समाज

डड्वार: गढ़वाल की विलुप्त होती परम्परा

डड्वार, गढ़वाल में दिया जाने वाला एक प्रकार का पारितोषिक है. जिसे पहले तीन लोगों को दिया जाता था: ब्राह्मण, लोहार और औजी. लेकिन धीरे-धीरे यह परंपरा खत्म होती जा रही है. इसके बदले अब लोग पैसे दे रहे हैं. सालभर में दो फसलें होती हैं. जिसमें एक गेहूं-जौ और दूसरी धान की. इसमें प्रत्येक फसल पर डड्वार दिया जाता था.
(Old Garhwali Tradition)

डड्वार में फसल पकने के बाद पहला हिस्सा देवता को दिया जाता था. जिसे पूज या न्यूज कहा जाता है. दूसरा हिस्सा पंडित का दिया जाता था. जो पंडित द्वारा साल भर किए गए कार्यों के बदले कम दक्षिणा की पूर्ति करता था. तीसरा हिस्सा लोहार का था. जो फसल काटने से पहले हथियार तेज करता था. इसे धान की फसल पर पांच सूप धान दिए जाते थे. जबकि गेहूं की फसल पर तीन पाथे जौ और एक पाथी गेहूं दिया जाता था. वहीं संग्राद दिवाली पर घर पर आकर ढोल बजाने शादी विवाह और शुभ कार्यों में काम करने की भरपाई करने के बदले औजी को भी डड्वार दिया जाता था. इसे लोहार से थोड़ कम दो सूप धान और दो पाथी जौ और एक पाथी गेहूं दिया जाता था. औजी को बाजगिरी समाज के नाम से जाना जाता है. इसका मुख्य व्यवसाय शादी विवाह और शुभ कार्यों में ढोल बजाना था. इसके साथ ही ये लोग गांव में सिलाई का काम भी करते थे. डड्वार, फसल का एक हिसा होता है जो प्रत्येक फसल पर दिया जाता है.

बौरु भी डड्वार की ही तरह श्रम के बदले दिया जाने वाला पारितोषिक है लेकिन यह डडवार से थोड़ा भिन्न है. यह किसी ग्रामीण महिला या पुरुष द्वारा खेतों में काम करने या अन्य काम करने के बदले दिया जाने वाली दैनिक मजदूरी है. जिसे अनाज के रुप में दिया जाता है. एक दिन के काम के बदले दो सूप धान दिया जाता था. जिसके बदले में अब तीन सौ रुपये दैनिक मजदूरी दी जा रही है.

गढ़वाल में पहले जब सांकेतिक मुद्रा नहीं थी, तब श्रम के बदले डड्वार, बौरु आदि दिया जाता था. वस्तु विनिमय भी उस समय किया जाता था. जैसे चौलाई, सोयाबीन के बदले नमक, तेल लेना. इसके लिए गढ़वाल से ढाकर आते थे. जो वर्तमान कोटद्वार है. उसके बाद सांकेतिक मुद्रा आई. तब वस्तु के बदले पैसे दिए जाने लगे.

गांव में आज भी डड्वार और बौरु जैसी परंपरायें कुछ हद तक जिंदा है. उसके बाद आधुनिक भारत में कैस लेस में पेटीएम, गुगल एप, यूपीआई, ऑनलाइन मनी ट्रासफर जैसी व्यवस्थाएं आ गई है. जिसमें ऑनलाइन ही कहीं से भी सामान मंगवा सकते हैं.
(Old Garhwali Tradition)

गढ़वाल में प्राचीन समय में माप तोल के पाथा, सेर आदि होते थे. दो सेर बराबर एक किलो. चार सेर बराबर एक पाथा. इसके बाद दोण, खार आदि आनाज मापने की विधि थी. खेत की माप मुट्ठी के हिसाब से होती थी. सोने चांदी और कीमती जेवरों की तोल रत्ती आदि में होती थी. समय की गणना ज्योतिष के घडी पल आदि से होती थी. दिन की पहर से और महीने की संक्रांति से. पवांण बीज रोपाई के पहले दिन को पवांण कहते हैं. पवांण का अर्थ होता है पहला दिन.
(Old Garhwali Tradition)

विजय भट्ट

पेशे से पत्रकार विजय भट्ट देहरादून में रहते हैं. इतिहास में गहरी दिलचस्पी के साथ घुमक्कड़ी का उनका शौक उनकी रिपोर्ट में ताजगी भरता है.

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  • परंपराओं खत्म हो रही है पक्ष्चिम यूपी मे यह रस्मे अस्सी के दशक में मैंने भी देखी है

  • परंपराऐ खत्म हो रही है पक्ष्चिम यूपी मे यह रस्मे अस्सी के दशक में मैंने भी देखी है

  • उत्तराखंड की संस्कृति में मैं भी रुचि रखता हूं,क्या में कफल ट्री के लिए लिख सकता हूं।।

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