पर्यावरण

भारत के नेता स्पोर्ट्समैन नहीं होते और बाघों का अपना कोई वोट नहीं होता – जिम कॉर्बेट

जेम्स एडवर्ड कॉर्बेट को ‘पक्का’ साहब नहीं कहा जा सकता था क्योंकि उन्होंने मैट्रिक नहीं किया था और उन्हें सेना में वह कमीशन नहीं मिला जो गोरों के लिए आरक्षित था. उन्होंने बंगाल की उत्तर-पश्चिमी रेलवेज में ईंधन की सप्लाई की ठेकेदारी करना शुरू किया. यहाँ की रेलों को चलाने के लिए लकड़ी जलाकर ऊर्जा पैदा की जाती थी. यह एक विडम्बना कही जा सकती है कि एक मनुष्य जो अपने जीवन में बड़ा प्रकृतिवादी बना, उसने अपना करियर पेड़ों के कटान से शुरू किया था. (JIm Corbett Birth Anniversary)

फिर पहला विश्वयुद्ध हुआ जिसमें उन्हें युद्ध में सीधे भाग लेने के बजाय फ्रांस और वजीरिस्तान में कुमाऊं लेबर कोर की व्यवस्था और उसका नेतृत्व करने से ही संतुष्ट होना पड़ा. उन्हें कैप्टन की पदवी दी गई. बाद में एक वन-विशेषज्ञ की हैसियत से उन्हें जंगल में युद्ध करने की तकनीकों में सेनिकों को प्रशिक्षित करने का काम दिया गया. उन्हें सिपाहियों को जंगल को समझने में सहायता करनी होती थी. इस कार्य के एवज में उन्हें लेफ्टिनेंट कर्नल की रैंक मिली. (JIm Corbett Birth Anniversary)

जंगल की समझ उन्हें कुमाऊँ की तराई में स्थित घने जंगलों वाले कालाढूंगी में मिली थी जहाँ उनका बचपन बीता था. उनके पिता जो कि एक पोस्टमास्टर थे, को कालाढूंगी में एक जमीन ग्रांट के तौर पर मिली थी. इस लिहाज से जिम कॉर्बेट एक तरह के जमींदार कहे जा सकते थे.

देखिये क्या-क्या है कालाढूंगी के जिम कॉर्बेट म्यूजियम में

जंगल के माहौल में एक कुशल शिकारी की हैसियत से खासा समय बिता चुके कॉर्बेट को बहुत पहले यह अहसास हो चुका था कि आदमखोर बाघों से ग्रामीणों को बचाया जाना कितना आवश्यक था. इसी अहसास की परिणति आगे चल कर जिम कॉर्बेट को एक मिथक के रूप में स्थापित करने में हुई.

कॉर्बेट जान चुके थे कि बाघ और तेंदुए केवल दो ही कारणों से आदमखोर बना करते थे. कभी कभी उन्हें सेहियों के कांटे चुभ जाते थे जो टूट जाने के बाद उनकी देहों में सेप्टिक पैदा कर दिया करते जिसकी वजह से वे शिकार नहीं कर पाते थे. मजबूरी में वे पहले घरेलू मवेशियों को उठा लेते और अंततः आदमखोर बन जाते.

कॉर्बेट की कालाढूंगी, कुमाऊँ का कमिश्नर और सुल्ताना डाकू

दूसरा महत्वपूर्ण कारण था इन पशुओं की प्राकृतिक टेरिटरी पर मनुष्यों का कब्जा. तराई-भाबर में तेजी से बढ़ रही बसासत के कारण बाघों और मनुष्यों का आमना-सामना बड़े पैमाने पर होने लगा था जिसकी वजह से मजबूरी में ये पशु आदमखोर बन गए. इन आदमखोरों के मानव-शिकारों की संख्या कहीं-कहीं दर्जनों और सैकड़ों तक पहुँची.

जिस कार्य में जिम कॉर्बेट ने अपना बाद का जीवन लगाया, उसने उन्हें समाज की कृतज्ञता और अपार ख्याति दिलाई. उन्हें अनेक सम्मान मिले – वनों के संरक्षण के कार्य के लिए उन्हें कैसर-ए-हिन्द के खिताब से नवाजा गया. उनकी मृत्यु के बाद उनके परम मित्र गोबिंद बल्लभ     

के प्रयासों से देश के सबसे बड़े नेशनल पार्कों में से एक का नाम उनके नाम पर रखा गया.

कालाढूंगी : नैनीताल का एक छोटा सा कस्बा

जिम के सम्मानित मित्रों की संख्या बहुत बड़ी थी – गोबिंद बल्लभ पन्त के अलावा संयुक्त प्रांत के गवर्नर रहे, हेली और हैलेट भी उनके उनके दोस्त थे जिनके साथ वे शिकार पर जाया करटे थे. फरवरी 1950 में उन्होंने राजकुमारी एलिजाबेथ और ड्यूक ऑफ़ एडिनबर्ग के लिए केन्या के ट्री टॉप्स में शिकार की व्यवस्थाएं की थीं. उल्लेखनीय है कि भारत की आजादी के बाद जिम अपनी बहन मैगी के साथ केन्या रहने चले गए थे.

इस राजसी यात्रा की बाबत जिम का एक कथन बहुत विख्यात हुआ था. उन्होंने कहा था, “जब मैंने उन्हें पेड़ पर चढ़ने में सहायता की थी वे एक राजकुमारी थीं जबकि पेड़ से उतरने तक वे रानी बन चुकी थीं.” उसी रात छठे किंग जॉर्ज का देहांत हो गया था.

कॉर्बेट ने अनुमान लगाया था कि 1947 में भारत में तीन से चार हजार तक बाघ मौजूद थे. उन्हें भय था कि अगले 10-15 सालों में उनकी संख्या समाप्त हो चुकी होगी. लार्ड वेवेल ने अपनी डायरी में लिखा था कि जिम कहते थे – “भारत के नेता स्पोर्ट्समैन नहीं होते और बाघों का अपना कोई वोट नहीं होता.”

(दुर्गाचरण काला की किताब ‘जिम कॉर्बेट ऑफ़ कुमाऊं’ के आधार पर)

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