फोटो केशव भट्ट
मौसम को करवट बदलते देख वापस हो लिए. मर्तोली गांव की गलियों में भटकने लगे. जिन गलियों में कभी बच्चे चहकते होंगे वो गलियां सूनसान सोयी हुवी सी महसूस हुवी. 200 मवासों का गांव आज सूनसान था. ज्यादातर मकानों की छतें व दीवारें टूट चुकी थीं. रागू की मजबूत लकड़ी से छत के लिए बनार्इ गर्इ बल्लियां ही बस बची दिख रही थीं. रागू नीचे बोगडयार में खूब होता है. इसे रेन ट्री (बरसाती पेड़) भी कहते हैं. इसकी लकड़ी मजबूत व टिकाउ होने के साथ ही वजन में हल्की होती है. जोहार में मकान बनाने के लिए बोगड्यार से ही रागू लकड़ी को लाते थे. तब जोहार के गांवों में शौकाओं की काफी चहल पहल रहती थी. शौकाओं की सामाजिक व्यवस्था का अपना अलग ही ढांचा था. तब गांव में प्रधान, सयाना व फौंजदार के नाम से पद बनाए गए थे. गांव में बुजुर्ग व ईमानदार व्यक्ति को प्रधान का पद तथा विद्वान व्यक्ति को सयाना का पद मिलता था. सयाना लोगों के आपसी मनमुटाव को सुलझाता था. इसके साथ ही गांव के साहसी व्यक्ति को फौंजदार बनाया जाता था. गांव की सुरक्षा की जिम्मेदारी उसकी रहती थी. पलायन के बाद अब जोहार के ज्यादातर गांवों के मकानों की छतें बिखर गर्इ हैं. सिर्फ रागू ही दीवारों के सहारे अभी संघर्ष कर रहा है. खंडहर हो चुके मकान अनगिनत कहानियां कहते प्रतीत हो रहे थे.
‘शाम के खाने में दाल-चावल या फिर कुछ और ? राजू ने पूछा तो तन्द्रा टूटी. कुछ और में क्या है, क्या होता है यहां? सूखा मीट है उसे बनाऊं क्या? संजू ने आंखे तरेरी. उसके लिए हरी सब्जी के साथ चावल का विकल्प मिल गया. सूखा मीट खुद बनाने की जिद हमारे लिए मंहगी साबित हुवी. सूखा मीट बनाना आता नहीं था तो मीट का जायका हमारे स्वाद के अनुसार नहीं रहा. थोड़ा सा खाया और फिर कभी नहीं खाने की कसम खार्इ. कसम खाने के बाद पेट भरने का सा अहसास हुवा.
जोहार, व्यास, दारमा तथा गढ़वाल के हिमालय से सटे ऊंचार्इ वाले इलाकों में भेड-बकरियों के मांस को सूखा कर माला बना संभाल दिया जाता है, ताकि जरूरत के वक्त भोजन आदि के काम आ सके. सदियों पहले इन घाटियों में रचे-बसे लोगों का बारहों मास यहीं रहना होता था. आज की तरह तब जाड़ों में नीचे को आना नहीं हो पाता था. जाड़ा हो या बर्फबारी इन सभी हालातों से बचाव के लिए उन्होंने अपने तरीके निकाले थे. लगभग छह माह, अप्रैल से सितंबर मध्य तक के खुशगवार मौसम में यहां जिंदगी काफी तेजी से दौड़ती थी. खेती-बाड़ी, जानवरों के चारे की व्यवस्था के साथ ही तिब्बत की मंडी में व्यापार के लिए भाग-दौड़ में ही छह माह गुजर जाते. गर्मियों में वक्त निकाल कर भेड़-बकरियों के मांस को छोटे-छोटे टुकड़ों में सूखा कर माला बना दी जाती थी. यही सूखा मांस बर्फिले दिनों में काम आता था. अक्टूबर से मार्च तक ये घाटियां बर्फ से लदकद हो एक नजर में हिमालय का सा आभास कराने वाली हुवी. ये छह महीने जोहार वासियों के लिए काफी कष्टकारी होने वाले हुए. गर्मियों में छह माह तक की गर्इ मेहनत के बलबूते ही इन्होंने ये बर्फिले छह मास काटने हुए.
अगले दिन मिलम गांव के लिए सुबह ही निकल पड़े. मार्तोली से नीचे नर्इ बन रही सड़क तक तीखा ढलान है. सामने बुर्फू गांव भी वीरान व खंडहर सा दिख रहा था. सड़क के किनारे बनी झोपड़ी नुमा दुकान के बाहर एक परिवार मीट की माला बनाकर उसे सुखाने में व्यस्त था. गोरी नदी की फुंफकार की वजह से उन्हें गप्पे मारने के लिए आपस में जोर-जोर से बोलना पड़ रहा था. रात के सूखे मीट को याद कर हम मुस्कुराते हुए आगे बढ़े. बर्फू के नीचे सड़क के लिए बुग्याल काटे जा रहे थे. सड़क काटने की वजह से इन बुग्यालों का सौन्दर्य अटपटा सा लग रहा था.
दूर सामने मापा गांव भी सूनसान अपनी जगह पर ही था. बिल्जू के उस पार गनघर उंचार्इ पर दिखा. पांछू गांव के बगल में पांचू नदी नीचे गोरी से मिलने के लिए दौड़ सी लगाती महसूस हुवी. बिल्जू गांव में घनश्यामजी के वहां दिन का भोजन लिया. घनश्याम बिल्जवाल ने बातचीत में बताया कि वो लोग सितंबर के अंत में चले जाते हैं नीचे दुम्मर या फिर मुनस्यारी को. अप्रेल में ही वापस आना हो पाता है. उस वक्त अक्सर गांव बर्फ से ढके मिलते हैं. गुजर-बसर चल रही है. अब सड़क बन रही है. कब तक बनेगी मालूम नहीं. क्या पता फिर कुछ ठीक हो जाए यहां भी तो एक दुकान ही चला लुंगा.
भोजन के बाद कुछ देर आराम करने के बाद फिर मिलम गांव की राह पकड़ी. बुग्याली रास्ते में पैदल चलने का एहसास नर्इ बन रही सड़क ने छीन लिया. नीचे दूर एक टूटा बुल्डोजर दिखा. सड़क के लिए बुग्यालों को काट रहे इस बुल्डोजर पर प्रकृति ने अपना गुस्सा बखूबी उतारा था. मिलम गांव से पहले तिब्बत से आने वाली कोलिंगाणा नदी बौखलाती हुर्इ सी मिली. कोलिंगाणा के आतंक से नदी पर बना पुल कांप रहा था. मिलम पहुंचने में सांझ हो गर्इ. यहां आर्इटीबीपी के पास अपने पहुंचने की सूचना देनी जरूरी है. आर्इटीबीपी को जब हमारे मलारी अभियान का पता लगा तो वो आनाकानी करने लगे. उनका व्यवहार देख एक पल के लिए लगा कि हम किसी तहसील में कोर्इ प्रमाण पत्र बनाने के लिए गए हों और घाघ बाबू हमें दूसरा कानून जबरदस्ती लादने के लिए जोर जबरदस्ती करने पर आमदा हो. उन्होंने हमें आगे के लिए परमिशन देने से ही मना कर दिया. जब हम अपनी जिद्व में कि, ‘इस परमिट में परमिशन ना दिए जाने का कारण लिख दो पर अड़ गए तो यहां तैनात इंस्पेक्टर ने एक तरीके से अपना फरमान ही सुना दिया कि ‘उप्पर काफी बर्फ आर्इ है अभी लांग रूट पैटोलिंग पार्टी आ ही रही है बड़ी मुश्किल से तुम सब बर्फ में फंस जाओगे तो हम सभी के लिए भी प्रोब्लम हो जाएगी अब तुमने जाना ही है तो एक बार फिर सोच लो नहीं तो एक-आध दिन यहीं रहो और वापस हो जाओ. बाद में हमारी जामा-तलाशी ली गर्इ.
कागजी कार्यवाही पूरी करने के बाद हम गांव की फिंजा में भागे. हमारे गाईड मनोज ने गांव में एक परिवार में हमारी व्यवस्था कर दी. थोड़ा सुकून मिला. चाय पीकर बाहर गांव की भूल – भूलैय्या को देखने निकले. गांव में पुरानी यादें ताजा हो रही थी. जब हमें बूढ़ा दुंग से अपने गाईड शंकरदा के बीमार होने पर वापस लौटना पड़ा था. मिलम गांव में वो चार—पांच दिन बमुश्किल कटे थे.
लगभग 4000मी. की ऊंचार्इ पर है मिलम गांव. कभी 500 मकानों का मिलम गांव अब खंडहर होते जा रहा है. बीते वक्त में गांव की गलियां भूलभूलैय्या सी थीं. इस गांव के बारे में कहावत थी कि, गांव में नर्इ दुल्हन के साथ परिवार का एक सदस्य कुछ माह तक रास्ता दिखाने के लिए रहता था. वक्त के बीतते-बीतते अब खिड़की-दरवाजों की बेहतरीन नक्काशी भी गायब दिखी. दरवाजों के साथ ही छत की बल्लियां भी ना जाने कहां लुप्त हो गर्इ थी. आलू के अलावा अब खेतों में जड़ी-बूटी भी उग रही थी.
मिलम में गोरी नदी के किनारे किलोमीटर भर वाला लंबा मैदान है. कभी इसमें गांव वाले खेती करते थे. वक्त गुजरने के साथ ही ये अब बंजर हो गया है. कुछ खेतों में आर्इटीबीपी के जवान वक्त काटने वास्ते आलू व अन्य कुछ उगाने की मेहनत कर लिया करते हैं. मिलम गांव के ज्यादातर परिवार बाहर ही बस गए हैं. मिलवाल, रावत, पांगती, धर्मषक्तु, निखुरपा, नित्वाल, धमोत के वंशज मिलम को सदियों पहले छोड़ चुके हैं. प्रवास पर अब बहुत कम परिवारों का ही आना हो पाता है.
जोहार के बारह गांवों के हालात अब मेहमानदारी लायक भी नहीं रहे. कर्इ मकानों की सिर्फ दीवारें ही बचीं हैं. इन खंडहर हो चुके मकानों के अंदर अब खेती होती है. प्रवास पर आने वालों ने दूर गोरी किनारे के खेतों को आबाद करने के बजाय एक बेहतरीन उपाय निकाल खंडहर हो चुके मकानों के अंदर के फर्श को ही खेत बनाकर जड़ी-बूटी के साथ ही मौसमी सबिजयों की क्यारियां बना ली हैं. 1962 से पहले भारत का जब तिब्बत के साथ व्यापार होता था तब इन गांवों की चहल-पहल देखने वाली होती थी. बुजुर्ग बताते हैं कि मानसरोवर जाने के लिए ये मार्ग छोटा है लेकिन दर्रों की वजह से कर्इ कठिनाइयां आती हैं. पश्चिमी तिब्बत की सबसे बड़ी मंडी ग्यानिमा जिसे खार्को के नाम से भी बुलाते थे यहां से 105 किमी की पैदल दूरी पर है. तब के जमाने में जुलार्इ व अगस्त दो माह के लिए इस मार्ग से व्यापारियों का कारवां चलता था. अब इस पढ़ाव में गहरी खामोशी पसर गर्इ है. गांव से लगभग तीनेक किलोमीटर की दूरी पर हरदयोल शिखर के वक्षस्थल पर ही है मिलम ग्लेशियर. नौ ग्लेशियरों से मिलकर करीब आधा किलोमीटर चौड़ा तथा 18 किमी लंबा बना है मिलम ग्लेशियर.
बागेश्वर में रहने वाले केशव भट्ट पहाड़ सामयिक समस्याओं को लेकर अपने सचेत लेखन के लिए अपने लिए एक ख़ास जगह बना चुके हैं. ट्रेकिंग और यात्राओं के शौक़ीन केशव की अनेक रचनाएं स्थानीय व राष्ट्रीय समाचारपत्रों-पत्रिकाओं में छपती रही हैं. केशव काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.
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