Featured

पीहू की कहानियाँ – 3

जब पीहू ने मेरी ग़लती को ठीक किया

पीहू के माता पिता रोहित विश्वकर्मा और प्रेरणा शर्मा की सहमति मिलने के बाद मैंने तय किया कि अब मुझे पीहू से रोज़ मिलना चाहिए. पीहू से दोस्ती बनाने के लिए भी और पीहू को समझने के लिए भी. मेरे ख़्याल से वो वक्त जीवन के सबसे ख़ूबसूरत वक्त में से एक था. एक छोटी सी प्यारी सी बच्ची के साथ दो घंटे. उसे देखना, उसे समझना, उसके साथ खेलना, लग रहा था कि जीवन में इससे ख़ूबसूरत कुछ हो सकता है क्या ? पीहू से मिलते हुए मुझे हमेशा लगता रहा कि इस बच्ची के साथ मेरा किसी जन्म का तो कोई रिश्ता है. ये बात पहली मुलाक़ात में भी लगी और फिर बार बार लगी और आज भी लगती है. साक्षी , प्रेरणा , रोहित को भी कई बार मैंने बताया और सब का मानना था कि हाँ कुछ तो कनेक्शन है. बल्कि रोहित-प्रेरणा से ना जाने कितनी बार मैने कहा कि यार तुम लोग फिर से कोशिश कर लो. पीहू को मुझे दे दो.

पीहू से लगातार मिलने से मुझे नई नई बातों के बारे में पता चलने लगा और साथ ही एहसास होने लगा कि मुझ से कुछ ग़लती हो गई है. दरअसल पीहू से मिलने से पहले ही मैं दो ड्राफ़्ट लिख चुका था. मतलब एक 43 साल के व्यक्ति की दो साल के बच्चे के दिमाग में जा कर कहानी और सीन गढ़ने की कोशिश. पीहू के साथ रहकर मुझे लगा कि मेरा तरीक़ा शायद ग़लत था. मुझे कहानी और सीन में वही कुछ रखना चाहिये जो पीहू करती है या जिसे करने में उसे मज़ा आता है. सीन बदलने शुरू किए. नए सीन लिखने शुरू किए. स्टोरीलाइन को छेड़े बिना. ये बहुत ज़रूरी था.

आपको ट्रेलर में बालकनी वाला सीन याद है?  बहुत लोगों ने लिखा कि उस एक शॉट से लोग सबसे ज़्यादा घबराए हुए हैं. इस सीन का जन्म भी पीहू के साथ रिसर्च के दौरान ही हुआ. दरअसल पीहू के पिता रोहित ने फ़ेसबुक पर एक तस्वीर पोस्ट की थी , जिसमें पीहू बालकनी पर खड़ी है. उस एक तस्वीर ने मुझे बहुत प्रभावित किया था. असल कहानी के बच्चे की भी कहानी कुछ ऐसी ही थी. पीहू से मिलने के दौरान मैंने देखा कि वो बालकनी मे ना सिर्फ बहुत देर तक खड़ी रहती है बल्कि आसपास के सारे बच्चों को अल बल सल जैसा कुछ भी बोल कर बुलाती भी है. उनके साथ वहीं से खेलती है. अपने खिलौने दिखाती है. मुझे ये सब बहुत ही दिलचस्प लगा और आप यकीन नहीं करेंगे : फ़िल्म में अब पूरे 6 मिनट का बालकनी का सीन है. वही बालकनी, जिससे आप सबसे ज़्यादा घबराए हुए हैं.

इतना ही नहीं,  मैंने देखा कि पीहू को फ़ोन पर बतियाना भी बहुत पसंद था. यकीन मानिये दो साल की ये बच्ची फ़ोन पर दो घंटे तक बात कर सकती थी. चाहे किसी की समझ में आए या ना आए या चाहे उसकी खुद की समझ में आए या ना आए. इस लेख के साथ मैं आपको उसी समय का पीहू का एक वीडियो पोस्ट कर रहा हूँ. जो रोहित ने पीहू का “स्टिंग ऑपरेशन” करके हासिल किया था. वीडियो है तो बहुत लंबा पर मैंने कुछ एडिट कर दिया है. इस वीडियो को देखकर आपको समझ में आ जाएगा कि पीहू कितनी बातूनी है और उसकी इस कला का फ़िल्म में मैंने बहुत इस्तेमाल किया है.

ये सिर्फ एक दो उदाहरण है. ऐसी ना जाने कितनी बातें हैं जो केवल पीहू करती है और पीहू करती है , इसलिए सब कुछ फ़िल्म का हिस्सा बन गया.

( जारी )

 

अगले हिस्से में :

रिसर्च के वक्त के तीन बेहद दिलचस्प वीडियो ..ऐसे तीन वीडियो जिसे देखकर आपको समझ आ जाएगा कि फ़िल्म में क्या होने वाला है.

 

पिछली कड़ी

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Girish Lohani

Recent Posts

सागर से शिखर तक : स्वामी मन्मथन

पिछली कड़ी : बद्रीदत्त पांडे और इंद्र सिंह नयाल ने रखा था ‘उत्तराखंड राज्य की…

3 days ago

उत्तराखण्ड की महिलाएं : स्थितियों, संघर्षों और चुनौतियों का दस्तावेज

1970 के दशक का उत्तराखण्ड का ‘चिपको आंदोलन’ विश्वविख्यात है. यह तथ्य भी कमोबेश ज्ञात है कि…

3 days ago

कामिनी तुम कौन?

पानी बरस रहा है. जब भी पानी बरसता है, देखता हूं पेड़-पौधे बहुत खुश हो जाते…

3 days ago

पूर्वी नयार नदी की वो बाढ़

राजेसिंह का कहना है कि ‘‘मरोड़ा गांव से लदोली घाट तक का रास्ता उतार-चढ़ाव का न…

3 days ago

कुमाऊँ की विलुप्त होती जन्माष्टमी पट्ट-चित्र परम्परा

कुमाऊँ में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी केवल भगवान कृष्ण के जन्म का धार्मिक पर्व नहीं रही है,…

3 weeks ago

बद्रीदत्त पांडे और इंद्र सिंह नयाल ने रखा था ‘उत्तराखंड राज्य की संकल्पना’ का वैचारिक आधार

पिछली कड़ी : पहले समाज बदलो, राज्य अपने आप सार्थक हो जाएगा : इंद्र सिंह नयाल इन्द्र…

3 weeks ago