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इस्मत चुग़ताई की कहानी : तो मर जाओ

“मैं उसके बिना जिन्दा नहीं रह सकती!” उन्होंने फैसला किया. (Toh Mar Jao)

“तो मर जाओ!” जी चाहा कह दूँ. पर नहीं कह सकती. बहुत से रिश्ते हैं, जिनका लिहाज करना ही पड़ता है. एक तो दुर्भाग्य से हम दोनों औरत जात हैं. न जाने क्यों लोगों ने मुझे नारी जाति की समर्थक और सहायक समझ लिया है. शायद इसलिए कि मैं अपने भतीजों को भतीजियों से ज्यादा ठोका करती हूँ.

खुदा कसम, मैं किसी विशेष जाति की तरफदार नहीं. मेरी भतीजियाँ अपेक्षाकृत सीधी और भतीजे बड़े ही बदमाश हैं. ऐसी हालत में हर समझदार उन्हें सुधारने के लिए डाँटते-फटकारते रहना इन्सानी फर्ज समझता है.

पर उन्हें यह कैसे समझाऊँ. वे मुझे अपनी शुभचिन्तक मान चुकी हैं. और वह लड़की, जो किसी के बिना जिन्दा न रह सकने की स्थिति को पहुँच चुकी हो, कुछ हठीली होती है, इसलिए मैं कुछ भी करूँ, उसके प्रति अपनी सहानुभूति से इनकार नहीं कर सकती. अनचाहे या अनमने रूप से सही, मुझे उनके हितैषियों और शुभचिन्तकों की पंक्ति में खड़ा होना पड़ता है.

दुर्भाग्य से मेरा स्वास्थ्य हमेशा ही अच्छा रहा और बीमार होकर मुर्गी के शोरबे और अंगूर खाने के मौके बहुत ही कम मिल पाये. यही कारण था कि शायद कभी प्राण-घातक किस्म का इश्क न हो सका. हमारे अब्बा जरूरत से ज्यादा सावधानी बरतने वालों में से थे. हर बीमारी की समय से पहले ही रोक-थाम कर दिया करते थे. बरसात आयी और पानी उबाल कर मिलने लगा. आस-पास के सारे कुँओं में दवाइयाँ पड़ गयीं. खोंचे वालों के चालान करवाने शुरू कर दिये. हर चीज ढँकी रहे. बेचारी मक्खियाँ गुस्से से भनभनाया करतीं, क्या मजाल जो एक जर्रा मिल जाये. मलेरिया फैलने से पहले कुनेन हलक से उतार दी जाती और फोड़े-फुंसियों से बचने के लिए चिरायता पिलाया जाता.

इश्क-मुहब्बत की रोक-थाम के लिए न जाने उन्होंने कौन से जोशाँदे पिला रखे थे कि किसी भी बहन भाई को घातक किस्म का इश्क न हो पाया. यों ही कभी जुकाम, खाँसी, मामूली बदहजमी की तरह किसी को इश्क हो गया तो बुजुर्गों ने हँस कर टाल दिया. न एक दम सम्बन्ध विच्छेद करने की धमकियाँ मिलीं, न जहर खाने की नौबत आयी. लोग कहते हैं, जब किसी को इश्क का रोग लग जाता है, तो खाना-पीना और सोना हराम हो जाता है. पर हमारा खानदान अजीब था कि उसमें जब कोई जरूरत से ज्यादा हँसता खेलता और मोटा होता पकड़ा जाता तो आम तौर पर वह इश्क का रोगी निकलता–इसलिए जैसा वे कहती हैं, मुझे उनके दर्द का अन्दाजा नहीं. उन्हें निहायत घातक किस्म का इश्क है और मैं हँस रही हूँ.

मुझे याद है कि हम लोग एक बार पुरानी फिल्म ‘हीर राँझा’ देखने गये थे. जब राँझा साहब की मरम्मत हुई तो हम लोग बेतहाशा हँसने लगे. हमारे गिर्द बैठी भीगी आँखों वाली पब्लिक ने हमारी कुरुचि पर घृणा प्रकट की.

लेकिन मेरी दोस्त, मेरी सहेली अपने प्रेमी के बिना जिन्दा नहीं रह सकतीं. वह उन्हें जलाता है, कलपाता है, अपमानित करता है. वे प्रेमी के द्वार पर सीस नवाने के लिए जाती हैं तो दरवाजा बन्द कर लेता है.

“मैं तुम्हारे बिना जिन्दा नहीं रह सकती.” वे हजार बार उससे कहती हैं.

“मैं तुम्हारे साथ जिंदा नहीं रह सकता.” वह हजार बार जवाब देता है. तब वे रोती हैं, जान देने की धमकियाँ देती हैं, पर वह कानों में तेल डाल लेता है. वह उसके सारे दोस्तों और जान-पहचान के लोगों से प्रार्थना कर चुकी हैं. एक इन्सान की हैसियत से उन्हें जिंदा रहने का अधिकार है. ये प्रगतिशील लोग एक भावुक लड़की की तमन्नाओं का खून होते कैसे देख सकते हैं. जी हाँ, दुर्भाग्य से मैं भी प्रगतिशील लोगों में गिन ली गई हूँ. और मुझ पर भी यह इल्जाम है कि मैं हरगिज प्रगतिशील नहीं हूँ, क्योंकि मैं अपनी ही जैसी एक औरत का दिल टूटते देखती हूँ और मेरे कान पर जूँ तक नहीं रेंगती.

साहब, मैं अपने कान पर जूँ छोड़ हाथी रेंगाने को तैयार हूँ, मगर खुदा के लिए कोई बताये, मैं उनके आशिक बल्कि माशूक को किस तरह उनके लिए फाँस सकती हूँ. काश, वह एक मर्तबान होता या मिट्टी का प्याला, तब या तो मैं अपनी प्यारी दोस्त के लिए उसे खरीद लाती, अजायब घर में होता तो चुरा लाने की कोशिश करती. मगर वह तो निहायत ढिठाई से मोटर में दनदनाता फिरता है. हवा को कौन मुट्ठी में बाँध सकता है. धूप को कैद करने का यंत्र अभी तक भारत में तो ईजाद नहीं हुआ और न इम्पोर्ट हुआ है. इस छलावा किस्म के आशिक को कौन घेर कर उनके दरबे में हाँक सकता है?

कसूर उस छलावे का भी है. दिल-फेंक किस्म का आदमी है. एक बार उसने इनकी तरफ भी छक्का मार दिया था. मीठी-मीठी बातें उनके कानों में उँड़ेल दी थीं. उन्हें लिये-लिये भी घूमता था. उन्हें सर्दी लग रही थी, तो स्वेटर खरीद कर पहना दिया. पेड़े खिलाये और शायद चूमा-चाटा भी होगा. ये सब तो वह जिन्दगी का फर्ज समझ कर हर महीने एक-न-एक नयी लड़की के साथ किया करता है. अगर वह उन सब लड़कियों से किये गये वायदे पूरे करता तो अब तक पूरी हरम भर जाती. इतना तो एक मोटर और अच्छी आमदनी का मालिक राह चलते करता ही रहता है. अब हर राह-चलता अगर उसके पीछे काजी और सेहरा लेकर दौड़ता फिरे तो बेचारा दम न तोड़ दे.

वह सेहरा और काजी काफी न समझ कर मुझे भी समधिन बनने पर मजबूर करना चाहती हैं. मुझे समधिन बनने से चिढ़ है. दुल्हा और दुल्हन तो एक दूसरे को मिल जाते हैं, समधिनों को सिर्फ गालियाँ मिलती हैं या फिर फूलों की छड़ियाँ, जिनमें फूल कम और छड़ियाँ ज्यादा होती हैं.

मेरी एक और सहेली को भी इश्क के रोग ने आ घेरा था. उनके आशिक ने आदत के मुताबिक उन्हें सब्ज बाग दिखाये मगर शादी नहीं की. कुछ गड़बड़ हो जाती तो अस्पताल ले जा कर इलाज करवा देता. वे इस इलाज से ही संतुष्ट थीं. इलाज के दौरान वह अपने आशिक की बीवी कहलाती थीं. वैसे वह उनके बड़े लाड़ करता था. सारी तनख्वाह हाथ में थमा देता था. सियाह-सफेद की वे मालिक थीं. मगर पक्का कागज करने से दम चुराता था. मेरी बदकिस्मती कहिए या शामत, जब चौथी बार गड़बड़ हुई और अस्पताल जाने की नौबत आयी तो वे आदत के मुताबिक रोती-पीटती मरहम-पट्टी के लिए मेरे पास आयीं.

“मत जाओ अस्पताल.” मैंने योंही बे-सोचे-समझे राय दी.

“ऐं?” वह चौंकीं, “मगर बच्चे कौन पालेगा?”

“उसका बाप पालेगा.”

“मगर बदनामी जो होगी.”

ओफ्फोह! मेरा जी जल गया. “यानी आप अब बड़ी नेक-नाम हैं. आये-दिन जूते मार-मार कर सड़क पर ढकेल कर कुंडी लगा लेता है. दूसरी लड़कियों की खातिरें करता है. आप सड़क पर मंडराया करती हैं. सामने होटल में बैठी इन्तजार करती हैं कि कब नयी लड़कियाँ पिट कर बाहर निकले और वह हँस पड़े तो कतई बदनामी नहीं होती.

“तुम उससे मुहब्बत करती हो?” मैंने पूछा.

“यह भी कोई पूछने की बात है.”

सचमुच पूछने की बात नहीं थी. वह उस मरखने बैल के लिए अपनी बच्ची और पति तक को छोड़ आयी थी. जिसने हिल कर पानी नहीं पिया था, वह उस जालिम के लिए चूल्हा झोंकती थी. उसके बिसाँदे कपड़े धोती थी. शराब पी कर इतना मारता कि उत्तू बना देता. यह सूजा हुआ मुँह लिये उसकी सेवा में लगी रहती, इसलिए कि अस्पताल में भरती कराते वक्त वह उन्हें अपनी ‘मिसेज’ बताता था.

”तो फिर उसका बच्चा नहीं पाल सकोगी?”

वे सोच में पड़ गयीं और थोड़े दिनों बाद एक दम उनकी शादी हो गयी. हम दौड़े-दौड़े गये बधाई देने. मियाँ बीवी दोनों ने बड़ी ही उपेक्षा से हमारी तरफ देखा और फ्लैट में ताला डाल कर सिनेमा चले गये और हम भौंचक्के रह गये कि हमने तो तरकीब बतायी और हम ही दूध की मक्खी बने. मालूम हुआ, दूल्हा इस लिए खफा था कि हमने लड़की को बहका कर उसे फँसा दिया. दुल्हन इसलिए नाराज कि हमने उसकी बड़ी-बड़ी दुर्गति देखी थी और अब वह निहायत ऊँची सोसाइटी में उठना-बैठना पसन्द करती थी और हम उसके भयानक अतीत की यादगार थे.

इस्मत चुगताई की विवादित कहानी ‘लिहाफ’

दूल्हा कुछ दिन बाद फिर मरखना बैल बन गया. उन्हें मारता है. नयी लड़कियों से दोस्ती करता है. पहले शायद उसकी आत्मा धिक्कारती थी कि एक मजबूर औरत को रखेल की जिल्लत दे रखी है. अब उसका दिल साफ है और शरीफ आदमियों की तरह उसे ठोकता है और रुपया ऐश में उड़ाता है.

हालाँकि यह नुस्खा एक बार उल्टा पड़ चुका था. पर अपना पीछा छुड़ाने के लिए मैंने फिर अपने आशिक के बिना जिंदा न रह सकने वाली अपनी दोस्त को थमा दिया.

वह बहुत गुस्सा हुईं, “क्या समझती हो उन्हें!”

मैंने देखा यह नुस्खा इस्तेमाल नहीं करेंगी. बस वहीं जमा दिये पैर ताकि खुद जिम्मेदारी से अलग हो जाये. लोग कहेंगे, मैं मासूम लड़कियों को कितनी गलत सलाह देती हूँ. मैं सचमुच बहुत लज्जित हूँ. दरअसल मैं इश्क के मामले में निहायत थर्ड क्लास सलाहकार हूँ. मैंने इश्क को हमेशा दिल और दिमाग को तरावट देने वाली चीज समझा है. मैं प्लेग और हैजे की तेजी रखने वाले इश्क के सिलसिले में जहरे-कातिल हूँ.

“मेरी मुहब्बत पाक और रूहानी है.” उन्होंने अभिमान से गर्दन ली.

“मुहब्बत हमेशा ही पाक होती है.”

‘एक वेश्या की मुहब्बत भी?” वे जल गयीं.

”वह सब से ज्यादा पाक और पवित्र होती है.”

“जिस्म बेचने को पाक-पवित्र मानती हैं?”

“व्यापार का नहीं, मुहब्बत का जिक्र था. रहा रूहानी इश्क तो उससे क्या मतलब है—पूजा?”

“हाँ.” वे जोश से झूम उठीं.

“तो कौन मना करता है. पूजा करो…डट कर करो. इसमें उस नकचढ़े से इजाजत लेने की क्या जरूरत है? वह कर भी क्या सकता है. और रूहानी मुहब्बत में निकाह की क्या जरूरत है? क्या खयाल भी हरामी हलाली हुआ करता है. तुम शौक से उसे अपना रूहानी शौहर बना लो. वह तुम्हारे चंगुल से नहीं बच सकेगा.”

“आप नहीं समझतीं.”

“मैं खूब समझती हूँ. मुझे खुद सहगल से इश्क था. उसकी आवाज सुन कर कलेजा निकल पड़ता था. मोतीलाल से इश्क था, अशोक कुमार ने नींदे उचाट कर दी थीं. और तो और किसी जमाने में गुरुदेव टैगोर से इश्क हो गया था. जी चाहता था, जोगिन बन कर शांति निकेतन में जान दे दूँ. शरत बाबू अगर मुझे हुक्म देते कि एक टाँग से खड़ी रहो तो मुझे एतराज न होता. किसी से कहना नहीं, मुझे पॉल राब्सन से तो ऐसा इश्क हुआ था कि खुदा की पनाह. उसके रिकार्ड सुन कर घंटों सर धुना है. अब भी खुदा की कसम ऐसे-ऐसे लोगों से इश्क है कि सोच कर रौंगटे खड़े हो जाते हैं. अगर किसी को मेरे आशिक-मिजाज दिल की दीदा-दिलेरियों का पता चल जाये तो अंधेर हो जाये. लोग मेरे नाम से भागने लगें और लोगों को सबक देने के लिए मुझे बीच बाजार में दुर्रे लगाये जायें.. मगर उनमें से किसी सूरमा से शादी का शौक नहीं. अगर उन लोगों की किसी भी हरकत से मुझे उनकी बदनीयती का शक हो जाय तो मैं इज्जत का दावा कर दूँ. मेरी जान! शादी और इश्क को गड़मड़ न करो. क्या तुम समझती हो, शादी के बाद इश्क नहीं हुआ करता. मेरा तो खयाल है, इश्क सिर्फ मुर्दों को नहीं होता. मगर वह भी शायद मैं पूरे यकीन से नहीं कह सकती, क्योंकि मैं अभी मुर्दा नहीं हूँ.”

“आप मजाक कर रही हैं. रूहानी इश्क से मेरा यह मतलब नहीं है कि टैगोर से इश्क कर लिया जाय.…यह इश्क नहीं.”

“तो साफ कहो, इश्क से तुम्हारा मतलब शादी है, जिसमें महर और तलाक का हक भी रहे. तुम निरी बनिये को बेटी हो. सख्त व्यापारी जहनियत है. लैला होती इस वक्त तो इश्क की तौहीन करने के सिलसिले में तुम्हें अपने ऊँट के नीचे कुचल देती. मेरी सलाह मानो तो किसी से शादी कर लो. बेटे का नाम अपने नामाकूल आशिक के नाम पर रखो और उसे वक्त-बे-वक्त पीट कर अपने दिल की भड़ास निकाल लिया करो. आशिक से शादी करना सख्त बदमजाकी का सबूत है. बदमजाक लोग लेमन ड्राप को चबा कर निगल जाते हैं. लेमन ड्राप चूस कर खाने की चीज है. खुदा के लिए आशिक को गृहस्थी के जुए में न जोतो. जरा सोचो, दिलीप कुमार, जो हजारों दिलों की धड़कन बना हुआ है, मुस्तकिल तौर पर घर वाले के रूप में आ डटे तो फिर दिल किसके लिए धड़के? यकीन मानो, वह भी इन्सान है. खाता है, पीता है, सोता है, लड़ता है, कुंजियाँ खो देता है, कागज बिखेरता है, वादा खिलाफियाँ करता है, सिनेमा के टिकट खरीद कर भूल जाता है और यकीन मानो जैसे मधुबाला और वैजन्ती माला के लिए खुदकुशी करता फिरता है, आहें भरता है, बीवी के लिए नहीं भरेगा. दिल टूट जायेगा. क्या समझती हो तुम. कृष्ण चन्द्र से शादी कर लो! वह कभी तुम्हारी साड़ी महालक्ष्मी के पुल पर नहीं टाँगेगा, बल्कि निहायत भोंडेपन से अपनी कमीज टाँगते वक्त तुम्हारी साड़ी कीचड़ में गिरा देगा और उल्टा तुम्हें फूहड़ कहेगा. साहिर, हाथ आ जाये तो कभी तुम्हारे आँसू रेशमी आँचल से न पोंछेगा, न तुम्हारी मर्मरी बाँहों का सहारा लेगा. सरदार जाफरी से तो भूल कर शादी न करना. तुम्हारे बालों तक में किताबें और कागज भर देगा और वक्त-बे-वक्त इक्के वालों की तरह लड़ेगा. जरा भी अक्ल रखती हो तो खुदा के लिए इन आर्टिस्टों से शादी न कर लेना;, वरना सर पकड़ कर अपनी हिमाकत पर रोओगी. ये सपने हैं, इन्हें सच बनाने की कोशिश न करना. पति एक निहायत ठोस सच्चाई होती है.”

वे मेरी अक्लमंदी की बातों से रोब में आ गयीं. खुशी से मेरे हाथ पाँव फूल गये. कौन कहता है, मैं बेतुकी बात करती हूँ. एक इश्क की मारी लड़की को सच्चे रास्ते पर लगा दिया. अब यह धूम-धाम से शादी करेगी; बच्चे जनेगी, दुनिया सजेगी. भई मुझे तो कौम की लीडरी करना चाहिए.

मगर मेरी लीडरी के सपने गद-गद करके नीचे आ पड़े, जब मैंने सुना कि उसी शाम उन्होंने अपने बदजात आशिक के मोर्चे पर हमला बोल दिया. उसकी बीमार तिनका-सी अम्माँ को जू-जुत्सू के पहलवानी हाथ दिखाये. “यह मेरा घर है … मैं यहाँ से कभी नहीं जाऊँगी.” उन्होंने पक्की गृहस्थिन की तरह एलान किया, “तुम उसकी माँ नहीं डायन हो .. . उसकी कमाई पर नागिन बन कर बैठी हो.” हो सकने वाली बहू ने चीख-चीख कर कहा और बड़ी मुश्किलों से धक्के देकर उन्हें घर से निकाला गया तब निकलीं.

अब मेरी कमबख़्ती देखिए! जैसे ये सारे धक्के मेरी ही पीठ में लगे. लोग बिलकुल ठीक कहते हैं, मैं निहायत अहमक हूँ.

“मैं उसके बिना जिंदा नहीं रह सकती.” वे बड़े विश्वास से कहती हैं तो मुझे क्यों आपत्ति है? मैं उनसे कह क्यों नहीं देती—“तो मर जाओ!”

खैर, आइन्दा कह दूँगी! (Toh Mar Jao)

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Sudhir Kumar

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