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वो कॉर्क की बॉल, पत्थर के विकेट, वो लकड़ी का बैट और वह छक्का

पहाड़ और मेरा जीवन भाग-16


(पोस्ट को लेखक सुन्दर चंद ठाकुर की आवाज में सुनने के लिये प्लेयर के लोड होने की प्रतीक्षा करें.)

क्रिकेट के खेल में ऐसा क्या था इसे मैं ठीक से चिन्हित तो आज भी नहीं कर सकता, पर मैं बचपन से आज तक इस खेल को लेकर हमेशा जैसे नशे में रहा. जब दिल्ली में थे, तो बिजली के पोल को विकेट बनाकर खेलते थे. तब हम बैट तो खरीद पाते नहीं थे, सो घरों से कपड़े पीटने वाले मोगरे को ही बैट बना दिया जाता था.

पिथौरागढ़ जाकर हमारे खेल के स्तर में थोड़ा इजाफा हुआ. अब हमारे पास पेड़ों की लकड़ियों को काटकर बनाए गए बैट होते थे और स्टंप के लिए हम ईंटों या पत्थरों का इस्तेमाल करने लगे थे. बिजली के खंबों में दिक्कत यह होती थी कि बॉल अगर विकेट पर भी लग जाती, तो बल्लेबाज मानने को तैयार नहीं होता था. उसे सारी बॉल स्टंप की ऊंचाई से ऊपर लगती नजर आती थी.

बॉल का बिजली के खंबे पर लगना तो सबको दिखता था, मगर यह साबित करना मुश्किल होता था कि बॉल विकेट की ऊंचाई से ऊपर लगी है या नीचे. इसलिए झगड़े बहुत होते थे. लेकिन पत्थर के विकेट होने से ऐसी गफलत नहीं हो पाती थी क्योंकि बॉल का विकेट पर लगना सबको दिखता था. वैसे विकेट हम पेड़ की शाखाएं काटकर भी बना लेते थे. लेकिन ज्यादा मजा बैट देखकर आता था.

घरों में बनाए गए ये बैट अलग-अलग आकार-प्रकार के होते थे क्योंकि इन्हें बनाने के लिए भी सबके पास ठीक से औजार नहीं होते थे. ऐसा ही घर में बनाया हुआ एक बैट मुझे भी नसीब हुआ जब मेरे पुश्तैनी गांव खड़कू भल्या में रहने वाले मेरे बाज्यू यानी ताऊजी हमसे पहली बार मिलने पिथौरागढ़ आए.

उन्हें मेरे बारे में किसी ने बता दिया था कि बहुत तेज लड़का है, क्रिकेट भी खेलता है. वे पहली बार मुझसे मिलने आने वाले थे इसलिए दो किलो मिसरी (मिसरी पिरामिड जैसे आकार की होती थी जिसके साथ कटकी मारकर चाय पी जाती थी ) और गुड़ की एक ढेली के अलावा वे आम की लकड़ी का खास मेरे लिए बनाया बैट भी लाए थे. हालांकि बैट के आकार-प्रकार और लंबाई को देखकर मैं खुश न हो सका था क्योंकि वह बहुत छोटा था. बाज्यू ने अपनी कल्पना में मेरा कद बहुत कम मान लिया था. लेकिन फिर भी पहली बार मोगरे की जगह बैट हाथ में आने का गरूर मैं महसूस कर सकता था.

मैंने सुना था कि बैट की लकड़ी को तेल पिलाने से बैट की ताकत बढ़ती है, तो मैं चोरी-छिपे उस पर तेल भी लगाता था. बैट थोड़ा चौड़ा था और उसे पकड़कर स्टांस लेते हुए बहुत ज्यादा नीचे झुकना पड़ता था. खैर, उस बैट से मैंने एक ऐसा ऑन ड्राइव मारा था कि आज भी याद करता हूं, तो शरीर मैं झुरझुरी उठती है और सोचता हूं कि तब किसी आचरेकर सरीखे कोच के हाथ पड़ जाता, तो अब तक तो क्रिकेट से संन्यास ले सुनील गावस्कर के साथ बैठ कमेंट्री कर रहा होता. वह ऑन ड्राइव मैंने बड़े भाई की बॉल पर ही मारा था और बड़े भाई को आप छोटा-मोटा बोलर न समझिएगा.

वह भी किसी कोच के हाथ नहीं पड़ा, नहीं तो दोनों भाई रिटायरमेंट के बाद साथ बैठ कमेंट्री कर रहे होते. मैं तो बैट्समैन था और ऑफ स्पिन बोलिंग करता था. उन दिनों कॉर्क की बॉल होती थी. भाईसाहब बॉल उंगलियों में घूमती हुई ऐसी निकलती थी कि क्या शेन वॉर्न, क्या बिशन पा जी और भज्जी भाई, मजाल है बैट्समैन उसे सूंघ भी पाए, खेलना तो बहुत दूर की बात थी. मैं प्रतिद्वंद्वी टीम के धुरंधर बल्लेबाजों को भी बोल्ड करने में माहिर था, पुछल्ले तो खैर किसी बॉल पर अगर बैट भी लगा दें, तो इसे मैं अपना अपमान समझता था.

ठूलीगाड़ में जहां हम रहते थे उसके जरा-सा ऊपर ही एमईएस कॉलोनी हुआ करती थी. मैं कॉलोनी के बच्चों के साथ ही क्रिकेट खेलता था. जैसा कि मैं आप लोगों को पहले भी बता चुका हूं कि खेल कोई भी रहा हो, मेरी हर खेल में बहुत माहिर खिलाड़ियों में गिनती होती थी. कॉलोनी के मैदान पर हम सबसे पहले कब्जा करके क्रिकेट खेलते थे.

कॉर्क की बॉल होती थी, जो कई बार एमईएस के ऑफिस की खिड़कियों का कांच तोड़ देती थी. कई बार वह टिन की छतों में जाकर गिरती और जबरदस्त आवाज पैदा करती. जितनी आवाज बाहर वालों को सुनाई पड़ती उससे कई गुना तेज आवाज छत के नीचे घरों में रहने वालों को सुनाई पड़ती होगी क्योंकि ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी की छत पर बॉल गिरी और अंदर से कोई अंकल या आंटी हाथ में छड़ी लिए बाहर न आई हो. पर उनके आने तक तो मैदान साफ हो जाता था और हम जगह-जगह सांस रोके छिपे होते थे.

हमने इस तरह पैसा इकट्ठा करके खरीदी गई न जाने कितनी नई-नई कॉर्क की गेंदें खोईं क्योंकि छड़ी हाथ में लेकर हमें खोजने आए उन अंकल-आंटी से बॉल मांगने जाने की किसी की कैसे हिम्मत हो सकती थी. बहरहाल, मैं मौका मिलने पर अक्सर बड़े भाई के साथ भी क्रिकेट खेलता था. मेरे बड़े भाई की बोलिंग की खासियत यह थी कि वह स्पिन तो डालता था पर उसकी बोल की गति सामान्य स्पिनरों से तेज रहती थी. समझ लो कि कुंबले की स्पीड से जरा-सी तेज.

आज भी कभी जब हम उन्मुक्त के साथ प्रैक्टिस करते हैं, तो वह भाई की बोलिंग पर चक्कर खा जाता है. उस दिन हम दोनों भाइयों ने सर्दियों की धूप में घर के नीचे यानी ठुलीगाड़ से सटकर लगे खेतों में जाकर खेलने का फैसला किया. उन खेतों पर उगी घास काटी जा चुकी थी. पाला चड़ने से घास बहुत कम बची थी. इतनी कम कि जमीन की सतह थोड़ी सख्त हो गई थी, जो कि क्रिकेट खेलने के लिए जरूरी भी था. (पिछली क़िस्त : और वह मुर्गी का चूजा दो महीने बाद जाने कहां से लौट आया)

मैं झूठ क्यों बोलूं, कॉर्क की बॉल से खेलते हुए थोड़ा मुझे थोड़ा डर हमेशा लगता था. पैर में लगने पर हड्डी भी टूट सकती थी. भाई अपनी स्पीड से बोलिंग कर रहा था. उसने एक बॉल फेंकी जो कि जरा-सी मेरे पैरों की ओर आई. मैंने पैर थोड़ा पीछे करके जगह बनाई और पूरी जोर से तेल और घी पिलाकर मजबूत बनाए हुए बैट को घुमाया.

बैट की मजबूती मेरे दिमाग का वहम ज्यादा था क्योंकि बॉल के बैट पर टकराते ही मेरे हाथों में जोरदार झनझनाहट हुई लेकिन अगले ही पल मैंने देखा कि बॉल जमीन से चिपकी दनदनाती हुई खेत दर खेत पार करते हुए बहुत दूर चली गई. क्योंकि खेतों में अब भी थोड़ी बहुत घास थी इसलिए बॉल घर्षण बल के कारण ज्यादा दूर नहीं जा पा रही थी, पर इस शॉट में क्या बात थी कि न सिर्फ वह जरा भी हवा में नहीं उठी, पांच खेत दूर भी चली गई.

मुझे यह शॉट तब तक याद रहा और मैं इसे सपने में देखता रहा जब तक कि ग्यारहवीं में पढ़ते हुए जीआईसी पिथौरागढ़ के मैदान पर मैंने अपने ही सहपाठी संजय सरन की इसी तरह पैरों की ओर आ रही नई कॉर्क की बॉल से चोट लगने से बचने की कोशिश करते हुए आंख बंद करके और हनुमान को याद करते हुए बैट घुमाया और बॉल बैट के बीचोंबीच टकरा अंतरिक्ष की ओर कूच कर गई. जब वह नीचे आई तो मैदान छोड़ उसके बाहर बांज के पेड़ों के बीच जाकर गिरी.

मैं हक्काबक्का था कि ये कैसे हुआ. लेकिन उस दिन मैं कैसे तो बॉल को देख रहा था कि उसी ओवर में एक और बॉल पर मैंने लगभग यही शॉट खेला और इस बार भी बॉल का यही हश्र हुआ. मैंने उसके बाद भी कई मर्तबा क्रिकेट खेला, मैच खेले, बैटिंग की, रन भी बनाए पर वैसे दो शॉट कभी सपने में भी नहीं खेल पाया. इन तीन शॉटों के अलावा मुझे अपना एक करामाती कैच भी याद है. बात सातवीं की है, तब तक हमारे केंद्रीय विद्यालय की नई इमारत बन चुकी थी. आज भी वह इमारत वैसी ही है. एमईएस कॉलोनी के हम कुछ लड़कों ने दो टीमें बनाईं और पांच-पांच रुपये जमा करके एक मैच खेला. मैच स्कूल के खेतनुमा मैदान में खेला गया. (जम्मू में नदी से मछलियां पकड़ना और अर्चना वर्मा की कॉपी से नकल करना)

दूसरी टीम में एक हमसे दो साल बड़ा लड़का था, जिसने कुछ दिन पहले किसी बात पर मेरा हाथ बहुत जोर से मरोड़ा था और मैंने पहली बार इस बात को लेकर आहत महसूस किया था कि आप खुद पर हो रहे अन्याय की किसी से शिकायत भी नहीं कर सकते. ऐसा इसलिए लगा था क्योंकि उसके पिताजी बड़े अफसर थे और मैं उसकी शिकायत करने उनके घर नहीं जा सकता था.

खैर, उस दिन मैच में यही अत्याचारी बैटिंग कर रहा था और मैं उससे तीन खेत दूर कवर्स के इलाके में फील्डिंग कर रहा था. उसने एक बॉल पर तगड़ा शॉट मारा. बॉल मेरे सिर के ऊपर से किसी मिसाइल की तरह निकल रही थी. मैं दो कदम पीछे आया तो खेत के मुहाने पर लग गया. मेरे पास उछाल मारने के सिवा कोई चारा न था. इधर मैं उछला और उधर बॉल मेरे हथेली से टकराई और अपने आप उंगलियों में फंस गई. बल्लेबाज दंग था और मेरी टीम के दूसरे खिलाड़ी भी यकीन नहीं कर पा रहे थे कि कैच पकड़ा जा चुका है. अब तो खैर हम इंटरनैशनल मैचों में कैसे-कैसे कैच देख चुके हैं, लेकिन मैं उस कैच को बहुत लंबे समय तक ईश्वर की करामात मानता रहा था कि उसने ही ऐसा करवाया ताकि उस बल्लेबाज को मुझ पर बिना बात हाथ मोड़ने का अत्याचार करने की सजा मिले.

(जारी)

सुन्दर चन्द ठाकुर

कवि, पत्रकार, सम्पादक और उपन्यासकार सुन्दर चन्द ठाकुर सम्प्रति नवभारत टाइम्स के मुम्बई संस्करण के सम्पादक हैं. उनका एक उपन्यास और दो कविता संग्रह प्रकाशित हैं. मीडिया में जुड़ने से पहले सुन्दर भारतीय सेना में अफसर थे.

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Girish Lohani

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