फोटो : अमित साह
एक अच्छी सी दूरबीन लेकर आप मेरे साथ चलिये चीना पहाड़ी की चोटी पर. आपको इस जगह से नैनीताल के आसपास की जगह ऐसी दिखेंगी जैसे कि आप किसी उड़ते हुए परिन्दे की नजर से इसे देख रहे हों. ये सड़क बिल्कुल खड़ी चड़ाई वाली है पर यदि आप चिड़ियां, पेड़ों और फूलों का शौक रखते हैं तो ये तीन मील की चढ़ाई आपको उबाऊ नहीं लगेगी. यदि ऊपर पहुंच कर आप भी त्रिऋषी की तरह प्यासे हो जायें तो मैं आपको स्फिटिक पत्थर की तरह साफ और शीतल पानी का सोता दिखाऊंगा जिसमें आप अपनी प्यास बुझा सकते हैं. थोड़ा आराम करने और अपना खाना खा लेने के बाद हम उत्तर दिशा की ओर मुड़ते हैं. यहां से नीचे देखने पर जो घने पेड़ों वाली घाटी दिखती है वह कोसी नदी तक फैली है. पहाड़ियों की चोटियां नदी के साथ चलती हैं जिन में कई गांव बसे हैं. इन्हीं पहाड़ों की एक चोटी में अल्मोड़ा शहर है और तो दूसरी पर रानीखेत की छावनी. इन चोटियों के पीछे और भी चोटियां हैं जिन में सबसे ऊंची चोटी डूंगर बुकाल है लेकिन 14200 फीट ऊंची है ये पहाड़ी भी हिमालय पर्वत के सामने बौनी लगने लगती है. यदि कौवे की उड़ने के तरीके से देखें तो आप के उत्तर में 60 मील दूर त्रिशूल है. 23 हजार 406 फीट ऊंची चोटी के पूर्व और पश्चिम में बर्फ के पहाड़ों की सैकड़ों मील लम्बी अनगिनत लकीरें हैं. त्रिशूल के पश्चिम में जिस जगह से बर्फ दिखनी बंद हो जाती है वहां सबसे आगे गंगोत्री के पहाड़ हैं और इसके ऊपर केदारनाथ और बद्रीनाथ जैसे पवित्र स्थल हैं और साथ ही स्मिथ की वजह से मशहूर माउंट कामेट पर्वत भी है. त्रिशूल के पूर्व में थोड़ा पीछे आपको नंदा देवी पर्वत दिखाई देगा जो भारत का सबसे ऊंचा शिखर है. उसके दांयी ओर नंदा कोट है – देवी पार्वती का निश्कलंक तकिया और इसके कुछ आगे पूर्व की ओर पंचाचूली की बेहद सुंदर पर्वतश्रृंखला है. पंचाचूली का मतलब है पांच चूल्हे – पांडवों ने कैलाश को जाते समय इस जगह पर खाना बनाया था. सूर्य की पहली किरण जब रात के घुप्प अंधेरे में डूबी चीना और बीच की चोटियों के ऊपर पड़ती है तो इन बर्फीले शिखरों पर्वतों का माथा गहरे काले रंग की जगह गुलाबी होने लगता है. सूरज जैसे ही आसमान के सबसे नजदीक वाली पहाड़ी को स्पर्श करता है गुलाबी रंग धीर-धीरे चमकदार सफेद रंग में बदल जाता है.
दिन के समय ये चोटियां शीतल और दूधिया नजर आती हैं- इन चोटियों के पीछे बर्फीली धुंध की पारदर्शी परत दिखती है. सूरज के डूबते समय यह नजारा किसी भी प्रकृति को चाहने वाले की कल्पना के अनुसार गुलाबी, सुनहरा या लाल रंग लिए हो सकता है.
अब आप बर्फ की चोटियों की ओर पीठ कर लो और अपना चेहरा दक्षिण की ओर. आपकी नजरें आखिर में जहां तक जाती हैं वहां पर आपको तीन शहर नजर आयेंगे – बरेली, काशीपुर, मुरादाबाद इन तीन शहरों में हमारे सबसे नजदीक काशीपुर है और अगर कौवे की उड़ान से इस आसमानी दूरी को नापे तो यह यहां से 50 मील दूर है. यह तीनों शहर कोलकाता और पंजाब को आपस में जोड़ने वाली रेलवे लाइन के किनारे स्थित हैं. रेलवे लाइन और चोटियों के बीच की जमीन तीन तरह की पट्टियों में विभाजित है. पहली पट्टी जो 20 मील चैड़ी है उसमें खेती होती है. दूसरी पट्टी घास की है. ये लगभग 10 मील चैड़ी है और इसे तराई कहते हैं. तीसरी पट्टि भी 10 मील चैड़ी है जिसे भाबर कहते हैं. भाबर वाली पट्टी सीधे पहाड़ियों के निचले हिस्से तक फैली है. इस पट्टी में जंगलों की उपजाऊ जमीन को सींचने के लिए कई नदी और नाले हैं. इस पट्टी में कई गाँव भी बस गए हैं.
इन गाँवों में सबसे नजदीकी गाँव कालाढूंगी सड़क के रास्ते से 15 मील दूर है और इसी गाँव के ऊपरी हिस्से पर मेरा गाँव छोटी हल्द्वानी है जो तीन मील लंबी पत्थर की दीवार से घिरा है. नैनीताल से कालाढूंगी आने वाली सड़क जिस जगह पर नीचे की पहाड़ियों के किनारे बनी सड़क से मिलती है ठीक वहीं मेरी कॉटेज की छत पड़ों के झुरमुटों के बीच से झांकती हुई नजर आती है. इन निचली पहाड़ियों के पूरे इलाके के पत्थरों में लोहा है. उत्तरी भारत में पहली बार लोहा कालाढूंगी में ही गलाया गया था और लोहा गलाने के लिये लकड़ी का इस्तेमाल किया गया. कुमाऊं कमिश्नर सर हेनरी रैमजे को कुछ समय में ही यह डर सताने लगा की आने वाले समय में सारे जंगल की लकड़ियों को इन भट्टियों में डाल दिया जायेगा तब उन्होंने इन भटियों को बंद करा दिया.
चीना पहाड़ी पर जिस जगह आप बैठे हैं वहाँ से कालाढूंगी तक की पहाड़ियों में साल के घने जंगल हैं. इन पेड़ों की लकड़ी का इस्तेमाल स्लीपर बनाने के लिये होता है. पहाड़ी की सबसे नजदीकी चोटी के पास छोटी सी झील खुर्पाताल है. जिस के आस-पास के जमीन में भारत के सबसे स्वादिष्ट आलू होते हैं. अपने दांयी ओर थोड़ा आगे आपको सूरज की रोशनी मैं चमचमाती गंगा नदी दिखाई देगी और बायीं ओर यही रोशनी शारदा नदी के पानी पर चमचमाती दिखेगी. इन दोनों नदियों के निचली पहाड़ियों के बीच से गुजरने की दूरी करीब 200 मील है.
अब आप पूर्व की ओर मुढ़ जाइये. आपके सामने की ओर जो इलाका फैला हुआ दिखता है इसे पुराने गजेटियर में ‘साठ झीलों वाला जिला’ कहा गया है. इनमें से बहुत सी झीलों में गाद भरने के कारण वो भर गयी और कुछ झीलें तो मेरे सामने ही गाद भरने के कारण समाप्त हो गयी हैं. अब कुछ झीलें ही बची हैं जिनका महत्व अभी भी है. ये झीलें हैं नैनीताल, सातताल, भीमताल और नौकुचियाताल. नौकुचियाताल के सामने आइसक्रीम के कौन जैसी जो चोटी दिखती है वो छोटा कैलाश है. इस पवित्र शिखर पर किसी पक्षी या जानवर का शिकार करना यहाँ के देवताओं को बिल्कुल पसंद नहीं है. सेना से छुट्टी पर आये एक फौजी ने देवताओं की मर्जी के खिलाफ इस पहाड़ी पर बकरी का शिकार किया कर दिया था. वो फौजी इस शिखर पर शिकार करने वाला आखिरी इंसान था जो पहाड़ी बकरे को अपना शिकार बनाने के बाद अपने दो साथियों के सामने बिना किसी कारण ही हजारों फुट गहरी घाटी में गिर गया. छोटे कैलाश के सामने काला आगर पहाड़ियां है जहाँ मैं चैगढ़ के आदमखोर की तलाश में 2 साल तक घूमता रहा. इन पहाड़ियों के बाद नेपाल के पर्वत नजर आने बंद हो जाते हैं.
अब पश्चिम की ओर मुड़ जाइये. परन्तु पहले यह आप कुछ 100 फीट नीचे उतरकर देव पट्टा की 7991 फुट ऊंची और चीना से सटी हुई चोटी पर आ जाइये. यहाँ ठीक नीचे पेड़ों से घिरी तंग पट्टी वाली गहरी घाटी चीना और देव पट्टा से से शुरू होती है और दाचुरी से होती हुई कालाढूंगी तक जाती है. यहाँ हिमालय की किसी भी घाटी के मुकाबले कई गुना ज्यादा पेड़, पौधे, फल, फूल, परिंदे और जानवर हैं.
इस सुंदर सी घाटी के आगे पर्वत श्रृंखलायें गंगा तक जाती हैं. आप गंगा के धूप में चमचमाते पानी को सौ मील दूर से भी देख सकते हैं. गंगा के एक ओर शिवालिक की चोटियाँ हैं – वह चोटियाँ जो हिमालय के जन्म से बहुत पहले ही बूढ़ी हो चुकी थीं.
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वाह ! बहुत आभार विनीता। जिम कार्बेट लिखित 'यंग इंडिया' में नैनीताल से पर्वत श्रंखलाओं और घाटियों का विहंगम दृश्य प्रस्तुत करने वाला यह मेरा पसंदीदा गद्य है। अद्भुत नैसर्गिक वर्णन किया है जिम कार्बेट ने। अनुवाद भी उतना ही अच्छा है। चीना पीक की चोटी से मेरे गांव कालाआगर की पहाड़ियां भी इसमें दिख रही हैं।
बहुत सुंदर अनुवाद।
बहुत अच्छा गद्य चुना आपने। व्याख्यान दिल को छू गया। आभार।
बहुत बढ़िया वर्णन किया हें आपने वहाँ की भोगोलिक स्थिति का।