किस्से

फिल्मों का क्रेज़ और वो ज़माना

जिस तरह पुराने हीरो अब हीरो नहीं रहे, एक दम ज़ीरो हो गए हैं या दादा-नाना बनकर खंखार रहे हैं, उसी तरह अपने शहर के दो सिनेमाघरों में भी एक वीरान पड़ा है तो दूसरा मॉल बन गया है. अपने को पुराने अभिनेताओं से भला क्या हमदर्दी? मगर उनके छायाचित्रों की क्रीड़ास्थली सिनेमाघरों की हालत पर खुल्लम-खुल्ला अफ़सोस है क्योंकि उनके साथ कई यादें वाबस्ता हैं.
(Nostalgia of Old Cinema Halls)

सिनेमा हॉल में पहली बार मेरा पदार्पण यही कोई 12-14 वर्ष की उम्र में हुआ होगा. ज़िन्दगी में जो पहली फ़िल्म देखी थी उसका नाम था – गरम खून. फिर धीरे-धीरे सिलसिला चल पड़ा और लत सी लग गई जो सिनेमा हॉल बन्द होने तक लगी ही रही.

क्या-क्या जतन करते थे सिनेमा देखने के लिए. चोरी, ठगी से लेकर कबाड़ बीनने तक. एक बार तो हद कर दी – हमारे लिए कोई हद वाली बात इसमें नहीं, सुनने वालों के लिए हो तो हो – हम दो-तीन दोस्त यूं ही टहल रहे थे. इत्तफ़ाक़न सिनेमा हॉल कके आसपास और इत्तफ़ाक़न ही पिक्चर का पहला शो शुरू होने वाला था. अब यह भी संयोग ही था कि एक कुष्ठ पीड़ित महिला वहीं सड़क पर अपना डब्बा लिए बैठी थी. हमें उसका मांगने का अन्दाज़ पसन्द था. वह एक स्वाभाविक मुस्कराहट के साथ बातें किया करती, जिसमें दीन-हीनता न के बराबर हुआ करती थी. उसे सिर्फ़ आपके सिक्कों में दिलचस्पी नहीं थी. वह लोगों से घर के हालचाल, स्वास्थ्य वगैरह भी पूछती थी. एक तरह का ममत्व था उसमें. बस इसी नाते हमारा उससे परिचय था. उस दिन भी उसने हमें पुकारा. मैंने कह दिया कि आज तो हमारे पास कुछ नहीं है. हो सके तो तुम हमें कुछ दे दो. उसने कहा – लला, मैंने तो ज़िन्दगी भर मांगा ही मांगा, भाग ही ऐसे ठहरे. दिया किसी को नहीं. आज मौक़ा है, बोलो कितने दूं …. उसने बोरे की तहें टटोलना शुरू किया. हमने तीन लोगों के सिनेमा और चाय के पैसे ले लिए इस शर्त पर कि दो-तीन दिन में वापस कर देंगे कुछ बढ़ा के.

एक दिन मेरा एक दोस्त और मैं पिक्चर के ही जुगाड़ में चार-छः पव्वे-अद्धे लिए कबाड़ी के पास जा रहे थे. रास्ते में एक जगह टेलीफ़ोन के खम्भे पर मैकेनिक चढ़ा बैठा था और समस्या के समाधान में बुरी तरह उलझा हुआ था. मेरे दोस्त ने नीचे पड़ी उसकी प्लास्टिक की चप्पलें झोले में डाल लीं. गर्मियों के दिन थे. कबाड़ी को दुकान में बैठे-बैठे झपकी आ गई थी. उस माई के लाल ने कबाड़ी के माल से भी दो-तीन पव्वे झोले में रखे तब कबाड़ी को जगाया. अफ़सोस कि ऐसी प्रचंड प्रतिभा का धनी वह किशोर उचित वातावरण न मिल पाने के कारण आगे चल कर कोई नामी चोर नहीं बन पाया. वर्ना मन्त्री न सही मन्त्री की नाक का बाल तो तब भी होता.
घर से भेजा जाता कि पांच लीटर मिट्टी का तेल ले आओ. तेल साढ़े चार ही लीटर लाया जाता. ढाई रूपये की बचत – पिक्चर का जुगाड. सबसे सस्ती क्लास का टिकट और मध्यांतर में चार आने की चीज़. उन्हीं दिनों एक तथाकथित अनुभवी ने बताया कि पिक्चर दूर से अच्छी दिखती है और रामलीला नज़दीक से. पर दूर यानी बालकनी से देखते कैसे? वह तो हमारे लिए दिल्ली से भी ज्यादा दूर थी. छुटभय्ये राजनेता के लिए जिस तरह विधानसभा संसद होती है वैसी ही हमारे लिए बालकनी और सेकेण्ड क्लास थे. यह दूर-नज़दीक वाली तो उसकी बात खैर ठीक थी, मगर इसके साथ ही उसने एक बड़ी जोर की गप्प हांकी जो उस वक़्त हमारी कनपटियों में खून बजा देने के लिए काफी थी. गप सुनिए – बाथरूम में मुसलमान औरतें नंगी होकर नहाती हैं. उस वक़्त दिमाग ने नंगी शब्द के अलावा कुछ नहीं सोचा.
(Nostalgia of Old Cinema Halls)

एक बार पिताजी ने किएसी बात पर नाराज़ होकर पहले तो मुझे पीटा फिर मेरी कापी-किताबें और लत्ते-कपडे आंगन में फेंक दी कि जा निकल जा घर से. उस सामान में मेरा मिट्टी का गुल्लक भी था, जिसने आँगन को सिक्कों से पाट दिया. प्राथमिकता के आधार पर मैंने सिक्के बीने. सिक्कों ने मुठ्ठियाँ तानकर बावाज-ए-बुलंद कहा – हम एक हैं और कुल जमा छः रुपए हैं. उस समय इतने हीरे-जवाहरात. मैं किस मुगल वली अहद से कम था? निकल गया घर से. जाकर एक दूकान में फुल प्लेट छोले के साथ दो बन खाकर चाय पी. फटीचर क्लास का टिकट लेकर पिक्चर देखी और हाफ टाइम में भी कुछ खाया. मौजां ही मौजां.

एक दिन क्लास के कुछ लड़के हेड मास्साब से इसलिए पिट रहे थे कि वे पिछले दिन स्कूल न आकर पिक्चर चले गए थे. बात न जाने कैसे लीक हो गयी. लड़कों ने हालांकि काफी बचाव किया. किसी ने कहा कि मास्साब मेरे घर में पूजा थी इसलिए नहीं आया. दूसरे ने कहा – मैं जीजाजी के साथ चितई गया था. एक ने कहा – मेरी ईजा को छूत हो गयी थी मुझे खाना पकाने में देर हो गयी थी. मास्साब पर कोई असर नहीं हुआ. उन्होंने सुताई जारी रखी – सालो घर से आते हो स्कूल और जाते हो पिक्चर. पिक्चर देख के बनेगा तेरा भविष्य? अच्छा बताओ कौन सी पिक्चर देखी? बता रे तू बता? एक ने बक दिया – जी, सुहागन. बगल में ही प्राइमरी स्कूक की अध्यापिकाएं थीं. मास्साब उनमें से ज़्यादातर से खार खाए रहते थे. एक अध्यापिका से खासकर जो उम्र हो जाने के बावजूद अविवाहित थी. मास्साब के मुताबिक उनके चिडचिडेपन का कारण अविवाहित होना था. अच्छा मौका था उदगार व्यक्त करने का. आए-हाए सुहागन. किसे कहते हैं सुहागन जानते हो, किसी होती है? ऐसे ही हो जाते हैं सुहागन, इतनी अकड के साथ. शादी बाप नहीं करता, गुस्सा और नखरा हमसे. टांग तोड़ दूंगा सालो जो फिर स्कूल से भाग कर पिक्चर गए तो.

सिनेमा की टिकटों के लिए खिड़की खुलने से काफी पहले ही लम्बी क़तार लग जाया करती थी. टिकट क्लर्क सरकारी बाबुओं की तरह कुछ देर से आकर आसन ग्रहण करता और बड़े इत्मीनान से टिकटों की गड्डियों पर तीन जगह मोहर लगाता था. उस वक़्त हम पर उसका बड़ा रुआब पड़ता था. वह भी खुद को किसी तहसीलदार से कम क्या ही समझता होगा. टिकट खिड़की के छोटे से छेद से टिकटार्थियों की तीन-चार कलाइयां अंदर घुसी रहतीं. टिकट के लिए अक्सर मारपीट हो जाया करती थी. बुकिंग क्लर्क से अगर आपकी सेटिंग है तो वह आपको ऐसी जगह टिकट दे सकता था जहां बगल में लडकियां बैठी हों. टिकटों की कालाबाजारी भी हुआ करती. तब के कई टिकट ब्लैक करने वाले आज कहाँ के कहाँ हैं. सब धंधे हैं. तब उनका धंधा टिकटों की कालाबाजारी था आज जो है वह मान्यताप्राप्त है, जिसमें पैसा और इज्ज़त है.

कभी कभार सरकार को लगता कि यार यह फिल्म तो समाज को कोई सन्देश भी दे रही है, मनोरंजन के साथ साथ दुर्घटनावश ही सही. तो वह फिल्म करमुक्त कर दी जाती. मतलब कि टिकट का दाम कुछ कम. सबसे अगली क्लास का टिकट डेढ़-पौने दो रुपये का. ऐसे में हम काफी खुश होते. मशक्कत कम करनी पड़ती थी. कई बार तो सेकेण्ड क्लास का टिकट भी हमारी पहुँच में आ जाता था. उमराव जान, दूल्हा बिकता है और गांधी जैसी फ़िल्में टैक्स फ्री थीं. यूँ तो बच्चों का पिक्चर देखना बुरा माना जाता है लेकिन कभी-कभी शिक्षा विभाग के अधिकारियों और अध्यापकों को लगता था कि यह पिक्चर बच्चों को भी देखनी चाहिए. अध्यापक सर्वज्ञाता होता है और शिक्षा विभाग का अधिकारी तो त्रिकालदर्शी होता है. तो उनको जो लगता होगा ठीक ही लगता होगा. तो जब उन्हें ऐसा लगता तो वे बच्चों को सूचित कर देते. बच्चे घर से पैसे मांग लाते टिकट के मूल दाम से शायद कुछ कम. अध्यापकों के नेतृत्व में बच्चों का जुलूस सिनेमा हॉल जा पहुँचता. बच्चे अगली कतारों में बिठा दिए जाते. मास्टर लोग काफी पीछे बालकनी में. बुद्धू बच्चे जिस तरह सबसे पीछे यानी बालकनी में बैठते हैं.
(Nostalgia of Old Cinema Halls)

कम ही लोगों को पता होगा कि पैसे अगर कम हों तो “डबलिंग” पद्धति से भी पिक्चर देखी जाती थी. आविष्कार की पैदाइश का आरोप आवश्यकता पर लगता आया है इसलिए डबलिंग की खोज हुई. डबलिंग मतलब कि एक सीट पर बैठकर दो लोग फिल्म देखते. एक के पास टिकट के पूरे पैसे दूसरे के पास लगभग आधे. एक टिकट लिया जाता, आधे पैसे गेटकीपर को बतौर सुविधाशुल्क दिए जाते कि माई-बाप हमें डबलिंग कर लेने दे. तू हमारी सीट पर एक ही आदमी को देखना. डबलिंग के लिए लाजिमी था कि दोनों दोस्त हों. अनजान आदमी के साथ यह पद्धति कारगर नहीं हो सकती थी और यह सब फटीचर क्लास में ही हो सकता था, बालकनी वगैरह में नहीं. डबलिंग के लिए अगर पैसे न हों तो खुजली मिटाने का एक और तरीका था. हॉल के बाहर दरवाज़े से कान सटाकर भीतर चल रही पिक्चर की आवाजें सुन्ना. जैसे भूखा आदमी दूर से खाना तो देखे पर खा न पाए. यह तरीका अपने को कभी पसंद नहीं आया. क्योंकि एक तो किसी भी चीज़ के लिए अपने को एक हद से नीचे गिराना ठीक नहीं, दूसरे फिल्म देखने की चीज़ है सुनने की नहीं.

फिल्मों में कई बार धोखे भी हो जाया करते थे. खासतौर पर महिलाओं को. मान लीजिए फिल्म का नाम है – शंकर महादेव. महिलाएं शिव महिमा देखने की उम्मीद में टिकट लेकर बैठ गईं बिना देखे भाले. पिक्चर शुरू हुई तो पता लगा कि यह तो शंकर और महादेव नाम के दो डाकुओं की कहानी है. डाकू अगर शरीफ हुआ तो भी गनीमत है, वह अमीरों को लूटकर गरीबों में बांटने का सत्कर्म करेगा और जो कहीं डकैत हरामी निकला तो आंटीजी दो-एक बलात्कार तो आपको देखने ही पड़ेंगे. अब आ ही गयी हैं तो छी-छी करते देख ही लीजिए पैसे तो खर्च हो ही गए हैं. अंत बुरे का बुरा. आखिर में तो हीरो ने आकर इसकी गर्दन उतार ही लेनी है. डकैतों की फिल्म देखने से पता लगता है कि अधिकाँश डाकू भाई लोग काली के उपासक होते हैं. यही उनकी कुल देवी होती है नाम चाहे उनके शंकर हों या महादेव.

ज़्यादातर डाकू मूलतः एक ज़माने के शरीफ आदमी हुआ करते हैं जो कि साहूकार के अत्याचार सहते-सहते पले-बढे. एक साधारण से वकील को अंग्रेजों ने रेल के डिब्बे से बाहर धकेल कर महात्मा गांधी बना दिया. कुछ इसी तरह की घटना उनके जीवन में भी एक दिन घटित होती है. क्या होता है कि साहूकार उसकी बेटी या बहन पर हाथ डाल देता है. उस दिन उसका खून खौल-खौलकर आधे से ज्यादा भगौने से बह जाता है. वे जंगल की तरफ भाग जाते हैं. कुछ देर भागने के बाद हम देखते हैं कि वे घोड़े पर सवार हैं और हाथ में दुनाली है. उनके साथ पचासेक लोग आ जुटते हैं. सबके पास घोड़ा और दुनाली बन्दूक है. यकीन करिये ये सब फिल्म के अंत तक साहूकार की हवेली की ईंट से ईंट बजाकर समर्पण कर देंगे और बैकग्राउंड से घोषणा होगी – अब कोई गुलशन न उजड़े, अब वतन आज़ाद है. हैरानी की बात है कि सरकार ऐसी फिल्मों को माओवादी पिक्चर कहकर प्रतिबंधित नहीं करती. जबकि अगर कोई कह दे के हमारे मोहल्ले में तीन दिन से पानी नहीं आया, क्या व्यवस्था है तो वह माओवादी हो सकता है. इस आधार पर कोई अगर चाहे ओ कह सकता है सरकार डाकुओं के साथ है.
(Nostalgia of Old Cinema Halls)

फिल्मों में मिथुन चक्रवर्ती का बाप नहीं होता और नजीर हुसैन की बीवी. मिथुन की विधवा माँ होती है और एक अदद जवान बहन जिसका अमूमन बलात्कार हो जाता है. मिथुन बलात्कारियों को चुन-चुनकर अपने हाथों मारता है. वह अक्सर मोटर मकेनिक जैसा रफ-टफ काम करता है. कभी-कभी पुलिस और मिलिट्री वाला भी होता है. एक अमीरजादी हाथ धोकर छोडिये नहा-धोकर उसके पीछे पड़ जाती है. मिथुन शुरू में हाथ नहीं धरने देता. फिर धीरे-धीरे नरम पड़ने लगता है और अंत तक लार टपकाने लगता है. बलात्कारियों को ठिकाने लगाने और मोटर रिपेयरिंग के कामों से फुर्सत निकालकर मिथुन उस अमीरजादी के साथ नाच-गा भी लेता है. मिथुन हमेशा गरीब और मजलूम के साथ है. वह मिलावटखोर बनिए की पोल सरेबाजार यूं खोलता है – ये क्या सेठ घी के डब्बे में डालडा! मिथुन जब तक ज़िंदा है कोई साला किसी के साथ अत्याचार तो करके दिखाए. मिथुन उसे चौराहे पर कुत्ते की मौत न मारे तो कुत्ता कह देना.

और नजीर हुसैन हमेशा न जाने कैसे कोई एक बेहद अमीर आदमी होता है. उसकी बीवी नहीं होती. संतान केनाम पर एक मात्र लड़की होती है – जवान और खूबसूरत. वह फिल्म के शुरू में बी.ए. के साथ पार्ट टाइम इश्क भी करती है. दो-एक गानों के बाद इश्क में होल-टाइमर हो जाती है, कॉलेज पार्ट टाइम जाती है. इस इश्क में कोई पच्चर फंसा होता है. समझ लीजिए कि लड़के के बाप का पता ही नहीं या हो सकता है कि लड़के की माँ के बारे में समाज जब फुर्सत में जुगाली करता है तो कुछ ऐसी-वैसी बातें करता है. यह बात सिर्फ नजीर हुसैन जानता है. कई बार लड़की भी जानती है तो वह बाप से ज़बान लड़ाती है – लेकिन डैडी मैं पूछती हूँ कि इसमें अशोक का क्या दोष है.

नजीर हुसैन दीवार में टंगी दिवंगत पत्नी की तस्वीर के पास जा खड़ा होता है – पार्वती अच्छा हुआ तुम चली गईं. मैं अभागा रह गया यह दिन देखने के लिए. इस लड़की के कारण ज़माना आज मुझ पर थूक रहा है. मेरी परवरिश में ही शायद कोई कमी रह गयी होगी. टीम होतीं तो शायद ये दिन न देखना पड़ता … अब क्योंकि फिल्म की एक-दो ही रीलें बची हैं इसलिए ग्रहदशा एकाएक अनुकूल होने लगती है. लड़के का बाप प्रकट हो जाता है और वह कोई रायबहादुर/ खानबहादुर से कम नहीं निकलता. और अगर लड़के की माँ के बारे में कोई चर्चा है तो वह भी साफ हो जाता है कि दर असल वह उस रात सेठ दीनानाथ की हवेली में उन्हें राखी बाँधने गयी थी जिस से समाज को भूलवश गलतफहमी हो गयी. वरना कौन नहीं जानता कि वो बुढिया तो इतनी शरीफ है कि आज तक अपने पति का मुंह भी उसने नज़र भर कर नहीं देखा. देखा बहन मैं न कहती थी कि सुमित्रा बहन जैसी भली मांस इस जहान में ढूंढें से न मिलेगी. आग लगे इस समाज के मुंह में जो जी में आया बक दिया. ललिता पवार जैसी सास कोई लड़की नहीं चाहेगी और निरुपमा रॉय जैसी सास हर लड़की को मिले. इफ्तखार अगर पुलिस अफसर नहीं है तो वह इफ्तखार किस काम का. ऐसे ही कई और भी अनगिनत सनातन सत्य है हिन्दी सिनेमा के – हवा-पानी की तरह.

जिस इंटर कॉलेज में आठवीं से आगे की पढाई के लिए दाखिला लिया उसका रास्ता पिक्चर हॉल से होकर गुजरता था. नवीं दसवीं में जो फीस पड़ती थी उसे हम बाप की पे-स्लिप दिखाकर पूरी या आधी माफ करा लिया करते थे. फीस पूरी माफ हुई तो घर में आधी बताई, आधी माफ हुई तो घर में कहा इस बार माफ नहीं हुई पूरी पड़ेगी. फीस-डे मतलब पिक्चर-डे.

मैं और मेरा वही पव्वा-चप्पल चोर दोस्त अक्सर बस्ते में जूट का एक कट्टा रख ले जाते. कट्टा कैंटीन में रख देते. इंटरवल में भागकर वहाँ पहुँचते जहां आज अल्मोड़ा की लॉ फैकल्टी है. वहाँ उन दिनों लाल मिट्टी की खान थी. हम एक कट्टा मिट्टी भरते, मैं अपने दोस्त के फटे जूते और बस्ता उठाता वह मिट्टी भरा कट्टा. लिपाई पुताई के काम आने वाली यह मिट्टी चार रूपये में बिकती थी. अब एक अठन्नी की दरकार होती. पिक्चर पक्की.

दक्षिण भारतीय फिल्मों का अलग किस्सा है. इनका निर्माण लोगों की यौन कुंठाओं को दुहने के लिए किया जाता था. यह पिक्चरें अमूमन जाड़ों में लगा करती थीं. पिक्चे क्योंकि वर्जित विषय पर होती इसलिए ६ से ९ वाला शो सबकी सहूलियत का होता. पर्याप्त अँधेरे के कारण किसी परिचित द्वारा देखे जाने की आशंका कम रहती. अब यह बात अलग है कि परिचित या तो पहले हॉल में बैठा होगा या आपसे ज्यादा शातिर हुआ तो फिल्म शुरू होने के कुछ पल बाद हॉल में घुसेगा, जब बत्तियाँ गुल कर दी जाएँगी.

इन फिल्मों को जिस चीज़ के लिए देखा जाता वह मूल तत्व पिक्चर में उतना ही होता जितना होटल के पालक-पनीर में पनीर मिलता है. फिल्म में एकाध मिनट का एक सीन जोड़ दिया जाता जिसका फिल्म की बेसिरपैर की कहानी से कोई सम्बन्ध नहीं होता था. उस दृश्य में एक जोड़ा स्त्री-पुरुष प्राकृतिक अवस्था में वही शारीरिक क्रिया बड़े मनोयोग से संपादित कर रहे होते जिसे आदिकाल से एकांत में करते आए हैं और वेंटिलेटर की मदद से जीवन जब एक्सटेंशन में चल रहा होता है तब भी करने की तमन्ना रखते हैं. ऐसा दूसरा सीन हाफ टाइम के लगभग तुरंत बाद आता था. इसके बाद हॉल में नौसिखिए रह जाते या वो जिनका “जब तक सांस है तब तक आस है” पर अटल विशवास होता. अनुभ्वीजन हॉल को यूं छोड़ देते जैसे लम्पटों की सभा का त्याग सत्पुरुष के देते हैं.

आसपास के दुकानदारों को हॉल के स्टाफ से मालूम पड़ जाता कि पहला सीन कितने बजे है और दूसरा कितने बजे. वे लोग ठीक समय पर दरवाजा खोलकर भीतर घुसते, वहीं खड़े-खड़े दर्शन कर फिर दूकान में जा बैठते. सार-सार को गहि रहे, थोथा देहि उडाय. ऐसी पिक्चरों के टिकट कुछ इज्ज़तदार लोग दूसरों से मंगवाते थे. ऐसे ही लोग शराब और कंडोम भी औरों से मंगवाते हैं. बड़े-बड़े महारथी नज़र आ जाया करते थे हॉल में, टोपी,मफलर और काले चश्मे की ओट लिए.
(Nostalgia of Old Cinema Halls)

दर्शकों द्वारा फिल्म पर छींटाकशी का भी रिवाज़ था. मिसाल के तौर पर विलेन की स्वाभाविक इच्छा है कि वह हीरोइन के साथ थोड़ा सा बलात्कार कर ले पर हीरोइन है कि बात को समझ नहीं पाती. कोई भगवाधारी समझाए इसे कि भई आस्था का प्रश्न है. तो साहब काफी देर बाद भी जब विलेन हीरोइन का पल्लू तक नहीं हटा पाता था तो दर्शकों में से कोई मदद की पेशकश करेगा- अबे मैं आऊँ क्या! या हीरोइन को एक दिन वॉश बेसिन के आगे खड़े होकर इलहाम होता है कि वह जो दो-चार बार हीरो के साथ नाची-गाई थी उसी वजह से उसे गर्भ रह गया. और उधर हीरो गायब! वह कश्मीर के मोर्चे पर गया था जहां उसने शुरू में तो दुश्मनों के साथ नींबू सानकर खाया और शत्रुओं के दांत खट्टे कर दिए. मगर अब सरकार कहती है कि वह लापता है. हाय राम, अब क्या होगा? ऐसे में हीरोइन किसी मूर्ती के आगे जाकर कहेगी – हे भगवान, मेरे चारों तरफ अँधेरा ही अँधेरा है … मूर्ति चुप रहेगी, कोई दर्शक राय देगा – मोमबत्ती जला, मोमबत्ती और भविष्य के लिए संतति निरोध का कोई साधन भी बता देगा.

पिक्चर हॉल में कई बार ऐसी दुर्घटनाएं भी हो जाया करती थीं कि अगली सीट पर बैठे जिन भाईसाहब से आपने माचिस माँगी थी, इंटरवल में जब बत्तियाँ जलीं तो वे आपके सगे बाप साबित हुए.

यह सारा किस्सा तब तक अधूरा और अलोना है जब तक कि एक सज्जन का ज़िक्र न कर लिया जाए. यादों की बरात का दूल्हा सचमुच वही हैं. वे सज्जन काफी उम्रदराज़ थे और उस उम्र में भी मेहनत मशक्कत का काम किया करते थे. दरमियाना कद, दुबली काया पर कुरता-पायजामा-वास्कट, सर पर टोपी और आँखों में मोटा सा चश्मा. उनकी आँखें बेहद कमज़ोर थीं. एक बार मैंने उन्हें दीवार से चिपका इश्तहार पढते देखा. वे इश्तहार से चेहरा यूं सटाए थे गोया इश्तहार को चाट रहे हों. उन जैसा पिक्चर प्रेमी देखने में नहीं आया. यह संस्मरण मैं उन्हीं अनाम बुजुर्गवार को समर्पित करता हूँ.

वे सज्जन एक अनुवादक के सहारे पिक्चर देखते थे. एक कमसिन बच्चा उनकी बगल की सीट पर बैठा उनके लिए पिक्चर की रनिंग कमेंट्री किया करता था – हाँ अब गाना हो रहा है, ना कोठे में नहीं, घर में नाच रही है. नाम पता नहीं कोई नई है. न ज्यादा मोटी, न दुबली जैसी हीरोइन होती है. हीरो जीतेन्दर है. गद्दार अभी नहीं आया पर मैंने पोस्टर में देख लिया था. प्रेम चोपड़ा है. हाँ वही शीशे से पत्थर तोड़ने वाला. हीरोइन नहा रही है. परदे के पीछे है. अल्ला कसम कुछ नहीं दिख रहा. गद्दार और हीरो में मारपीट हो रही है. हीरो रस्से से लटक कर बदमाशों को मार रहा है. ये पडी एक के लात – शीशा तोड़ते हुए बाहर छतक गया. हीरो क्यों हारेगा. हीरोइन को परेशान करता था न. हाँ … अच्छा गद्दार अगर फूल को जूते से मसल दे तो हीरोइन की इज्ज़त लुट जाएगी? कैसे पता? तजुर्बा क्या होता है? हीरो इज्जत क्यों नहीं लूटता? कोई भी आदमी फूल पे पाँव रख के इज्जत लूट सकता है? इज्जत क्या होती है? सलवार-कमीज़ में तो हीरोइन की इज्जत एक भी पिक्चर में नहीं लुटी … क्यों … चुप हो जाऊँगा तो कहोगे कि ठीक से बताया नहीं, मज़ा नहीं आया … हाँ चलो हाफ टाइम हो गया. चाय पी लो, मैं पकौड़ा खाऊंगा. इति फ्लैशबैक स्टोरी.
(Nostalgia of Old Cinema Halls)

शंभू राणा 

शंभू राणा विलक्षण प्रतिभा के व्यंगकार हैं. नितांत यायावर जीवन जीने वाले शंभू राणा की लेखनी परसाई की परंपरा को आगे बढाती है. शंभू राणा के आलीशान लेखों की किताब ‘माफ़ करना हे पिता’  प्रकाशित हो चुकी  है. शम्भू अल्मोड़ा में रहते हैं और उनकी रचनाएं समय समय पर मुख्यतः कबाड़खाना ब्लॉग और नैनीताल समाचार में छपती रहती हैं.

ओ परुआ बौज्यू की गायिका वीना तिवारी

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