आम तो बस आम है. इसका कोई जवाब नहीं. खास ही नहीं, आम आदमी का भी मनपसंद फल. देश भर में उगता है और बहुतायत से फलता है. आम हमारे देश का राष्ट्रीय फल है, हमारी पहचान है. यहां इसे सदियों से उगाया जा रहा है. तभी तो घरों के आसपास और बाग-बगीचों में आम के पेड़ लगाने की परंपरा बनी. यह हमारे जीवन से जुड़ गया. इतना जुड़ गया कि शुभकार्यों, उत्सवों और त्योहारों पर घर आम की पत्तियों के बंदनवारों से सजाए जाने लगे. आम्रपाली जैसे नाम रखे गए. यज्ञ के लिए आम की पवित्र लकड़ी की समिधा बनाई जाने लगी. गांव-कस्बों में लोग अमराइयों की घनी, शीतल छांव में विश्राम करने लगे. बच्चे आम के पेड़ों पर चढ़ते, उतरने और झूला झूलने लगे. लोग राह चलते बटोहियों को छांव देने के लिए सड़कों के किनारे आम के वृक्ष लगाने का पुण्य काम करने लगे.

कहते हैं, हमारे देश में कम से कम 4,000 से 6,000 वर्ष पहले से आम की खेती की जा रही है. रामायण और महाभारत में आम के उपवनों का वर्णन किया गया है. 327 ईस्वी पूर्व में सिकंदर भारत पर आक्रमण करने आया. उसके सैनिकों ने सिंधु घाटी में पहली बार आम के पेड़ देखे. प्रसिद्ध चीनी बौद्ध यात्री ह्वेनसांग ने भी भारत में आम के पेड़ देखे थे. एक और विदेशी यात्री इब्न-बतूता ने तो यह भी लिखा कि यहां के लोग कच्चे आम का अचार बनाते हैं. पके हुए फल चूस कर या काट कर खाते हैं.

आम ने मुगल बादशाहों का मन मोह लिया. उन्होंने अपने शासनकाल में आम के बड़े-बड़े बाग लगाए. बाबर ने आम की बहुत तारीफ की और लिखा, यह हिंदुस्तान का सबसे उम्दा फल है. अकबर ने दरभंगा के पास लाल बाग में आम के एक लाख पेड़ लगवाए थे. बादशाह जहांगीर ने लिखा है, उसे सभी फलों में आम सबसे अधिक पसंद था.

मन में विचार आ रहा है- हमारे जीवन में रचा-बसा, रसीला आम आखिर पैदा कहां हुआ? देखा, पढ़ा तो पता चला, हमारे देश के पूर्वी भाग यानी असम से लेकर बांग्लादेश और म्यांमार तक के इलाके को आम की जन्मभूमि माना जाता है. भारत से आम दुनिया के दूसरे देशों में फैल गया. चौथी और पांचवी सदी में आम बौद्ध भिक्षुओं के साथ मलाया और पूर्वी एशिया के अन्य देशों में पहुंचा. कहते हैं, पारसी लोग 10 वीं सदी में इसे पूर्वी अफ्रीका ले गए. पुर्तगाली लोगों के साथ आम सोलहवीं सदी में पूर्वी अफ्रीका और फिर ब्राजील पहुंचा. ब्राजील में यह खूब फला-फूला. वहां से हमारा यह स्वादिष्ट फल वेस्ट इंडीज पहुंचा. फिर जमैका और मैक्सिको में इसने अपनी जड़ें जमा लीं. डॉ. हेनरी पेरिन. ने सन् 1833 में युकाटान, मैक्सिको से आम की पौध अमेरिका के फ्लोरिडा राज्य को भेजीं. लेकिन, रेड इंडियनों ने डॉ. पेरिन की हत्या कर दी. फिर, उन पौधों को कौन पालता? वे सूख गए. उसके बाद सन् 1861 में वहां आम उगाया गया. वहां आम अपनी जन्मभूमि की तरह ही खूब फला-फूला. आज आम दुनिया के तमाम देशों में उगाया और खाया जा रहा है.

भारत से भले ही आम दुनिया भर में फैल गया, लेकिन आज भी दुनिया में इसकी सबसे अधिक खेती हमारे देश में ही की जाती है. इसकी एक से बढ़ कर एक किस्में हैं. और, वे एक-दो नहीं हजारों हैं. इतनी कि आम के नाम सुनने वाला सुनता ही रह जाएगा. और मुंह में पानी भर आएगा. कुछ नाम ये रहेः दशहरी, चैसा, लंगड़ा, सफेदा, बंबइया, बंगलौरा, गुलाब खास, जर्दालू, फजली, समर बहिश्त चौसा, नीलम, सुवर्ण रेखा, बंगनपल्ली, पैरी, मलगोवा, मल्लिका, अल्फांसो, आम्रपाली.. यानी, देश के हर कोने में हर किसी के लिए आम की कोई न कोई किस्म जरूर है. उत्तर हो या दक्षिण, पूरब हो या पश्चिम, आम के मौसम में हर जगह आम की बहार आ जाती है.

किस्म-किस्म के आमों के किस्से भी बहुत मजेदार हैं. ‘लंगड़ा’ को ही ले लो. भला, लंगड़ा किसलिए? इसलिए कि इस किस्म के आम का पहला पेड़ बनारस में एक लंगड़े फकीर बाबा के घर के पिछवाड़े में उगा था! वहीं से चारों ओर फैला. और, स्वादिष्ट दशहरी? यह लखनऊ के पास मलीहाबाद के दशहरी गांव में पैदा हुआ. इसका, स्वाद इतना अच्छा था कि आम लोगों ने तो इसे मुंह लगाया ही, लखनऊ के नवाबों और वजीरों ने भी इसे गले लगाया. मलीहाबाद तहसील के ही चैसा गांव में लोगों ने जब पहली बार एक अलग स्वाद और सुगंध वाला आम चखा तो उसका नाम ‘समरबहिश्त चौसा’ रख दिया! और, फजली फजली क्यों कहलाया? कहते हैं, बिहार के भागलपुर गांव में एक औरत थी- फजली. पहली बार उसी के आंगन में फला-फूला था यह आम. इसे पालने-पोसने वाली फजली के नाम पर यह फजली कहलाया. भागलपुर गांव से यह पूरे बिहार में ही नहीं, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और पंजाब तक फैल गया.‘कलम’ के इस कारीगर के लिए कलमकार हरीश चंद्र पांडे ने भी क्या खूब लिखा है कि उनकी कलम चूसने को जी करता हैः

सब कुछ दिल्ली में ही नहीं सोचा जा सकता
कुछ मलीहाबाद में भी सोचा जा सकता है
कुछ ऐसे जैसे कि दशहरी आम के पेड़ पर
क्या फलाया जा सकता है लंगड़ा आम
क्या आम्रपाली के साथ फलाया जा सकता है बंबइया
क्या विलायती, देशी, अब्दुल हक, चौसा, रामकेला,
पुखराज, बंगलौरा
सबकी सब प्रजातियां फलाई जा सकती हैं,
एक साथ, एक पेड़ पर
कुछ ऐसा ही सोचता है कलीम उल्ला खान
इस छोटी सी जगह मलीहाबाद में – हरीश चंद्र पांडे

आम की उम्र कितनी होती होगी? प्रसिद्ध वैज्ञानिक और लेखक डॉ. एम.एस.रंधावा ने लिखा है कि बहुत पहले चंडीगढ़ के बुड़ैल गांव में आम का एक विशाल पेड़ था. उसकी उम्र 100 वर्ष से भी अधिक थी. उसका तना 9-75 मीटर मोटा था और पेड़ 2,258 मीटर क्षेत्र में फैला हुआ था. एक साल में उससे करीब सोलह-सत्रह टन फल मिलते थे. कहते हैं, फिलीपींस में भी आम का एक ऐसा ही 100 वर्ष से अधिक उम्र का पेड़ था जो हर साल दस से पंद्रह हजार फल देता था. एक साल तो उसमें 35,000 फल लगे. वह पेड़ 1,350 वर्ग मीटर में फैला हुआ था.

विदेशी लोग यह देख कर हैरान रह जाते हैं कि किस्म-किस्म के खट्टे-मीठे आमों का स्वाद हम किस-किस रूप में चखते हैं. कच्चे आम की चटनी और अचार बना लेते हैं. पके हुए देशी आम को मजे से चूस लेते हैं और कलमी आम को सफाई से काट कर सलीके से खाते हैं. लू की लपटों से बचने के लिए आम का ‘पना’ बना लेते हैं तो पके फलों को दूध में घोट कर मैंगो शेक, तैयार करते हैं. आम के रस और गूदे के अमावट यानी आम-पापड़, अंबापोली और आम-पट्टी बना लेते हैं. आम का स्क्वैश, जैम, जेली और मुरब्बा भी बनाया जाता है. आम में विटामिन ‘ए’, विटामिन ‘सी’ और कई खनिज होते हैं. इसलिए, आम आम होकर भी बहुत खास फल है.

देवेंद्र मेवाड़ी

लोकप्रिय विज्ञान की दर्ज़नों किताबें लिख चुके देवेन मेवाड़ी देश के वरिष्ठतम विज्ञान लेखकों में गिने जाते हैं. अनेक राष्ट्रीय पुरुस्कारों से सम्मानित देवेन मेवाड़ी मूलतः उत्तराखण्ड के निवासी हैं और ‘मेरी यादों का पहाड़’ शीर्षक उनकी आत्मकथात्मक रचना हाल के वर्षों में बहुत लोकप्रिय रही है.

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