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सेम मुखेम गांव के पहाड़ों की आवाज

टिहरी गढ़वाल प्रतापनगर तहसील के सेम मुखेम गांव की कहानी जो पलायन के चलते आधे से ज्यादा खाली हो गया है, और हो रहा है. अगर पहाड़ बोल पाते तो वो कुछ इस तरह बोलते :

इस बार फिर मंगशीर (नवंबर) आयेगा और मेरा दो साल का इंतजार खत्म होगा. पर हां इस मंगशीर आने के बाद मैं फिर तुम्हारे लिए पूरे दो साल के इंतजार में बैठ जाऊंगा. इंतजार का ये सिलसिला पहले न था, पिछले एक दशक में बना है. और मेरी लाचारी ये है कि मैं न तो तुमसे कोई शिकायत कर सकता हूं न ही तुम्हें अपनी पीड़ा बता सकता हूं. बताऊं भी तो तुम समझोगे नहीं मजबूरन मैं मूक खड़ा हूं.

ये मंगशीर आता हर बरस है पर जो दो साल पहले आया था तब तुमने मुझे इस तरह संवारा था. मैं बसंत सा दिखने लगा, भोर में पक्षियों की तरह चह-चहाने लगा. खुशी इतनी थी कि मैं सब कुछ भूल गया था. अगर उन खुशियों को कहीं समेट सकता तो जरूर समेटता. यूं तो मैं खुद से तुम्हारे लिए सजता, संवरता तो हूं, पर तुम मुड़ के कभी देखते नहीं.

तुम्हे याद है जब तुम पिछली बार आए थे तो मैंने तुम्हें कोदा की रोटी, भट्टु का साग, आलू का झोल, घर के दूध की चाय, छाछ, ठणोट (मक्खन) घोत की दाल और बहुत कुछ, सब घर का खिलाया-पिलाया था.

याद है जब तुम ढ़ोल-दमाऊ की अलग-अलग बाजु (धुन) पर नाचे थे. तब तुम्हें देख मैं भी जी-भर नाचा था. जब तुमने मुझे पिठंई (तिलक) लगाया था तो मैं भीतर से जी उठा था.

पता है जब तुम आये थे तब ऐसा लगा जैसे लाश में किसी ने जान फूंक दी हो. सब कुछ भरा-भरा लग रहा था.पर अब यहां खालीपन है और ये खालीपन मुझे भीतर ही भीतर खाये जाता है. तुम्हारे बिना यहां सब वीरान हो गया है.

सेम नागराजा की डोली . फोटो : जयेश मटियाल

सुनो. तुम मुझे भूले तो नहीं. तुम्हें मैं याद तो हूं न. मैं वही घर का खलिहान हूं जहां तुम खेला करते थे. मैं वही भित्तर (कमरा) हूं जहां तुम सुकून से सोया करते थे. मैं वही चूल्हा हूं जिस पर पकाया खाना तुम खाते थे और आग सेकते थे. मैं वहीं पन्यारा (पानी का कुंआ/धारा) हूं जहां तुम ठंड़ा पानी पीते थे. मैं वहीं मंदिर हूं जहां तुम रोज नतमस्तक होकर मुझे और मैं तुम्हें देखता था. मैं वही जंगल हूं, जहां तुम पशु चराने आते थे. मैं वही 11 गती (प्रविष्टा) मंगशीर, सेम नागराजा का मेला हूं जो तेसाली (त्रैवार्षिक) लगता है. हां वही मेला जिस दिन तुम खुद को और मुझे सजाते हो, संवारते हो, जिस दिन तुम मुझे बंद कमरे से बाहर लाकर, सेम के जंगल में मेरे चांदी के ढ़ोल-दमाऊ के साथ मेरे मंदिर का भ्रमण करवाते हो, मेरे निशाण और डोली को फूल-चुन्नियों से सजाते हो.

सेम नागराजा (कृष्ण) का निशाण. फोटो : जयेश मटियाल

मुझे भरोसा है तुम इस बार आवोगे. बताओ, अब की बार तो आवोगे न…

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यह लेख हमें जयेश मटियाल ने काफल ट्री की ईमेल आईडी पर भेजा है. जयेश मूलतः टिहरी गढ़वाल से हैं. वर्तमान में हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय में मीडिया एवं जनसंचार के विद्यार्थी हैं.

फिर आयेगा धुन्नी

पहाड़ के चेहरे: कमल जोशी के फोटो

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Girish Lohani

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  • यहां सवाल मात्र पलायन का नहीं है बल्कि उससे कहीं अधिक हमारे अस्तित्व का है, हमारी पहचान का है!
    डर है, कहीं हमें वो दिन न देखना पड़े, जब भावी पीढ़ी को हमारे पास बताने को सिर्फ गांव का नाम होगा और कुछ नहीं!

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