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कहो देबी, कथा कहो – 14

डांस ब्वाइज डांस 

छुट्टी के दिन कई बार मैं अपने साथी बिष्ट के कमरे में भी मिलने चला जाता था. वह मुझे अक्सर एक पुराना गढ़वाली गीत सुनाया करता था- ‘नौ रूपायाक मोत्या बल्द, दस रूपायाक सींग!’ एक बार मैं और साथी कैलाश वहां गए तो वहां उसके एक जिंदादिल रिश्तेदार कैप्टन आए हुए थे. वे पूछने लगे, “खाली समय में क्या करते हो यंग ब्वाइज?”

हमने कहा, “घूम लेते हैं- पार्क में, बाजार में. कभी-कभी फिल्म देख लेते हैं.”

“नो! दिस इज डल लाइफ. अच्छी नौकरी कर रहे हो, कल जीवन में आगे बढ़ोगे. सोसाइटी में, पार्टियों में जाओगे. उनमें भाग लेने के लिए तुम्हें खास एटिकेट्स आने चाहिए. डांस करना आता है?”

हम उनका मुंह ताकने लगे! डांस?

हमने कहा, “नहीं. अभी तो नहीं आता.”

“तो फिर कब आएगा? यही तो उम्र है सीखने की. शादी से पहले यह सब सीख लो. ब्वाइज, यू हैव टु बी स्मार्ट. फिल्मों में देखा नहीं, कैसे जोड़े एक दूसरे की कमर में हाथ डाले, कंधे पर बांह रखे, पार्टी में संगीत की धुन पर नाचते रहते हैं. नो, नो, माइ डियर फ्रैंड्स यू हैव टु लर्न इट ऑल. डांस ब्वाइज डांस! डांस सीखना शुरू कर दो.”

“हम कहां सीखेंगे?” हमने पूछा.

“डांसिंग स्कूल में. मैं ले चलता हूं वहां. पहले एक सप्ताह की मैंबरशिप लेकर सीखो. मजा आने लगे तो मैंबरशिप आगे बढ़ा लेना,” उन्होंने कहा.

“कब से जाना होगा?”

“राइट फ्रॉम टुडे यंग फ्रैंड्स. चलो चलते हैं.”

वे हमें कनाट प्लेस ले गए. वहां किसी ब्लाक के पीछे भीतरी लेन से सीढ़ियां चढ़ कर ऊपर पहुंचे. दरवाजे से भीतर प्रवेश किया. भीतर दरवाजे के पास ही काउंटर था. वे लोग कैप्टन को पहले से जानते थे. उन्होंने हमारा नाम लिखाया. सप्ताह भर की फीस तब शायद दस-बीस रूपए थी. वह जमा की. फिर कैप्टन चले गए. वहां बाहर बरामदा था जिसकी खिड़कियों से नीचे कनाट प्लेस का सबसे भीतर का सर्कल दिखाई दे रहा था. यानी, हम नीचे के शोरूमों के ऊपर किसी मंजिल पर थे. बरामदे की दीवार के साथ कुर्सियां लगी थीं, जिन पर दो-तीन बालाएं और कुछ डांस के लिए आतुर व्यक्ति बैठे थे. एक वृद्ध बाला बीच में खड़ी थी.

वृद्ध बाला इसलिए कि वह थी तो ढलती उम्र की महिला, लेकिन उसने शार्ट स्कर्ट और ऐसा टॉप पहना था कि स्मार्ट और युवा लगे. करीने से कटे हुए बाल, होंठों पर सुर्ख लिपस्टिक और गहरा मेकअप.

उसने हमसे कहा, “हम पहले- फॉक्स ट्रॉट के चार स्टेप चलेंगे….वन, टू, थ्री, फोर….अब मेरे पैरों को देखो…देखो वन-टू स्लो हैं, और थ्री-फोर क्विक. यही ध्यान रखना है. उसने करके दिखाया- वन, टू, थ्री, फोर. स्लो, स्लो, क्विक, क्विक. फिर बोली, “नाउ कम ऑन. लेट अस स्टार्ट. हम तीनों उठने लगे तो उसने कहा, “वन बाइ वन.”

मेरा एक साथी उठा. वृद्ध बाला ने उसके हाथ पकड़ कर पोजीशन समझाई और उसे फॉक्स ट्रॉट डांस सिखाना शुरू किया. हम उसे देखते रहे. थोड़ी देर बाद वृद्ध बाला चीखी, “ओई”. साथी का चमड़े का मजबूत जूता उसके पैरों पर पड़ गया था. उसने कहा, “जूता उतार कर आओ. कल से कपड़े का पी. टी. शू पहन कर आना.”

तभी उनकी चाय आ गई. एक मग में बगल में बैठी युवा बाला ने कुछ घूंट लिए. कुछ घूंट उसकी बगल में बैठी बाला ने, कुछ वृद्ध बाला ने. वे एक ही कप की चाय पी रही थीं. मुझे आश्चर्य हो रहा था. मैं तो कभी किसी की जूठी चाय पी नहीं सकता था. बहरहाल, फिर मेरे दूसरे साथी ने डांस के स्टेप सीखे और उसके बाद मैंने. यह भी देखा कि कुछ लोग आते, काउंटर पर फीस देते और कुर्सी पर बैठी बालाओं में से किसी का हाथ थाम कर भीतर चले जाते. भीतर शायद कमरे थे जिसमें आधा घंटा डांस करने के बाद लोग चले जाते. दरवाजा खुलने पर भीतर से आता संगीत सुनाई देता.

एक दिन तो डांस के लिए बाला चुनते समय एक मंझोले कद और गठीले बदन के एक आदमी ने बालाओं से ‘सी दिस’ कह कर कोई ऐसा उत्तेजक डांस किया कि बालाएं भी लोट-पोट हो गईं. वह किसी बनैले सांड की तरह बमक रहा था. कहने लगा, उसने वह डांस अफ्रीका में सीखा. फिर वह जोड़ा बना कर एक बाला के साथ भीतर चला गया. वृद्ध बाला हमें फॉक्स ट्रॉट के अगले स्टेप सिखाती रही. सप्ताह भर की फीस दी थी, इसलिए सप्ताह भर जाना पड़ा. लेकिन, हमें पहले ही दिन से लगने लगा था कि शायद यह रास्ता हमारे लिए नहीं है. इसलिए उसके बाद नहीं गए. कुछ साथियों से डांस स्कूल का जिक्र किया तो वे छूटते ही बोले, “क्या यार तुम लोग भी! वहां कोई डांस-वांस नहीं होता. उसकी आड़ में लोग उन डांसर लड़कियों से मिलने जाते हैं. यह दिल्ली है. यहां सब कुछ वैसा नहीं होता प्यारे जैसा दिखाई देता है.” तब हम लोग सतर्क हो गए.

वह तो कुछ दिन बाद मेरे वरिष्ठ पत्रकार मित्र के एक खुफिया सेवा के दोस्त ने रहस्य का खुलासा किया. तब मुझे असलियत का पता लगा.” वे पत्रकार मित्र कभी-कभी कनाट प्लेस में मिल जाते थे. उस बार मिले तो उन्होंने अपने खुफिया इंस्पैक्टर दोस्त से मेरा परिचय कराया. हम कनाट प्लेस के बरामदों में घूमने लगे. एक जगह पहचानी-सी लगी. मैंने कहा, “इसके पीछे से ऊपर जाओ तो वहां एक डांसिंग स्कूल है.”

“तुम्हें कैसे पता?” पत्रकार मित्र ने पूछा.

“मैं वहां एक सप्ताह तक डांस सीखने गया था,” मैंने कहा.

इंस्पैक्टर हंसा, “कोई डांस-वांस का स्कूल नहीं है. साला भ्रष्टाचार का अड्डा है.”

पत्रकार मित्र ने कहा, “ऐसा कहां हो सकता है? क्या प्रमाण है तुम्हारे पास?”

“प्रमाण?” साहित्य प्रेमी इंस्पैक्टर ने तल्ख स्वर में कहा, “तुम लेखक-पत्रकार इन दिनों भोगा हुआ यथार्थ की ऊंची-ऊंची बातें कर रहे हो. लेकिन, सच यह है कि सब कुछ काल्पनिक लिख रहे हो. जानते हो, यथार्थ क्या है? कितना कडुवा है? देखोगे यथार्थ?”

“कहां दिखाओगे?”

“यहीं, और कहां? बात उठी है तो आज देख ही लो यथार्थ का नमूना. देख लो समाज के खाए-अघाए इलीट लोगों का असली चेहरा. है हिम्मत?”

“बिल्कुल है. देवेन को जाने दें?” पत्रकार मित्र ने कहा.

“नहीं, इन्हें भी देखने दो यथार्थ. ये भी तो लेखक हैं. आप लोग यहीं खड़े रहें, पिलर की ओट में. मेरा नाम मत लेना, न इंस्पैक्टर साहब कहना. साढ़े नौ बजने वाला है. डांसिंग स्कूल के बंद होने का समय है. तुम लोग बस यहां ओट में से देखते रहना चुपचाप.”

पत्रकार मित्र ने कहा, “ठीक है, ठीक है यार. हम यहां खड़े हैं.”

खुफिया इंस्पैक्टर ने कहा, “साढ़े नौ बजने वाला है. डांसिंग स्कूल के बंद होने का समय है. वहां सामने देखो. पैसे वाले लोग आने लगे हैं. वह देखो, कार आकर किनारे रूक गई है. उधर से वह दूसरी कार आकर रुकी. एक आटो भी आकर खड़ा हो गया है. बस, देखते रहो.”

साढ़े नौ बजा. पीछे गली से डांस बालाएं नीचे उतर कर आने लगी. पहली बाला आई. एक कार ने हेड लाइट जला कर इशारा किया. वह उसमें बैठ कर चली गई. एक और बाला आई, दूसरी कार में बैठ कर चली गई. तीसरी बाला आई तो इंस्पैक्टर तेजी से उस ओर बढ़े. सादी पोशाक में उसने पहचाना नहीं. शायद बहस करने लगी. इंस्पैक्टर ने जेब से कार्ड निकाल कर दिखाया. वह चुप हो गई और इंस्पैक्टर  के साथ हमारी ओर आई. पिलर के दूसरी ओर इंस्पैक्टर खड़े हो गए. वह जाने देने के लिए अनुनय-विनय कर रही थी. इंस्पैक्टर की आवाज सुनाई दी, “अरे, चलो, चलो. घंटे भर में वापस छोड़ दूंगा.”

बाला की आवाज, “नहीं सर. पैसे रखने पहले घर जाऊंगी.”

इंस्पैक्टर ने घुड़क कर कहा, “तुम्हारे पैसे कोई लूट रहा है क्या?”

“सर, परसों दो आदमी यहीं से ले गए कार में. आगे जाकर मेरे रूपए छीने और मुझे सड़क पर फैंक कर चलते बने. इस समय मेरे पास दिन भर की कमाई होती है सर. मैं घर जाकर आ जाती हूं.”

“जाओ, जाओ” इंस्पैक्टर ने कहा, “मैं तो यों ही कह रहा था.”

“सर आप नाराज तो नहीं हैं ना?”

“नहीं, अब जाओ,” इंस्पैक्टर ने कहा. वह जाकर इंतजार कर रहे आटो में बैठ कर चली गई.

पत्रकार मित्र से इंस्पैक्टर ने कहा, “देखा, यह है यथार्थ. तुम लेखक लोग यों ही लिख देते हो. बड़ी घिनौनी है यहां रात की दुनिया.”

“यार, आपको यह सब कैसे पता लगा?” पत्रकार मित्र ने कहा.

“ड्यूटी करते हुए. जानते हो, यह इलाका मिलने पर शुरू-शुरू में मुझे भी तुम लोगों की तरह सब कुछ ठीक-ठाक दिखाई देता था. चमचमाती दूकानें, आते-जाते लोग. आज की तरह एक बार रात की गश्त पर था. दूकानों के बरामदों से होकर गुजर रहा था कि इसी डांस स्कूल के ठीक नीचे एक आदमी गिरा. जाहिर था कि उसे खिड़की से फेंका गया था. मैंने पुलिस बुलाई और छापा मारा. वहां तब दो डांस स्कूल थे- एक इस ओर, दूसरा उस ओर. पता लगा, ग्राहकों में झगड़ा हुआ और एक ग्राहक को पीट कर नीचे फेंक दिया गया. मैंने केस बनाया और एक डांस स्कूल बंद करा दिया. लेकिन, बंद कहां होते हैं ऐसे अड्डे?”

“आप तो कह रहे हैं बंद करा दिया था?”

“यहां बंद करा दिया था. लेकिन, पता लगा उन लोगों ने उसे कुछ समय बाद दक्षिण दिल्ली में खोल लिया. सुना है, वहां बहुत अच्छा चल रहा है.”

भोगा हुआ यथार्थ की साक्षात झलक देखने के बाद हम इंस्पैक्टर से विदा लेकर आटो से घर लौट आए.

□□□

मैं और मेरा साथी बिष्ट पटेल नगर में यदा-कदा मिलते ही रहते थे. एक बार मिलने की बात हुई तो साथी ने कहा, “आज भाई साहब के यहां जाना है. ठीक 6 बजे वहीं मिलेंगे.”

“कौन भाई साहब?” मैंने पूछा.

“अरे यार मेरे भाई साहब हैं रिश्ते में. रावत जी. स्कूल में पढ़ाते हैं. वेस्ट पटेल नगर की एक बरसाती में अकेले रहते हैं. वहीं मिलेंगे. फिर घूमेंगे बाहर पार्क में,” साथी ने कहा.

“मैं तो उन्हें जानता नहीं?”

“कोई बात नहीं, मेरा नाम लेकर बता देना कि दोस्त हूं, दोनों साथ काम करते हैं.”

उसने मुझे पता दे दिया और मैं शाम को छह बजे के आसपास पूछते-पाछते उस पते पर पहुंच गया. दिल्ली में छत में बनाया गया एक या दो कमरों का सेट तब बरसाती कहलाता था. मैं जहां पहुंचा, वह एक कमरे की बरसाती थी. सीढ़ियां चढ़ते हुए सोचता जा रहा था कि रावत जी को अपना परिचय कैसे दूंगा. छत पर पहुंचा तो अंधेरा घिरने लगा था. दरवाजे पर खट्-खट् की. लेकिन, खोला किसी ने नहीं. मैंने सोचा छुट्टी का दिन है. सो गए होंगे. मैं छत पर टहलते हुए उनके उठने का इंतजार करता रहा.

अंधेरा गहरा गया लेकिन वे नहीं उठे. फिर से दरवाजा खटखटाया. फिर भी कोई आवाज नहीं. दरवाजे को धीरे से धक्का दिया. वह खुल गया. भीतर घना अंधेरा था. मैं समझ ही नहीं पा रहा था कि हो क्या रहा है और साथी ने यह मुझे कहां भेज दिया? हिम्मत करके दरवाजे के इधर-उधर हाथ फिरा कर स्विच टटोला. स्विच मिलते ही उसे आन किया. लेकिन, लाइट नहीं जली. मैं परेशान कि अब क्या करूं. साथी अब भी आया नहीं था. सोच-सोच कर दिल की धड़कन बढ़ती जा रही थी कि आखिर अंदर अंधेरे में हुआ क्या है? साथी ने उनसे भी तो कहा होगा कि शाम को आवूंगा.

काफी देर हो गई. साथी नहीं आया. मैंने लौट जाना ही उचित समझा. अंधेरे में सीढ़ियों से धीरे-धीरे नीचे उतरा. नीचे पहुंचा ही था कि किसी ने पूछा, “कौन? किससे मिलना है?”

“रावत जी से. वे ऊपर बरसाती में रहते हैं?”

“तुम कौन?” उसने थोड़ा तेज आवाज में पूछा.

मैंने अपना नाम बताया और कहा उनके भाई के साथ काम करता हूं.

“चलो मेरे साथ, ऊपर चलो,” उसने मेरा हाथ पकड़ कर कहा.

मैंने कहा, “वहां रावत जी नहीं है.”

“मैं हूं रावत. ऊपर चल कर बताओ तुम क्यों आए थे,” उसने कहा.

मैंने हैरान होकर उनकी ओर देखा, नमस्कार किया जिसका उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया. ऊपर पहुंचे. उन्होंने अंधेरे में स्विच आन किया. मैंने कहा, “लाइट नहीं जल रही है.”

“तुम्हें कैसे पता?” उन्होंने मेरा हाथ और अधिक कस कर पकड़ कर कहा, “तुम कमरे में भी गए? भीतर कैसे गए?”

मैंने घबरा कर कहा, “नहीं, नहीं रावत जी. मैं तो आपको देखने के लिए गया कि आप उठ कर लाइट क्यों नहीं जला रहे हैं?” दरवाजे पर हल्का धक्का दिया. वह खुल गया. दरवाजा फेर कर उन्होंने कहा, “सब समझता हूं, यहीं खड़े रहो मैं लाइट जलाता हूं.”

मैंने कहा, “मैं कहीं नहीं जा रहा हूं. यहीं खड़ा हूं. आप जलाइए.”

उन्होंने माचिस जला कर देखा. बल्ब उतारा हुआ था. उन्होंने टेबल लैंप खोज कर उसके तार पास के स्विच बोर्ड में डाले और बल्ब जल उठा. कमरे में रोशनी होते ही उन्होंने मुझे गौर से देखा. सिरहाना टटोला. आसपास की चीजों पर नजर फिराई और बोले, “गया तो कुछ खास नहीं. सिरहाने में कुछ रूपए और सिक्के पड़े थे. वे गायब हैं.”

फिर मेरी ओर शक से घूर कर देखा और कहा, “हां, अब बताओ तुम कौन हो?”

मैंने फिर से अपना नाम बताया. उनके भाई यानी रिसर्च स्कीम के अपने साथी का पूरा परिचय दिया और कहा कि हम गहरे दोस्त हैं. उसे भी आना था. उसी ने मुझे भेजा कि आपके घर पर मिलेंगे.

उन्होंने मेरा पता-ठिकाना लिखा. शायद अब उन्हें लग चुका था कि शायद मैं उनके भाई के साथ काम करता ही हूं. उन्होंने थोड़ा राहत की सांस लेते हुए कहा, “ये तीसरी बार है जब साले ने चोरी की है. पहली चोरी के बाद से ही मैं पैसे बैंक में रखता हूं. खाना बाहर खाता हूं, इसलिए भांडे-बर्तन भी नहीं रखता. बिस्तर और चारपाई वह ले नहीं जाता. पहली चोरी के बाद से ही कोशिश कर रहा हूं कि उसे पकड़ लूं और पुलिस को सौंप दूं. अब तक पकड़ में नहीं आया, साला.”

मैंने उन्हें नमस्कार किया और घर को लौटा. उन्होंने पीछे से आवाज लगा कर कहा, “उससे कहना कि बात जरूर कर ले और तुम्हारे बारे में भी बताए.”

मैंने कहा, “जी, जरूर रावत जी.” जान बची और लाखों पाए! बल्कि, पाया तो कुछ नहीं, जान ही बची. चुपचाप देवी सिंह बिष्ट के होटल में खाना खाया और यह सोचते हुए कमरे की ओर चला कि अगर ये पुलिस बुला लेते तो वह थाने में मुझसे पूछताछ जरूर करती. यह सोच कर सिहर उठा. अगले दिन लैब में साथी से पूछा, “आए क्यों नहीं?” तो उसने जवाब दिया, “सारी यार. दूसरा जरूरी काम आ गया था. मैं आ नहीं सका. लेकिन, भाई साहब आए थे सुबह. तुम्हारे बारे में पूछ रहे थे. उनके यहां शायद चोरी हो गई थी. क्यों?”

मैंने कहा, “तुमने वहां मुझे गलत भेजा. तुम्हें नहीं आना था तो मुझे भी नहीं भेजना था.”

“सॉरी यार. मुझे क्या पता था?” कह कर साथी हंसने लगा. जैसे कुछ हुआ ही नहीं. मैंने कान पकड़े, आगे से इस तरह कभी किसी से मिलने नहीं जाऊंगा.

“तो नहीं गए किसी से मिलने?”

“नहीं, लेकिन एक दिन अकेला था. खम्म से वह आ गया मेरे सामने!”

“वह? वह कौन?”

“सुनो, बताता हूं.”

“ओं”

( जारी है )

पिछली कड़ी कहो देबी, कथा कहो – 13

 

वरिष्ठ लेखक देवेन्द्र मेवाड़ी के संस्मरण और यात्रा वृत्तान्त आप काफल ट्री पर लगातार पढ़ते रहे हैं. पहाड़ पर बिताए अपने बचपन को उन्होंने अपनी चर्चित किताब ‘मेरी यादों का पहाड़’ में बेहतरीन शैली में पिरोया है. ‘मेरी यादों का पहाड़’ से आगे की कथा उन्होंने विशेष रूप से काफल ट्री के पाठकों के लिए लिखना शुरू किया है.

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Girish Lohani

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