बचपन की वे स्मृतियां आज भी जीवन्त हैं जब हमसे खेत में जोते जाने वाले हल को छूने की सख्त मनाही होती थी लेकिन यह नहीं बताया जाता था कि हल क्यों नही छूना है? मन है कि जिस चीज के लिए मना किया जाय, जिज्ञासावश उस काम को करने को लालायित रहते और चोरी-छिपे वह सब करने से नहीं चूकते, जिसके लिए मना किया गया हो.
(Old Tradition in Kumaon)
साल में मुश्किल से एक दो बार खेत जुताई का मौका होता इसलिए न अपने हल-बैल होते और न कोई स्थाई हलिया. जब जरूरत पड़ती गांव के ही किसी व्यक्ति को हल जोतने के लिए मना लिया जाता. यह काम भी कोई आसान नहीं था. कई मिन्नतों के बाद कोई हल जोतेने को राजी होता. ऐसा व्यक्ति जो स्थाई हलिया नहीं होता, उसे हलिया कहना भी एक तरह से वह अपना अपमान समझता.
ऐसा ही वाकया हुआ जब एक हलवाहे को बात चुभ गयी और आधा काम छोड़कर भाग खड़ा हुआ. हुआ कुछ इस तरह कि किसी ठाकुर यजमान के घर उसका कोई रिश्तेदार आया था, यजमान के कहने पर वह हमारे खेतों की जुताई के लिए राजी हो गया. सुबह-सुबह हमारे खेत पर जुताई शुरू ही की थी कि ईजा भी खेत पर पहुंच गयी. उसकी जुताई से नाखुश होकर ईजा बोल पड़ी – यौस हई हैबेर निहईये भल (ऐसे होने से न होना ही अच्छा) लेकिन वह उस बात का अर्थ समझ बैठा – ऐसे हलिए से तो हलिया न होना ही अच्छा. फिर क्या था उसका गुस्सा सातवें आसमान पर. मैं कोई हलिया हॅू तुम्हारा! बोलते हुए हल से बैल खोलकर वापस लौट गया. वह दिन था कि किसी हलवाहे से संभलकर बोलने की सीख मिल गयी.
जब जुताई होती तो किसी से बैल, किसी से हल आदि और एक हलवाहे की व्यवस्था करना किसी चुनौती से कम न होता. दिनभर की जुताई के बाद शाम को हल तो खेत में ही पड़ा होता लेकिन हल को जुए से जोड़ने वाला नाड़ा, किसी ऊॅचे पेड़ की टहनी में लटका जाता. कारण, नाड़ा जानवरों के चमड़े का बना होता, जिसे नीचे रखने पर कुत्ते नोच दिया करते. इसे छूने तक के लिए घरवालों की सख्त मनाही होती थी. सालों-साल चलने के लिए यह चमड़े का बना होता, आज तो नाइलॉन की रस्सी भी इसका विकल्प बन चुकी है. हम बच्चों के लिए यह नाड़ा किसी अनजान खौफ से कम नहीं था. लेकिन जुताई के बाद जब खेत पर पटला चलता तो उस पर बैठने का भरपूर मजा उठाने से हम नहीं चूकते.
(Old Tradition in Kumaon)
यह हल ही था, जिसने कुमाऊं में ब्राह्मण वर्ग को दो खेमों में बांट दिया – छोटी धोती और बड़ी धोती के नाम से. सरल शब्दों में कहें तो कुलीन और हौव फोड़ बामण. वैसे कुमाऊं में ब्राह्मणों को तीन श्रेणियों में बांटा गया है. दीवान खानदान के पण्डित यानी जिनके बुजुर्ग कभी रियासतों के राजाओं के दीवान या मंत्री रहे हों, दूसरी श्रेणी में अन्य ब्राह्मण जो स्वयं को कुलीन कहलाते जब कि तीसरी श्रेणी के ब्राह्मण पीतई ब्राह्मण या हौव फोड़ ब्राह्मण कहलाने लगे.
वर्ण व्यवस्था के प्रारंभिक दौर में तो खेती-किसानी ब्राह्मणों के हिस्से थी ही नहीं. उन्हें तो धार्मिक अनुष्ठान, वेदाध्ययन तथा समाज को शिक्षा व दिशा देना रहा. कर्म के अनुसार जातियां बनी न कि जातियों के अनुसार कर्म लेकिन कालान्तर में वंशानुगत जातियां बन गयी. जाहिर है कि वंशानुगत ब्राह्मण विद्वान ही हो, जरूरी नहीं इसलिए जो योग्यता नहीं रखते थे, उन्होंने जीविकोपार्जन के लिए खेती-किसानी करना शुरू दिया. अब समस्या ये थी कि ब्राह्मणों के लिए हल जोतना वर्जित माना जाता था जिनके लिए संभव था, उन्होंने अपना स्थाई हलिया नियुक्त कर दिया, जिनको सालभर में उगने वाले अनाज को मेहनताने के रूप में दिया जाता. यही व्यवस्था औजी, नाई आदि के लिए भी थी. लेकिन जिनको खेती-किसानी के ऐनवक्त पर हलिया नसीब न हुआ अपनी रोजी-रोटी के खातिर हल थाम लिया और वे हलिया ब्राह्मण की श्रेणी में आ गये.
(Old Tradition in Kumaon)
आज ब्राह्मणों में भी विभिन्न श्रेणियों के बीच बड़ी धोती व छोटी धोती के बीच की खाई को कम होते देखा जा सकता है, लेकिन जो अपने पुश्तैनी गांव में रहते हैं, उनके बीच यह अन्तर आज भी साफ दिखाई देता है. पुरातन मान्यताओं पर विश्वास करने वालों में परस्पर रोटी-बेटी का संबंध आज भी वर्जित है.
एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से दिमाग में तैरता है कि हल जोतने मात्र से कोई ब्राह्मण बड़ा या छोटा कैसे हो सकता है? पहली बात जो मुझे लगती है कि हल में प्रयोग होने वाला नाड़ा जो चमड़े का होता था, उसे अपवित्र माना जाता था. हल जोतना है तो नाड़े के बिना संभव नहीं, लेकिन नाड़ा यदि रस्सी का बना है तो फिर हर्ज क्या? आप कुलीन ब्राह्मण की श्रेणी में आते हैं, चमड़े का जूता पहन सकते हैं, चमड़े की बेल्ट पहन सकते हैं , यहां तक कि कुछ कुलीन वर्ग के कहे जाने वालो ब्राह्मणों को मांसाहार से भी परहेज नहीं, लेकिन चमड़े का हल का नाड़ा छूने पर आप अपनी ही जाति में नीचे के पायदान पर आ जाते हैं. यह बात कुछ हजम नहीं होती.
(Old Tradition in Kumaon)
हल चलाने के पीछे एक तर्क ये भी माना जा सकता है कि इससे अनजाने में जीव हत्या हो सकती है इसलिए ब्राह्मणों को जीव हत्या से बचने के लिए हल नहीं जोतना चाहिये या धरती जिसे हम माता स्वरूप मानते हैं, उसको चीरना एक तरह से पाप की श्रेणी में आता है. तब तो कुदाल से जमीन खोदना भी ऐसा ही कृत्य है फिर केवल हल से ही कैसा परहेज? यदि गौ वंश को कष्ट न देना इसके पीछे कारण है तब तो बैलगाड़ी में भी ब्राह्मण का बैठना वर्जित होना चाहिये. बल्कि सच्चाई तो यह है कि खेती-किसानी जिस काल में ब्राह्मण वर्ग का पेशा नहीं था, यह रवायत तब से है. हम पेशा बदल चुके हैं लेकिन पुरानी परम्पराओं व मान्यताओं को अभी भी अपनाये हुए हैं. दुनियां भर के कुकृत्य करने के बाद भी ब्राह्मण कुल में पैदा होकर यदि हम अपने को श्रेष्ठ कहलाने से नहीं थकते, तो यह हमारी नासमझी ही तो है.
अब आते हैं पहाड़ियों के भात की बात पर. भात पहाड़ियों का दोपहर का पसन्दीदा भोजन है. यही नहीं विशेष उत्सवों-नामकरण, जनेऊ, विवाह तथा श्राद्ध आदि पर अन्य पकवानों के साथ भात प्रमुखता से परोसा जाता है. ’’नामकन्द का भात’’ या ’’भात-बर्यात’’ जैसे शब्दयुग्म हमारे दैनन्दिन जीवन में भात की महत्ता को ही दर्शाते हैं. भात व बिना भात की रसोई को कच्ची रसोई व पक्की रसोई के नाम से जाना जाता है. अपनी जातीय श्रेणी में नीचे के पायदान के व्यक्ति के हाथ का भात नहीं खाया जाता. लोकपरम्परा में अपनी ही ब्याहता बेटी के हाथ का भात नहीं खाया जाता और कहीं-कहीं तो बुजुर्ग महिलाऐं अपनी बहू के हाथ का भात खाने में तक परहेज करते हैं.
वैसे यह बात जनमानस में प्रचलित है कि – जैसा खावे अन्न, वैसा होवे मन, लेकिन यहां जाति से नहीं बल्कि उस व्यक्ति के आचार-विचार का प्रभाव उस भोजन पर पड़ने की बात कही गयी है. फिर वह भात हो अथवा रोटी एक ही बात है. रोटी के लिए आटा तो हाथ से गॅूथा जाता है और हाथ से ही रोटी बनाई जाती है, उसके खाने में नियम शिथिल हैं, जबकि भात जिस को पकाने में हाथ का स्पर्श तक नहीं होता, उससे इतना परहेज क्यों? दरअसल लोकपरम्परा में चली आ रही इन मान्यताओं को तार्किक आधार पर देखें तो ये किसी अबूझ पहेली से कम नहीं है. जिनका कोई तर्कसंगत उत्तर हमारे पास नहीं है फिर भी खुद को श्रेष्ठ साबित करने की ललक हमें इन परम्पराओं को ढोने को मजबूर करती है.
(Old Tradition in Kumaon)
भवाली में रहने वाले भुवन चन्द्र पन्त ने वर्ष 2014 तक नैनीताल के भारतीय शहीद सैनिक विद्यालय में 34 वर्षों तक सेवा दी है. आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से उनकी कवितायें प्रसारित हो चुकी हैं.
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