अभी विमान देहरादून में उतरा भी नहीं था की वहाँ के मौसम का आभास हो चुका था. पायलट बाबू पहले ही कुर्सी की पेटी पहने रखने का संदेश दे चुके थे. हिलते-डुलते विमान सही सलामत देरादून हवाई अड्डे पर उतरा तो सब अपने छतरी और रेनकोट निकाल कर बारिश से बचते-बचाते अंदर घुसे. मेरी नज़रे कन्वेयर बेल्ट से ज़्यादा भीड़ में उस चहरे को ढूंढने में जुट गयी जिसे मैं अभी नौ महीने पहले अक्टूबर 2015 में रूपकुंड ट्रेक में पहली बार मिली थी. हालांकि उस ट्रेक में काफी और लोगों से मिलना मिलाना हुआ पर कहते हैं की, कुछ मुलाकातें जीवन भर की मुलाकातों की वजह बन जाती हैं. (Travelogue By Jyoti Daurbi)
रूपकुंड ट्रेक के बाद ये साथ यात्रा की हमारी पहली योजना थी, जिसमें हम ही आयोजक थे और हम ही सहभागी. घर वालों के लाख समझाने पर भी यात्रा का जूनून ऐसा सवार था कि मौसम विभाग की भारी बारिश और भूस्खलन की चेतावनी भी हमें रोक न सकी और जोश से भरे हम दोनों, बैग बांधे पूर्व आरक्षण के बिना चल पड़े उत्तराखंड घूमने.
मूसलाधार बारिश हो रही थी और ऐसे में बस स्टॉप तक जाना पूरी तरह नामुमकिन था. पहले से कोई टैक्सी बुकिंग न होने के कारण बाहर निकल कर किसी टैक्सी का इंतेज़ाम करना ज़रूरी था. चूँकि हम तो जुनूनी थे ही, एयरपोर्ट टैक्सी पर साढ़े तीन हज़ार रुपये खर्च करना हमारी कमजोरी दर्शाता और वैसे भी तय हुआ था कि ये सफर हम सार्वजनिक परिवहन से करेंगे.
सामान और सखी को भीतर ही छोड़ मैं एयरपोर्ट के बाहर गयी और ख़ाली टैक्सी के लिए नज़रें इधर-उधर घुमाई. जब कुछ भी न हो सका तो बेहतर समझा की पुलिस से ही मदद ली जाये और मसूरी जाने का आसान तरीका पूछा जाये. तीन चार एयरपोर्ट सिक्योरिटी के अफसर झुंड में खड़े कुछ बातचीत कर रहे थे, उनमें एक सज्जन बहुत ही मददगार साबित हुए, जल्दी से एक टैक्सी वाले को फ़ोन कर वापिस आने को बोला, शायद वो अभी थोड़ी देर पहले ही किसी को एयरपोर्ट छोड़ देहरादून के लिए रवाना हुआ था.
इसी बीच एग्जिट दरवाज़े के पास जाकर मैंने प्रतिभा को बाहर आने का इशारा किया, सामान लेकर हम टैक्सी का इंतज़ार करने लगे और थोड़ी देर में टैक्सी सामने थी. पुलिस वाले सज्जन ने मोल भाव कर 250 रूपये में हम दोनों का देहरादून तक का सफर तय कर दिया.
तक़रीबन डेढ़ घंटे बाद हम देहरादून बस स्टैंड पहुंच गए पर बारिश रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी. रेनकोट पहनकर हमने मसूरी जाती बस का पता किया और किस्मत से हमें ख़ाली सीट भी मिल गयी. रूपकुंड यात्रा के अनुभव के अनुसार खिड़की की सीट मुझे सौंपी गयी, क्या पता कब जरूरत पड़ जाए. अभी बस धीरे से देहरादून के बाहर सरक ही रही थी की देखते ही देखते पूरी भर गयी. थोड़ी देर में एक बुजुर्ग महिला अपनी बेटी क साथ बस में किसी तरह घुसी, बैठने को तो दूर बड़ी मुश्किल से उन्हें खड़े होने की भी जगह मिली. क्यूंकि उनकी उम्र थोड़ी ज़्यादा थी और इस तरह उन्हें खड़ा देख हम ने तय किया की हम बारी-बारी खड़े हो कर जायेंगे और उन्हें अपनी एक सीट सौंप दी.
दो घंटे बाद जब हम मसूरी पहुंचे तो एक चीज़ अब भी साथ थी, वह थी बारिश. बस से उतर कर एक छोटी सी दुकान की आड़ में हमने अपने रेनकोट पहने और चल पड़े होटल की तलाश में. पूछताछ में लोगों ने जो होटल बताये वहां पहुंचने तक हम लगभग एक से डेढ़ किलोमीटर बारिश में चल चुके थे. जो भी कमरे देखे उनमें कुछ न कुछ कमी की वजह से बात नहीं बनी. मुश्किल से ही हम दोनों को एक कमरा पसंद आया तो उसी होटल में बुकिंग कर ली गयी. शाम के साढ़े चार बज चुके थे और हर हाल में हमे 5 बजे तक कैंब्रिज बुक डिपो पहुंचना था. मसूरी आने का ख़ास कारण भी यही बुक डिपो था. हर शनिवार मशहूर लेखक रस्किन बांड हर शाम पांच बजे यहाँ आते है और अपने प्रसंशकों के साथ कुछ वक़्त बिताते हैं. अगर आप कोई किताब इस बुक डिपो से खरीदते हैं तो आप उस पर उनके हस्ताक्षर भी ले सकते हैं. बांड साहब के लेखन में एक अजीब सा जुड़ाव हैं, जो किसी को भी सीधा प्रकृति से जोड़ सकता है. भाषा इतनी आम की कब आप उनकी कहानियों में खो जाये ये आप खुद भी नहीं जान पाते.
बादलों में तो जैसे होड़ सी लगी थी कि कौन देर तक बरसेगा, जब से हम एयरपोर्ट में उतरे थे, तब से लेकर अब तक मज़ाल की बारिश एक पल के लिए भी थमी हो.
बचते-भीगते जब हम बुक डिपो पहुंचे तो पहला झटका मिला. पता चला की भारी बारिश ने मिस्टर बांड का रास्ता भी रोक लिया है और आज वे यहाँ नहीं आएंगे. पहले ही प्लान पर बारिश ने पानी फेर दिय. बिजली से तेज गिरती अपनी आशा को हमने थोड़ा सा जोश दिया और बुक डिपो के मालिक से पूछा कि क्या बांड साहब आगुन्तकों से अपने घर पर मिलना पसंद करते है? जवाब उससे भी तेज आया की उनकी तबियत थोड़ी सी नासाज़ है और ऐसे में उन्हें परेशान करना बिलकुल भी ठीक नहीं होगा.
दुःखी मन से लौटते हुए माल रोड पर रंग-बिरंगी छतरियों ने हमारा ध्यान भटकाया, मोल-भाव कर दो छतरियां खरीद हमने रेनकोट अपने बैग में रख लिए. बड़े-बड़े रंगीन छाते ले हम दोनों माल रोड पर चाय-पकौड़ों की तलाश में जुट गए. भूखे-प्यासे तो हम थे ही, दुकान मिलते ही छाते बंद कर दुकान के किनारे रख खाने का आर्डर दिया. थोड़ी देर बाद चाय, पकोड़े और आलू के पराठे हमारी टेबल पे थे. खाने के स्वाद में खोये हुए जब मेरी नज़र बाहर की तरफ पड़ी तो दो आदमी जो अभी हमारे ही होटल से बाहर निकल रहे थे में से एक मुझे देख मुस्कुराया. जब तक मैं कुछ समझती वे निकल गए. दरअसल हमारी बाहर पड़ी छतरियों में से एक छतरी उठा कर वह चला गया था. यह सब कुछ ही पलों में हुआ और जब हम बाहर निकले तो वे दोनों वहां से गायब थे. भले दुकान वाले ने अपने कर्मचारी को दौड़ाकर आस-पास देखने को कहा पर वे रफूचक्कर हो चुके थे.
सूरज की तरह आज लगता था कि हमारी खुशी को भी ग्रहण लगा हुआ था. गम भुलाने के लिए हमने और एक-एक कप अदरक वाली कड़क चाय मगाई और चाय की चुस्कियों के साथ उस छाता चोर को खूब कोसा. अभी तो हमने उन छतरियों के साथ एक फोटो भी नहीं ली थी, शायद चोर को ये पता होता तो उसका मन भी पसीज़ ही जाता.
एक ही छतरी में दोनों वापस. दूसरी छतरी खरीदने उसी पुरानी दुकान में गए और तीसरी छतरी खरीदने पे डिस्काउंट भी मांगा. दिन कुछ ख़ास था नहीं, छतरीवाला भी अपने दाम से टस से मस न हुआ. अपनी-अपनी छतरियां पाने की ख़ुशी में हमने कुछ अच्छे फोटो खिंचवाए और अपने कमरे की तरफ बढ़ चले थोड़ा आराम करने. घर पे फ़ोन कर अपनी कुशलता की जानकारी दे हम थोड़ी देर आराम करने चले गए.
जब आँख खुली तो रात के आठ बज चुके थे और वापस भूख लौट आयी थी. सोचा बाहर निकल कुछ खा आयें और निरंतर गिरती बारिश को भी नमन कर आयें.
होटल की गली को पार करते समय काफी सन्नाटा बरपा हुआ था लेकिन जब हम माल रोड पहुंचे तो वहां एक अलग ही दुनिया बसी थी. शनिवार होने के कारण दिल्ली, पंजाब, हरियाणा सब जैसे मसूरी ही आ गए थे. सड़क पर चलने भर की जगह नहीं और हर दुकान पर सैलानियों का हुजूम ऐसे पूछताछ में जुटा था गोया आज ही बाजार का सारा सामान बिक जायेगा. बारिश से तो जैसे कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा था. लोग छाते और रेनकोट ले मॉल रोड के पूरे मज़े ले रहे थे. ये सब देख हम भी नींद से पूरी तरह बाहर आकर जुट गए भीड़ का हिस्सा बन घरवालों के लिए गिफ्ट लेने.
खरीदारी में ऐसे डूबे की कब 10 बजे पता ही नहीं चला. मेरा बचपन पहाड़ो में ही बिता था, पर देर रात पहाड़ो में इतनी चहल-पहल मेरे लिए बिल्कुल नयी बात थी. ख़ैर जैसे-तैसे एक रेस्तरां में बैठने की जगह मिलते ही हमने फटाफट आर्डर दे दिया. बिल भरते-भरते रात के 11 बज चुके थे पर सड़क वैसे ही खचाखच भरी हुई थी. जैसे आज सब कुछ बिक जाना हो.
सुबह उठे तो बारिश अभी भी बिना थके चली जा रही थी. तैयार होकर, नाश्ता किया और हम चल पड़े अगले पड़ाव की ओर. टैक्सी स्टैंड से कोई भी टैक्सी सीधे ऋषिकेश जाने को तैयार ही नहीं थी और जो थी भी उनके किराये आसमान छू रहे थे. देहरादून की बस पकड़कर फिर वहां से शेयरिंग टैक्सी लेकर ऋषिकेश पहुंचे. वहां पहुंचते ही चमत्कार हुआ और न रुकने वाली बारिश एकदम से थम गयी. एक अच्छे से होटल में कमरा बुक कर हम ऋषिकेश घूमने के लिए तैयार हो गए. सबसे पहले जम कर खाना खाया और फिर दुकानों में ताक-झांक की. रुद्राक्षों के बारे में कुछ जानकारी भी बटोरी गयी.
लक्ष्मण झूले से उफनाई हुई गंगा को देख मन सिहर ही उठा और वही पहला बचकाना ख्याल मन में आया ‘अगर कोई इसमें गिरा तो कतई नहीं बच सकता.’ जब बचपन में माता-पिता के साथ ऋषिकेश आयी थी तब सर्दियों की वजह से नदी थोड़ा शांत थी. आज देख कर लग रहा था पता नहीं कितना कुछ समेटे हुए आ रही हैं और कितना कुछ खुद में समा लेना चाहती है ये नदी. हम भी तो ऐसे ही है, सब कुछ होने के बावजूद हमेशा ही और ज्यादा पाने की चाह रखते हैं. कम में ही संतुष्टि जहां एक ओर मोक्ष का मार्ग बताया गया है वहीं कई यह भी मानते हैं कि संतुष्टि जीवन में गतिशीतलता की अवरोधक है. ख़ैर भांति-भांति के लोग और भांति-भांति के मत.
माँ गंगा को नमन कर, कुछ देर उसके बहाव में खो एक अलग सी शांति की अनुभूति महसूस की. फिर हुआ फोटो खींचने-खिंचाने का सिलसिला. सब कुछ निपटाकर हम गंगा आरती देखने परमार्थ निकेतन की ओर निकले. चूंकि हम पैदल ही निकले थे सो हमें पहुंचने में देर हो गयी और आरती समाप्त हो चुकी थी. कुछ बच्चे छोटी टोकरियों में माँ गंगा को अर्पित करने के लिए फूल और तेल में भीगी हुई बाती बेच रहे थे. हमने भी एक एक टोकरी ले खुद ही माँ गंगा की आरती करने की सोची. थोड़ी देर में नदी के दूसरी तरफ से माँ गंगा की भव्य आरती शुरू हुई जिसमें हम सम्मिलित तो नहीं हो सकते थे पर दूर से ही उसके दर्शन कर और आवाज़ सुन मन प्रफ़ुल्लित जरूर हुए. हमने भी साथ-साथ अपने दिये जलाकर माँ गंगा की आरती की.
पानी का वो आक्रामक बहाव एक ओर मन को विचलित कर रहा था तो वहीं दूसरी तरफ आरती के स्वर और घंटियों की ध्वनि मन को शांति प्रदान कर रही थी. मेरे जीवन का वह ऐसा पल था जिसे मैं कभी भूल नहीं पाऊँगी. वहीं घाट की सीढ़ियों पे बैठ खुद से थोड़ी बातें की और जीवन के उस सुन्दर पल का साक्षी होने के लिए ईश्वर को धन्यवाद किया.
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पर्वतारोहण की शौकीन ज्योति डौरबी मूल रूप से रानीखेत की रहने वाली हैं, हाल-फिलहाल बैंगलुरू में रहती हैं और मन पहाड़ों में बसता है.
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