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आखिर बाबू को आश्रय देने वाले लोग कैसे रहे होंगे

पिताजी सन् 1949 में लखनऊ आ गए थे. उन्होंने ने ही बताया था कि घर से ( गराऊँ, बेरीनाग ) बड़बाज्यू अलमोड़ा तक पैदल छोड़ने आए थे. उन दिनों अलमोड़ा से आगे मोटर रोड नहीं थी. हमारे यहाँ के लिए पैदल रास्ता तथा घोड़ी सड़क भी थी. सामान के नाम पर पिताजी के पास एक झोले में चार कपड़े, खाने की चीजों के साथ कुछ और जरुरत की चीजें ही थी बस.

अलमोड़ा से के०एम०ओ की बस से हल्द्वानी और फिर रेल से लखनऊ पहुंचे थे. रेल के सामान्य श्रेणी का किराया चार रुपये छह आना था शायद. के०एम०ओ की बस का किराया भी बाबू ने बताया था जो मुझे बिलकुल भी याद नहीं है. यह ट्रेन बंद होने तक ( छोटी लाइन के बड़ी लाइन में परिवर्तित होने ) नैनीताल एक्सप्रेस के नाम से जानी जाती रही. कुछ लोग जिम कार्बेट एक्सप्रेस भी कहते थे. इससे पहाड़ वासियों का भावनात्मक सम्बन्ध रहा है. रेल देखते ही नराई और निस्वास साथ-साथ लगता.

आज हावड़ा से वाया लखनऊ बाघ एक्सप्रेस काठगोदाम तक जाती है लेकिन उसमें वो बात नहीं है. लखनऊ में हमारे गाँव के साथ पड़ोस गाँव के कई लोग सरकारी नौकरियों में थे जिनमें कुछ सचिवालय में अपर डिवीजन क्लर्क तो कुछ अन्य विभागों में अधिकारी तथा चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी भी थे.

बाबू बताते थे कि उन्हें रेवेन्यू बोर्ड के प्रयाग दादा स्टेशन लेने आये थे. उन्हीं के सरकारी क्वार्टर में प्रतक्रिया से निवृत्त होकर पड़ोस गाँव के गोविन्द बल्लभ पंत जी के यहाँ गए तो वे उन्हें साथ ही रेवेन्यू बोर्ड ले गये. दफ्तर में जाफरी साहब से कुछ बातें हुयी तो उन्होंने तुरन्त ही काम पर लगा दिया. बाबू इंटर फर्स्ट डिवीजन थे, अंग्रेजी का अच्छा ज्ञान भी था तो उन्हें क्लर्क की नौकरी मिली और वे जल्द ही सचिव के सम्पर्क में आ गए. उस दिन जाफरी साहब ने चाय पिलाई और बिस्कुट भी खिलाये थे. सायं बाबू गोविन्द बल्लभ जी के घर ही रहे. प्रयाग दादा ने उनका सामान पहुँचा दिया था.

हमारे पड़ोस गाँव के प्रयाग दादा उम्र में पिताजी से बड़े ही होंगे लेकिन हम सब उन्हें दादा ही कहते. यह बात मुझे इंटर पास करने के बाद ही कुछ-कुछ समझ आयी. वे हमारे पारिवारिक मित्र के साथ ही सुख-दुख के साथी भी थे. उनका परिवार गाँव में ही रहता था लिहाजा साल में चार चक्कर घर के जरुर लगाते. आते समय आमा की पुन्तुरी वे जरुर लाते जिसमें भट, गौहत, चूक के साथ बाबू के प्रिय सिरौले ( विशेष चावलों की लय्या ) होते.

बाबू भी लखनऊ से रेवड़ी, गजक के साथ कुछ पैसे आमा के लिए सदैव भेजते. इतना मुझे पक्का याद है. कई बार वे मुझे गर्मी की छुट्टियों में साथ ले जाते और लौटते समय मैं किसी के साथ भी आ जाता. उनका गाँव जगथली, बेरीनाग से पहले चौकोड़ी के नीचे पड़ता लिहाजा मैं पहले उनके ही घर जाता. नहाने, खाने के बाद उनके भाई या पूजा- पाठ करने गाँव से आया कोई भी मुझे आमा तक पहुँचाता.

1968 में पहली बार मैंने चौकोड़ी से सूर्योदय के साथ हिमालय, त्रिशूल, पंचाचूली आदि शिखरों के जीवंत दर्शन किए थे. फिर वैसा हिमालय में आज तक कभी नहीं देख पाया.

शुरुआती दौर में सभी की समान्य व्यवस्था डेरे ही थी लखनऊ में. किसी को सरकारी क्वार्टर मिल जाये बात दूसरी होती. फिर भी रहने की विशेष परेशानी न होने बावजूद पिताजी ने प्रयाग दादा से व्यवस्था करने की बात कही थी और यह भी सभंव है कि चलते समय बड़बाज्यू ने उन्हें ऐसा ही समझाया भी हो लेकिन वे बताते थे कि पड़ोस गाँव के एक हर सिंह जी का पता देकर बड़बाज्यू ने कहा था – “कहीं ढंग की नौकरी न मिले या किसी भी प्रकार की परेशानी हो तो किसी और से कहने से अच्छा हरसींग के पास जाना. वह अच्छा आदमी है, जरुर मदद करेगा. बखत पर हमने खूब मदद की ठैरी उसके परवार की.”

बाबू संकोची स्वभाव के थे और उनके कारण किसी को कोई परेशानी हो उन्हें बर्दाश्त न था. प्रयाग दादा दूसरे ही दिन हर सिंह जी के यहाँ ले गये. अमीनाबाद क्षेत्र के नयाँ गाँव मोहल्ले में उनकी बिस्कुट फैक्ट्री होती थी जिसमें तीस के लगभग लोग काम करते थे. बड़ा सफल कारोबार था उनका. परिचय होते ही उन्होंने बड़ी आत्मीयता से कहा “अरे तमि त गुरु महाराज भया हो. याँ यसी व्यवस्था भै, तमि कती ले लै रै जावौ” (अरे, आप तो गुरु महाराज हैं. यहाँ एसी ही व्यवस्था है, आप कहीं भी रह जाओ)

परदेश में इतना ही बहुत था. दूसरे ही दिन प्रयाग दादा ने झोला झंटी नयाँ गाँव हर सिह जी के यहाँ पहुँचा दी. पिताजी बताते थे कि लखनऊ में मेरी शुरुआत कुछ ऐसे ही हुई थी. बाद में तो उन्होंने कानपुर यूनिवर्सिटी से प्राइवेट बीए, एमए किया. राज्य वेतन आयोग व अर्ध सरकारी निगमों व विभागों में महत्वपूर्ण पदों पर डेपुटेशन में रहे तथा जनवरी 1990 में रेवेन्यू बोर्ड से सहायक सचिव / रजिस्ट्रार पद, संयुक्त सचिव स्तर से सेवानिवृत्त हुए.

हर सिंह जी के यहाँ सभी सुविधाओं के साथ पिताजी को खाने-पीने का भी आराम था. इन सबके ऐवज में वे एक पैसा लेना भी पाप समझते थे. चूँकि बाबू सदैव से खुद्दार रहे और यह सब उनके सिद्धांतों के विपरीत था. अतः आफिस से आने के बाद वे फैक्ट्री का हिसाब-किताब देखने लगे. हर सिंह भी खुश थे कि अपने भरोसे का एक अपना आदमी, वह भी ब्राह्मण, सौभाग्य से आ गया है. चूँकि वे अधिक पढ़े लिखे नहीं थे और ऊपर से सच्चे, सरल और सहृदय इंसान बिलकुल पहाड़ जैसे. लिहाजा कर्मचारी व अन्य काराबोरी लेन देन में गड़बड़ी करते.

बाबू बताते थे कि उनके रिस्तेदारों ने खूब चूना लगाया. कभी वे कहते तो हर सिंह जी का उत्तर होता – “क्या पंडिज्यू तमि ले लागि रौछा ! खाँण दियौ, कतु खा्ल. ” (क्या पंडित जी, आप भी लगे हो, कितना खाएंगे. )

परिणाम यह हुआ कि फैक्ट्री धीरे-धीरे घाटे पर आयी और अंततः बंद हो गयी. तब तक बाबू भी हुसैनगंज थाने के सामने किराये के एक दो मंजिले मकान में शिफ्ट हो गये थे जहाँ हम लोग तीस वर्ष रहे थे. फिर 1980 में अपने मकान इन्दिरा नगर ही आए. पिताजी छह-सात माह हर सिंह जी के यहाँ रहे होंगे लेकिन बताते थे कि काफी समय तक उनसे सम्पर्क बना रहा था. उनका मकान कब बिका, लेनदारी का क्या हुआ, यह सब तो वे कुछ नहीं बताते लेकिन इतना जरुर कहते कि हर सिंह के साथ आये पंजाबी लोग जो उन दिनों सर पर मटकी रखकर कुल्फी बेचते थे आज उनके अमीनाबाद में शो रुम और बड़े-बड़े प्रतिष्ठान हैं!

आप भी सोचते होंगे कि इस कथा में आँखिर कथा है क्या? यहाँ तक तो ऐसा कुछ भी उल्लेखनीय नहीं लेकिन अपनी बात कहने से पहले मेरे लिए यह सब बताना भी जरुरी हो गया था. बात यों है कि करीब छह माह पूर्व आफिस जाते समय एक आटो चालक ने कुछ यों कहा – “मैं बहुत दिनों से देख रहा था. आप गुर जी के लड़के हैं? शक्ल मिलती है. कलोनी सुरक्षा गेट से ही निकलते थे. बहुत दिनों से देखा नहीं उन्हें. मैं हर सिंह का लड़का हूँ.”

इसके बाद मैंने ही उसके घर की बहुत सारी बातों के साथ बताया कि बाबू आपके यहाँ रहे हैं. मेरे साथ उसके मन मस्तिष्क में भी रील चल रही थी. सब समय की बात है. उस जमाने में बिस्कुट फैक्ट्री मालिक को आज इस हालत में देख मैं भीतर तक भीजता रहा. उनका अपना आटो कारबार है लेकिन वो बात कहाँ. वे बोलते भी क्या? आटो जो चला रहे थे. वैसे अब वे मेरे लिए आटोचालक कहाँ रह गये थे! फैक्ट्री चौपट होने का मलाल उन्हें आज भी था.

सोचता हूँ, उनके बेटे ही कभी घर आते तो कैसा होता. मैं भी तो देखता कि आखिर पिताजी को आश्रय देने वाले लोग कैसे रहे होंगे.

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यह लेख हमें लखनऊ में रहने वाले ज्ञान पन्त ने फेसबुक पर भेजा है. मूलतः पिथौरागढ़ से ताल्लुक रखने वाले ज्ञान पन्त काफल ट्री के नियमित पाठक हैं और समय समय पर अपनी अमूल्य टिप्पणी काफल ट्री को भेजते रहते हैं. हमें आशा है कि उनकी रचनाएं हम नियमित छाप सकेंगे.

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Girish Lohani

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