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करवा चौथ पर श्री टेलीविजन को पत्र

श्री टेलीविजन जी,

आज करवा चौथ है. सो कल भीषण शापिंग के चलते मेरे शहर की सड़कें जाम थीं. बिल्कुल नई दुल्हन सा सजना होता है इसलिए सब कुछ नया चाहिए होता है. कांच की चूडियों को टूटने से बचाने के लिए सेफ्टी पिन और टूथब्रश भी.

जाम में फंसी दयनीय ढंग से सजी औरतें देखीं, ब्यूटीपार्लर श्रमिकों के घनघोर परिश्रम के बावजूद लटकते लोथड़ों, जीवन की सोहबत छोड़ चुकी त्वचा, झुर्रियों समेत वे ध्यान खींच पाने में विफलता के क्षोभ से चमकती आंखों से वे मेंहदी रचे, कुचीपुडी नृत्य की मुद्राएं बनाते हाथों को कारों की खिड़कियों से बाहर झुलाते निहार रहीं थी. सौंदर्य-विज्ञान की विफलता पर बेहद क्रोध आया कि वह इन अरमानों से उफनाती औरतों की सहायता क्यों नहीं कर सकता, इराक पर बम गिराने वालों की तो लाल-भभूका दृश्यावलियां रच कर करता है. क्रोध उन सुंदर लड़कियों पर भी आया जो सूरत का सत्यानाश कराकर गांवों की रामलीला में मुर्दाशंख पोते सेत्ता जी से मुकाबला कर रहीं थीं.

उनके भीतर आप थे. आप के भीतर वे थीं और सामने सोफों पर बैठे लाखों पुरूषों से संबोधित थीं. एक भी औरत किसी सोफे पर क्या मूढे या बोरे पर भी नहीं बैठी थी. वे मादा दर्शक नहीं चाहतीं थीं. क्योंकि वह रीझती नहीं, सराहती नहीं, ईष्याग्रस्त हो जाती है और विवाहेतर संबधों वाले सीरियलों के बारे मे बात करने लगती है.

निर्जला व्रत होगा. चलनी से चांद देखा जाएगा और उसी से पति को देखा जाएगा. तब भी वे आप ही के भीतर होंगी और उनके भीतर आप होंगे.

एक लड़की ने मेंहदी लगवा ली लेकिन कहा कि वह व्रत नहीं रहेगी. पड़ोसनें उसे कोसने लगीं. घर लौटते उसने अपनी दोस्त से कहा कि इनमें से कई की अपने पति से शाम ढलने के बाद बातचीत बंद हो जाती है. वे इस उम्मीद में सज रहीं हैं कि शायद, शादी की स्मृति ताजा हो जाए और रातों का जानलेवा सूनापन टूट जाए. मैं चाहता हूं कि ऐसा ही हो. लेकिन उस क्षण भी वे आप ही के भीतर रहना चाहती है.

मैने शहर आने के बाद या कहिए डीडीएलजे देखने के बस जरा पहले ही इस राष्ट्रीय से लगते पर्व का नाम सुना था. आज मेरी बूढ़ी मां ने अपनी बहू को धमकाया उस लफंडर के चक्कर में न आना वह तो मुझे जीऊतिया (इसका तत्सम वे भरें जिन्हें हिंदी से प्यार है) का व्रत भी नहीं रहने देना चाहता था. तू अपने सुहाग की फिक्र कर बेटी. आपने अपनी छवि-लीला से मनोरंजन-प्रिय उस किसान बुढ़िया का दिमाग भी धो डाला है जिसके कबीर-पंथी पिता यानि मेरे नाना ने उसे आत्मनिर्भर बनाने के लिए चरखा कातना सिखाया था और एक एक दम नया ब्लेड लाकर दिया था कि दाईयों का हंसिया छीन लिया करो और उनके साथ जाकर बच्चों की नाल काटो. बहुत सारी नन्हीं जाने टिटनेस से बचाई बाप-बेटी ने, चाचा नेहरू के जमाने में.

आपकी ताकत से आक्रांत पुलकित हूं कि काश आपने बस पढ़ना-लिखना और चांद, तारे, नक्षत्र, भाग्य, देवता, अपशकुन वगैरा को बस एक कदम पीछे हट कर गौर से देखना सिखा दिया होता. तो क्या होता? जरा सोचिए. भारत माता, गाय और ईश्वर के बीच में आपकी भी जगह होती.

इस चिट्ठी को शायद वे भी पढ़े जो अपनी पूंजी से उपग्रह और प्रसारण के अधिकार किराए पर लेकर आपको चलाते हैं. लेकिन आपके आगे अब उनकी भी खास औकात नहीं. आपकी टीआरपी पर रोकड़ा कदमताल करता है.

आपकी ताकत की बलिहारी हे चकमक चौकोर भस्मासुर. विध्वंसक लालसाओं के लहकावन.

जै हिन्द.

 

अनेक मीडिया संस्थानों में महत्वपूर्ण पदों पर अपने काम का लोहा मनवा चुके वरिष्ठ पत्रकार अनिल यादव बीबीसी के ऑनलाइन हिन्दी संस्करण  के लिए नियमित लिखते हैं. अनिल भारत में सर्वाधिक पढ़े जाने वाले स्तंभकारों में से एक हैं. यात्रा से संबंधित अनिल की पुस्तक ‘वह भी कोई देश है महराज’ एक कल्ट यात्रा वृतांत हैं. अनिल की दो अन्य पुस्तकें भी प्रकाशित हैं.

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Girish Lohani

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