मेरा बाल्यकाल अल्मोड़ा में बीता. पिताजी अल्मोड़ा में रहते थे. हमारी दुनिया अल्मोड़े तक ही सीमित थी. कुमाऊवासियों के लिए अल्मोड़े में सभी प्रकार की सुविधाएं प्राप्त थीं. निकटस्थ एवं दूरस्थ गांवों एवं कस्बों के निवासी भी स्वास्थ्य सम्बन्धी सुविधाओं, परीक्षण आदि के लिए आवश्यक वस्तुएं खरीदने के लिए भी अल्मोड़ा आते थे. प्राइमरी तक की शिक्षा के लिए गांवों में स्कूल होते थे. आठवीं कक्षा के बाद अधिकतर विद्यार्थी अल्मोड़ा में ही शिक्षा प्राप्त करते थे. शिक्षा के क्षेत्र में अल्मोड़ा अग्रणी था.
(Nainital in 1945)
सबसे पुराना रामजे मिशन हाईस्कूल, गवर्नमेंट इण्टर कालेज लड़कियों के लिए मिशनरियों द्वारा संचालित एडम्स गर्ल्स हाई स्कूल एवं लड़कियों के लिए गवर्नमेंट द्वारा संचालित आठवीं कक्षा तक का स्कूल था. स्कूलों में नित्य प्रति गेम्स, स्पोर्टस, सांस्कृतिक गतिविधियां वाद-विवाद प्रतियोगिता इत्यादि होती रहती थीं. बच्चों के चरित्र-निर्माण की सभी प्रकार की सुविधाएं एवं वातावरण उपलब्ध था.
हाईस्कूल व इण्टर की शिक्षा प्राप्त करने के लिए दूरस्थ क्षेत्रों से एवं पास के गाँवों से भी लड़के-लड़कियाँ अल्मोड़ा ही आते थ. सन् 1945 में मैं कक्षा दस की छात्रा थी. पहाड़ में मेडिकल सुविधाओं का अभाव था. साधारण बीमारियों के लिए दवा की टिकियायें एवं दवा की दुकानों में बने मिक्चर उपलब्ध हो जाते थे. इमरजेंसी में कभी इन्जैक्शन लग जाते थे. एक्सरे, अल्ट्रासाउण्ड, ई.सी.जी., एम.आई.आर. आदि उपकरणों के नाम तक नहीं सुने थे. नैनीताल के क्रास्थवेट अस्पताल में डाइथरमी (सेंक) की मशीन आई. यह समाचार अल्मोड़ा तक भी पहुँच गया, माँ को साइनस की तकलीफ थी. डाक्टरों ने माँ को भी एक कोर्स डायथरमी करने का सुझाव दिया.
हम लोग दिसम्बर के प्रथम सप्ताह में नैनीताल आये तब तक भवाली से होकर नैनीताल का मोटर मार्ग का निर्माण नहीं हुआ था. अल्मोड़ा से हम लोग के.एम.ओ.यू. की बस से गेठिया होते हुए नैनीताल आये. अल्मोड़ा से नैनीताल का लगभग सत्तर (70) मील का लम्बा सफर, रास्ते की थकान, दिसम्बर महीने की शरीर को कपा देने वाली ठंड ने नैनीताल दर्शन के उत्साह को कम कर दिया था, किन्तु बस के पोस्ट आफिस के पास के मोड़ से नैनीताल में प्रवेश करने पर सामने फैली विस्तृत झील उसमें हवा के झोंकों के साथ उठती लहरें, तालाब के दोनों ओर से जाती हुई सड़कें, सभी कुछ अद्भुत लगा. ऐसा प्रतीत हुआ कि हम दूसरी दुनिया में आ गये हैं.
तालाब के स्वच्छ नीले जल में हवा के वेग में डोलती तरेंगें, तालाब के चारों ओर हरे-भरे घने वृक्षों से आच्छादित पर्वत श्रृंखलायें दिखाई दीं. पहाड़ों में कहीं-कहीं पर एक मंजिले टिन की लाल छतों से छाये हुए बंगले दिख रहे थे. पहाड़ियों में कहीं-कहीं पर वक्षों के बीच से जाती हुई पगडंडियां दिख रही थी, जो सम्भवतः इन बंगलों को जाने वाले पैदल मार्ग होंगे. तालाब के बांई ओर जाती सडक के किनारे बना पाषाण देवी का मन्दिर दिखा. मन्दिर में बजती हुई घंटियों की ध्वनि ने उधर को ध्यान आकर्षित किया.
सर्वत्र शान्त वातावरण था. कहीं कोई हलचल, कौतूहल अथवा भय का वातावरण नहीं था. जमीन में यत्र-तत्र गंदगी, पान की पीक कागज के टुकड़े फैले नहीं थे. सफाईकर्मी झाडू और टिन के छोटे-छोटे बेल्चों से कहीं पर भी मैला पड़ा हो, साफ कर रहे थे.
बस स्टैण्ड में पहुंचने से पहले ही ‘मेट’ (नेपाली मजदूर) अपना पास नम्बर यात्रियों को पकड़ाने लगते थे. बस रूकने से पहले मन्द गति में चलने लगती थी. कुली बस की खिड़कियों के डंडे पकड़ कर लटक जाते. मैम साहब, ‘कुली’ मैम साहब कुली चिल्लाते हुए बस में लटके हुए बस के साथ ही बस स्टैंड में पहुंच जाते थे. ‘कुली बाबू जी कुली’ यही उनका नारा होता था. बस से उतर कर एक कुली से उसका पास नम्बर लिया और उसे बस की छत पर रखा टिन का बक्सा व होलडौल (उन दिनों सटकेस, वैग, ब्रीफकेस आदि चलन में नहीं थे) कुली को दिखा दिया. बस के कंडेक्टर ने सामान उतार कर कुली के सुपुर्द कर दिया. उसके बाद सामान की जिम्मेदारी कुली की होती थी. हमें कुली को सामान किस बंगले, कम्पाउंड में पहुँचाना है यही बताना होता था. पहाड़ में चलने के अलावा अन्य कोई साधन उपलब्ध नहीं थे. डांडियों का प्रचलन था. किन्तु बीमारी या अन्य असुविधा होने पर ही जनसाधारण इनका प्रयोग करता था. आज नैनीताल में सभी जगह के लिए मोटर मार्ग बन गये हैं टैक्सी जीप उपलब्ध है. रईस घोड़ों को लेकर तल्लीताल व मल्लीताल घोड़ा स्टेंड में मिल जाते थे.
(Nainital in 1945)
जनसाधारण में बहुत सहजता व ईमानदारी थी. आज के दैनिक जीवन में आ चुके भय, अविश्वास व चतुराई को देखते हुए यह विश्वास नहीं होता है कि कभी हमने नैनीताल में इतना, सहज, शान्त व निर्भय जीवन जिया हो. दूसरे दिन हम लोग प्रातः आठ बजे क्रास्थवेट अस्पताल जाने के लिए तल्लीताल रिक्शा स्टेंड पहंचे. उन दिनों हाथ से खींचने वाले रिक्शा होते थे. दो कुली रिक्शा को सामने लगे हैण्डिल से खींचते थे. रिक्शा की सीट, पायदान अच्छे, आरामदेह होते थे. वर्षा से बचाव के लिए उनमें अच्छे ‘हुड’ लगे रहते थे. चढ़ाई में चलते समय यदि जरूरत हुई तो पीछे से सहारा देने को एक और कुली चलता था.
रिक्शा स्टैंड पहुँच कर रिक्शा वाले से कहा “क्रास्थवेट अस्पताल जाना है. भाड़ा क्या लोगे ?” उसने बड़ी सहजता से पूछा – काला अस्पताल? समझ में नहीं आया इस काले, गोरे का क्या मतलब है. रिक्शा चालक को यह समझने में देर नहीं लगी कि हम नैनीतालवासी नहीं हैं. बोला – बाबू जी यहां का रहने वाला काला चमड़ी का लोग काला अस्पताल में दिखाता, अंग्रेज लोग, बड़े लोग का अस्पताल होता रामजे अस्पताल| उसकी बात सुन कर मन में टीस लगी.
हम लोग नियत समय पर अस्पताल पहुंच गये. अस्पताल के अन्दर, बाहर कम्पाउंड में सभी जगह सफाई और शान्ति थी. डॉक्टर अपने कमरों में उपस्थित थे. मरीजों को देखने की पर्ची जिस खिड़की पर बनती थी, वहां से मैंने भी मां के नाम की पर्ची बनवा ली एवं डाइथरमी लगने वाले कमरे के बाहर लाइन में खड़े हो गये. नियत समय पर रेडियालाजिस्ट आये. वहां पर मरीज कम कम बिजली से चलने वाली सेंक की मशीन को देखने को जमा उत्सुक जनता अधिक थी.
(Nainital in 1945)
कुछ समय पश्चात डॉ. डी.एन. शर्मा आये. उन्होंने भली-भांति सम्पूर्ण व्यवस्था का परीक्षण किया. देखा मशीन ठीक से काम कर रही है या नहीं. तत्पश्चात जिस व्यक्ति का बिजली की मशीन से सैंक किया जा रहा था, उससे पूछा- कोई तकलीफ तो नहीं हो रही है. चन्द मिनटों के लिए आकर डाक्टर साहब ने अपनी जिम्मेदारी निभा कर वातावरण को सहज कर मरीजों को भी सहज कर दिया. उन दिनों सभी जगह अस्पतालों में ऐसी ही व्यवस्था व वातावरण था. सीमित साधनों के होते हुए भी मरीजों का उपचार पूरी सहृदयता व सहानभूति के साथ किया जाता था. डाक्टर एवं कर्मचारीगण मरीज की पीड़ा व उसके परिजनों की मजबूरी अनुभव करते थे.
मरीजों की संख्या कम थी. मां का भी सेंक हो गया. हमें अस्पताल में ज्यादा समय नहीं लगा. अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद नैना देवी के दर्शन के लिए मन्दिर जाने का निश्चय किया. जनसाधारण में यह मान्यता थी कि नैनीताल आवागमन के बाद एवं जाने से पहले अवश्य नैना देवी के दर्शन, पूजा अर्चना कर प्रसाद लेकर जाना चाहिए.
मन्दिर के बाहर या फ्लैट्स में कहीं कोई दुकान नहीं थी जहां से पूजा की सामग्री चढ़ावे का सामान, प्रसाद, मिठाई खरीद सकें. भोटिया मार्केट, चाट, खाने के अन्य सामानों चाय, कॉफी, कोल्ड ड्रिंक आदि की भी दुकान नहीं थी. मन्दिर में पूजा के लिए मिठाई, फल खरीदने थे. हमने बड़ी बाजार से चलकर मन्दिर की ओर जाने का निश्चय किया. बाजार की सड़क के दोनों ओर दुकानों से मिली हुई चौड़ी गहरी नालियां थी. बाजार की सड़क में कही पर भी अतिक्रमण नहीं था. आजकल बाजार में चलना मुश्किल लगता है. कहीं से मोटर साइकिल आ रही है, कहीं पर दुकानों के बाहर सामान आढ़ा तिरछा पड़ा रहता है. बाजार में पूरी, पराठे, समासों की दुकानें ही मुख्य आकर्षण हो गई हैं. बाजार में प्रवेश करते ही लगता है कि हम लोग पराठे वाली गली में आ गये हैं. इससे भी अधिक इन दुकानों के पास से गुजरने में भय लगा रहता है कि कहीं हाथ या बदन पत्थर के कोयले की धधकती हुई अगीठी अथवा तवे से न छू जाय. अंगीठियां प्रायः दुकान से बाहर को निकली रहती है. दुकानों के बाहर कहीं-कहीं पर टूरिस्ट जलेबी, चाट, चटकारे लगा कर खा रहे दिखते हैं. हम लोगों ने मिठाई की दुकान से मिठाई व फल की दुकान से फल खरीदे और थाने की गली से जाकर फ्लैट्स पार करके मन्दिर पहुंचे.
दिसम्बर महीने की ठंड, सर्द हवा के कारण बाजार में सुनसानी छाई थी. दाइयों (मेटो) के छोटे बच्चे रस्सी के सहारे पीठ से टोकरी लटकाए उसे सड़क में घसीटते हुए पीछे-पीछे चलने लगे. टोकरी, मेम साहब टोकरी, चार आना टोकरी, कहते हुए थोड़ी पाछ-पीछे आये फिर लौट गये. गर्मियों में सीजन के समय इनकी बहुत माँग रहती थी.
(Nainital in 1945)
मंदिर में सब देवी-देवताओं के दर्शन, पूजा अर्चना कर बहुत शान्ति मिली व सन्तोष हुआ. स्थानीय महिलाएं, लहँगा, पिछौड़ा व नथ पहन कर हाथ में पूजा सामग्री की थालियां हाथों में लेकर आई हुई थीं. थालियों में घी की आटे के दियों में बनी ज्योति बहुत अच्छी लगी. उन लोगों ने सभी मन्दिरों में इन ज्योतियों से आरती की. हम से भी कहा, तुम भी हमारे साथ हाथ लगा कर आरती कर लो. उनका ऐसा सौहार्दपूर्ण स्नेहिल व्यवहार बहत अच्छा लगा था. सहज एवं सौहार्दपूर्ण व्यवहार ही यहां के लोगों की विशेषता थी.
(Nainital in 1945)
विनीता उपाध्याय
विनीता उपाध्याय का यह लेख श्री नंदा स्मारिका 2011 से साभार लिया गया है.
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