कहो देबी, कथा कहो – 31
पिछले कड़ी कहो देबी, कथा कहो –30
जानता था, इस शहर में रहना है तो इसकी धड़कनों को सुनना होगा, तभी यह मुझे गले लगाएगा. दो-चार दिन दीप होटल में बिताने के बाद हजरतगंज के चौधरी लॉज में आ गया था और फिर ऐन महानगर के ऐन वायरलैस चैराहे पर किदवई साहब की कोठी में आशियाना मिल गया. परिवार के साथ वहां रहने लगा. तहजीब सीखने और शहर लखनऊ को समझने की इससे बेहतर जगह क्या हो सकती थी? मिसेज किदवई अच्छी मम्मी कहलाती थीं लिहाजा मेरे बच्चे भी उन्हें अच्छी मम्मी कहने लगे. किदवई साहब एक्साइज कमिश्नर के ओहदे से रिटायर हुए थे और पांचों दफा नमाज पढ़ते थे. तीन बेटे थे और एक बेटी. दोनों बेटे विदेश में और बेटी राना बंगलौर में रहती थी. वे सभी कभी-कभार आते रहते थे. हमारे परिवार को किदवई साहब के परिवार का भरपूर प्यार मिला. बेटी राना की तीन बेटियां थीं- अदीबा, नूर और हूर. नूर और हूर जुड़वां बहिनें थीं और जब भी आतीं, हमारी बेटियों से मिलने जरूर आतीं. मेरी बेटी वाणी के साथ उनकी गहरी दोस्ती थी और एक बार वे उसे ईद मिलन पर मलिहाबाद भी ले गई थीं. तीनों ईदी लेकर लौटी थीं.
बुजुर्ग किदवई साहब बेगम साहिबा के साथ कई बार हज के लिए जा चुके थे. हमारी मौजूदगी में भी वे एक बार हज करने गए. लौटे तो छोटी बेटी मानसी और बेटे मनु के लिए सुंदर कपड़े लेकर आए थे. ‘रामायण’ सीरियल किदवई साहब हमारे घर पर देखते थे और कहा करते थे कि सभी धर्मों में यही समझाया जाता है कि बुराई पर सच्चाई की विजय होती है. तब मैं मांसाहारी था, बल्कि जुनून की हद तक मांसाहारी था. किदवई साहब को यह पता था. ईद-उल-जुमा के मौके पर उन्होंने एक बार कुर्बानी के बकरे की पूरी रान इस हिदायत के साथ सेवक जैकउल्लाह के हाथ हमें भिजवा दी कि मेवाड़ी साहब को देकर आओ, उन्हें गोश्त बहुत पसंद है. तब उन्होंने एक बकरे की कुर्बानी दी थी लेकिन एक साल जब परिवार के हर सदस्य की ओर से छह बकरों की कुर्बानी दी तो छह दिन तक गोश्त भिजवाते रहे. वे उसे प्रसाद की तरह भिजवाते थे.
मैं आफिस से सदा देर शाम या रात में आया करता था. एक बार न जाने क्या हुआ कि शाम पांच बजे ऑफिस से निकल आया. घर के पास रोड पर पहुंचा ही था कि सामने आम के पेड़ के नीचे बुजुर्ग किदवई साहब को सड़क पार करने की कोशिश करते हुए देखा. तभी एक युवती के स्कूटर से वे टकरा गए और औंधे मुंह रोड पर गिर पड़े. मैंने अपनी मोटर साइकिल किनारे पर रोकी और उन्हें उठाया. आवाज़ देकर मिसेज किदवई को बुलाया और रिक्शे में अपनी गोद में किदवई साहब को लिटा कर फातिमा हास्पिटल ले गए. वहां बताया गया कि यह तो एक्सीडेंट केस है, पहले पुलिस को सूचना दें.
हमें तुरंत उपचार कराना था, इसलिए रिक्शा लेकर निशातगंज बाज़ार में प्राइवेट डाक्टर के पास भागे. उसने तुरंत चैकअप किया और बताया कि खतरे की कोई बात नहीं है. कालर बोन भीतर को मुड़ गई है. रिंग्स पहना कर दवा दे देता हूं. दो-चार दिन में ठीक हो जाएंगे. मुझे लगा, पांचों दफा की नमाज ने उन्हें बचा लिया है. इबादत की उस कसरत ने उनके शरीर को इतना लचीला बना दिया था कि कालरबोन भी लचक गई मगर फ्रैक्चर नहीं हुआ. लौटते समय मैंने कहा, “देखिए आज मैं भी न जाने कैसे इतनी जल्दी आकर ठीक मौके पर पहुंच गया.”
किदवई साहब बोले, “मुझे बचाने के लिए आज खुदा ने सही समय पर आपको भेज दिया.”
कुछ दिन रिंग्स पहनने और दवाइयां खाने के बाद किदवई साहब ठीक हो गए. वे अपनी कोठी के भीतर लंबे-चौड़े आंगन में नमाज़ पढ़ते और तय समय पर खाना खाते दिखाई देते. गर्मियों में खाने से पहले आंगन में ईंटों के फर्श पर पानी का छिड़काव किया जाता. फिर आंगन के बीच में दस्तरख्वान बिछाया जाता. उसमें बड़े सलीके से खाना परोसा जाता. वे सब्जी, रोटी और गोश्त रोज खाते थे लेकिन तय मिकदार में. गोश्त की बमुश्किल दो-तीन बोटियां ही खाते थे. एक बार उनका फ्रिज खराब हो गया था तो गोश्त की बोटियों के छोटे-छोटे पैकेट बना कर वे हमारे फ्रिज में रख गए. खानासामा रोज आता और एक-एक पैकेट ले जाता. ईद के मुकद्दस मौके पर वे कई तरह की स्वादिष्ट सेवइयां खिलाते. होली-दीवाली पर मिलने हमारे घर पर आ जाते थे. तब हम उन्हें गुझिया और आलू के गुटके खिलाते.
मिसेज किदवई अपने हाथ से बहुत खूबसूरत जयपुरिया रजाइयां बनाती थीं. खोल में रूई की पतली परत बिछा कर ताग देकर सिलतीं. उस पर खूबसूरत डिजाइन बनातीं, गोटा और झालर लगातीं. बेटियों की शादी के मौके पर पास-पड़ोस की कई परिचित महिलाओं के लिए वे ऐसी रजाइयां बनाती थीं. मेरी पत्नी लक्ष्मी से भी वे कहा करती थीं कि आप लोग अगर यहीं रहे तो आपकी बेटियों की शादी के मौके पर मैं उनके लिए रजाइयां बनाऊंगी.
किदवई साहब और उनकी बेगम साहिबा अपने सेवकों के भविष्य के बारे में भी सोचा करते थे. खानसामा अताउल्लाह के लिए उन्होंने अपनी चहारदीवारी के साथ एक बार्बर शॉप खुलवा दी थी. अताउल्लाह वहां हेयर कटिंग करने लगा. एक दिन वह सुबह-सवेरे आया और लड्डू का पैकेट थमा कर बोला, “लीजिए, साब मुंह मीठा कीजिए.”
“अरे वाह, क्या खुशखबरी है अताउल्लाह?”
“आपके भतीजे का एडमिशन हो गया है स्कूल में,” उसने खुशी जताते हुए कहा.
लेकिन, मैं चक्कर में. मेरे भतीजे के बारे में इसे क्या मालूम? वह लौट गया तो मैंने लक्ष्मी से कहा, “अताउल्लाह लड्डू दे गया है. कह रहा था, आपके भतीजे का एडमिशन हो गया है.”
लक्ष्मी ने हंस कर कहा, “वह अपने बेटे सनाउल्लाह की बात कर रहा होगा. लखनऊ के अंदाज में आपको बता गया.” हालांकि, यह अंदाज आम था लेकिन उस समय मैं एकायक नहीं समझ पाया था.
फिर लखनऊ के अदब का अंदाज धीरे-धीरे समझ में आने लगा. पहले मैंने सलीके से हाथ उठा कर आदाब करना सीखा और तहज़ीब की बाकी चीजों पर गौर करने लगा. एक दिन, देर शाम दरवाजे की घंटी बजी तो देखा एक लड़का हाथ में बड़ा-सा टिफिन लेकर खड़ा है. ताज़्जुब से उसे देखा तो वह बोला, “डाक्टर साब ने बिरयानी भेजी है आपके लिए.”
मैंने पूछा, “डाक्टर साहब ने?”
“हां, डॉ. खान ने निशातगंज से,” उसने कहा और चला गया. वह लड़का उनका कंपाउंडर था. टिफिन खोला तो देखा डिब्बे बिरयानी से भरे हैं और ओह, वह खुशबू! वह खुशबू हवा में फैल कर मुंह में पानी भर रही थी. बहुत स्वादिष्ट और जायकेदार थी वह बिरयानी. लेकिन, डॉक्टर खान कौन?
लखनवी बिरयानी
निशातगंज बाजार में उनका दवाखाना था जिसके बाहर एक बड़ा ब्लैक एंड ह्वाइट बोर्ड लगा था- ‘डाक्टर खान का दवाखाना.’ दवाखाना डॉ. एम. डब्लू. खान का था. हुआ यह कि एक बार दोनों छोटे बच्चों, मनु और मानसी की तबियत खराब हो गई. एक बाल विशेषज्ञ के पास गए जिसने अच्छी-खासी फीस लेकर जांच कर दवाइयां लिख दीं. लेकिन, दो-चार दिन हो गए, तबियत में सुधार नहीं हुआ. शुरू से ही हम यह मानते रहे हैं कि यदि संतुलित आहार लिया जाए और साफ-सफाई पर ध्यान दिया जाए तो बीमारी अक्सर पास नहीं फटकती. लेकिन, बच्चों की तबियत नहीं सुधरी तो फिक्र हुई. पड़ोसी मिसेज ढौंढियाल ने एक बार मेरी बेटी का पैर तार से कट जाने के कारण टिटनेस का इंजैक्शन और टांके लगाने के लिए डॉक्टर खान के दवाखाने के बारे में बताया था. तब उनसे पहली बार मुलाकात हुई थी. वे हमें अच्छे लगे और उन्हें हम. इसलिए बच्चों को लेकर हम उनके पास पहुंचे. उन्होंने बच्चों की जांच की, कुछ गोलियां पीस कर पुड़ियां बना दीं और यह हिदायत दे दी कि दवा कब-कब खिलानी है. उनसे खूब बातें करके हम लौट आए. हमें ताज्जुब हुआ, जब देखा की एक-एक डोज दवा खिलाने के बाद ही बच्चों की तबियत में सुधार शुरू हो गया. तो, इस तरह डॉक्टर खान से खासी पहचान हो गई. उनसे यहां-वहां तमाम बातें होती रहती थीं जिसके कारण उन्हें मेरे बिरयानी के शौक का भी पता लग गया.
हम पर भी उनकी ही दवाइयां असर करती थीं. एक बार पत्नी लक्ष्मी को बुरी तरह उल्टियां होने लगीं. इतनी कि वे उल्टियां करते-करते बेहोश होने लगीं. मैं बदहवाश होकर डॉ. खान के पास भागा. उन्होंने तुरंत दवा की पुड़ियां बनाईं और दवा खिलाने को कहा. वही किया और धीरे-धीरे पत्नी की हालत सुधरती चली गई. खुद मुझे एक बार पेचिस हो गई थी जो किसी तरह ठीक नहीं हो रही थी. लक्ष्मी डॉक्टर खान से दवा लाती रही और पेचिस रूक गई. उस दौरान सप्ताह भर घर में रहना पड़ा. उसका लाभ यह हुआ कि कभी-कभार जो एकाध सिगरेट पी लेता था, वह छूट गई. वह दिन है कि आज का दिन, सिगरेट को फिर हाथ नहीं लगाया. तो, इस तरह डॉक्टर खान के साथ रिश्ता कुछ ऐसा जुड़ा कि मरीज के इलाज के साथ-साथ वे उसे कभी-कभी शानदार लखनवी बिरयानी भी खिलाने लगे! होली के मौके पर हम भी उन्हें गुझियां खिलाया करते थे. अब लगता है, यह तो बस लखनऊ में ही हो सकता था.
भूतल पर हमारे पड़ोसी थे कैप्टन एल.डी. ढौंढियाल. तब वे एच.ए.एल. में मुख्य सुरक्षा अधिकारी थे. होली आती और कैप्टन साहब के यहां रंग खेलने के साथ-साथ रसरंजन की भी महफिल जमती. वहीं रंगे-भीगे कैप्टन सनवाल और डॉक्टर बहुगुणा से भी मुलाकात हो जाती. हम भी शुद्ध मावे की गुझियां, चटपटे आलू के गुटके और राई पड़ा तीखा रायता बनाने का अपना हुनर आजमाते. कैप्टन ढौंढियाल को गुटके बहुत पसंद थे. उनके पास एक बड़ा डालमेशियन कुत्ता था- ब्रूट, जो प्रायः घर की चहारदीवारी के अंदर ही रहता था. बाहर की चीजों को कम पहचानता था. एक दिन वह दुर्रंटा की बाड़ के एक छेद से बाहर देख कर डरता हुआ, दबे पांव पीछे हट रहा था. हमने छत से झांका कि आखिर वह डर किससे रहा है? वहां देखा तो एक बकरी चर रही थी! लेकिन, अपने घर पर वह शेर हो जाता था. कैप्टन साहब हमें बुलाते तो पहले पुचकार कर ब्रूट को शांत करते. मैं सोफे पर बैठता तो मेरी बगल में वह उकडूं बैठ जाता और ध्यान से हमारी बातें सुनता. कई बार बातें सुनते हुए उसका मुंह मेरे चेहरे के इतना करीब आ जाता कि मैं उसकी सांसें महसूस कर सकता था. बच्चों से डालमेशियन कुत्तों को सहज प्यार होता है. एक दिन वह लक्ष्मी की गोद में बेटे मनु पर भी ऐसा प्यार लुटाने लगा कि नाखूनों से लक्ष्मी की साड़ी कई जगह फट गई.
लेकिन, एक बार एक नेतानुमा, सफेद कुर्ता-पैजामा धारी मेरे परिचित तो उससे इतना डर गए कि उनका उस ओर आना ही बंद हो गया. हुआ यह कि घर का गेट खुला होगा. परिचित जीने की सीढ़ियां चढ़ कर ऊपर आए और दरवाजे पर लगी घंटी बजाई. तभी उन्हें लगा जैसे किसी ने उनके दोनों कंधे जकड़ लिए हैं. चेहरा घुमा कर जो देखा तो गाल पर ब्रूट की नम नाक छू गई. तभी उसने अपना मुंह उनके दाहिने कंधे पर टिका दिया.
मैंने भीतर से पूछा, “कौन?”
उनकी डरी, घिघियाती और कांपती हुई आवाज आई, “दाज्यू मैं हूं. दरवाजा खोलो. मेरी पीठ पर कुत्ता चढ़ा हुआ है.”
मैंने हैरान होकर दरवाजा खोला तो उनके कंधे पर ब्रूट का लंबा मुंह दिखाई दिया. दरवाजा खुला देख कर उसने भीतर को छलांग लगाई. नाखून लंबे होने के कारण वह सीमेंट के फर्श पर खस-खस खिसकता हुआ भीतर कमरे की ओर गया तो लक्ष्मी डर कर पीछे हटी. तभी उसे बाहर चौड़ी छत नजर आ गई और वह वहां जाकर चारों ओर का जायजा लेने लगा. फिर जीने से नीचे उतर कर अपने घर में चला गया. परिचित की सांस में सांस आई. पानी पिया, चाय पी, थोड़ी देर बातें कीं और चले गए. ब्रूट के डर से वे दुबारा नहीं आए.
लखनऊ का लज़ीज़ खाना-खजाना खोजते-खोजते मैं शहर के कई ठिकानों पर पहुंचा. शुरू में जब परिवार आने से पहले चार माह तक अकेले रहना पड़ा तो दिन में हज़रतगंज में नवल किशोर रोड के नुक्कड़ पर या फिर साहू सिनेमा के सामने खुले में कबाब, शोरबे और हरी चटनी के साथ लखनऊ की बिरयानी का लुत्फ़ उठाया. उन्हीं दिनों प्रेस क्लब के पीछे की गली में सखावत के ‘मुंह में रखते ही घुल जाने वाले’ लज़ीज़ कबाबों की खोज की. एक बार वहां लंच टाइम में गया था तो बगल की मेज पर बैठे सज्जन से परिचय हुआ. मैंने पूछा, “कबाब खाने आए होंगे?”
बोले, “एक अरसे से यहीं लंच करता हूं, कभी कबाब-बिरयानी तो कभी रोगनजोश-रूमाली. घर से लंच नहीं लाता.” वे स्टेट बैंक में काम करते थे.
मैं देखता था, लंबी, घनी और सफेद दाढ़ी वाले एक बड़े बुजुर्ग मियां सीमेंट के ऊंचे चबूतरे पर बैठ कर सामने रखे परात में से मसाला लगा कीमा उठा कर उसकी पीठी बनाते और फिर दाहिने हाथ के अंगूठे से उसमें गड्ढ़ा बना कर, बारीक कतरा हुआ प्याज वगैरह भरते. फिर उसे हथेली में सहलाते हुए, दबा कर प्यार से तपते तवे पर रख देते. बहुत मन से उसे सेकते, उलटते-पुलटते और कबाब भूरा, करारा हो जाने पर प्लेट में परोसते. तब एक लड़का उसे ग्राहक को पेश करता. कोई नया ग्राहक जल्दबाजी दिखाता तो बड़े मियां ‘खुदा के नूर’ पर हाथ फिराते हुए कहते, “हुजूर सब्र रखिए. कबाब सिक रहे हैं. इतना वक्त तो लगेगा ही.” शाम के समय उस पुराने, धुएं से काले पड़े छोटे-से रेस्टोरेंट के आसपास कारों की कतार लग जाती. लोग घर या पार्टी के लिए सखावत के कबाब खरीद रहे होते.
और, लालबाग में वे टुंडे के स्वादिष्ट कबाब और चाप! कैसरबाग में वर्मा का हांडी-मुर्ग जिसके लिए वर्मा कहा करते थे कि पूरे स्वाद के लिए उसे वहीं बैठ कर, आंच के उसी ताप पर खाया जाए. और, चारबाग में महाराजा होटल का वह काली मिर्च मुर्गा. एक बार मित्र डॉ. डी. के. पनेरू को ट्रेन से वापस जाना था. उससे पहले काली मिर्च मुर्गे का स्वाद चखने के लिए हम महाराजा होटल में गए. बैठे ही थे कि बेयरे ने आकर पूछा, “दो हाफ लगाऊं?”
पनेरू जी ने कहा, “जरा मालिक को बुलाओ.”
मालिक के आने पर वे उससे बोले, “लड़का पूछ रहा है, दो हाफ लगाऊं? यह हमारी बेइज्जती है. हम ऐसे-वैसे कस्टमर नहीं हैं. चौगढ़ पट्टी के रहने वाले हैं. फुल मुर्गे से खाना शुरू करते हैं और बाद में फुल ही पूछना पड़ता है.”
मालिक मुस्कराया और लड़के से दो फुल काली मिर्च मुर्ग लगाने को कहा.
सौ-सवा सौ साल से भी पुराने चौक के मशहूर रहीम होटल के दोस्त जुबैर अहमद को कैसे भूल सकता हूं? महानगर में जहां मैं रहता था, उसके पास ही मार्केट में रहीम होटल की शाखा क्या खुली कि मेरे लिए मुगलई खाने का खज़ाना खुल गया. वहां शाम के वक्त लॉन में मेज-कुर्सियां सज जातीं. देगों और पतीलों में खाना सजा रहता और रहीम होटल से आए जुबैर अहमद खिदमत के लिए तैयार हो जाते. उनसे बातें करते-करते उन्हें पता लग गया कि मैं अलग-अलग तरीके से बने गोश्त का कितना शौकीन हूं. लिहाजा वे रोजाना मेरे लिए एक से एक नायाब डिश बना कर लाते. कभी कोरमा, रोगनजोश तो कभी कुलचे, निहारी, कभी स्ट्यू और बिरयानी.
रहीम होटल के कुलचे, निहारी
पूछने पर बताते, “निहारी के लिए गोश्त खास हिस्से का लिया जाता है, जैसे बोंग, अगली दस्त और करेली. स्ट्यू को वे बोन मैरो या मगज़ के साथ परोसते. साथ में निहारी या रूमाली. रहीम होटल का गोश्त मुलायम होता और मुंह में घुल जाता था.
जुबैर बताते थे कि रहीम होटल उनके दादा के नाम पर है. उनके खाने की खासियत हैं उनके मसाले. वे उबलते तेल और घी में लहसुन, अदरक, प्याज, हल्दी और लाल मिर्च का पेस्ट भूनते हैं और फिर उसमें गोश्त को तब तक चलाते रहते हैं तब तक कि गोश्त की बोटियां तेल और घी न छोड़ने लगें. उनके यहां बनी निहारी में धनिया, सफेद जीरा, लौंग, इलायची, नारियल चूरा और चंदन चूरा खास मिकदार में डाला जाता है. वही फार्मूला है जो उनके खाने को खास बनाता है और सौ-सवा सौ साल से तमाम ग्राहकों की जुबां पर चढ़ चुका है.
यह सब कुछ बताते-बताते जुबैर भाई ने एक दिन मुझे ‘नार्दर्न इंडिया पत्रिका’ की संडे मैगज़ीन का एक पूरा पेज, बल्कि सवा पेज दिखाया जिसमें रहीम होटल के खाने के सफर का ज़िक्र था, उसके लज़ीज़ खाने के बाबत लिखा गया था.
“मतलब लखनऊ में तो आपके खाने के मजे आ गए?”
“हां, जब भी दो घड़ी चैन से खाने का मौका मिल गया. नौकरी के काम में भाग-दौड़ इतनी थी कि चैन से खाने का मौका कम ही मिलता था. और हां, तब हमने घर में लखनऊ के उसी स्वाद और खुशबू की बिरयानी बनाने की कोशिश शुरू कर दी थी. लक्ष्मी बनाती और मैं चख कर बताता. एक दिन हम उसी खूशबू और स्वाद वाली बिरयानी बनाने में सफल हो गए. लेकिन दोस्त, खाना ही तो मकसद नहीं था, वहां लिखने-पढ़ने की दुनिया में भी तो जगह बनानी थी. वह कैसे बनाई, सुनोगे?”
“ओं, जरूर”
(जारी है)
वरिष्ठ लेखक देवेन्द्र मेवाड़ी के संस्मरण और यात्रा वृत्तान्त आप काफल ट्री पर लगातार पढ़ते रहे हैं. पहाड़ पर बिताए अपने बचपन को उन्होंने अपनी चर्चित किताब ‘मेरी यादों का पहाड़’ में बेहतरीन शैली में पिरोया है. ‘मेरी यादों का पहाड़’ से आगे की कथा उन्होंने विशेष रूप से काफल ट्री के पाठकों के लिए लिखना शुरू किया है.
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