फोटो : जयमित्र सिंह बिष्ट
पहाड़ और मेरा जीवन – 33
पिथौरागढ़ से राजस्थान जाने के बाद मैं एक साल वहां रहा. इस एक साल में स्कूल की कोई खास मदद के बिना मैंने आठवीं कक्षा सफलतापूर्वक उत्तीर्ण की, बाकायदा पूरे स्कूल में पांचवें स्थान पर रहते हुए. चूंकि मैं केंद्रीय विद्यालय से पढ़कर गया था और अंग्रेजी ठीकठाक उच्चारण के साथ पढ़ लेता था, मैं अपने क्लास टीचर, जो कि अंग्रेजी भी पढ़ाते थे, श्री देवी शंकर जी का चहेता छात्र था. मेरा एक सहपाठी था फहीम अख्तर, जिसे मैंने कुछ साल पहले फेसबुक से खोज निकाला. वह अब वेटनरी डॉक्टर है. दो महीने पहले मैंने उससे देवीशंकर जी का नंबर मांगा. संयोग से उस दिन देवी शंकर जी के बेटे का विवाह था, पर फिर भी उन्होंने फोन उठाया और 36 साल बाद भी उन्होंने मुझे पहचान लिया. उनकी नजर में मैं पूरे स्कूल में सबसे होनहार छात्र था, हालांकि वस्तुत: ऐसा नहीं था. यह जरूर था कि वे मेरे अंग्रेजी सही पढ़ लेने पर मुझपर फिदा थे. वस्तुत: तो मैं बदमाश था. कम से कम राजस्थान में तो मैंने बहुत बदमाशियां कीं.
मैं जिस स्कूल में पढ़ता था, वह एक सरकारी स्कूल था, लेकिन देवली छोटी जगह थी, वहां एक ही स्कूल बहुत था. उन दिनों प्राइवेट स्कूलों का बहुत बोलबाला नहीं हुआ था. स्कूल में मेज कुर्सियां नहीं थीं. हम अपनी किताबों के साथ पुरानी बोरी भी लेकर जाते थे और उसी पर बैठते थे क्योंकि फर्श बहुत चुभता था. शुरू में तो मैं अच्छे बच्चे की तरह घर से सीधे स्कूल जाता रहा क्योंकि उस जगह के बारे में ज्यादा पता न था. पर धीरे-धीरे मेरे दोस्त बनने लगे और मैं दुकानों, गलियों व सड़कों से परिचित होने लगा. स्कूल जाते हुए रास्ते में किराए पर साइकिल देने वालों की कतार से दुकानें आती थीं. इन दुकानों के बाहर एक से बढ़कर एक पुरानी साइकिलें होती थीं. एटलस की पीछे कैरियर वाली, आगे बिना डंडे वाली, बिना कैरियर और बिना डंडे वाली, छोटी, बड़ी. आखिरी बार साइकिल में बैठने की दास्तां मैं आपको सुना ही चुका हूं कि कैसे मैंने संजू वडके की नई साइकिल पहाड़ी ढलान से उतारते हुए पूरी सड़क घेरकर चल रही बकरियों के पीछे एक डोट्याल के पिछवाड़े दे मारी थी.
एक दिन मैंने साइकिल वाले से किराए पर एक ऊंचाई में थोड़ी छोटी साइकिल ले ली. एक अकेली एकांत सड़क पर जाकर मैंने वह साइकिल चलाई तो खुशी से फूला न समाया क्योंकि बहुत ही लाजवाब संतुलन से साइकिल चली थी. मैं इसी तरह कुछ दिन साइकिल किराए पर लेकर चलाता रहा. साइकिल यहां अठन्नी में घंटे भर के लिए मिल जाती थी. कुछ ही दिनों में मैं साइकिल चलाने का उस्ताद बन गया. हमारे स्कूल के प्रागंण में रेत बिछी हुई थी. कई बार मैं साइकिल लेकर स्कूल भी गया जहां मैं दूसरे लड़कों को रेत पर करतब दिखाते हुए देखता था. वे तेजी से साइकिल चलाकर लाते और अचानक ब्रेक मारकर एक पैर नीचे रख देते और साइकिल एक सौ अस्सी डिग्री उलटी दिशा में घूम जाती. मैं भी अब यह करतब दिखाने की कोशिश करता. हमारा साइकिल चलाने वालों का एक गैंग ही बन गया. जल्दी ही हमने स्कूल के प्रांगण में करतब दिखाने से आगे तरक्की करते हुए साइकिल कोटा जाने वाले हाइवे पर चलानी शुरू की. मैं घर से स्कूल जाते हुए रास्ते में ही साइकिल किराए पर ले लेता पर स्कूल जाने की बजाय मैं लड़कों के साथ कोटा हाइवे की ओर निकल जाता. हाइवे से कई अकेली सुनसान सड़कें निकलती थीं जिन पर हम रेसिंग करते. ये सड़कें कुछ-कुछ दूरी पर चढ़ाई और ढलान से भरी हुई थीं यानी आप ऊपर चढ़ों और फिर नीचे उतरो. ऐसा लगता हम साइकिल नहीं चला रहे किसी झूले की सवारी कर रहे हैं. मुझे याद नहीं पड़ता कि मैं कभी किसी से साइकिल की रेस में हारा भी. आज भी मेरी आंखों के सामने रेस का दृश्य जीवंत है कि कैसे मेरी कमीज के बटन खुल जाते थे और वह हवा में उड़ रही होती थी जबकि मैं स्पीड बढ़ाने के लिए थोड़ा झुककर पैडल मार रहा होता था ताकि हवा का प्रतिरोध कम हो और साइकिल प्रतिद्वंद्वियों से ज्यादा तेज रफ्तार ले.
सिर्फ साइकिल रेसिंग ही नहीं, उन दिनों मैं हर खेल को बहुत निपुणता से खेलता था. आप लोग कहेंगे कि अपने मुंह अपनी बढ़ाई कर रहा है लेकिन मैं बहुत ईमानदारी से यह बात यहां बता रहा हूं कि एक बार इंटर स्कूल फुटबॉल टूर्नामेंट में मुझे हमारे स्कूल का कप्तान बना दिया गया. कप्तान था, तो जाहिर है मैं फॉरवर्ड की पॉजिशन पर खेल रहा था. हमारे समय में कप्तान उसी पॉजिशन पर खेलता था. ये तो आज है कि गोलकीपर को भी कप्तानी दे दी जाती है. मैं फॉरवर्ड की पॉजिशन पर खेल तो रहा था, पर मुझे पीछे से बॉल फीड नहीं हो रही थी जबकि मैं बॉल को हमेशा अपने पैरों पर रखना चाहता था. इस चक्कर में मैंने पीछे जाकर गोलकीपर से बॉल ली और वहीं से अकेले ही उसे लेकर आगे बढ़ा. झूठ बोले कुत्ता काटे. पता नहीं तब तक डियागो माराडोना पैदा हुआ था या नहीं, मैं डीलडौल में तब उसके जैसा ही था, नाटा और थोड़ा मोटा. बॉल लेकर जो मैं आगे बढ़ा तो मुझे कोई रोक ही नहीं पाया क्योंकि मुझमें इतनी ऊर्जा और स्फूर्ति भरी हुई थी कि सामने आने वाले हर प्रतिद्वंद्वी को मैं छकाता चला गया और बॉल प्रतिद्वंद्वी टीम के गोल के भीतर जाकर ही रुकी. मैं दो मिनट के उस अंतराल को कभी नहीं भूला. हां, इतनी ही देर लगी होगी मुझे अपने गोलकीपर से बॉल लेकर प्रतिद्वंद्वी टीम के गोल तक पहुंचने में. उस दिन जरूर फुटबॉल के मैदान पर किसी बड़े खिलाड़ी की बेचैन आत्मा भटक रही होगी क्योंकि मैं खुद अपनी ताकत से ऐसा कर सकता था, इसका यकीन तो मुझे कभी नहीं हुआ, हालांकि एक-दो करामाती गोल मैंने बाद के सालों में भी किए, पर उस जैसा गोल तो कोई नहीं कर सकता था. करना क्या, कोई सोच भी नहीं सकता था.
यहां आकर फुटबॉल के साथ-साथ मैं क्रिकेट भी खूब खेलने लगा था. हाथों में गलव्स और पैरों में पैड पहनकर खेलने का मेरा पहला अनुभव भी देवली का ही है. पर क्रिकेट की बातें अगले सप्ताह.
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कवि, पत्रकार, सम्पादक और उपन्यासकार सुन्दर चन्द ठाकुर सम्प्रति नवभारत टाइम्स के मुम्बई संस्करण के सम्पादक हैं. उनका एक उपन्यास और दो कविता संग्रह प्रकाशित हैं. मीडिया में जुड़ने से पहले सुन्दर भारतीय सेना में अफसर थे.
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