओर एक आँगन के बाद बाबा धर्मानन्द अपनी रसोई में बैठे नजर आते है. ऐसा प्रतीत होता है जैसे बाबा को पहले से ही मालूम है कि हम लोगो को क्या चाहिए. बाबा के समर्पण ने मेरे जैसे घोर नास्तिक के मन को भी आस्था से सराबोर कर दिया. यह आस्था किसी चमत्कार को लेकर नही बल्कि बाबा के उस ममतामयी व्यवहार को लेकर थी जो मैने अपनी जिंदगी मे केवल और केवल अपनी माँ से पाई है. एक बड़ा गिलास चाय और बिस्कुट के भोग के बाद बाबा ने देश दुनिया पर चर्चा शुरू कर दी. मुझे अपने जीवन मे यह पहला साधू मिला जिसके लिए पूजा पाठ और आध्यात्म बिलकुल व्यक्तिगत कार्य है. वह हमसे चंद्रयान पर बात करते हुए कहते हैं कि देश के प्रधानमंत्री की जल्दबाजी के चलते मिशन फैल हो गया. यह सॉफ्टवेयर की खामी थी, अगर थोडा समय और दिया जाता तो हम कामयाब हो जाते. बाबा यही नही रुकते वे उत्तराखंड के नेताओं और नौकरशाहों के पहाड़ के प्रति रवैये को लेकर भी चिंतित नजर आते है. वे शहरों मे रहकर पहाडों के नाम पर सरकारी और गैर सरकारी इमदादों का कारोबार करने वाले शिक्षा विद्वों, तथाकथित बुद्धिजीवियों, पर्यावरण विद्वों और समाज सेवकों को पहाड़ का सबसे बड़ा दुश्मन मानते है. बाबा धर्मानन्द खाती और उसके आसपास के गावों के स्कूलों के लिए शिक्षकों की व्यवस्था अपने निजी खर्चे पर कर रहे हैं.
बाबा से विदा लेने के बाद हम लोग नदी पार स्थापित अपने बेस कैंप की तरफ हो लिए. बारिश और ग्लेशियर के पानी का प्रवाह लिए पिंडर नदी में पैर डालते ही सर तक झुरझुरी दौड़ पडती है. एक तो ठंडे पानी का तेज बहाव, उपर से नदी में पड़े तीखे कंकड और थके हुए पैर. यह अपने आप मे एक जटिल काम था. लेकिन ग्लेशियरों के नीचे बह रही नदियों को पार करना पर्वतारोहण का एक अनिवार्य हिस्सा है. बेस कैंप पहुंचने के बाद यह तय किया गया कि कल एडवांस बेस कैंप के लिए लोड फेरी करने के बाद ही इस अभियान का पहला अवकाश लिया जाएगा.
अगले दिन सुबह उठते ही अगले कैंप के लिए लोड बनाए गये. क्योंकि यहाँ से आगे का रास्ता बहुत ही दुरूह और खतरनाक था. लिहाजा दस से पंद्रह किलो के लोड बनाए गये. हम लोगों ने कुछ अपना सामान भी पिट्ठू मे डाल दिया. नाश्ते के बाद कूच किया गया. बेस कैंप से एबीसी का रास्ता सामने पसरे दो पहाडों के बाद प्रसिद्ध नन्दा खाट के नीचे बह रहे बुढ़िया नाला से पार होकर फिर वहाँ से उपर को जाता है. लगभग पाँच सौ मीटर के बाद पडने वाली पहली चढाई ने हमारे एक युवा साथी के हौंसले पस्त कर दिए. वह वहीं बैठ गया. हम सब आगे बढ रहे थे कि तभी सुबह ठीक ठाक दिखने वाले मौसम ने अचानक तेवर बदल दिए. बारिश होने लगी तो हम एक प्राकृतिक गुफा की आड़ मे बैठ गये. जब काफी देर बारिश नही रूकी तो सामान वहीं डंप कर हम लोग वापिस बेस कैंप लौट आए. मौसम विभाग से पता किया तो पता चला कि अगले दिन भी मौसम ऐसा ही रहने की संभावना है. थके तो थे ही, लिहाजा सब घोड़े बेचकर सो गये. लेकिन अगले दिन मौसम लगभग साफ ही रहा. हमारा यह अच्छा खासा दिन मौसम विभाग की भविष्यवाणी की भेट चढ़ गया.
एक और दिन आराम मिलने के बाद हम लोग अगले दिन नई स्फूर्ति और जोश के साथ एडवांस बेस कैंप की तरफ हो लिए. हमारा एक साथी पैरों मे छाले हो जाने के चलते पहले ही कैंप मे रूक गया था. आज के सफर मे पहली चढाई पर पहुंचते ही हमारा एक ओर युवा साथी फिर से हिम्मत खो बैठा और वहीं से पलट कर वापिस बेस कैंप लौट आया. . इस रास्ते में यह अकेली चढाई नही है. इस तरह की कई चढाईयां और उतराईयां पार पाने के बाद ही तख्ता कैंप पहुंचा जा सकता है. साधारण पर्यटकों के लिए इस रास्ते के बीच मे भी कैंप लगाने पडते है लेकिन प्रशिक्षित पर्वतारोहियो के लिए इतना सफर कोई बडी बात नही है. हालांकि नाम मात्र के इस रास्ते मे पडने वाली सीधी खड़ी ऊँची चट्टानों से बचने के लिए कहीं उपर को खडे दम चढना होता है तो कहीं बिलकुल सीधे नीचे उतरना पड़ता है. पैर पैर पर नीचे की तरफ से झांकती ख़तरनाक खाईयां, जिनके मुँह पिंडर नदी तक खुले दिखाई देते हैं और हवा में आक्सीजन की कमी भी किसी हद तक इस सफर को दुरूह बनाने के लिए जिम्मेदार है लेकिन यही सारी मुश्किलें तो पर्वतारोहण को रोमांचक और चुनौतीपूर्ण बनाती है. तकरीबन तीन चौथाई दिन गुजरने तक हम लोग लोड फेरी पूरी करने के बाद वापिस बेस कैंप आ गये.
अगले दिन हम सभी को एडवांस कैंप मे काबिज होना था. पहले दिन हुई लोड फेरी के चलते कुछ साथियों के हौंसले पस्त हो चुके थे. दर असल यह रास्ता आसमान पर जाने से कम नही लगता. पहाड़ ऐसे ही होते हैं. केवल ताकत, तकनीक और क्षमता के बल पर पहाड़ नहीं चढे जा सकते, इसके लिए इच्छाशक्ति सबसे महत्वपूर्ण है. इच्छाशक्ति न तो पैसे से खरीदी जा सकती और न ही कोई दूसरा इसे आपको दे सकता है. यह आपके दिल से उठती है. मुझे उम्मीद थी कि रात गुजरने पर सभी का हौंसला लौट आएगा और हम सब लोग अगले दिन तख्ता कैंप मे काबिज हो जाएंगे.
शाम को दल के लीडर कर्नल मलिक ने राम सिंह, मुझे, विजय और निर्मल को बुलाकर आगे की रणनीति पर बातचीत की. बात यह ठहरी कि बेस कैंप ज्यों का त्यों बनाए रखा जाएगा. कर्नल मलिक और आगे ना जा सकने वाले साथी यहीं बेस कैंप मे बने रहेंगे. बाकी तख्ता कैंप मे शिफ्ट होने के बाद अगले ही दिन कैंप 1 के लिए लोड फेरी करेंगे और एक दिन बाद वहाँ शिफ्ट हो जाएंगे. उसके बाद वहाँ से एक टीम, जो विजय की देख रेख में मार्टिन मोरेन को ढूंढने के लिए उस जगह की एक बार फिर से पडताल करेगी जहाँ सात पर्वतारोहियो के शव मिले थे. दूसरी टीम, जिसमे मुझ सहित राम सिंह, निर्मल, चित्र मोहन और तीन हेप होंगे, उस अनाम चोटी पर आरोहण करेंगे जिस पर चढ़ते हुए मार्टिन मोरेन का दल दुर्घटनाग्रस्त हो गया था.
सुबह एक बार फिर पूरे जोश के साथ हम लोगों ने तख्ता कैंप पर कब्जा जमाने के लिए धावा बोल दिया. आज सबके पास लोड फेरी के मुकाबले सामान ज्यादा था. रास्ते परिचित हो जाने के बाद सफर उतना मुश्किल महसूस नही हो रहा था जितना पहले लग रहा था. सुबह तो मौसम ठीक ही था लेकिन चढ़ते दिन के साथ मौसम के मिजाज बदलने लगे. तख्ता कैंप पहुंचते पहुंचते वाईट आउट हो गया. पहले पहुँच चुके साथियों ने टेंट पिच कर दिए थे. रसोई बनाई गयी और सब लोग मिलकर रात के खाने की तैयारी मे जुट गये.
तख्ता कैंप हमारे अभियान के रास्ते में पडने वाले ठिकानों मे सबसे मन मोहक और रोमांचकारी पड़ाव था. रोमांच से भरे रास्ते को चढ उतर कर पार करते हुए पहली बार तख्ता कैंप पहुचने वाले को तो शायद इस बात का ख्याल भी नहीं आता होगा कि उसका अगला पड़ाव इतना खूबसूरत भी हो सकता है. तख्ता कैंप से जहाँ एक ओर दूर तक जा रही मन भावन पिंडर घाटी मे नदी की पतली लकीर और छोटे छोटे बुग्यालों के साथ किसी पेटिंग के जैसी नजर आती है वहीं तीन तरफ बल जूरी, पंवाली धार, नन्दा खाट, छंगुच, नन्दा कोट जैसे धवल शिखर अपनी एक अलग ही छटा बिखेरते हुए देखे जा सकते है. एक दम नीचे घाटी के मुहाने पर पसरा पिंडारी ग्लेशियर और उसका दूर दूर तक फैला मोरैन प्रकृति के एक अलग ही रूप को बयान करता है. मौसम साफ हो तो नन्दा खाट और छंगुच के बीच वाली घाटी से उतरता आईस फॉल देखने वालों को मंत्र मुग्ध कर देता है. हिम शिखरों के नीचे गलियों मे लटके भारी भरकम हिम खंड और स्नो लाईन के नीचे के भुरभुरे ढाल तथा काली चट्टानें देखने वालों के बदन में झुरझुरी दौडाने के लिए काफी है. गाहे बगाहे सामने घाटी मे सरकते आइस फॉल में हिम स्खलन के चलते होने वाली गड़गड़ाहट से जब तख्ता कैंप की शांत वादियां गरजती है तो लगता है जैसे यह कोई युद्ध का मैदान हो.
अगले दिन मौसम का मिजाज संदिग्ध तो था लेकिन फिर भी जोश जोश मे हम लोग कैंप 1 के लिए लोड फेरी की तैयारी मे जुट गये. क्योंकि हमे अगले कुछ दिनों उपर ग्लेशियर और बर्फीले इलाके मे ही रहना था इसलिए हमने केवल दो दिन के राशन के अलावा तकनीकी उपकरणों सहित खाने पीने का सारा सामान आगे के लिए बांध लिया. चाय और हल्के नाश्ते के बाद हम लोग कैंप 1 की तरफ चल पडे. तकरीबन 35 से 45 डिग्री के ग्रेडिएंट के एक अच्छे खासे टुकड़े को पार पाने के बाद मोरैन से भरी घाटी अच्छे अच्छे चलने वालों के दम खम की परीक्षा ले लेती है. उसके बाद रास्ते मे पडने वाली पहली खड़ी चट्टान, जिससे हमेशा पत्थरों के निकल कर गिरने का भय बना रहता है, पर्वतारोहियों के संतुलन के पडताल के लिए तैयार मिलती है. बर्फ के उपर की ओर चढते एक बड़े मैदान को पार कर हम लोग कैंप 1 के नीचे की आखिरी वॉल के नीचे पहुँचे ही थे कि तभी मौसम खराब होने लगा. तय हुआ कि लोड फेरी मे लाया गया सामान बर्फ में टेंट के अंदर रख कर दबा दिया जाए. कल जब मौसम साफ होगा तब अपने निजी सामान के साथ साथ इसे भी सामने खड़ी वॉल से उपर चढा कर कैंप 1 ले जाया जाएगा.
वापसी में लौटते हुए हम लोगों को पहली वॉल के उपर टेंट्स के लिए बनाई गयी जगह पर पिछले साल सेना द्वारा किए गये ट्रैल्स पास अभियान के दौरान छोड़े गये बहुत सारे रेडी टू ईट सहित काफी मात्रा में वहाँ पड़ा अजैविक कचरा मिला. हम लोगों ने बिना देर किए वह सब अपने अपने खाली बैग मे भरा और वापिस तख्ता कैंप की तरफ हो लिए. लौटते हुए होने वाली बारिश और वाईट आऊट ने थोडी ही देर में विकराल रूप ले लिया था.
पूरे दिन रह रह कर बारिश होती रही. हमे लग रहा था कि अब बहुत जल्द बर्फ पड जाएगी लेकिन रात गुजर गयी, बर्फ नही पड़ी. अगले दिन भी रूक रूक कर बारिश होती रही. बेस कैंप से लीडर की तरफ से संदेश आया कि बारिश के रूकने का इंतजार किया जाए. यह बड़े ताज्जुब की बात थी कि लगभग 4500 मीटर की ऊंचाई पर पिछले 24 घंटे से बारिश पडने के बावजूद भी तापमान नहीं गिर रहा था. बारिश के चलते सामने की घाटियों और आइस फॉल मे लटके हिम खण्डों के टूटने का सिलसिला और तेज हो गया था.
पहाड़ों में इस दौरान बारिश कभी नहीं होती. सितम्बर और अक्टूबर हिमालय के इन उच्च भू भागों में विचरण करने के लिए आदर्श मने जाते है. बरसात के बाद के इन दो महीनों में मौसम लगभग साफ़ ही रहता है. अगर कभी थोड़ा बहुत बदला भी तो मौसम में ठंडक के चलते छिटपुट बर्फवारी ही होती है. लेकिन इस बार तो लगातार हो रही बारिश ने सबको चौंका दिया था.
लगातार हो रही इस बारिश के चलते छंगुच चोटी के नीचे लटका हुआ पुराना ग्लेशियर भी आखिरकार टूट ही गया. गर्मी और बरसात की मार झेलने के बाद जब हिमालय की घाटियों मे पसरे इन हिमनदों को बचे रहने के लिए ताजा बर्फ की जुंबिश चाहिए होती है. ऐसे वक्त मे बारिश का लगातार बने रहना इनके अस्तित्व के लिए एक बडे खतरे का संकेत है. उत्तर भारत के शहरों और कस्बो मे चलने वाले अंधाधुंध वातानुकूलित यन्त्रों, वाहनों, कारखानों द्वारा उगले जा रहे ताप के चलते हिमालय के उच्च भूभाग मे होने वाली इस तरह की बेमौसम बारिश ने न जाने अब तक न जाने ऐसे कितने ही ग्लेशियर लील लिए होंगे. सरकार और कारपोरेट घरानो के सौजन्य और सानिध्य मे वातानुकूलित कमरों/सभागारों के आदी भाषण बाजों, स्पोर्टस यूटिलिटी व्हीकल मे सफर करने वाले तथकथित पर्यारणविदों, नेताओं, अधिकारियों, शिक्षाविदों, एक्टिविस्टों को चाहिए कि अपनी ब्रांडिंग की बजाय जितना जल्दी हो सके उन्हे बदलाव की शुरूआत खुद से कर देनी चाहिए. नहीं तो वो दिन दूर नहीं जब हिमालय में जमे हुए ये हिमखंड समूचे उत्तर भारत को पानी पानी कर देंगे.
बहरहाल, शाम तक हल्की फुल्की बर्फ गिरनी शुरू हो गयी थी. मौसम के लगातार बनते बिगडते मिजाज के चलते हमारे कुछ साथी चिड़चिड़े हो रहे थे. मौसम के हाल को देखकर वे जल्दी से जल्दी वापिस लौटना चाहते थे. हमारे पास अगले दिन सुबह तक का राशन बाकी था. उपर कैप 1 में लगातार बर्फ पड रही थी. ऐसे हालात में यहाँ से आगे जाना बेवकूफी भरा निर्णय होता. लगातार हो रही बर्फवारी के चलते मार्टिन मोरेन के शव मिलने की बची खुची संभावनाएं खत्म हो चुकी थी. मौसम के हालात देखकर हमने उस अनाम चोटी पर चढने का विचार त्याग दिया था. लीडर से हुई बात के बाद यह तय हुआ कि अब वापिस लौटने मे ही समझदारी है. अगली सुबह को मौसम चाहे जैसा भी होगा, लोड फेरी द्वारा कैप 1 के रास्ते मे छोड़े गये सामान को किसी भी तरह वापिस लाया जाए ताकी उसके बाद वापसी की जा सके. . यहाँ हमारे पास बस सुबह तक का राशन बचा था. बेस कैंप में भी राशन नही के बराबर था. दो दिन की दूरी पर बसे खाती और खरकिया से पहले राशन मिलने की कहीं कोई गुंजाइश ही नहीं थी. ले दे कर हमारे पास एक ही जरिया था कि हम किसी तरह से कैंप 1 के रास्ते मे डंप किए गये सामान को , जिसमे राशन भी शामिल था, वापिस ले आएं और जितना जल्दी हो सके वापिस रोड़ हेड तक लौट जाएँ.
अगले दिन तीन आदमियों को कैंप में खाना बनाने के लिए छोड़ कर बाकी लोग सामान लेने के लिए कैंप 1 की तरफ निकल पड़े. बर्फवारी जारी थी. बर्फ ने रास्ते को और भी दुरूह कर दिया था. लेकिन हमारे लड़कों ने गजब की हिम्मत दिखाई. अगले पाँच घंटो के संघर्ष के बाद कैंप 1 के रास्ते में रख छोड़ा गया सारा सामान वापिस तख्ता कैंप लाया जा चुका था. अगले दिन हमें तख्ता कैंप समेट कर बेस कैंप को लौटना था.
जब हम किसी लक्ष्य के साथ किसी अभियान पर जाते हैं और किसी कारण वश लक्ष्य के करीब जाकर उसे हासिल नहीं कर पाते, वह क्षण बहुत दुखदायी होता है. सितंबर की 14 तारीख को शुरू हुआ यह अभियान 29 सितंबर को पूरा हुए बिना ही खत्म हो रहा था. 15 दिनों का समर्पण और पहाड़ मे मीलों लम्बे उतार चढ़ाव भरे रास्ते में मय बोझ के किए गये पैदल सफर का हासिल पिंडर घाटी की जानकारी तक सीमित रह गया था. कैंप 1 के पार ट्रैल्स पास और उसके आस पास को देखने समझने की इच्छा पूरी होने से पहले ही खत्म हो गयी थी. इस अभियान के दौरान तख्ता कैंप जैसी खुशमिजाज जगह पर हमारी यह उदासी भरी रात थी.
तमाम किस्म की हताशाओं और निराशाओं के बावजूद फिर से लौट आने की दृढ इच्छा के साथ हमने अगले दिन सुबह उठते ही सामान बांधना शुरू कर दिया. अगले एक घंटे मे सब कुछ पैक हो चुका था. एक बार फिर से लोड तैयार किए जाने लगे. सभी के हिस्से मे ठीक ठाक वजन आ गया था. इस में एक पूरा वजन तो कचरे का था. रास्ते में अच्छी खासी फिसलन हो रही थी. विजय यहाँ अनेकों बार आ चुका है. रास्ते के मिजाज को देखकर विजय सभी को साथ लेकर चल रहा था. साथियों को साथ लेकर चलने का नाम ही पर्वतारोहण है.
बेस कैंप मे हमारे पहुचने तक खरकिया से पोर्टर्स आ चुके थे. यहाँ से निकलने के बाद हमारा रात का अगला पडाव द्वाली था. तगड़े बोझ के चलते तख्ता कैंप से बेस कैंप पहुंचते पहुंचते अच्छी खासी थकान हो गयी थी. मौसम के हालात भी कुछ ठीक नही थे. आसमान जब तब बरसे जा रहा था. इसलिए बेस कैंप मे खाना खाने के बाद हम लोग तुरंत ही द्वाली के लिए रवाना हो गये.
बेस कैंप से द्वाली तक रास्ते भर रूक रूक कर बारिश होती रही. भीगते भागते हम लोग कोई देर रात तक द्वाली पहुँच गये थे. यहाँ यात्री शेड मे डेरा डाला गया. अगले दिन हम लोग सुबह खाती के लिए निकल पड़े. खाती में खाना खाने के बाद दिन के लगभग 3 बजे हम सभी पोर्टर्स सहित खरकिया पहुँच गये जहाँ से खिलाफ सिंह की जीपों में बैठकर हम लोग बागेश्वर आ गये और अगले एक दिन बाद वहाँ से दिल्ली लौट आए.
– सुभाष तराण
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