समाज

क्या होती है पार्थिव पूजा

पार्थिव पूजा कुमाऊँ में सर्वत्र मनाया जाने वाला अनुष्ठान है. श्रावण के महीने में काली चतुर्दशी के दिन इस पूजा का विशेष महत्त्व माना जाता है. (Parthiv Puja and Folk Art)

श्रावण मॉस के इस दिन लोग घरों में भी पार्थिव (मिट्टी, गोबर अथवा चावल से) बना कर पूजा करते हैं परन्तु अधिकाँश लोग विशेषकर पूजा करने के उद्देश्य से जागेश्वर धाम जाते हैं. (Parthiv Puja and Folk Art)

प्रमुख रूप से यह अनुष्ठान संतान प्राप्ति की कामना से किया जाता है. कुमाऊँ में श्रावण, बैसाख व कार्तिक किसी भी माह में किसी भी दिन इस अनुष्ठान का आयोजन किया जा सकता है.

कई लोग पूरे माह भी पार्थिव पूजन करते हैं अलबत्ता हर दिन नए शिवलिंगों की स्थापना की जाती है.

फोटो : राजेन्द्र पन्त

कला की दृष्टि से देखा जाय तो इस में शिल्प व चित्र दोनों ही पक्ष सामान होते हैं. शिल्प में पार्थिव लिंग तथा चित्र में पार्थिव लिंगों की स्थापना हेतु वस्त्र पर अष्टगंध से या पिठ्या से अंकित शिव-पीठ आते हैं. शिव पीठ का अंकन अधिकांशतः पूजा संपन्न कराने हेतु आमंत्रित ब्राह्मण अर्थात पंडित ही करते हैं. इस शिव पीठ में और गेरू-बिस्वार से बनायी जाने वाली शिव-पीठ में अंतर होता है. पूजा स्थल पर गेरू-बिस्वार से ही शिव-पीठ अंकित की जाती है.

फोटो : राजेन्द्र पन्त

शिव पीठ की रचना:

इस अंकन में प्रायः केंद्र में एक बिंदी बनाई जाती है जो ब्रह्माण्ड का प्रतीक होती है. इसे शिव यंत्र के बीज का प्रतीक रूप भी मना जा सकता है. यह बिंदु ही विश्वव्यापिनी शक्ति है. इस बिंदु से बाहर एक वृत्त बनाया जाता है जिसके बाहर अष्ट कमल दल अंकित किये जाते हैं जो कि सृष्टि के गुप्त कमल के प्रतीक होते हैं.

इस वृत्त के भी दो त्रिकोण – एक ऊर्ध्वमुखी व दूसरा अधोमुखी होता है, जो मिलाकर एक षटकोणीय सितारे का आकार ले लेते हैं. ऊर्ध्वमुखी त्रिकोण शिव का और अधुमुखी त्रिकोण शक्ति का प्रतीक है. ये त्रिकोण विश्व में सृष्टि की रचना, पालन, और विलय में त्रिकोण विशुद्ध शक्ति द्वारा की जाने वाली क्रीड़ा का निरूपण करते हैं. इस त्रिकोण के मध्य स्थित बिंदु शिव के साथ साथ शक्ति का एकाकार स्वरूप भी है. ये सभी त्रिकोण तथा अष्ट कमल दल आदि चारीं ओर से एक चार द्वार वाले चतुष्कोण (भूपुर अर्थात भूमि) में स्थापित होते हैं. यह चतुष्कोण पृथ्वी का प्रतीक माना जाता है.

(डॉ. कृष्णा बैराठी और डॉ. कुश सत्येन्द्र की पुस्तक ‘कुमाऊँ की लोक कला, संस्कृति और परम्परा‘ के आधार पर)

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