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यह कौन सा तरीका है बच्चों की परीक्षा लेने का

किसी बच्ची की नाक की लौंग खेंची जा रही है किसी के कान की बालियां. एक कोने में खड़ी दो बच्चियां सुबक रही हैं क्योंकि उनके नए कुर्तों की आस्तीनें काट डाली गयी हैं. एक लड़की की जींस के सारे बटन उखाड़ फेंके गए हैं और उसे कमर बाँधने के लिए कपड़े का नाड़ा उपलब्ध कराया गया है. एक लड़के के लोअर की जिप कैंची से काट दी गयी है. उतारे गए सैकड़ों जोड़ी जूते इधर-उधर बेतरतीब बिखरे पड़े हैं. एक मरियल लड़का बगैर कमीज पहने बम-बारूद तलाश करने वाली मशीन से अपनी चेकिंग करवा रहा है.

आज के अखबार में ये बानगियाँ पढ़ने-देखने को मिलीं. डाक्टर बनने की ख्वाहिश रखने वाले बच्चों ने कल देश भर में नीट की परीक्षा दी. करीब आधे पन्ने पर इस महान घटना के अनेक फोटो और विवरण छपे हैं.

हमारे देश के नीतिनिर्माता पगला चुके हैं. कान की बाली से या जींस के बटन से कौन नक़ल कर सकता है? कौन है जो पतलून की जिप की मदद से पर्चा आउट कर सकता है. अगर कोई ऐसा कर सकता हो तो उसकी प्रतिभा को निखारने के लिए विशेष वैज्ञानिकी छात्रवृत्ति दी जानी चाहिए.

मैं दिल्ली या ऐसे ही किसी बड़े महानगर के किसी बड़े दफ्तर में एक दृश्य की कल्पना कर रहा हूँ जिसमें प्रवेश परीक्षा में हिस्सेदारी कर रहे बच्चों के लिए जारी की जाने वाली दिशानिर्देशिका बनाए जाने संबंधी मीटिंग चल रही है. बड़े से लेकर छोटे सभी तरह के साहबों के अलावा देश भर से बुलाये गए शिक्षा सलाहकार, फ़ौज के कमांडर और सीआईडी के सिद्ध जासूस वगैरह बहुमूल्य सलाहें दे रहे हैं. दस मिनट तक उस मीटिंग की कार्रवाई देखने पर आपको अहसास हो जाएगा कि देश की सुरक्षा को सोलह-सत्रह साल के पढ़ाकू बच्चों से अभूतपूर्व खतरा है. मेटल डिटेक्टर लगाए जाने होंगे. हर केंद्र के बाहर पुलिस और फ़ौज का पुख्ता इंतजाम रहेगा. आंसूगैस के गोलों और पानी की बौछारों का भी. मासूम बच्चों पर किये जाने वाले पिंडारी व्यवहार और उससे उनके माँ-बापों के चिंतित चेहरों पर उपजने वाले भय की कल्पना से ही प्रसन्न-मुदित-प्रफुल्लित हो रहे एक से एक बड़ी सैडिस्ट सिफारिशें आती हैं और मीटिंग सफल रहती है.

किसी को पांच मिनट के लिए एटीएम के बाहर लगी लाइन का मॉनिटर बना कर देखिये. वह उन सभी कर्तव्यों का पालन करना शुरू कर देगा जिनका जिक्र उसने नवीं क्लास में ‘यदि मैं देश का प्रधानमंत्री होता’ विषय पर निबंध लिखते समय किया था. इस दौरान उससे फ़ौज के खूंखार कमांडो और हिटलर जैसे पगलेट जननायक बन जाने की उम्मीद भी की जानी चाहिए. उसने इन पांच मिनटों में देश को बदलना है, व्यवस्था को पटरी पर लाना है.

हमारे देश की सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि हर कोई देश को बदलना और व्यवस्था को पटरी पर लाना चाहता है.

अगर तुम्हारे परचे लीक हो जाते हैं तो तुम्हें अपनी घूसखोर सिक्युरिटी दुरुस्त करनी चाहिए भैये! बच्चे नक़ल करने को मजबूर हैं तो इसलिए कि तुम्हारे बेपढ़े मास्टरों ने उन्हें ढंग से पढ़ाया नहीं. यह देश की सुरक्षा की नहीं कॉमन सेन्स की बात है.

अपनी आस्तीन कटवा कर, पाजामा उधड़वा कर, मेटल डिटेक्टर से चेकिंग करवा कर जिस बच्चे ने कड़ी सरकारी निगरानी में डाक्टरी का एंट्रेंस दिया हो, डाक्टर बन जाने के बाद वह किस किस मरीज के आस्तीन-पाजामों के साथ कैसा-कैसा व्यवहार करेगा, चाहें तो इसकी कल्पना में आप प्रसन्न-मुदित-प्रफुल्लित हो सकते हैं!

उसने भी तो देश की व्यवस्था को पटरी पर लाना है! उसने किसी का क्या बिगाड़ा है?

– अशोक पांडे

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