लेखक के पिता स्व. श्री किशन सिंह मेवाड़ी
कहो देबी, कथा कहो – 25
पिछली कड़ी:कहो देबी, कथा कहो – 24, पंतनगर में दुष्यंत कुमार और वीरेन डंगवाल
पंतनगर आने का फायदा यह हुआ कि अब गांव से पिताजी भी वहां आ सकते थे. असल में उन्हें चलती हुई बस या ट्रक में चक्कर आ जाता था. इसलिए बस से यहां-वहां आने-जाने में उन्हें बहुत परेशानी होती थी. सिर चकराने लगता और लगातार उल्टियां होने लगतीं. बस, ट्रक ही क्या, किसी भी घूमती हुई चीज को देख कर उन्हें चक्कर आने लगता. गेहूं की दांय मांड़ने में भी वे बैलों के साथ ज्यादा देर तक गोलाई में नहीं घूम सकते थे.
लेकिन, पंतनगर हल्द्वानी से बहुत दूर नहीं था. हल्द्वानी तक पैदल आकर वे तीस-पैंतीस किलोमीटर दूर पंतनगर के पास तक बस में बैठ कर जाने की हिम्मत कर सकते थे. उन्होंने यही किया और नवंबर 1970 में वे गांव से पहली बार पंतनगर आए.
उनका प्रथम आगमन बहुत ही नाटकीय ढंग से हुआ. पंतनगर के पास नगला स्टेशन तक बस से आकर वे वहां उतर गए और खुली हवा में गहरी सांस लेकर पंतनगर विश्वविद्यालय की ओर दो-तीन किलोमीटर पैदल चल पड़े. विश्वविद्यालय कितना बड़ा होता है, इसका उन्हें कोई अंदाजा नहीं था और न हमें कोई पत्र लिखा था कि वे कब आएंगे. राह चलते, यह पूछते-पाछते आगे बढ़ते रहे कि यहां मेरा बेटा काम करता है, उसका नाम देवेंद्र मेवाड़ी है. उसका आफिस कहां होगा? वे मेरे आफिस में आना चाह रहे थे.
नगला में मेरे साले साहब पान सिंह की बेकरी थी. वे जगत ‘पनदा’ कहलाते थे और सभी छात्रावासों में बेकरी का सामान भेजते थे. रिक्शे में नगला की ओर आते पनदा ने पिताजी को पहचान लिया. देख कर वे चौंके- पिताजी के बदन पर एक पुरानी कमीज और घुटनों तक वैसी ही धोती. कंधे में झोला. रुक कर प्रणाम करके पूछा, “किलै सौरज्यू, यां कसिक?” (क्यों ससुर जी, यहां कैसे).
“देबी से मिलने उसके ऑफिस जा रहा हूं. अच्छा हुआ जमाई तुम मिल गए. तुम्हें पता ही होगा उसका ऑफिस?”
“वह तो पता है, लेकिन ऑफिस क्यों, घर चलिए. उनके क्वार्टर का पता है मुझे. बैठिए रिक्शे में.”
“नैं-नैं रिक्शे में सिर घूमता है मेरा. पैदल ही चलते हैं.”
शाम को घर पहुंचा तो पिताजी से भेंट हुई. बिना खबर किए इस तरह अचानक उन्हें आया हुआ देख कर मैं भी चौंका. उनकी पोशाक देख कर भी आश्चर्य हुआ कि ऐसी दीन-हीन हालत में कैसे आए होंगे? क्या हुआ होगा? घर की ऐसी हालत तो नहीं है. ददा भी मदद करते हैं और मैं भी जो संभव होता है, भेजता ही हूं. फिर उन्होंने यह रूप क्यों रखा? उस दिन बाजार बंद था, इसलिए कपड़े ला भी नहीं सकता था. अपना एक कोट, कमीज और पैजामा दिया कि इन्हें पहन लीजिए. उन्होंने वे कपड़े पहन लिए.
अगले दिन गांधी आश्रम से गर्म कोट, वास्कट, टोपी, कुर्ता और पाजामा खरीद लाया. पिताजी ने नए कपड़े पहने और विह्वल होकर बोले, “च्यला, ज्योंन छन तक चलि जाल इन.” (बेटा, जीवित रहने तक चल जाएंगे ये.)
मैंने कहा, “ऐसा क्यों कह रहे हैं? ये फट जाएंगे तो नए आ जाएंगे.”
“द, कु जानंछ, कब तक ज्योंन रुछु मैं.” (द, कौन जानता है, कब तक जीवित रहता हूं मैं.)
घर में पिताजी को मैं बाज्यू कहता था. पहाड़ के हिसाब से पड़ोसी और बच्चे उन्हें ‘बूबू’ यानी दादा जी कहने लगे. वे सुबह उठते, आसपास की सैर करते और फिर लॉन में या सीढ़ियों पर धूप में बैठ जाते. अक्सर कुर्ता उतार कर धूप तापते थे. धीरे-धीरे उन्होंने कुछ और देर तक घूमना शुरू कर दिया. मेरे कुछ दोस्तों से भी परिचय हो गया उनका. उनमें से एक थे हार्टिकल्चर के मेरे मित्र लीलाधर बिष्ट. पिताजी अक्सर घूमते हुए, उनके घर में रुक कर आगे बढ़ते. अगर घर में कोई न मिला तो वे दरवाजे पर कोयले या चॉक से लिख देते, ‘मैं आया था आप नहीं मिले- दस्तखत किशन सिंह मेवाड़ी.’ अपनी पहचान के कई घरों के दरवाजे पर वे इस तरह लिख देते.
कई बार वे कमरे या बरामदे में अकेले में बैठे होते. थोड़ी देर बाद भीतर आपस में बातें करने की आवाज आती तो मेरी पत्नी लक्ष्मी जाकर पूछती, “हं वै, कैथें लागि रछा बात?” (आप किससे बात कर रहे हैं) तो वे हंस कर कहते, “आपुईं थैं. प्यट क्वैंण लागि रछों.” (अपने-आप से. मन ही मन बातें कर रहा हूं.) कई बार तो उनके कमरे से आवाजें सुनाई देतीं, ‘द्वि सौ….द्वि सौ बीस….बीस तीस….द्वि सौ पचास….(फिर भूल जाते और नए सिरे से गिनना शुरू कर देते- द्वि सौ…द्वि सौ बीस). पूछने पर कहते, ‘नैं, नैं, क्या नैं. (कुछ नहीं, कुछ नहीं.)
वे राह चलते किसी भी अनजान आदमी से बात कर लेते थे. पूछते, “अच्छा महाराज, आप भी इलाजाबाद के हुए?”
वे सज्जन कहते, “इलाहाबाद से? नहीं, मैं तो इलाहाबाद से नहीं हूं.”
“अच्छा तो फिर कहां से हुए?” पिताजी पूछते.
वे सज्जन बताते कि कहां से हूं. बस, इस सूत्र को पकड़ कर पिताजी उन्हें बातों में लगा लेते और बातें खत्म होने तक उनसे उनकी अच्छी-खासी पहचान हो जाती. दुआ-सलाम का रिश्ता जुड़ जाता. उनके उन तमाम परिचितों में विश्वविद्यालय के शिक्षक, छात्र, दूकानदार, रिक्शे वाले और अन्य लोग होते थे. एक बार उन्होंने मुझसे दो-एक लोगों के बारे में पूछा. मैंने कहा, “इन्हें तो मैं नहीं जानता.” वे तुरंत बोले, “तो, इतने साल से यहां क्या कर रहा है तू?”
उन्होंने मुझे एक लंबी लिस्ट दिखाई और कहा, “देख मैं इन सबको जानता हूं.”
असल में गांव के होते हुए भी उनमें कोई झिझक या संकोच नहीं था. वे बहुत अच्छे कम्यूनिकेटर थे जब कि मैं बचपन से ही संकोची स्वभाव का था और बात करने में झिझकता था.
आने के बाद सबसे पहले उन्होंने किचन गार्डन की उपजाऊ ज़मीन का मुआयना किया. उसे देखकर बोले यहां इस मिट्टी में तरुड़ भी बहुत बढ़िया होंगे. अगली बार तरुड़ के बीज ले आवूंगा. यहां बो देंगे. दीवाल के सहारे बेल भी ऊपर चढ़ जाएगी. वे बीज लाए और बो दिए. सच कहा था उन्होंने, बहुत बड़े-बड़े और बढ़िया तरुड़ पैदा हुए. छीलने पर खूब चमकीले और गुलाबी दिखाई देते थे.
पड़ोसी बूबू जी, बूबू जी कहकर उनसे पहाड़ की बातें पूछते रहते. एक दिन एक पड़ोसिन ने पूछा, “अच्छा बूबू जी, पहाड़ में कौन-कौन सी सब्जियां होती हैं?”
“द नातनी (नातिन), क्या बताऊं, पहाड़ में तो सब्जियां ही सब्जियां हुईं- गदुवा, लौकी, तुमड़ा, भूंजा, बतिया, लिंगुड़ा, चुवा, पिनालू, गडेरी, कोच्यां, उगल, बेथ्वा, करेला….बम्तमान साग होता है, वहां की क्या पूछती हो.”
पड़ोसिन हपकपाल (चकित) कि बूबू जी ने क्या बताया? वह लौकी और करेले के अलावा कुछ नहीं समझीं. तब लक्ष्मी ने समझाया, “वे कह रहे हैं- कद्दू, कुम्हड़ा, पेठा, बैंगन, लिगुड़ा, फर्न, चौलाई, अरबी, लाल गडेरी, लंबे-लंबे अरबी जैसे कोच्यां, कुटू, बथुवा वगैरह. वे पहाड़ी नाम ले रहे हैं.”
ऐसा ही तब हुआ जब एक दिन वे धूप में लॉन में बैठ कर पड़ोसिनों को वह किस्सा सुना रहे थे, जब ओखलकांडा में एक भैंसे ने सींग मार कर उन्हें जमीन में गिरा दिया था. कुर्ता उतार रखा था. एक पड़ोसिन ने उनके पेट से लेकर कंधे तक गई गहरी खरौंच का निशान देख कर पूछ लिया कि बूबू जी, यह निशान कैसे पड़ गया?
“द नातनी, क्या पूछती हो, एक दिन एक काटा (भैंसा) पीछे पड़ गया. मैं तो रास्ते से सीधे-सीधे बहू-बच्चों के पास जा रहा था. तभी असत्ती काटे ने देख लिया. जाने क्या हुआ, उसको कि वह मेरी तरफ को दौड़ा. मैं बचने को किनारे हुआ तो उसने सींग मार कर मुझे ऐसे नीचे गिरा दिया (जैसे गिराया होगा, पिताजी अभिनय करके वैसे ही लॉन में गिरे), उसने गुस्से से मेरे भंटबाण (पसलियां) में सींग मारा. उसका मुंह मेरे सामने था ऐसे. तब मैंने जोर से अपने कुरकुचे से चड़म उसके थुथमुरे (थूथन) में ऐसे लात मारी. तब जो वो असत्ती गया वहां से. उस दिन तो मार ही देता था वो मुझे, बस बच गया समझो,” लॉन में से उठते हुए पिताजी ने कहा.
कभी-कभी उनकी कमर में चसक पड़ जाती. पहली बार चसक पड़ी तो बातों-बातों में उन्होंने कहा, “कमर में चसक पड़ गई है. कोई उल्टा पैदा हुआ होता तो उससे कमर में लात मारने को कहता. बिल्कुल ठीक हो जाती चसक.” एक पड़ोसिन ने कहा, “हमारी बेटी अनीता तो पैदा हुई है उल्टी.”
“अरे तो बुलाओ बिटिया को.”
पड़ोसिन सकपकाईं. ऐसे भी कहीं ठीक होती है कमर की नस! फिर बुजुर्ग बूबू जी की कमर में वह लात कैसे मार सकती है? पिताजी ने फिर कहा, “यही इलाज होता है इसका. नातनी बुलाओ अनीता को.”
अनीता बुलाई गई. उसे लात मारने को कहा तो वह झिझक कर पीछे हट गई. तब पिताजी ने उसे खूब समझाया कि बेटी, इस इलाज से कमर की चसक ठीक हो जाएगी. धीरे से ही सही, दो-तीन लात मार दो.
बिटिया ने बहुत संकोच से दो-तीन लातें मार दीं. पिताजी खुश और कुछ देर बाद बोले, “देखो, आराम मिल गया ना!” उसके बाद जब भी चसक पड़ती, वे समझा-बुझा कर अनीता से दो-एक लात लगवा लेते!
हमने सिलाई मशीन ले ली थी. उस पर बच्चों के कपड़े लक्ष्मी ही सिलने लगी. उस साल पिताजी आए तो सही फिटिंग के लिए पिताजी का कुर्ता, पाजामा भी लक्ष्मी ने ही सिला. उन्हें पहन कर वे बहुत खुश हुए और लॉन में जाकर बैठ गए. कुछ देर बाद लक्ष्मी को आवाज दी.
“ब्वारी! ब्वारी!”
“हं”
“सुन धैं जरा”
लक्ष्मी वहां गई तो बोले, “त्वैलि भौत बढ़िय सिड़ि राखीं इन. नाप ले ठिक्क छ. (तुमने बहुत बढ़िया सिल रखे हैं ये. नाप भी बिल्कुल ठीक है). बस, अगर (कुर्ता दोनों हाथों से, सिर के ऊपर से खोलते हुए) कहीं इस तरह न्यौत-पाते में खाना खाने के लिए कुर्ता खोला तो लोग कहेंगे, यह किस बेकूफ ने सिला? सिलाई के ये झुमरे दिखाई देंगे. अब मैं क्यों चाहूंगा, मेरी ब्वारी को कोई बेकूफ कहे!”
लक्ष्मी समझ गई. घर में पीको तो हो नहीं सकता था. उसने तुरपाई करके, झुमरे बैठा कर कुर्ता ठीक कर दिया.
उन्हीं दिनों मेरे एक मित्र अरविंद सक्सेना ने पंतनगर में पहली बार मशरूम की खेती का प्रयोग शुरू किया. उद्यान विभाग के साथी पनराम आर्या ने ‘किसान भारती’ के ‘ज्योनार’ स्तंभ में मशरूम के व्यंजनों के बारे में लिखा. अरविंद ने मशरूम पुलाव की तारीफ की तो वह बनाया. बहुत पसंद आया. मैंने ‘किसान भारती’, ‘नवनीत’ और ‘हिंदी एक्सप्रेस’ में मशरूम पर लेख लिखे. इस पूरी कवायद में मशरूम जुबान पर चढ़ गया. बाद में अरविंद ने मशरूम के प्रचार के लिए बड़ी-बड़ी सफेद मूंछों वाले एक सयाने आदमी को कालोनियों में मशरूम बेचने के लिए भेजना शुरू कर दिया. अखबार वाला की तर्ज पर लोग उसे मशरूम वाला कहने लगे.
तो, वह मशरूम वाला हमारी ‘ट’ कालोनी में भी आने लगा. हम उससे मशरूम खरीद लेते थे. लेकिन, एक बार जब घर पर पिताजी आए हुए थे तो देखा, काफी दिनों से मशरूम वाला नहीं आ रहा है. एक दिन वह कहीं दिखा तो मैंने पूछा, “क्यों भाई, इन दिनों मशरूम नहीं हो रहे हैं क्या?”
वह बोला, “क्यों नहीं साब, मशरूम तो हो रहे हैं. मैं बेच भी रहा हूं.”
“बेच रहा हूं? तो हमारी तरफ क्यों नहीं आए.”
“यहां आने से मना कर रखा है,” उसने कहा.
“किसने मना कर रखा है?” मैंने नाराज होकर पूछा.
“बाबा ने. आपके घर में आए हैं ना?”
मैंने कहा, “हां, मेरे पिताजी आए हैं. लेकिन, वे क्यों मना करेंगे?”
“वे पूछ रहे थे, यहां कौन मंगाता है इसे?” तो मैंने कहा, साब मंगाते हैं. उन्हें तो यह बहुत पसंद है.
“तो, उन्होंने क्या कहा?”
“कहा कि खबरदार, जब तक मैं यहां हूं, इस रास्ते से भी मत आना. हमारे यहां नहीं खाते इसे. हां, मेरे बेटे देबी या बहू को बताना मत कि मैंने मना किया है,” मशरूम वाले ने बताया.
मैं पिताजी की परेशानी समझ गया. हमारे गांव में मशरूम को ‘च्यों’ कहते हैं और इसे नहीं खाया जाता. बल्कि, वर्जित भोजन माना जाता है. मैं मशरूम के पोषण गुणों के बारे में जानता था, इसलिए इसे बहुत पसंद करता था. बहरहाल, हमने पिताजी की बात रखी और मशरूम वाले को बाद में ही आने के लिए कह दिया.
हम किचन में फर्श पर चटाई बिछा कर, चौकी में बैठ कर खाना खाते थे. पहले पिताजी को खाना खिलाते. वे खाते हुए धीरे-धीरे, चबा-चबा कर खाते थे. खाते-खाते, चौकी पर घूम जाते जिसका उन्हें पता भी नहीं चलता था. शिकार के तो वे खैर गजब के शौकीन हुए ही. लेकिन, अपने नियम के तहत शनिवार को सूरज ढलने के बाद रविवार को सूर्यास्त होने तक शिकार नहीं खाते थे. साग-सब्जी में नमक वगैरह के बारे में लक्ष्मी पूछती तो चौंक कर कहते, “किलै पुछैंछी ब्वारी. असल है रौ. खान् सदैं ठीकै हुनैर भै (क्यों पूछती हो बहू. अच्छा हो रहा है. खाना तो सदा ठीक ही होने वाला हुआ.)” खाने के बारे में उन्होंने कभी कोई शिकायत नहीं की. खाना चाहे जैसा भी बना हो, वे बहुत प्यार से खाते थे. नमक थोड़ा कम भी हो तो भी रस लेकर खाते रहते थे.
वे सुबह अखबार पढ़ते थे. एक बार मित्र बटरोही आया था. पिताजी अखबार में एक खबर पढ़ कर अचानक गंभीर हो गए और बटरोही को वह खबर दिखाई. बोले, “महराज, देखो तो जरा, क्या जमाना आ गया है, एक लड़के ने बाप को चित्त मार दिया. क्या हुआ होगा उसे, हैं? पगली गया होगा? नहीं तो सगे बाप को जो क्या मार देता?”
बटरोही ने कहा, “हां, समय बदल गया है. अब ऐसी खबरें भी आने लगी हैं.”
“नैं, नैं महराज, उसको हुआ क्या होगा, जो सगे बाप को मार डाला?” पिताजी ने फिर पूछा.
उनकी बेचैनी देख कर, उनके मन में चल रहे तूफान का अनुमान लगा कर उसने एक कहानी लिख डाली- ‘महाभारत’. वह कहानी ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में छपी थी.
फागुन आता और प्रवासी पक्षियों की तरह पिताजी की भी पहाड़ लौटने की बेचैनी बढ़ने लगती. उन्हें पहाड़ और घर बहुत याद आने लगता. कई बार फागुन बीतने के बाद चैत में भी कुछ समय तक रुक जाते. धूप में बैठ कर पैरों-पिंडलियों पर सरसों का तेल मलते हुए कहते, “जब आता हूं तो फिंडोरी (पिंडली) सूखी रहती हैं. यहां से जाने तक वे भर जाती हैं.”
हमारे किचन गार्डन में गेहूं की बालियों में दाना पड़ जाता तो गौरेयों का झुंड भी आने लगता. उन दिनों पिता जी लॉन में बैठ कर जोर से गौरेयां भगाते-
सहा! सहा!
मुहल्ला जाग जाता.
मुहल्ला तो एक बार रात में भी जाग गया था, पिताजी की बुलंद आवाज सुन कर. वे सोए हुए थे. नींद में शायद कोई डरावना सपना देख रहे थे. हमें उनके बड़बड़ाने की आवाज सुनाई दी. थोड़ी देर में वे जोर-जोर से अं….अं….ई….ई….जैसा बड़बड़ाने लगे तो हम डर गए. मैंने उनके बेडरूम की कुंडी खटखटाई -खट्-खट्!
कि, तभी कमरे के भीतर पिताजी चीखे- हार्ड़च! हार्ड़च! हुईई! पकड़ो! पकड़ो!
आवाज इतनी तेज थी कि पड़ोसी जाग कर डंडे लेकर बाहर निकल आए, यह सोच कर कि शायद कोई चोर आ गया है. पिताजी ने दरवाजा खोला और शांति से बोले, “बाज्यू, बाज्यू नहीं बचका रहा है, चिटकन खटखटा रहा है. मैं श्वैन (सपना) देख रहा था.”
एक दिन वे कैंपस में घूम कर लौटे तो भीतर आते ही मुझसे बोले, “हं देबी, त्वै कैं यै ले फाम छ कि तेरि ईज हैड़ाखान अस्पताल में भर्ती भैछि. तू वीकि आंगड़ि लिबेर सितेंछे. हमारा गोरु-भैंस ले याद छैं त्वै कैं?” (देबी, क्या तुझे अब भी याद है कि तेरी मां हैड़ाखान अस्पताल में भर्ती हुई थी. तू उसकी आंगड़ि लेकर सोता था. हमारी गाय-भैंसें भी याद हैं तुझे?)
मैं चौंका, पिताजी यह क्यों पूछ रहे हैं? मां तो वर्षों पहले 1956 में ही विदा हो गई थी. इन्हें आज क्यों यह सब याद आ रहा है? इसलिए मैंने पूछा, “आपको कैसे याद आया आज?”
“किलै, हर्बोला मासाब के पास अखबार में तेरा लिखा हुआ पढ़ा. वे प्राइमरी स्कूल में हेडमास्टर हैं यहां. उन्होंने वे अखबार बक्से में संभाल कर रखे हैं. ‘नैनीताल समाचार’ अखबार था.” उन्होंने बताया.
मैं समझ गया. उन दिनों में ‘नैनीताल समाचार’ में ‘पाटी-दवात’ शीर्षक से अपनी यादों के पहाड़ पर लेखमाला लिख रहा था. हर्बोला मास्साब ने मेरे वे लेख पिताजी को पढ़ा दिए.
तापमान कुछ और बढ़ता और पिताजी पहाड़ को लौट जाते.
“तो देबी, पिताजी भी आए पंतनगर?”
“हां, पिताजी भी और गांव से बड़े ददा-भौजी भी. ओखलकांडा से ददा भी आए जिन्होंने पढ़ा-लिखा कर मुझे यहां तक पहुंचाया था. घर पर तो लोक वैज्ञानिक भी आते रहते थे.”
“कौन लोक वैज्ञानिक?”
“लोहुमी जी. बताऊं उनके बारे में?”
“ओं”
(जारी है)
वरिष्ठ लेखक देवेन्द्र मेवाड़ी के संस्मरण और यात्रा वृत्तान्त आप काफल ट्री पर लगातार पढ़ते रहे हैं. पहाड़ पर बिताए अपने बचपन को उन्होंने अपनी चर्चित किताब ‘मेरी यादों का पहाड़’ में बेहतरीन शैली में पिरोया है. ‘मेरी यादों का पहाड़’ से आगे की कथा उन्होंने विशेष रूप से काफल ट्री के पाठकों के लिए लिखना शुरू किया है.
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