सावन का महीना शिवपूजा के लिए इसलिए पवित्र और महत्वपूर्ण होता है क्यूंकि सावन माह में पार्वती जी ने तपस्या की सफलता से ही शिव को प्राप्त किया था. तब से ही शिव इस माह अपने प्रेमी / भक्तों पर विशेष कृपा करते हैं. इसी लिए सावन माह में शिव अर्चन विशेष फलदाई है.
माना जाता है कि बागपत के पास निवास कर रहे, परशुराम ने सर्वप्रथम गढ़मुक्तेश्वर गंगा से गंगाजल लाकर सावन माह त्रयोदशी को पुरा महादेव (मेरठ ) मंदिर में जलाभिषेक किया. तभी से प्रत्येक वर्ष सावन माह त्रयोदशी के दिन पुरामहादेव में जलाभिषेक किया जाता है. प्रारंभ में यह जलाभिषेक गढ़ गंगा के जल से ही किया जाता था लेकिन धीरे-धीरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कांवड़िए गंगाजल के लिए हरिद्वार पहुंचने लगे धीरे-धीरे कांवड़ यात्रा हरिद्वार विशाल स्वरूप धारण करने लगी है. समय के साथ कांवड यात्रा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के साथ ही हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान आदि क्षेत्रों में भी कुछ ज्यादा लोकप्रिय हो गई, पुरामहादेव के साथ ही स्थानीय शिव मंदिरों में भी जलाभिषेक किया जाने लगा है.
1990 को कांवड़ यात्रा के विस्तार का साल भी कहा जाता है. 1990 के बाद ही सजी-धजी कांवड़ के साथ बाजार ने कांवड़ यात्रा में प्रवेश किया. छोटी जरीकेन, एक से रंग की कहानियों की ड्रेस बाजार ने ही विकसित की. धीरे-धीरे कांवड़ यात्रा अपने आधुनिक स्वरूप में विकसित हुई.
एक अन्य मान्यता के अनुसार हिमाचल में निवास कर रहे श्रवण कुमार की माता-पिता ने गंगा स्नान की इच्छा व्यक्त की तो श्रवण कुमार ने अपने माता-पिता को हरिद्वार स्थित मायापुर में गंगा स्नान कराने के उपरांत गंगाजल लेकर सावन माह में शिव मंदिरों में जलाभिषेक किया तब से भी कांवड़ की परंपरा मानी जाती है. इस वर्ष त्रयोदशी जलाभिषेक 30 जुलाई को है.
प्राचीन समय से कावड़ एक ही रूप में प्रचलित थी. वह रूप था दोनों कंधों पर श्रवण कुमार की भांती संतुलन बनाकर गंगाजल ले जाना. इस पद्धति के कांवडि़या बहुत विधि-विधान से और नियम संयम से छोटे-छोटे समूह में शिव भजन करते हुए शांति से कांवड़ ले जाते हुए दिखते हैं. यह कावड़िए अपनी पूरी यात्रा पैदल ही संपन्न करते हैं.
1990 के बाद कांवड़ का वाहन से कावंड़ स्वरूप ज्यादा प्रचलित हुआ है जिसमें एक वाहन में गांव और मोहल्ले के कावड़िए इकट्ठा होकर हरिद्वार तक आते हैं और वापसी में कुछ लोग गंगाजल को कंधे में रखकर पैदल-पैदल वापसी करते हैं. यह पैदल कावड़िए बदलते रहते हैं और उनका स्थान वाहन में बैठे कांवड़िए लेते हैं. वाहन से आ रहे कांवड़िए डी. जे. बजा कर खूब नाच गाना करते हुए जाते हैं वर्तमान में कांवड़ का यही स्वरूप सबसे अधिक प्रचलित है.
डाक कावड़ अथवा दौड़ती हुई कावड़ पिछले कुछ वर्षों से डाक कावड़ अधिक प्रचलित हुई है. डाक कावड़ में कांवड़ियों का समूह छोटे चार पहिया वाहन अथवा दो पहिया वाहन से हरिद्वार, नीलकंठ ऋषिकेश पहुंचता है और फिर यहां से अपने गंतव्य की दूरी को दिन और घंटे के लिहाज से तय कर, एक अथवा दो कावड़िए जल लेकर दौड़ते हैं पीछे-पीछे उनके वाहन दौड़ते हैं. जब एक कावड़िया थक जाता है तो दूसरा कावड़िया दौड़ते हुए कावड़िया से जल लेकर खुद आगे आगे दौड़ना शुरू कर देता है. इस प्रकार हरिद्वार से अपने गंतव्य तक लगातार दौड़ते-दौड़ते पहुंचकर ही गंगाजल पहुंचाया जाता है और शिवलिंग को अर्पित कर जलाभिषेक किया जाता है. कांवड़ का यह प्रकार ही डाक कावड़ कहलाता है.
जब किसी गांव अथवा मोहल्ले से कांवड़ियों का जत्था हरिद्वार अथवा गंगोत्री गंगाजल उठाने के लिए रवाना होता है बकायदा गांव के मंदिर में इन कांवड़ियों की पूजा होती है. विधि विधान के साथ इन्हें रवाना किया जाता है प्रत्येक जत्थे में एक मुखिया नियुक्त किया जाता है जो कि पूरे मार्ग में कांवड़ का संचालन करता है. किस स्थान पर कांवड़ को रुकना है, भोजन की कैसे व्यवस्था होनी है अथवा कितने किलोमीटर की यात्रा एक दिन में पूरी की जानी है, यह सारा प्रबंध मुखिया द्वारा किया जाता है.
एक बार कावड़ को उठाने के बाद फिर जमीन पर नहीं रखा जाता है और न ही किसी के द्वारा छूने से अपवित्र ही किया जाता है यदि किसी प्रकार की लघुशंका अथवा दीर्घ शंका की स्थिति उत्पन्न होती है तो कांवड़ को पेड़ अथवा अस्थाई रूप से पृथ्वी से ऊपर उठाए गए लकड़ी के अड्डे में ही टिका कर ही विश्राम अथवा लघुशंका, दीर्घ शंका करने का प्रावधान है. हर भोजन, लघुशंका, दीर्घशंका के उपरांत स्नान करने एवं कांवड़ की पूजा करने के बाद फिर से कांवड़ प्रारंभ की जाती है. अब प्रत्येक वर्ष लगभग 2 करोड़ कांवड़िए जल भरने के लिए हरिद्वार, नीलकंठ और गंगोत्री तक भी गंगाजल लेने पहुंचने लगे हैं.
एक सामान्य अनुमान के अनुसार प्रतिवर्ष 2 करोड़ कांवडि़या अब हरिद्वार में जल भरने पहुंचने लगे हैं. एक कांवड़िया अपने हरिद्वार प्रवास में 5 बार भोजन करता है. 300 से ₹500 के बीच कावड़ खरीदता है और सजाता है ₹300 का प्रसाद लेता है. इसप्रकार औसतन एक कांवड़ियों अपनी इस यात्रा में 2500 से ₹3000 हरिद्वार/उत्तराखंड में खर्च करता है. 2500 रू की औसत से 5000 करोड का कारोबार भी हरिद्वार मे होता है. कांवड़ पर बाजार की गहरी नजर है हर वर्ष लाखों की संख्या में नए गाने, रागणी जो भोले की बंदना पर आधारित होती है, बाजार में उतारी जा रही है . साथ ही हर वर्ष भोले के वेश के लिए नए-नए प्रकार की डिजाइनर ड्रेस भी बाजार में उतारी जा रही है . इस प्रकार कांवड़ 15 दिनों में व्यापारियों को अलग-अलग प्रकार से अरबों रुपए का कारोबार देता है.
क्योंकि कांवड़ उठाने अधिकांश युवा ही आते हैं जो जोश से भरे रहते हैं और कावड़ की पवित्रता को लेकर जो मान्यताएं हैं उसको लेकर कई बार राहगीरों, स्थानीय नागरिकों तथा प्रशासन से भी कांवड़ियों की हिंसक झड़पें हुई है. भीड़ की यह हिंसक मानसिकता तथा करोड़ों की संख्या में जब कावड़िए खुले में मल मूत्र का त्याग करते हैं तो कावड़ के बाद भीषण गन्दगी चारों ओर फैल जाती है जिसमें महामारी का खतरा बना रहता है यह कांवड़ यात्रा का काला पक्ष है.
हमारे फेसबुक पेज को लाइक करें: Kafal Tree Online
प्रमोद साह
हल्द्वानी में रहने वाले प्रमोद साह वर्तमान में उत्तराखंड पुलिस में कार्यरत हैं. एक सजग और प्रखर वक्ता और लेखक के रूप में उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी एक अलग पहचान बनाने में सफलता पाई है. वे काफल ट्री के नियमित सहयोगी.
काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री
काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें
Online Casino Utan Svensk Licens - Casino utan Spelpaus ▶️ SPELA Содержимое Var det är…
Slot Sites in GB - Mobile Access ▶️ PLAY Содержимое Why Mobile-Friendly Slots MatterThe Benefits…
Krypto-Casinos mit Boni in Deutschland ▶️ SPIELEN Содержимое Die Vorteile von Krypto-CasinosFlexibilität und VerfügbarkeitWie funktionieren…
Meilleur Casino en Ligne 2026 - Sites Fiables ▶️ JOUER Содержимое Les Meilleurs Casinos en…
Casinos en línea confiables en Argentina ▶️ JUGAR Содержимое ¿Qué son los casinos en línea?Los…
Bookmakers hors ARJEL en France - interface et navigation ▶️ JOUER Содержимое Les bookmakers hors…