Featured

जोहार घाटी का सफ़र – 2

(पिछली क़िस्त का लिंक – जोहार घाटी का सफ़र – 1)

मुनस्यारी में हमें परमिट को ध्यान से पढ़ने पर पता चला कि इस क्षेत्र में कैमरे वर्जित हैं. अब क्या करते. मैं तो एक वीडियो और एक रील वाला कैमरा ले गया था. मिलम गांव से पहले वो हमने छुपा जैसे लिए थे तो वो आईटीबीपी की हल्की—फुल्की चैकिंग में पकड़ में नहीं आए. लेकिन जब वो चैकिंग कर रहे थे तो धुकधुकी जैसी हो रही थी. उनसे मुक्ति मिलते ही हम गांव की ओर चल दिए. गांव के अंत में राजदा ने एक मकान में रूकने की बात की. मकान वाले ने नीचे दुकान खोल रखी थी और उप्पर के दो मंजिले में चाख में रूकने की व्यवस्था थी. दुकान में कुछ लोग बीड़ी में ‘दम’ का मजा ले अपनी फसकों में मगन थे. उनकी भाषा समझ में नहीं आ रही थी. उप्पर चाख में अपने रूकसैक रख भोजन की तैंयारी शुरू हो गई. सुबह के बाद पेट में भी कुछ गया नहीं था. आज खिचड़ी बनी जिसमें थोड़ा सा घीं भी डला.

राजदा ने नीचे जाकर उप्पर के मौसम के बारे में थोड़ी जानकारी भी ले ली थी. सोते वक्त उन्होंने बताया कि वो कल शंकर राम के साथ आगे का पढ़ाव दुंग में जाकर हालातों का जायजा लेंगे कि बर्फ कितनी पड़ी है. फिर उसके बाद ही आगे का प्लान बनेगा. सोने से पहले उन्होंने हमें मीठा चूरन का गोला भी खाने को दिया. चूरन लाजवाब था.

रात में थोड़ी बारिश हुवी थी जिसका पता सुबह लगा. आशमान में बादल छाये थे. सुबह राजदा ने शंकर राम उर्फ शंकरदा को साथं लिया और पहले मिलम के आईटीबीपी कैम्प में हांजरी बजाकर उन्हें अपने प्लान के बारे में बताकर दुंग को चले गए. दोनों जन का प्रोग्राम ये था कि वो दुंग तक रैकी करके शाम या दोपहर तक वापस मिलम गांव में आ जाएंगे. गोविंद और मैं उन्हें कुछ देर उप्पर की धार में मंदिर से ओझल होने तक देखते रहे. अब हम दोनों आजाद थे. नर बहादुर, गोविंद और मैंने मैगी का नाश्ता किया और उसके बाद अपने कैमरे छिपाकर मैं और गोविंद मिलम ग्लेशियर की ओर निकल पड़े. नर बहादुर वहीं ठहर गया. मिलम ग्लेशियर के रास्ते के उप्पर कुछ आईटीबीपी के जवान भी जाते हुए दिखे तो एक बार तो हमें लगा जैसे आज हमारी श्यामत ही आ गई है. ये सायद हम पर नजर रखने के लिए ही हमसे उप्पर की ओर गए हैं. वहां से सब साफ दिखाई देता है. हम दोनों चुपचाप चलते रहे. मन में डर भी बैठ गया था. चोर निगाहों से उप्पर की ओर देखा तो जवान उप्पर की ओर आगे निकल गए थे. सांस वापस लौटी. जवानों का ये रोजमर्रा का काम होता होगा ड्यूटी का. कैमरों ने हमें चोर जैसा फील करा दिया ठैरा!

सामने लंबा और मटमैले बर्फ की ठहरी हुवी नदी देखी तो मुंह से आवाज भी कुछ देर तलक नहीं निकली. अच्छा तो ऐसा होता है ग्लेशियर. कोबरा सांप की तरह दिखने वाला और बलखाता हुवा. नजदीक गए तो ग्लेशियर के मुहाने से पानी की धाराएं छोटी—छोटी नदियां बनाती हुई सी निकल रही थी. कूदते—फांदते हम दोनों ग्लेशियर के एकदम नजदीक पहुंच गए. ग्लेशियर में उप्पर जाने का कोई रास्ता नही दिखा तो कुछ देर तक वहीं चुपचाप फोटो खींच वापस लौट पड़े. ग्लेशियर को उप्पर के रास्ते देखने का मन था लेकिन. वहां तो आईटीबीपी के जवान गए थे. हमारे लिए तो उस वक्त आईटीबीपी वाले कुछ इस तरह के हो गए थे जैसे हाईस्कूल के बोर्ड एक्जाम में नकल की सारी पर्चियां शरीर में ओने—कोने ठूंसी हों लेकिन अचानक ही उड़न दस्ते के बगल के स्कूल में आने की खबर फैल गई हो.

वापस ठिकाने पर पहुंचे तो भूख लगने लगी. क्या करें. सामान टटोला तो खिचड़ी बनाने पर हम तीनों की राय बन गई. खिचड़ी स्टोव में चढ़ाकर नीचे दुकान में गए तो वहां हवा में ‘दम’ की खुशबू बिखरी हुवी थी. कुछ बिस्कुट लेकर हम वहीं बैठ गए तो परिक्रमा में घूमती हुवी बीढ़ी हमारे पास भी आ गई. दो-एक कश मार ही लिए हमने. इन जगहों में छोटे—बड़ों का साथं में बीढ़ी पीना एक तरह से सामान्य सी बात होती है. जैसे चाय पीना. अब बीढ़ी चाहे भरी ही क्यों न हो वो शांत भाव से आपस में घूमती जरूर है. मना करने पर कोई जोर जबर्दस्ती नहीं. जैसे कि कोई चाय पीने का मजा ले रहा हो और किसी को कॉफी में मजा आ रहा हो.

उप्पर कमरे में गए तो डेग में खिचड़ी खदबदा रही थी. हम दोनों चुप से हो गए थे. दिमाग सुन्न सा हो गया था. सुर जैसा चढ़ा तो डेग में एक करछी घीं और पेल दिया. भूख का आलम ये रहा कि स्टोव बंद कर गर्म खिचड़ी खाना शुरू कर दिया. ये खीचड़ी वैसे सामान्य तौर पर चार लोगों के लिए पर्याप्त थी. नर बहादुर खाके खिसक लिया तो बीढ़ी के धुंवे के असर से हम दोनों पूरा डेग ही चाट गए. सब भकोसने के बाद कुछ पल चुपचाप रहे तो फिर चाय का सुर चढ़ गया. चाय पी रहे थे कि शंकर राम आ गया. उसने एक पर्ची हाथ में थमा दी. शंकर राम के साथ एक आईटीबीपी के जवान भी थे. वो बागेश्वर के ही थे और दुंग में ड्यूटी में तैनात थे. उन्हें वहां राजदा मिले तो उन्हें ऐसा लगा जैसे जेल में बंद कैदी से मिलने उनके घर से कोई आ गया हो.

राजदा ने एक कागज में लिखा था, ‘प्रिय भट्टजी यहां आगे का मौसम सही है. तुम लोग इनके साथ सामान लेकर दुंग आ जाओं. आईटीबीपी से मूवमेंट वाला कागज भी ले आना.’ मुझे शंकरदा कुछ कष्ट में दिखा तो मैंने कारण पूछा. उसने बताया कि उसे कमजोरी और घबराहट हो रही है. उसने मुझसे कुछ दवा मांगी तो मैंने उसे रिवाइटल की एक गोली दे दी. मुझे लगा कि दिन भर की थकान हावी होगी तो इससे जरा इनर्जी मिल जाएगी.

हम सभी फटाफट तैंयार हुए. धुंवे का असर अब तक गायब हो चुका था. आईटीबीपी वाले साथी मजेदार और मस्तमौला थे. मैं उनके साथ कैंप में गया और कागजी कार्यवाही कर सामान लादा और साम के करीब चार बजे चले पड़े दुंग की ओर. मंदिर तक पहुंचे तो आगे नदी के किनारे उतार—चढ़ाव वाला रास्ता दिखा. साथी जवान जिन्हें मैं दाज्यू कहके बुलाने लगा था, इस चढ़ाई में अपने किस्से सुनाते जा रहे थे. अंधेरा होने पर मैंने टार्च जलाने की बात कही तो वो बोले, नहीं चांदनी रात है ऐसे ही चलते हैं अच्छा रहेगा. हम उनके पीछे सधे कदमों से चल रहे थे. अब हम नीचे ढलान की ओर संकरे से रास्ते में उतर रहे थे. नदी का शोर तेज हो गया था. लेकिन दाज्यू थे कि चुप होने का नाम ही नहीं ले रहे थे. उनके पास किस्सों कहानियों का खजाना भरा पड़ा था और इस जगह में जब सभी के पास किस्से होने वाले हुवे तो आपस में कौन किसको सुनता या सुनाता. नदी पर बने पुल से पार पहुंचे तो फिर चढ़ाई शुरू हो गई. आधे घंटे बाद दूर टिमटिमाती हुवी रोशनी दिखी जो कि दुंग था. हल्की बारिश शुरू होने लगी थी तो कदम तेज कर दिए. दुंग पहुंचते ही वहां पर तैनात एक जवान ने चैकिंग के नाम पर खानापूर्ति की.

राजदा हम सबके गले मिले और हम सभी जवानों के ही एक बड़े से तंबू में घुस गए. सभी जवानों ने हमारा गर्मजाशी से स्वागत किया. ठंड काफी हो रही थी. कुछ देर बाद जवानों के मैस से चावल और दाल आ गई. आधा—अधूरा खाकर हमने उन्ही के अगल—बगल अपने स्लीपिंग बैग तान लिए. तंबू के पोल में दारू के एक ‘अध्धे’ में लैंप जल रहा था.

तंबू में कुछ लोग आए हैं वाली बात पर दूसरे तंबू वालों को भी बैचेनी हो रही थी. बार—बार हमसे मिलने कहें या बात करने के कौतुहल में वो कुछ बहाना बनाकर तंबू में चले आ रहे थे. अंदर जगह नहीं होने पर वो तंबू का पर्दा किनारे कर अपनी—अपनी कहने को आतुर थे. उन्हें इससे कोई मतलब नहीं था कि बाहर बारिश में वो भीग रहे हैं. उन्हें देख लग रहा था कि वो ड्यूटी करते हुए भी एक तरह का वनवास सा झेल रहे हैं. एक जवान राजदा से दिनभर में कुछ ज्यादा ही आत्मीय हो गया था. कुछ नॉनवेज चुटकलों और बातों के बाद वो बोला, ‘साहजी भौजी कं छोड़ी बेर यां डान कान में किले भटक रिछा.. वां एल भौजी दग चिपक रोना त कदु मज उन तुमुकुं ल और भौजी कं ल.’

हम सब सुन तो रहे थे लेकिन सोने का बहाना भी करते रहे. दाज्यू उर्फ हमारे लीडर के सामने ही वो जवान शब्दों से अपने और उनके कपड़े उतारने में लगे थे. जवानों को किसी से कोई मतलब नहीं था. खासतौर पर शालीनता से. वो भी इस निर्जन और हिमालय की जगह पर. यहां के बारे में तो ये कहा जाने वाला ठैरा कि इन जगहों में तो साधू—महात्माओं का डेरा हुवा और वो ईश्वर भक्ति में इतने तल्लीन हो जाने वाले ठैरे कि तन के कपड़े भी उन्हें बोझ लगने वाले हुए. नंग धडंग तपस्या करने में ही उन्हें आंनद के साथ ही परामानंद की प्राप्ति होने वाली हुई बल. अश्लीलता जब भटकने लगी तो तंबू के अंदर वाले जवानों ने ही हल्ला काटा. सभी जवान फिर अपने तंबूओं की ओर हो—हो करते हुए भागे. लैंप धीमी आंच में रात भर जलते रहा.

सुबह मौसम खुशगवार हो गया था. तंबू से बाहर झांका तो जवान अपने कामों में लगे दिखे. हम सभी फारिग होकर अपना सामान बांधने की तैंयारी कर रहे थे कि जवानों के अफसर ने हमें भी नाश्ता करने को बोला. कुछ जवान बॉलीबाल खेलने में लगे थे. अब ये अलग बात थी जो हम समझ नहीं पाए कि ये रोज खेलते हैं या हमें दिखाने के लिए खेल रहे थे. इस जगह को देखा तो किनारे में खंदक खोद रखी थी. कभी दुश्मन का आक्रमण हो तो तुरंत सभी सुरक्षित होकर उनका मुकाबला कर सकें. नीचे ग्वांख नदी अपने होने का एहसास करा रही थी.

इस तंबू में एक जवान था जो कि बटालियन पंडित था. रूटीन की वजह से उसका ट्रांस्फर यहां हुवा तो वो पुराने ऐश भरे दिनों को याद कर करके रोनी सूरत बनाने की कोशिश में लगा रहता था. जब इससे जी भर जाता तो वो दूसरे तंबू में जाकर साथी जवान को मर्यादा विहीन गालियों से बार—बार नवाजने के बाद भागते हुए तंबू के अंदर कूदते हुए समा जाता था. तंबू के बाहर से गुस्से में दूसरे टेंट वाला जवान उसे ललकारता था. लेकिन तंबू के अंदर घुसा वो बटालियन पंडित जवान चुप्पी साध लेता था. बाहर का जवान गालियों की बरसात करने के बाद वापस चला जाता था. कुछ देर बाद फिर बटालियन पंडित वाला जवान उसे छेड़ कर तंबू में फटक मार देता था. ये सिलसिला काफी देर तक चला. हमें कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था. बाद में कुछ जवानों के विरोध के बाद ये हंगामा शांत हो गया. पूछने पर पता लगा कि, ‘यहां मनोरंजन के साधन कुछ होते हैं नहीं तो इनके हंगामें से ही हम सबका मनोरंजन होते रहता है. हां! इसमें शर्त ये रखी गई है कि बटालियन पंडित यदि तंबू से बाहर पकड़ में आ जाए तो इसे कूट दो या जो मर्जी करो लेकिन तंबू में कुछ भी हंगामा नहीं होगा. और फुर्तीला बटालियन पंडित इसी बात का फायदा उठाकर उन्हें छेड़कर तंबू में घुस जाता है.’

हमारा सामान पैक हो चुका था. उससे पहले राजदा ने मैगी के कुछ पैकेट जवानों को दे दी तो वो बहुत खुश हो गए. इस जगह में वो चावल—दाल खा—खाके उकता चुके थे. हमने सबसे विदा ली तो राजदा का फौजी जवान मित्र कुछ दूर तक हमें छोड़ने के लिए हमारे साथ हो लिया. चलते वक्त मैंने चुपचाप कुछ वीडियो के शॉट भी रास्ते में ले लिए. किलोमीटर भर आगे रास्ते के उप्पर अस्थाई हैलीपैड को देखने गए तो वहां जगह—जगह लिखी गई अ—श्लील शायरियां हैलीपैड की शोभा बढ़ाती दिख रही थीं. एक जगह में बकायदा इस तरह की अ—साहित्यिक किताबें भी बिखरी दिखी तो मैं और गोविंद चुपचाप आगे रास्ते की ओर खिसक लिए. फौजी मित्र और राजदा कुछेक देर गपियाने के बाद नीचे रास्ते में आ गए. जवान से विदा लेनी चाही तो देखा कि सामने हमारा पोर्टर शंकरदा एक टूट चुके रास्ते से पीठ में सामान लादे मिट्टी की भूरभूरी चट्टान में चढ़ने में लगा था. राजदा और फौजी भाई ने तुरंत ही वहां को दौड़ लगाई. बमुश्किल शंकरदा को वहां से निकाला गया. फौंजी भाई ने विदा ली और वापस दुंग की ओर चले गए. शंकरदा के कारनामें से राजदा गुस्से में थे.

बुढ़ा दुंग में पहुंचते ही उन्होंने शंकरदा से इस बात पर नाराजगी भी जताई. शंकरदा ने बताया कि उसे परेशानी हो रही थी तो वो लंबे रास्ते के वजाय इस पुराने शॉटकट से आ गया. उसे पता नहीं था कि अब ये रास्ता खतरनाक हो गया है करके. बुढ़ा दुंग में भी आईटीबीपी की पोस्ट हैं जहां कुछ झोपड़ीनुमा सैल्टर बने हैं. हम एक सैल्टर में समा गए. दाल—चावल बना तो शंकरदा ने खाने से मना कर दिया. उसने बताया कि उसके पेट में दर्द हो रहा है. उसने मुझसे पहले दे चुकी रिवाइटल की दवा मांगी लेकिन मैंने उसे नहीं दी. बमुश्किल उसने थोड़ी सी दाल पी. उसका दर्द बेतहाशा बढ़ते जा रहा था. राजदा उसकी हालत देख चिंतित थे लेकिन वो हमें जाहिर नहीं कर रहे थे. रात के करीब आठ बज रहे होंगे कि अचानक सैल्टर का दरवाजा खुला और राजदा के मित्र जवान के साथ ही और एक जवान अंदर आए. हम हक्का—बक्का से हो गए.

वो हथियारों से लैस थे. कुछ देर सुस्ताने के बाद उन्होंने बताया कि आपके पास जो कैमरे हैं वो आगे जाकर आपके लिए मुसीबत बन जाएंगे. उन्हें हमें दे दीजिए बाद में हम बागेश्वर में उन्हें ले आएंगे. मैंने राजदा को सुझाव दिया कि शंकर भाई की तबीयत खराब हो रही है और कैमरे भी मुसीबत बन रहे हैं तो क्यों न मैं ही वापस शंकर भाई और कैमरों को लेकर वापस जाउं और मलारी में मैं मिल जाउंगा. हां घर नहीं जाउंगा. वो इस बात पर सहमत नहीं हुए. उनका कहना था कि जाएगी तो पूरी टीम ही वापस जाएगी अकेला कोई नहीं जाएगा.

(जारी)

 

बागेश्वर में रहने वाले केशव भट्ट पहाड़ सामयिक समस्याओं को लेकर अपने सचेत लेखन के लिए अपने लिए एक ख़ास जगह बना चुके हैं. ट्रेकिंग और यात्राओं के शौक़ीन केशव की अनेक रचनाएं स्थानीय व राष्ट्रीय समाचारपत्रों-पत्रिकाओं में छपती रही हैं. केशव काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Girish Lohani

Recent Posts

DK88 casino promo code payment methods for Malaysian players

What Is the DK88 Casino Promo Code?How To Claim The DK88 Casino Promo CodeUnderstanding The…

23 hours ago

DK88 casino registration security guide for Malaysian players

Why Choose DK88? Licensing, Security and Local AppealStep‑by‑Step DK88 Casino Registration ProcessPreparing Your DocumentsCreating Your…

23 hours ago

DK88 Casino Registration Steps and Methods for Malaysian Players

DK88 Casino Registration: Practical Guide for Malaysian Players Welcome to the ultimate walkthrough of DK88…

23 hours ago

DK88 casino app mobile guide for Malaysian players

Getting Started: Registration & First StepsVerification and KYCNavigating the DK88 Casino App InterfaceKey Features at…

23 hours ago

DK88 Malaysia Casino Bonus Guide: Full Breakdown of Welcome Offers

Why DK88 Malaysia Casino Stands OutRegistration & Getting StartedBonuses & PromotionsGame Selection – Slots, Live…

23 hours ago

अब हल्द्वानी में पहाड़ी उत्पादों के सबसे विश्वसनीय ब्रांड ‘मुनस्यारी हाउस’ की शुरुआत

आपको मुनस्यारी की दुर्लभ राजमा कि तलाश है या फिर कुमाऊं-गढ़वाल के उच्च हिमालयी क्षेत्रों…

1 day ago