अधिकांश पहाड़ी जगहों के नाम में वहां का इतिहास और भूगोल छिपा रहता है

इन्सानों के नाम भले मता-पिता अपनी मर्जी के अनुसार कुछ भी रख लें, यह आप पर निर्भर है. यहां तक कि कभी-कभी उन नामों का कोई सार्थक शब्द तक नहीं बनता. लेकिन जगहों के नाम व्यक्ति विशेष द्वारा नहीं रखे जाते, उसके पीछे अधिकांशतः वहॉ का इतिहास व भूगोल समाहित होता है, अथवा इसके पीछे कोई न कोई कारक होता है और लोकमानस की आम स्वीकृति होती है. जिज्ञासावश इन्सानी फितरत है कि वह नाम रखे जाने के पीछे के कारणों को जानना खहता है.
(Meaning of Places Name in Uttarakhand)

उत्तराखण्ड की भौगोलिक संचरना मैदानी क्षेत्रों से भिन्न होती है, कहीं ऊंचे पहाड़ हैं तो कहीं गहरी घाटियां, कहीं पहाड़ों के बीच टीलेनुमा भू-आकृति है तो कहीं दलदली भूमि. लोकभाषा में ऐसी भू-आकृतियों को धार (पहाड़ का शिखर) धुर (सामान्यतः जंगल के लिए प्रयुक्त पहाड़ी भू-भाग) छिन (पहाड़ के शिखर का वह स्थान जहॉ से दोनों ओर की घाटियों को एक साथ देखा जा सकता है, सैंण (पहाड़ों के बीच का घाटियों का समतल मैदानी क्षेत्र) आदि को प्रत्येक को भौगोलिक बनावट क अनुसार लोकभाषा में अलग-अलग नाम दिये गये हैं. प्रायः शब्दयुग्मों से बने इन पहाड़ी जगहों के नाम में इतिहास व भूगोल दोनों समाहित होता है.

अगर आप गौर करें तो अधिकांश जगहों के दो शब्दों के योग से बने नामों में दूसरा शब्द वहां का भूगोल दर्शाता है, जब कि उसी शब्दयुग्म के पहले हिज्जे में वहॉ का इतिहास छिपा होता है और दूसरे हिज्जे में भूगोल. आपने गौर किया होगा कि पहाड़ी जगहों के नामों में नाम का दूसरा हिज्जा कई जगहों का समान होता है जैसे – भिकियासैण, गैरसैंण, भराड़ीसैण, थलीसैंण, बल्दियाखान, भत्तरौंजखान, हैड़ाखान, चमड़खान, सुन्दरखाल, घोड़ाखाल, रिखणीखाल, ड्योड़़ाखाल. इसी तरह धौलछीना, हरछीना, कुकुछीना, चलनीछीना, बाढ़ेछीना, गोलूछीना आदि. इसी तरह तालों के नाम से भी कई जगहें हैं जिनके अन्त में ताल का प्रयोग हुआ है. इसका कारण यही है कि वहॉ की भौगोलिक स्थिति तो लगभग समान है लेकिन इतिहास अलग-अलग है, जिससे नाम के पहले हिज्जे में बदलाव देखा जा सकता है.                        
(Meaning of Places Name in Uttarakhand)

बात शुरू करते हैं तालों के शहर नैनीताल की. इस जिले में स्थित नैनीताल, खुर्पाताल, भीमताल, नौकुचियाताल, सातताल, नलदमयन्तीताल, हरीशताल, लोहाखामताल, सरियाताल, मलवाताल जैसे नाम हैं, जो सुनते ही हमें अहसास करा देते हैं कि वहॉ तालाब अथवा झील होगी, जबकि नाम का पहला हिज्जा उस नाम के पीछे का इतिहास अपने में छिपाये हैं. ताल का ही छोटा रूप बावड़ी हैं, जो वर्षा जल को संग्रहित कर बनता है, जिसे स्थानीय भाषा मे खाव या खाल कहा जाता है और इसी खाल व खाव पर घोड़ाखाल, सुन्दरखाल, रिखणीखाल, ड्योड़ाखाल आदि जगहों के नाम हैं, जो सुनिश्चित करते हैं कि यहॉ बावड़ी होगी अथवा कभी रही होगी.                            

छिन शब्द वाले जगहों के नाम कुमाऊॅ में आपने बहुत सुने होगें. दरअसल छिन कुमाऊॅ में धार (पहाड़ों के शिखर) में स्थित उस भूभाग को कहते हैं, जहॉ पर खड़े होकर आप दोनों तरफ की घाटियों का एक ही स्थान से दीदार कर सकते हैं. इसे एक घाटी से दूसरी घाटी में प्रवेश का द्वार भी कह सकते हैं. हरछिना (कौसानी) धौलछीना, कनालीछीना, चलनीछीना, बाढ़ेछीना, गोलूछीना आदि ऐसे ही स्थान हैं, जो वहॉ की भौगोलिक स्थिति को स्वयं बताते हैं. लेकिन नाम के पहले हिस्से की जानकारी के लिए इतिहास कुरेदना पडेगा.

भत्तरौंजखान, बल्दियाखान, ओड़ाखान, हैड़ाखान, चमड़खान, नथुवाखान आदि नाम अक्सर आपको सोचने को मजबूर करते होंगे कि क्या इनका नाम किसी मुस्लिम सम्प्रदाय वाले खान उपनाम से जुड़ा हो सकता है? पहली बार सोचने पर ऐसा प्रतीत होना स्वाभाविक है लेकिन सच्चाई ये है कि इन जगहों का खान उपनाम वाले लोगों से कोई वास्ता नहीं है. खान एक अन्य अर्थ में भी प्रयुक्त होता है, जो खनिज सम्पदा के भण्डार के लिए प्रयुक्त होता है, लेकिन पहाड़ में इन जगहों में कोई खदानें नहीं हैं, इसलिए इस अर्थ में भी यह उपयुक्त प्रतीत नहीं होता. अगर लोकभाषा के शब्दों के आधार पर गौर करें तो पहाड़ी घरों में ताल्खान् और माल्खान् जैसे शब्द आपने अवश्य सुने होंगें, जहॉ घर के आगे के कमरे को ताल् खान् और अन्दर के कमरे को माल्खान् कहा जाता है. यहॉ खान् खण्ड शब्द का ही अपभ्रंश प्रतीत होता है. इन खान नाम वाली जगहों के नाम के पीछे कारण जानने पर पुराने इतिहास की जानकारी के अभाव में कोई सार्थक उत्तर हमें नहीं मिलता. हॉ, हैड़ाखान ओड़ाखान जैसी जगहों के नाम पर एक अनुमान लगाया जा सकता है, कि हैड़िया उपजाति के लोगों के रहने के कारण इसे हैड़ियाखान नाम दिया हो जो बाद में हैड़ाखान हो गया. इसी तरह कभी ओड़ (कुमाऊॅ में राजमिस्त्री का कार्य करने वाले को ओड़ कहा जाता है) लोगों का गांव होने के कारण इसे ओड़ाखान कहा गया हो. इसी तरह खान शब्द के साथ अन्य नामों पर भी सोचा जा सकता है, मसलन नथुवाखान में नत्थू नाम के किसी शख्स का इलाका रहा हो. बहरहाल इस पर अनुमान ही लगाया जा सकता है. 

धुर और धार शब्द स्थानीय भाषा में पर्वत शिखर के लिए प्रयुक्त होता है और इसी शब्द को लेकर कुमाऊॅ में कई स्थान है, जैसे – देवीधुरा, जन्तवाल धुरा, दुतकानेधार, सैमधार, भूमियाधार, पौधार, जाखणीधार आदि स्वयं ही अपना भूगोल बता देते हैं, उसका इतिहास जानने के लिए आपको नाम के पहले हिज्जे पर शोध की आवश्यकता होगी.
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सैंण शब्द स्थानीय भाषा में पहाड़ों के बीच के मैदानी भूभाग को कहा जाता है और इसी शब्द को समाहित किये गैरसैंण, थलीसैंण, भिक्यासैंण, भराड़ीसैंण जैसी जगहों के नाम हैं, जबकि मटेला, चापड़, चोपड़ा जैसे गांव आपको हर इलाके में सुनने को मिलेंगे, ये जगहें भी पहाड़ों में या तो ढलान पर कुछ समतल जगह अथवा टीलेनुमा आकृति से संबंध रखते हैं. इसी तरह रानीखेत, सराईखेत, गैरखेत, लोहारखेत तथा रानीबाग,बरगदबाग आदि जगहों के अन्त में खेत तथा बाग भी क्षेत्रविशेष की भैागोलिक स्थिति स्पष्ट करते हैं।

सामान्यतः घाट का आशय श्मशान घाट से होता है, जो प्रायः नदियों के किनारे बने होते हैं. लेकिन पहाड़ों में ऐसे स्थान को भी घाट नाम दिया गया है, जो पहाड़ों से घिरी घाटियों में बसे हैं. वेतालघाट, भुजियाघाट, शेराघाट, रातीघाट, काकड़ीघाट, लोहाघाट व पिठौरागढ़ के पास घाट तथा देघाट आदि स्थान इसी के कुछ उदाहरण हैं.
(Meaning of Places Name in Uttarakhand)

कभी पहाड़ों में किले अथवा दुर्ग भी हुआ करते थे, जिनके नाम पर कोट नाम के कई स्थान यहॉ हैं, जो उस क्षेत्र की ऐतिहासिकता को दर्शाते हैं. स्यूनराकोट में ऐसे किलों के अवशेष आज भी उपलब्ध हैं. इसके अतिरिक्त गरूड़ के पास कोट की माई, चौकोट, ग्वालाकोट, धनियाकोट , ऊॅचाकोट, ज्योलीकोट आदि भी किसी कालखण्ड में दुर्ग या किले होने का अहसास कराते हैं.                      

इससे इतर पहाड़ों में ऐसे गांवों के नामों की भी एक लंम्बी फेहरिस्त है , जो जातियों के नाम से रखे गये अथवा इससे इतर गांवों के नाम से जातियों का नामकरण हो जाता है. जाति विशेष के बहुसंख्यक लोग जब उस गांव में बसे तो जाति के नाम पर ही गांव का नाम रख दिया गया. तिवारीखोला, पाण्डेखोला, जोशीखोला, कर्नाटकखोला, कैड़ारौ, बौरारो आदि. दूसरी ओर कुछ गांवों के वाशिन्दों ने गांव के नाम से अपनी जाति का वरण कर लिया. जैसे बुढलाकोट के बुढलाकोटी, पाडली के पडलिया, पलडा के पलड़िया, निगलाट के निगल्टिया, चनौती के चनौतिया, लमगढ़ा के लमगढ़िया आदि.

अगर आप सीमान्त के ब्यास, चौंदास एवं दारमा घाटी के गांवों को देखें तो प्रायः गांवों के नाम से ही जातियां बनी दिखती हैं. मसलन गर्ब्यांग के गर्ब्याल, नाभी के नबियाल, तिदांग के तितियाल, कुटी के कुटियाल , गुंजी के गुंज्याल आदि. लेकिन कुछ जगहों के नाम जो शब्द-युग्म से नहीं बल्कि एक ही शब्द के हैं, उन नामों की व्युत्पत्ति कर पाना संभव नहीं है, क्योंकि इन नामों में व्याकरणिक नियम लागू नहीं होते, कि संस्कृत की अमुक धातु से यह शब्द बना है. ये ठेठ लोकभाषा में प्रयुक्त शब्दों पर आधारित होते हैं और हमें संस्कृत के इस सूक्त से सन्तुष्ट होना ही पडता है – ’’नामग्रामयोंः व्युत्पत्ति नास्ति’’ अर्थात् नाम और ग्राम की व्युत्पत्ति नहीं होती.
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– भुवन चन्द्र पन्त

भवाली में रहने वाले भुवन चन्द्र पन्त ने वर्ष 2014 तक नैनीताल के भारतीय शहीद सैनिक विद्यालय में 34 वर्षों तक सेवा दी है. आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से उनकी कवितायें प्रसारित हो चुकी हैं. काफल ट्री में प्रकाशित लेखक की अन्य रचनाएं:
कुमाऊनी रामलीला के तबला उस्ताद: मास्साब मनोहर लाल
भवाली में रामलीला की परम्परा
कुमाऊँ के बियावान जंगलों में रहने वाले कठपतिया का किस्सा

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