गीत

नेगीदा की वसंत नायिका

काव्य कला का सौष्ठव उसके सब कुछ कह देने में नहीं, बल्कि, अनकहे अंश में है. जैसे अपने पति का नाम न लेने वाली कोई ग्रामीण-नायिका, पति के बारे में पूछे जाने पर हल्के-से मुस्कुरा दे, और नैनो के इशारे से अपने पीछे खड़े पति की हल्की सी भनक-भर कर दे. उन अनकही चेष्टाओं में रूपकों के जाल नहीं, बिम्बों के विधान नहीं, उपमाओं के आभूषण नहीं, और न ही प्रतीकों की क्लिष्टता होती है, बल्कि संकेत-भर होता है. लेकिन यह संकेत ही संपूर्ण काव्य-कला की उपमाओं का सार है, और इसे ही काव्य-विमर्श में पैदा कर पाना, काव्य-कला का उत्स होता है. माने, सब कुछ न कहकर, कुछ अनकहा रख देना, जहाँ से आगे की पदयात्रा, सजग पाठक की कौतूहल-यात्रा बन जाती है.
(Narendra Negi Song)

नेगीदा की वसंत-नायिका इस अर्थ में अद्भुत है. उनकी काव्य-कला की ही भाँति, सरल-सहज; किंतु गंभीर भाव से, लाक्षणिकता में केवल अपनी बात कहती है –

कै बाटा ऐली, कै बाटा जैली
उजाळी-सी मुट्ठी चम्म, कै दिशा खतेळी.

किस पथ से तू आयेगी, किस पथ से तू जायेगी
उजाले की मुट्ठी-सी यह, कौन दिशा बिखरायेगी?

यहाँ फागुन अथवा वसंत के आने का, किसी सुंदरी के आने के रूप में, प्रश्नोत्तर शैली में बड़ा रोचक वर्णन है. जितना रोचक प्रश्नकर्ता का प्रश्न है, उतना ही रोचक और रसपूर्ण उत्तर भी है

रौल्यूँ बाटी औंलू , धारा-धरी जौंलू
डाळी-बोटी ह्यनु रई , सर्र सनकौंलू.

नद-कूलों से आऊँगी, धुर बाटों से जाऊँगी
डाली-पाती तकते रहना, सैनों से दिखलाऊँगी.

पर्वतों की उपत्यका में नदि-कूलों के प्रवाह के साथ लगे, वसंत के खेतों को जिसने वास्तव में न भी देखा हो, वह भी एकबारगी, कल्पनाओं की उड़ान भर सकता है. डाली-पाती में हल्की-लाल कोंपलें जब झक्क हवा के झोंकों के साथ खिलखिलायें तो उसे ही वसंत के आने का सूचक समझा जाय. कितनी सूक्ष्मता से कवि ने कहा है कि डाली-बोटी को तकते रहना, क्योंकि वह (वसन्त-नायिका) चुपके से केवल इशारों में ही अपनी बात कहेगी. यों भी वसंत की उलार बता कर नहीं आती, चुपके से आती है. इशारों को जिसने समझ लिया, वह पार पा गया, वरना ऊँचे शिखरों का वह कौन सा पेड़ होगा है, जिसे कभी हवा नही लगी?

कै ऋतू ऐली, कै रितु मा जैली,
बस्ग्याळ ऐली रुझाणु, कि ह्यूंद कोंपेली.

किस रुत में तू आयेगी, किस रुत में तू जायेगी
आयेगी चौमास भिगोने, या हिम-ऋतु में ठिठुरायेगी?

प्रश्नकर्ता मानो अब बड़ी मासूमियत से वसंत-नायिका के आगमन का समय जानना चाहता है कि वह चौमास की भीगी ऋतु में आयेगी या हिम-ऋतु (पहाड़ी ह्यूंद) में ठिठुरायेगी. प्रकारांत में, यहाँ वसंत की कोमल बयारों के विरोधाभास की भूमि तैयार की जा रही है. बरसात के बाद शरद, और शरद के बाद हेमंत, का क्रम भी सिलसिलेवार प्रस्तुत किया गया है.
(Narendra Negi Song)

लगदा फागुन औलू , बिखोती बाद जौंलू
नाचुलू गौंलू थौळा मां, कौथिग  वीरोलूं.

फागुन लगते आऊँगी, बैसाख बाद ही जाऊँगी
नच-नच के मैं यहाँ वहाँ, मेलों को खूब सजाऊँगी.

पर्वतीय जनमानस की स्मृतियों में फागुन-चैत-वैशाख की जो हर्षमय स्मृतियाँ बनी रहती हैं, वे इन शब्दों के उच्चारण मात्र से ही कुलबुलाने लगती हैं. नेगीदा की वसंत-नायिका भी उतनी ही तत्परता से सब कुछ बयाँ करती जाती है.

क्या ले की ऐली , क्या देकी जैली,
कैकु भौरेली भंडार , कैकु रितू कैली.

क्या ले के आयेगी तू, क्या-क्या दे के जायेगी
किसका घर-भंडार भरेगी, किसको तू ठुकरायेगी?

मानो पूरा पर्वतीय समाज ही फागुन के फाग और चैती गीतों की झोड़ा-चाँचरी में नाचता आँखों के आगे प्रकट हो जाता है. लेकिन प्रश्नकर्ता का प्रश्न बड़ा ही स्वाभाविक है कि इस ऋतु में मायके से आने-जाने वाली स्त्रियां कुछ ना कुछ भेंट लेकर या देकर अवश्य ही आती-जाती रहती हैं, तो वह वसंत नायिका भी क्या लेकर आयेगी और क्या-क्या देकर जायेगी?

मौल्यार ल्योंलू , हरियाली बांटी जोलु
घर खोलों मा, गों-थौळा मां, फूल पाती सजौंलू.

हरियाली लेकर आऊँगी, हरियाली बाँट के जाऊँगी
घर-आँगन, में गौं-बाटों में, फूल-पाती सजाऊँगी.

नायिका का उत्तर इतना सहज है कि प्रकृति का कोई चितेरा कवि ही इसे अपनी कल्पनाओं से रँग सकता है. लेकिन पर्वतीय मानस के लिए केवल आँखें मूँद-भर लेने की देर है कि पहाड़ों में वसंत की “मौल्यार” का सारा बिंब उठ खड़ा होता है. कुछ शब्दों के भावार्थ तो न तो किए जा सकते हैं, और न ही किए जाने चाहिये. इन शब्दों का वागार्थ उनके भावार्थ के आगे सदा नतमस्तक रहता है. वे शब्द एक जीवंत संस्कृति के अपने प्रतीकार्थ होते हैं, जिनमें कोई समाज खुद को अभिव्यक्त करता है. “मौल्यार” ऐसा ही एक शब्द है.
(Narendra Negi Song)

आप बस हरी कौंपलों पर आने वाली लालिमा-युक्त बहार की कल्पना कर सकते हैं, या जवानी की धूप की पहली किरण की लालिमा को दन्तिल मुस्कान वाले मुखड़े पर कल्पना कर सकते हैं. वसन्त-नायिका उसी “मौल्यार” को लाने का दावा करती है, और पीछे-पीछे आती हरियाली बाँटकर जाने का वादा करती है. घर-घर में, खेत-चौपालों में या वन-बीहड़ों में, सब तरफ फूलों के खिलने की वासंती आभा तो, जिसने घास के लिए वनों को जाते हुए इन पगडंडियों को देखा हो, वही बतला सकता है; शेष के लिए तो यह कालिदास की उपमा-मात्र है.

कै भागी हँसेली , कै लठ्याळा रूवेली
कैकी माया चट चीमिली, कैकी फुन्ड सरकेली.

कौन भागी हँसायेगी, किस बाँके को रुलायेगी
किसे प्रेम से गले लगाकर, किसको परे हटायेगी.

‘किस भाग्यवान को तू हँसाकर जायेगी और किस बाँके-छबीले जवान को रुलाकर जायेगी’, कहने में चैत के महीने मैत (मायके) आने-जाने के क्रम में, मिलन और विदाई के भाव पूर्ण दृश्य तो हैं ही, जीवन की नश्वरता का सार भी गुँथा हुआ है. एक ओर जहाँ, उम्र की दहलीज पर भी प्रेम की आभा से रहित रहने वालों की शाश्वत पीड़ा तो है ही, दूसरी ओर, चाय के कप में पड़ने वाले चीनी के चम्मचों की तरह ही अपनी उम्र को भी आने-जाने वाले कितने ही वसन्तों में नापने-जोखने वाले बड़े-बुजुर्गों की व्यथा-कथा भी है. सुख-दुख और विरह मिलन की परिपाटी को समान भाव से जीने वाले पर्वतीय समाज में अक्सर ही हर होली-दीवाली बाद किसी बुजुर्ग को कहते सुना जा सकता है कि अबकी बग्वाल (दीपावली) तो खा ली, आगे की कौन जाने! एक और बसंत के बीतने की यह प्रतिध्वनि इसी नश्वरता और क्षणभंगुर की शाश्वत प्रतीति है.

बालोंऊँ हँसोलु, दानों थे तरसौंलू
ज्वानों की जिकुड़ी बाली, माया बूती जोलु.

बालों को हँसाऊँगी, वृद्धों को तरसाऊँगी
तरुणों की प्रेमिल छाती में, प्रीत रोप कर जाऊँगी.

वसंत नायिका चंचल है. चंचलता तो प्रकृति की धरोहर ही है. वो कहती है की उगते सूरज की तरह मुख वाले छोटे बालकों को तो वह हँसा कर जायेगी, दोपहर की धूप की तरह चटख रंग वाले युवा हृदयों के मन में प्रेम का अंकुर बीज कर जायेगी, और शाम की ढलती धूप की तासीर वाले वृद्धों को तरसा कर (नॉस्टेल्जिक) बनाकर जायेगी.

लोक संस्कृति और जीवन के कितने ही ऐसे रंग-प्रसंग हैं, जो नेगीदा के गीतों में मुखर हो उठते हैं. उन्हें शब्दों में बाँधा ही नहीं जा सकता. लक्षणायुक्त शब्दों के चितेरे नेगीदा शब्दों की चातुरी जानते हैं और कठिन होने की पीड़ा से कोसों दूर हैं. नेगीदा के गीतों को पढ़ना और सुनना, एक पूरे फलक को जी लेने के समान होता है. यों ही नहीं कोई कवि जनकवि हो जाता है, और यों ही नहीं पर्वतीय जनमानस ने उन्हें ‘गढ़रत्न’ कहा है.
(Narendra Negi Song)

मिहिर

मिहिर का मूलनाम इन्द्रेश हैं. वह उत्तर प्रदेश उच्च शिक्षा विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर अंग्रेजी विभाग, गोचर महाविद्यालय सहारनपुर में कार्यरत हैं. इसे भी पढ़ें-
उत्तराखंड में भादो अष्टमी और सातों-आठों का लोकपर्व

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