“देख शेखू ये बात कुछ ठीक नहीं लग रई!”
कार्यक्रम शुरु हुए आधा घण्टा हुआ था और मुझे शेखू दुबे से कही गई अपनी बात रह-रह के याद आ रही थी. तब शेखू दुबे ने कहा था- फिकर की कोई बात न है. पर अब फ़िक्र बहुत जोर की आ रही थी. मैंने फिर प्रयास करने का सोचा. मैं ऑडिटोरियम के पीछे वाले दरवाज़े से निकलने के लिये झुक के आगे बढ़ा, जैसे अकबर बाश्शा के क़रावल दस्ते का फौजी हूँ. बाहर इस बार कोई नहीं दिखा. मैं सोचालय जाने के लिए दाहिने मुड़ा तो सामने यमराज टाइप दो सितारे वाले एक महामल्ल खड़े थे. जैसे महाराणा के किसी सरदार ने धर लिया हो, अपनी वही हालत हो गई.
“कहाँ जा रहे हो?”
“वो..वो… फ़िक्र आई थी जोर की!”
“कार्यक्रम के पहले घण्टे में किसी को कक्ष छोड़ने की अनुमति नहीं है. साहब का ऑर्डर है.”
“कक्ष है कि परीक्षा कक्ष?”
“तुम तो परीक्षा कक्ष मानो बल.”
मैं मुड़ ही रहा था कि देखता हूँ अपने झकमोला भाई को दो सिपाही पकड़े ले जा रहे हैं. मैं चिल्लाया, “अरे वो मेरा दोस्त है झकमोला. उसे क्यो पकड़ा?“
“वो सोचालय की दीवार से पीछे कूद कर भाग रहा था, पकड़ गया.” स्कंध तारक यमराज अंकिल ने बताया.
“साले झकमोले, पौढ़ी की पहाड़ियों में पद्य लिखने से शांति न मिली थी तुझे, जो यहाँ पुलिस वालों की किताब के विमोचन में पुलिस लाइन में आकर फँसा? कोई गढ़वाली कितनी भी बातें कर ले ग्राम विकास की, कितना भी जड़ों की ओर लौटो का नारा लगा ले, पर अंदर से सबको देहरादून वाला बनना है.” मैंने आवाज़ लगा कर कहा.
“अपनी सोच प्रिय. मैं तो आजाद करके गिरफ़्तार हुआ हूँ.” झकमोला मुझे ठेंगा दिखा कर चला गया.
मैं वापस अंदर आ कर बैठ गया. पुलिस ने ऑडिटोरियम को चारों ओर से घेर रखा था. उत्तराखंड पुलिस के इफ़्तिख़ार हर दरवाज़े पर तैनात थे. मुझे प्रोग्राम पर शुरू से ही शक था. जब शेखू दुबे ने प्रोग्राम का आमंत्रण दिया था तभी मैंने कहा था कि देख शेखू ये बात कुछ ठीक नहीं लग रही. पुलिस लाइन में किताब के विमोचन की क्या ज़रूरत है. और वो भी पुलिस वाले की किताब? कहीं फँस-फँसा गए तो? शेखू ने कहा कि चिंता की कोई बात नहीं है, अपने चाचा जी लाइन के आरआई हैं. फिर मैंने पूछा- कार्यक्रम में पेशेवर, वरिष्ठ, कनिष्ठ, अलग-अलग संघों के सदस्य, साहित्यकार भी तो आ ही रहे होंगे. देख शेखू, पिछले कुछ वर्षों में सोशल मीडिया पर साहित्यकारों की जो परस्पर कटाजूझ देखी है न; उनके नाम से ही दिल बैठा बैठा जाता है. साहित्यकारों ने वर्चुअल दुनिया में एक दूसरे के रियल कपड़े जम कर फाड़े हैं. अपन तो अब भयाक्रांत टाइप के रहते हैं. शेखू बोला- न,न, कोई पेशेवर पोएट नहीं बुलाया है, तू बस आ जा. और शेखू के बहकावे में आ कर मैं देहरादून की पुलिस लाइन तक आ पहुँचा.
सबसे पहले तो हमारे लेखक अमित दा खुद मंचासींग हो गए, फिर नितिन भाई को भी उन्होने मंचासींग कर लिया. और फिर दोनों गढ़वालियों ने बिना सींग वाले सिरिकान्त को बिठाल्लिया. तो दो मंचासींग, और एक बिना सींग वाला. मैंने खुद से कही, “प्रिय बेट्टे कुछ गड़बड़ है. इस कार्यक्रम से पुलिसिया तानाशाही की बू आ रही है.”
तभी चार अंकिल जी स्टेज की ओर बढ़े. सुफैद बालों युक्त हर शहर में पाए जाने वाले ये वही अंकिल लोग थे जो नीचे बैठते ही नहीं. जिन्हें हर बार मंचासींग होना होता है. जो मानते हैं कि उनके सींग मंचा होने के लिये ही बने हैं. दो अंकिल तो कैंची भी धर के लाए थे. हाथ मे कैंची ले कर पूछने लगे- “फीता किधर है, फीता किधर है?”
वे उमर के हिसाब से बोलते थे. अस्सी वाला अस्सी मिनट और सत्तर वाला सत्तर. उनको मंच के आसपास देखते ही श्रोताओं के हँसी-ठहाकों के सब सोते सूख गए. पहली बार लोगों ने चीखने की बजाय एक-दूसरे के कान में कहा- त्राहिमाम, त्राहिमाम.
दरअसल वे माइक-पकड़ थे. जिस तरह कुछ लोग धरती-पकड़ होते हैं, उसी तरह कुछ लोग माइक-पकड़ होते हैं. वे माइक को ऐसे पकड़ते हैं जैसे कुत्ता टाँग पकड़ता है. लाख लाठी-डंडे मार लो पर छोड़ने को तैयार न हों. ऐसे ही एक बार एक मंचासींग ने ऐसा माइक पकड़ा कि छुड़ाने के लिए माइक में करंट दौड़ाना पड़ा था.
वे मंचासींग मंच पर चढ़े और चालू हो गए. रामचन्द्र शुक्ल और बाबू श्याम सुंदर दास पर लगातार बोलते हुए उनको चालीस मिनट हो गए. श्रोताओं की हालत खराब होने लगी. धीरे-धीरे लगने लगा कि साँस नहीं आ रही है. ऑडिटोरियम में ऑक्सीजन की कमी हो गई है. वे अब नई कहानी और नई कविता पर आ गए थे, और हमें लग रहा था कि हम वहीं बैठे-बैठे पुराने हो जाएँगे. लग रहा था कि अगर यूँ ही उनका भाषण चलता रहा तो ऑडिटोरियम से केवल अर्थियां ही बाहर निकलेंगी. कभी लगता कि छत हमारी छाती पर रखी है, कभी लगता कि मंच बहुत विशाल हो गया है और वे बहुत भीमकाय. चींटी जैसे हम श्रोता उनकी पतलून खींच कर उन्हें रोकने की कोशिश कर रहे हैं और वे भाषण दिए जा रहे हैं. फिर कभी लगता कि ऑडिटोरियम की दीवारें पास आती जा रही हैं और हम इसमें पिच कर मर जायेंगे. बोलते-बोलते वे उत्तर आधुनिक साहित्य पर आ चुके थे. लोगों की मुंडियाँ अपनी धुरी से स्वतंत्र होकर इधर-उधर लुड़क रही थीं.
कुछ वक्ता न जाने कौन सा स्तम्भन-मारन प्रयोग करते हैं कि श्रोता या तो जड़ बना बैठा रह जाता है या वहीं अचेत हो जाता है. लोग बोलना चाहते हैं पर बोल नहीं पाते. हिलना चाहते हैं पर हिल नहीं पाते. बस पुतलियां हिलती हैं और आँखें बार-बार घड़ी पर टिक जाती हैं. मैं तो अब उच्चाटन सीख रहा हूँ. वक्ता मंच से स्तम्भन करे और मैं इधर से जवाब में उच्चाटन दे मारूँ. इस मामले में उच्चाटन किया भी, पर दूसरी तरह से. कल्लू साउंड से बात करी. सौ की पत्ती लगी माइक में करेंट दौड़ाने में, पर उच्चाटन हो गया.
मैं तो कहता हूँ हर कार्यक्रम में, विशेष रूप से साहित्य वाले, माइक में करेंट दौड़ाते रहना चाहिये. बक्ता बोलेगा कि बस दो मिनट और लूँगा आपकाsss, या आखिरी मुक्तक प्रस्तुत कर रहाsss… ईss… और करेंट खा कर वापस बैठ जाएगा.
तो वे सुफैद बालों वाले अंकिल जैसे ही मंच की ओर बढ़े, सीढ़ियों पर खड़े दो कलाश्निकोवधर मंचरक्षकों ने उन्हें रोक लिया और कहा कि ऊपर नहीं जा सकते, साहब का हुक्म है. वे बोले- “अरे, हमें विमोचन करना है. इस शहर के सारे विमोचन हम चारों में से ही कोई करता है. हम कैंची भी लाये हैं, फीता किधर है?”
उन मंचरक्षकों ने कहा- “ये विमोचन का कार्यक्रम नहीं है. यहाँ कोतवाल का हुक्का पुस्तक पर परिचर्चा होगी. आप आज आगे की कुर्सियों से ही सन्तोष करिये.” वे क्रोध में बड़बड़ाते हुए कि बिना विमोचन की किताब ऐसे ही है जैसे बिना दष्ठौन का बच्चा, अपनी सीटों पर बैठ गए. मुझे लगा तानाशाही ही अच्छी व्यवस्था है. पुलिसिया तानाशाही की जय हो. लोग उन भाषणबाज अंकिलों से इतने त्रस्त थे कि ज़ोर-ज़ोर से तालियाँ बजाने लगे.
कार्यक्रम शुरू हुए आधा घण्टा हो चुका था. मैं बेचैन बैठा था कि तभी मुझ पर बिजली सी गिरी. मंच से मेरा नाम पुकारा जा रहा था कि वे आएँ और पुस्तक की कुछ कहानियों का पाठ करें. मैंने मुड़ कर देखा तो शेखू दुबे मुस्कुरा रहे थे. ये ज़रूर उन्हीं की साजिश थी.
मैंने 376पेलूराम, नफ़री, प्रत्यायोजित अधिकार जैसी कुछ मनपसंद कहानियां पढ़ीं. पढ़ कर नीचे उतरा तो फिर बिजली गिरी, पर इस बार शेखू दुबे पर. अब मुस्कुराने की बारी मेरी थी. शेखू दुबे को उठा कर मंच पर धकेल दिया गया. उसके बाद बारी थी श्रोताओं के पुस्तक के बारे में अपने विचार रखने की. पहले सब बरातियों की तरह शर्माते रहे. कोई नाचने को तैयार नहीं था. फिर वसुंधरा का भोग करने वाले हमारे जैसे वीरों ने मोर्चा संभाला.
साथियों जिस तरह से जम्हाई देख कर जम्हाई आती है, उसी तरह बोलाई देख कर बोलाई आती है. किसी को सोशल मीडिया पर कुछ लिखते देखें, या किसी को माइक पर कुछ बोलते देखें, देखते ही सीने में सुलगते हैं अरमां हो जाता है. और उन सुफैद बालों वाले अंकिल जी के अरमां तो कब से सुलग रहे थे. मौका मिलते ही वे जनता की तरफ़ से बोलने खड़े हो गए. पर जनता भी तैयार थी. इस बार जनता ने करतल ध्वनि से उनका उच्चाटन कर दिया. बताते हैं इसके पीछे शेखू दुबे की साजिश थी. फिर कुछ अन्य लोग भी मचल गए, जिनकी पत्नियां उनको कोहनी मार रही थीं कि तुम भी बोलो. इधर मेरी फ़िक्र का विमोचन बाकी था. मैं शेखू दुबे के दूर के चाचा आरआई साहब के पास गया तो उन्होंने कहा- “कौन शेखू दुबे?”
मैं फिर शेखू दुबे पर फट पड़ा- “सब तुम्हारे चक्कर मे हो रहा है, पुलिस वाले की किताब पर चर्चा में पुलिस लाइन आ गए. कल को कोई जेलर जेल में पुस्तक का अनावरण करे तो वहाँ भी पहुँच जाना.“
शेखू ने कहा- “तुम भी तो आए हो प्रिय.”
“यार किताब के कारण भावनाओं में बह गया. और मुझसे ज्यादा वो पुलिस वाले बहे, जिन्होंने इसे पढ़ा. एक डेंजर दरोगा जी तो सुबक-सुबक कर रोए. एक डीएसपी साहब किताब पढ़ के बोले- मम्मी की याद आ रही है, मुझे घर जाना है. एक एसपी साहब बोले- ये किताब नहीं है. ये पुलिस के दर्द भरे नग़मे हैं.”
इधर पत्नियों की कोहनियों से ट्रिगर हुए वक्ता मोर्चा संभाले थे. एक विषय, जिस पर प्रत्येक व्यक्ति भर पेट बोल सकता है, वह है- पुलिस. जैसा कि होता है, बात कोतवाल के हुक्के से शुरू हुई और पुलिस सुधार, धर्मवीर आयोग तक जाने लगी. रायता फैलता देख चतुर पुलिस ने वही किया जो हर बार करती है. पुलिस ने प्रशासन के आदमी को आगे खड़ा कर दिया. रयाल सर को मंच पर आना पड़ा.
रयाल सर ने अपने प्रखर व्यक्तित्व, तार्किक आलोचना और नुकीली मूछों से मंचासींगों के सींग छिन्न-भिन्न कर दिये. उनके भाषण में धारा 144 का असर था. सभागार खामोश हो गया.
सूचना विभाग के प्रमुख चौहान साब ने ख़ालिस और धाराप्रवाह उर्दू में अपनी बात रखी. ऐसी शीरीं जुबां, पिघलती हुई सी उर्दू, जैसे फ़िरनी हो. ख़ास बात ये थी कि उनके नुक्ते हर बार सही जगह टप्पा खाते थे. उर्दू तो हम सभी बोलते हैं, पर हिंदी बोलने वाले के सभी नुक्ते सही जगह गिरें, असम्भव है. थोड़ी लाइन-लेंथ गड़बड़ाती ही है. पर उनका वाचन अद्भुत था. वे ज़रूर बड़े मुशायरा लूटक होंगे.
उनियाल जी का काव्यांश प्रकाशन एक नया प्रकाशन है. नये प्रकाशन का प्रकाशक लड़की के पिता की तरह होता है जो बरातियों से पूछता रहता है- कहीं कोई कमी तो नहीं रही. शेखू दुबे ने पेटीज़ भरे मुँह से कहा- “बहुत बढ़िया इंतज़ाम है, बस ढोकला इधर नहीं आया.”
कार्यक्रम की समाप्ति के समय ऋषि प्रियोस्की भी वहाँ पधारे गए. उन्होंने कहा- “मैंने ये पुस्तक पढ़ी है. ये किताब पुलिस की समाज के विरुद्ध एफआईआर है. जब पुलिस समाज के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज कराएगी तब इस किताब को आगे रख कर कहेगी- फरियाद करती हूँ, रिपोर्ट दर्ज की जावे.” यह कह कर प्रियोस्की ऋषि अंतर्ध्यान हो गए.
कार्यक्रम समाप्त हुआ. राहत मिली. मैंने भी अपनी फिक्र का विमोचन किया.
(Kotwal Ka Hukka)
मूलतः ग्वालियर से वास्ता रखने वाले प्रिय अभिषेक सोशल मीडिया पर अपने चुटीले लेखों और सुन्दर भाषा के लिए जाने जाते हैं. वर्तमान में भोपाल में कार्यरत हैं.
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