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अलविदा घन्ना भाई

उत्तराखंड के प्रसिद्ध हास्य कलाकार घनानंद जी ’घन्ना भाई’ हमारे बीच नहीं रहे. देहरादून स्थित एक अस्पताल में आज दोपहर 12:30 बजे लंबी बीमारी के बाद उन्होंने अंतिम सांस ली.
(Obituary to Ghanna Bhai)

गढ़वाली के हास्य कलाकार के रूप में वर्षो तक मंच पर अपना जादू बिखेरने वाले घन्ना भाई मूल रूप से पौड़ी जिले के थे. घन्ना भाई गत चार दशकों से मंचीय कार्यक्रमों में लोकप्रिय कलाकार के रूप में स्थापित रहे. हिमालयी ग्राम्य जीवन, समाज और यहां के लोक में रचे-बसे छोटे-छोटे किस्से और घटनाओं को उठाकर मंच तक ला कर अपने चुटीले अंदाज में प्रस्तुत करने वाले घन्ना भाई अपने समय के अद्वितीय और विलक्षण कलाकार थे. अपनी सहज और सरल संवाद शैली से वे घण्टों तक दर्शकों को बांधे रख सकते थे.

गढ़वाली के मौखिक भाषा प्रभाव और मिठास को मंचों पर बिखरने वाले, अप्रतिम कलाकार घनानंद जी ने रामलीला के मंच से अपना सफर शुरू किया. विभिन्न रंगमंचों, कैसेट, सीडी, रेडियो, दूरदर्शन, नाटकों और फिल्मों तक का सफर तय करते हुए उन्होंने गढ़वाली भाषा के हास्य-व्यंग्य को देश-दुनिया में लोकप्रियता और पहचान दिलाई.
(Obituary to Ghanna Bhai)

गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी जी के मंचों पर उनकी खास पहचान और मांग रहती थी. नरेन्द्र सिंह नेगी के साथ घन्ना भाई की जुगलबंदी को बहुत पसंद किया जाता. नेगी जी के कई म्यूजिक एल्बम में उन्होंने अभिनय भी किया.

घन्ना भाई ने उस दौर में गढ़वाली भाषा की मौखिक प्रस्तुति को लोकप्रिय बनाया जब आमतौर पर लोग मंच से गढ़वाली बोलने में झिझकते थे. गीत-संगीत के अलावा मंच पर गढ़वाली भाषा के दूसरे स्वरूपों तथा अन्य प्रयोगों का अभाव रहता. मंच से गढ़वाली संवाद, बातचीत, भाषण, संचालन, वक्तव्य आदि मौखिक भाषा के विविध प्ररूप प्रायः नदारद रहते. मंच से गद्य प्रस्तुतियों का अभाव रहता. घन्ना भाई ने पहली बार साबित किया कि गढ़वाली भाषा में भी मंच से गद्य प्रस्तुति और संवादों का धाराप्रवाह और प्रभावी तरीके से प्रस्तुत किया जा सकता है. गढ़वाली संवादों के माध्यम से श्रोताओं को गुदगुदाया-हंसाया जा सकता है तथा स्वस्थ मनोरंजन किया जा सकता है. अपने ख़ास अंदाज़ से श्रोताओं और दर्शकों को लोट-पोट करने वाले घन्ना भाई ने साबित किया कि न सिर्फ गढ़वाली गीत-संगीत बल्कि गढ़वाली गद्य की मौखिक प्रस्तुतियां भी अच्छी खासी प्रभावी, मनोरंजक और लोकप्रिय हो सकती है.

घन्ना भाई को गढ़वाली भाषा का प्रथम स्टैंडअप कॉमेडियन कहा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. कई नवोदित कलाकार आपसे प्रेरणा ग्रहण करते रहे, आपको कॉपी भी करते रहे. घन्ना भाई ने राजनीति में भी अजमाईश की, विधायक का चुनाव लड़ा पर सफन नहीं हुए. आपका कला की दुनिया से जुड़ाव बना रहा.
(Obituary to Ghanna Bhai)

गढ़वाली भाषा की गद्य प्रस्तुति तथा मौखिक स्वरूप को लोकप्रियता प्रदान करते हुए भाषा को मजबूती दिलाने में आपके योगदान को याद किया जाता रहेगा. आपके हास्य/व्यंग भविष्य में भी सदैव लोगों को गुदगुदाते रहेंगे. जब भी गढ़वाली हास्य-व्यंग्य प्रस्तुतियों की चर्चा होगी आप याद किये जाते रहेंगे. सदा हंसाते रहे घन्‍ना भाई, पर आज रूला दिया.

विनम्र श्रद्धांजलि.

नंद किशोर हटवाल की फेसबुक वाल से साभार.

नंद किशोर हटवाल उत्तराखंड के सुपरिचित कवि, लेखक, कलाकार व इतिहासकार हैं. उन्हें उत्तराखंड की लोक कलाओं के विशेषज्ञ के तौर पर भी जाना जाता है.

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