फोटो www.youthkiawaaz.com से साभार
साधो हम बासी उस देस के – 5
-ब्रजभूषण पाण्डेय
(पिछली कड़ी : बार्क मतलब खाली भौंकना नहीं होता उर्फ़ कैस्केडिंग इफ़ेक्ट की बारीकियां)
जमुना परसाद उन दोनों को फ़ुल इग्नोर मारते हुए अपनी चेयर पर रूल फटकारते बैठ गए और अपनी ही रौ में बड़बड़ाने लगे.
‘स्साले. सुअर. लेट आते हैं. लगता है बाप के बियाह में पूड़ी खाने जा रहे हैं. ई स्कूल है भेंचो स्कूल. भइया जी का दालान नहीं. रहना है, पढ़ना है तो लूर लच्छन सुधार लो. नहीं तो मुंह करिखा लगा के फूट लो. ‘
रौद्र रस की घोर धारासार वाले इस समस्त एकालाप में एक बात बेहद स्पष्ट थी कि धमकी कहीं और दी जा रही थी. पढ़ने वाले तो कब के क्लास में घुस गए थे. निशाना वहाँ बैठे दोनों मास्टर थे जो हेडमास्टर साहब के विरोधी गुट के माने जाते थे.
लेकिन मथुरा बाबू के रौब गांठने का उन दोनों पर कोई असर नहीं हुआ. त्रिभुवन हीरोइन की मांग के बाद उसके कंचुकी में छिपे समुन्नत शिखरों को क़लम के निशाने पर ले चुके थे. राधे मास्टर ने एक टांग ज़रा ज़्यादा पसार कर एक उबासी ले ली. दोनों क्लास में जाने के लिए रत्ती भर नहीं हिले. उधर लड़कों के ज़ोर ज़ोर से हँसने, लड़ने, गाली गुलपाडे की आवाज़ें आने लगी थीं.
अपना भौकाल जमता नहीं देख हेडमाट साब ने चपरासी को डांटना शुरू किया.
‘सुकुल. ए सुकुल. गिलास काहे नाहीं माँजते हो ठीक से जी? बसाते रहता है. ‘
‘कइसे माँजें ख़ाली हाथ से? एतना दिन से कह रहे हैं नेनुआ का खुझा ला दीजिए तो सुनते ही नहीं हैं आप. ‘
पूरे उपस्थित शिक्षक समुदाय में ठहाका फूट पड़ा.
नेनुआ गर्मियों के मौसम में पाया जाने वाला एक सब्ज़ी है जिसे कहीं कहीं तोरई या परोल के नाम से भी जाना जाता है. ज़्यादा मोटा नेनुआ सब्ज़ी बनाने के लिए अच्छा नहीं माना जाता. इसलिए उसे सूखने दिया जाता है. सूखने के बाद उसका गूदा बर्तन माँजने के काम आता. स्काच ब्राइट के तार ब्रश का लो बजटीय अवतार पहले ही हो चुका था. क्रेडिट मिले ना मिले और बात है.
लेकिन हँसी का कारण दूसरा था. हेडमाट साहब जाति के कोइरी थे जो एक बेहद उद्यमी खेतिहर जाति है और सब्ज़ी उत्पादन के लिए मशहूर है.
इसलिए मथुरा बाबू से नेनुआ के खुझा के डिमांड ने लोगों को प्वाइंट दे दिया कि बन चाहे गए हों आप माहटर हेडमाहटर हैं तो आप कोइरी ही. बाभन छत्री थोड़े हैं.
‘ए जमुना! काहे नाहीं लाते हो भाई खुझा सुकुल के लिए? उंगली कट खिया गया उसका तो अपना बियाह में सेनुर कइसे डालेगा मेहरारू के मांगे में? बताओ भला. आंय? ‘
रघुनंदन शर्मा ने छेड़ा. वे वरिष्ठता में जमुना परसाद के ही समकक्ष थे. दो बार अनधिकृत गैरहाजिरी को ज़िला शिक्षा पदाधिकारी ने रंगे हाथ ना पकड़ा होता तो आज प्रिंसिपल की कुर्सी की गरिमा बढ़ा रहे होते.
जमुना परसाद बेहद घाघ थे. वो जानते थे इस परिहास के जवाब देने का मतलब है और भद्द पिटना. सो गुस्साने की बजाय वो निपोरने लगे.
‘अरे हम कहाँ से लाएँ रे सुकुल? हमारे यहाँ अब खेती थोड़ी होता है? लेकिन शिवनंदन बाबू एक ज़माना था जब हमारे बाबूजी हमको बैल के दहिनवार जोते रहते थे खेती में. सुबह उठो आर कोन करो, चतरी के सिवान में बनिहार को दाना पहुँचाओ तब जाओ स्कूल. संघर्ष से उट्ठे हैं स्साला संघर्ष से. किसी के बाप ने नौकरी नहीं दी. कमाई है, छीनी है लड़ के. ‘
प्रिंसिपल साहब ने अपनी रामकहानी की इब्तिदा करूण रस से कर इंतेहाई उठान वीर रस में लिया. अंतिम पंक्तियों से लड़ के लेंगे पाकिस्तान जैसी जुनुनी क़वायद की बू आ रही थी जिसे विरोधी गुट अपने उपर व्यंग्य की तरह समझ रहा था.
‘भाई प्रवचन पेलबे की क्या ज़रूरत? ई तो सबई जानते हैं कि प्रिंसिपल मथुरा परसाद की नौकरी जो है त्रिभुवन या राधे के बाप ने नईं दी. तो क्या बाकि लोगों की नौकरी इन्के दादा अठराजा ने सदाव्रत बाँटी है? आंय?’
इन सभी मानसिक लंतरानी का एक ही नतीजा हो सकता था कि सब नियति नाम की दानवी से लड़ कर विजेता राजकुमार बनने की अपनी अपनी कहानी सुना सुना कर ख़ुद को प्रतिद्वंद्वी से बीस संघर्षबाज सिद्ध करने की क़वायद स्टार्ट करते.
लेकिन इससे पहले की मामला बीभत्स रस के किसी कवि के लिए आदर्श मसाला प्रस्तुत करता खुदा की मेहर बरसी और मथुरा बाबू की नज़र सामने की ओर उठ गयी.
मिडिल स्कूल के खुले अहाते में नीम के पेड़ के नीचे सनेही मास्टर कुर्सी पर बैठे मुंडी झुकाए उंघ रहे थे. दोनों आबनूसी टाँगों की कसरती पिंडलियों पर झूले एक एक मरघिल्ले छोकरे मसाज क्रिया को अंजाम दे रहे थे.
‘देखो स्सालों को शर्मा, देखो. ओझवा स्साला आकाश नापता है सनेहिया पाताल.’
ये बात इसलिए कही गयी थी क्योंकि ओझा मास्टर को सर उपर रख कर सोने में स्पेशलाइजेशन था तो सनेही को गोत कर सोने में.
(जारी)
बनारस से लगे बिहार के कैमूर जिले के एक छोटे से गाँव बसही में जन्मे ब्रजभूषण पाण्डेय ने दिल्ली विश्वविद्यालय से उच्चशिक्षा हासिल करने के उपरान्त वर्ष 2016 में भारतीय सिविल सेवा जॉइन की. सम्प्रति नागपुर में रहते हैं और आयकर विभाग में सेवारत हैं. हिन्दी भाषा के शास्त्रीय और देसज, दोनों मुहावरों को बरतने में समान दक्षता रखने वाले ब्रजभूषण की किस्सागोई और लोकगीतों में गहरी दिलचस्पी है.
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