बहुत समय पहले बमौरा नाम का एक गाँव था जहाँ के निवासी बहुत संपन्न थे. उस गाँव के पड़ोस में एक लुटेरा डाकू रहता था जिसका नाम पंचू ठग था. उसने आसपास के गाँवों की महिलाओं को आतंकित कर रखा था – वह उनके गहने और इज्जत लूट लिया करता था. वह आने-जाने वाले यात्रियों के साथ लाठी से मारपीट करता और उन्हें लूट लेता. Musa Saun and Panchu Thag Kumaoni Folk Tale
पड़ोस के एक गाँव कैलढुकरी में नारायण सौन नामक एक आदमी रहता था. उसकी पत्नी का नाम रिखोला था. उनका एक बेटा हुआ जिसका नाम उन्होंने मूसा सौन रखा. मूसा सौन बहुत होशियार बच्चा था और लोग कहते थे कि वह बड़ा होकर महान बनेगा. जब बड़ा होकर उसने पंचू के अत्याचारों के बारे में सुना, अपमान से उसका खून खुल उठा. उसने पंचू को मार डालने का प्राण लिया.
एक दिन उसने अपने माँ से अनुमति माँगी कि वह जाकर बैलों की एक जोड़ी खरीद लाये और उस खेत को जोते जो लम्बे समय से बंजर पड़ा हुआ था. उसकी माँ ने उसे चेतावनी दी की अगर वह पैसे लेकर बाहर जाएगा तो उसका लुटना और पंचू के हाथों मारा जाना निश्चित है. लेकिन मूसा जितना अधिक पंचू के अत्याचारों के बारे में सुनता, उसे मार डालने का उसका निश्चय उतना ही दृढ़ होता जाता.
एक दिन मूसा ने अपने पिताजी के बही-खातों पर निगाह डाली तो पाया कि उसके पिता ने मूसा के पास सोने का एक हार गिरवी रखा हुआ था जिसे वापस नहीं लाया गया था. मूसा ने खता अपनी माँ को दिखाकर कहा कि वह हार वापस लाने पंचू के पास जा रहा है. उसकी माँ ने उसे ऐसा करने से हतोत्साहित किया. Musa Saun and Panchu Thag Kumaoni Folk Tale
एक दिन मूसा और उसकी माँ अनाज पीसने घराट (पनचक्की) गए. पनचक्की का ऊपरी पत्थर एक गज मोटा था. अपनी माँ को अपनी ताकत दिखाने की नीयत से मूसा ने चक्की के उस पाट को अपनी मुठ्ठी के एक प्रहार से तोड़ डाला. उसने अपनी माँ को बताया कि अगर वह एक मुठ्ठी से इतने मोटे पत्थर को तोड़ सकता है तो पंचू को मार भी सकता है.
अपने बेटे की ताकत भांप लेने के बाद माँ ने उसे बमौरा जाकर पंचू से लड़ने की इजाजत दे दी. मूसा ने सोने के कड़े और कुंडल पहने, अपना कवच डाला और बमौरा की तरफ चल दिया. उसके साथ दो लोग थे जो उसके भोजन की टोकरी लिए चल रहे थे. पंचू को मूसा रास्ते में दिख दिया और उसके जेवर देखकर वह बहुत उत्साहित हो गया. उसने मूसा की दिशा में लकड़ी का एक कुंदा फेंका लेकिन मूसा ने उस पर ध्यान नहीं दिया. फिर उसने और अधिक ताकत के साथ दूसरा कुंदा फेंका. मूसा ने पंचू की तरफ देखकर पूछा कि वह कौन है और उस भोले भाले यात्री की तरफ लकड़ी के कुंदे क्यों फेंक रहा है. पंचू ने पूछा कि वह किसका बेटा है और कहाँ जा रहा है. मूसा ने कहा कि उसकी माता का नाम रिखौला है और वह बमौरा जा रहा है. Musa Saun and Panchu Thag Kumaoni Folk Tale
यह सुनकर पंचू बोला, “अरे! तेरी माँ तो मेरी बहन है. अपनी मामी के लिए क्या तोहफा लेकर आया है तू?”
मूसा ने जवाब दिया, “मामा, तू तो बड़ा लालची है. अगर मेरी मामी मेरा स्वागत करेगी और मेरे भाल पर पिठ्या (टीका) लगाएगी तो मैं उसे सोने की एक मोहर दूंगा.”
पंचू बोला, “प्यारे भांजे, सोने की मोहर सम्हालने के लिए मुझे दे दे. जब तू इसे अपनी मामी को देना चाहेगा मैं तुझे सौंप दूंगा.
मूसा ने उत्तर दिया, “मामू अगर मैं सोने की मोहर तुझे दे दूं और फिर वापस मांगूं तो मेरी मामी सोचेगी कि मैंने सोने की मोहर उसके अपने पति से माँगी है.”
जब पंचू समझ गया कि मूसा को इतनी आसानी से बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता तो उसने यह कह कर कि उसने बहुत दिन से कुछ भी नहीं खाया है, मूसा से अनुरोध किया कि उसे कुछ खाने के लिए दे. मूसा ने उसे अपनी खाने की टोकरी में से कुछ खाना दिया. उसके बाद चलना शुरू करते समय हर कोई सबसे आगे रहना चाहता था. आखिरकार खाने की टोकरी ले जाने वाले कहार सबसे आगे चले, मूसा उनके पीछे था और सबसे पीछे पंचू चल रहा था. चढ़ाई चढ़ते हुए मूसा बहुत थक गया. पंचू ने सोचा कि मूसा को मारने का यही सबसे सही मौक़ा है. उसने ऐसा करने की नीयत से अपनी लाठी को हवा में उठाया. यह देखते ही मूसा ने अपना खंजर निकाल लिया और बोला, “मामू तूने अपनी लाठी क्यों उठा ली?”
पंचू ने जवाब दिया, “प्यारे भांजे तेरे सिर पर थोड़ी सी मिट्टी लग गयी है. मैं उसी को इस लाठी की मदद से साफ़ करना चाह रहा था.”
फिर दोनों पहाड़ी चढ़ते रहे जब तक कि वह समतल नहीं आ गया जहाँ से बमौरा गाँव दिखाई देता था. पंचू ने मूसा को मारने के लिए अपनी लाठी फिर से उठाई. मूसा ने अपना खंजर निकाल लिया. दोनों सात दिन और सात रात तक लड़ते रहे. कभी पंचू का पलड़ा भारी होता कभी मूसा का. आखिरकार पंचू ने मूसा को जमीन पर पटक दिया और उसकी छाती पर चढ़ बैठा. मूसा ने अपना खंजर निकाला और नीचे से उसे पंचू की छाती में उतार दिया. पंचू की छाती खुल गयी और वह जल्द ही मर गया. Musa Saun and Panchu Thag Kumaoni Folk Tale
पंचू की देह की तलाशी लेने पर मूसा को चार हजार रुपये मिले जिन्हें वह अपने घर ले आया.
उधर मूसा के दो साथी पंचू और मूसा की लड़ाई के बीच भाग खड़े हुए थे. उन्होंने जाकर मूसा की माँ को बता दिया था कि लड़ाई में पंचू और मूसा दोनों की मौत हो गयी है.
यह सुनकर मूसा की माँ और गाँव के सारे लोग बहुत गहरे दुःख में डूब गए. लेकिन जब उन्होंने मूसा को विजयी होकर घर लौटते देखा तो उनकी खुशी का ठिकाना न रहा. पूरे इलाके में आतंक फैलाने वाले पंचू ठग की मौत पर सारे गाँव में जश्न मनाया गया. लोगों ने ग्राम गायकों को बुलवाया कि वे पंचू ठग पर मूसा सौन की जीत के गीत बनाकर गाएं. इन गाँवों में ये गीत अब भी गाये जाते हैं.
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ई. शर्मन ओकले और तारादत्त गैरोला की 1935 में छपी किताब ‘हिमालयन फोकलोर’ में कुमाऊँ और पश्चिमी नेपाल की लोककथाओं का विशाल संग्रह पढ़ने को मिलता है. इस पुस्तक में इन लोक कथाओं को अलग अलग खण्डों में बांटा गया है. प्रारम्भिक खंड में ऐतिहासिक नायकों की कथाएँ हैं जबकि दूसरा खंड उपदेश-कथाओं का है. तीसरे और चौथे खण्डों में क्रमशः पशुओं व पक्षियों की कहानियां हैं जबकि अंतिम खण्डों में भूत-प्रेत कथाएँ हैं. हम आपको इस पुस्तक से समय-समय पर कहानियां पेश करेंगे. यह कथा इसके पहले खंड से ली गयी है. मूल अंग्रेजी से अनुवाद अशोक पाण्डे ने किया है.
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