अशोक पाण्डे

उसकी आँखें अफ़साने कहती थीं – इरफ़ान की याद

एक. Irrfan Khan Remembered Ashok Pande

एक टीवी शो में उसने कहा था – “एनएसडी में जाने से पहले मैं एक अंडे के भीतर था. मैं पैदा भी नहीं हुआ था. वहां दाखिला मिलने के बाद ही मेरा जीवन शुरू हुआ.”

एनएसडी में दाखिला लेने के लिए नियम यह था कि आपने कम से कम दस नाटकों में काम किया हुआ हो. इरफ़ान ने दस नाटक नहीं कर रखे थे सो उसने अपनी एप्लीकेशन में ऐसे नाटकों का भी ज़िक्र कर दिया जिनमें उसने काम नहीं कर रखा था. उसका झूठ पकड़ा नहीं जा सका और दाखिले के साथ उसे बाकायदा स्कॉलरशिप भी मिली. Irrfan Khan Remembered Ashok Pande

लेकिन दिल्ली जाने से पहले बहुत सारे पारिवारिक मसाले निबटाये जाने की राह देख रहे थे. हाल ही में उसके पिता का देहांत हुआ था और घर के बड़े बेटे की हैसियत से उससे उम्मीद की जाती थी कि वह अपने पिता की टायर की दुकान सम्हालेगा. ऐसे में इरफ़ान के छोटे भाई इमरान ने परिवार का धंधा देखने का प्रस्ताव दिया. अम्मी का ख़याल था ग्रेजुएट होने के बाद इरफ़ान जयपुर में ही कोई ढंग की नौकरी करे. वे चाहती थीं उनके सारे बच्चे आसपास रहें और मिल कर रहें. इसके काफी पहले इरफ़ान के मामू बंबई जा चुके थे और वापस नहीं लौटे थे. अम्मी नहीं चाहती थीं कोई महानगर उनके बेटे को छीन ले. लेकिन इरफ़ान के पास दूसरी ही योजनाएं थीं. नियति ने तय कर रखा था कि उसके डैनों को खूब चौड़ा पसरना था.

एनएसडी में उसने गिरीश कर्नाड के क्लासिक नाटक ‘तुगलक’ में काम किया और उसके एक डायलॉग को जीवन में ढाल लिया – “उमंगों भरी उम्र है. सारे आलम को फ़तेह करने के ख़्वाब देखने की उम्र है.”

देश-दुनिया में अपनी अभिनय-प्रतिभा का परचम लहरा चुकने के बाद उसी टीवी शो में उसने अभिनेता विनय पाठक से आगे कहा था – “इंसान इसलिए पैदा होते हैं कि वे उड़ें और आगे बढ़ें. अगर आप अपने जीवन में ग्रो नहीं कर सकते तो जीने का कोई मकसद नहीं है.”

दो.

उन दिनों लन्दन में इलाज चल रहा था. अभिनेता विपिन शर्मा उनसे मिलने अस्पताल पहुंचे. देखा कमरे में न इरफ़ान हैं न उनकी पत्नी सुतपा. रिसेप्शन पर पूछा तो पता लगा दोनों कॉफ़ी पीने गए हुए हैं.

उस मौके को याद करते हुए विपिन ने लिखा, “इरफ़ान के बेड पर खुली हुई रूमी की किताब उल्टी धरी हुई थी. मैं उस छवि को कभी नहीं भूल सकता. काश मैंने उसका फोटो ले लिया होता. उसे देखना बेहतरीन अनुभव था. रूमी की किताब उलटी रखी हुई थी और मैंने अपने आप से कहा – ये है इरफ़ान!” Irrfan Khan Remembered Ashok Pande

महान संत रूमी के जैसी सूफियाना मनःस्थिति ने इरफ़ान को जीवन के सबसे मुश्किल और सबसे अनिश्चित दौर को पार करने में मदद की. जिस पन्ने पर किताब उल्टी हुई थी उसमें रूमी की यह कविता थी –

“जो जाना हुआ है और जो अजाना है
उस सब के बारे में क्यों बात करें
देखें, किस तरह अजाना घुलता है जाने हुए में.
इस जीवन के और उसके बाद के जीवन के बारे में
अलग-अलग क्यों सोचें
जबकि पिछले वाले से ही उपजा हुआ है यह जीवन”

ठीक तीन दिन पहले रमजान के मुक़द्दस महीने के पहले दिन यानी 26 अप्रैल को जयपुर की कृष्णा कॉलोनी में रहने वाली अस्सी साल की सईदा बेगम इंतकाल फरमा गयी थीं. ये सईदा बेगम इरफ़ान को जन्म देने वाली उसकी प्यारी अम्मीजान थीं जिनके जनाजे को कंधा देने तक वह नहीं आ सका.

आज वह खुद उनके पास चला गया.

– अशोक पाण्डे

हमारे फेसबुक पेज को लाइक करें: Kafal Tree Online

इरफ़ान खान : जिसका निभाया हर किरदार स्टाइल बन जाता था

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

Recent Posts

कुमाऊँ की विलुप्त होती जन्माष्टमी पट्ट-चित्र परम्परा

कुमाऊँ में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी केवल भगवान कृष्ण के जन्म का धार्मिक पर्व नहीं रही है,…

2 weeks ago

बद्रीदत्त पांडे और इंद्र सिंह नयाल ने रखा था ‘उत्तराखंड राज्य की संकल्पना’ का वैचारिक आधार

पिछली कड़ी : पहले समाज बदलो, राज्य अपने आप सार्थक हो जाएगा : इंद्र सिंह नयाल इन्द्र…

2 weeks ago

आकर्षक कलेवर में आंचलिक परिवेश की किताब “टुकड़ा-टुकड़ा जिंदगी”

पूरी तरह आंचलिक परिवेश में तैयार, "टुकड़ा टुकड़ा जिंदगी" वरिष्ठ इतिहासकार डॉ निर्मल जोशी की नव प्रकाशित…

2 weeks ago

भूख न तीस न डर न फिकर छ्, मुट्ट बोटीं छन कसीं कमर छ्

ये सितंबर 1994 की सुबह थी जब खटीमा में पूर्व सैनिकों का जुलूस निकल रहा था. पूर्व…

2 weeks ago

उत्तराखण्ड के सरोवर

उत्तराखण्ड को सामान्यतः हिमालय, नदियों, झरनों और जलधाराओं की भूमि के रूप में जाना जाता है. किंतु…

2 weeks ago

दौड़ता अल्मोड़ा : फ़ोटो निबंध

पिछले 3 सालों से अल्मोड़ा के कुछ जागरूक युवा अल्मोड़ा मानसून मैराथन का आयोजन कर रहे हैं,जिसमें…

2 weeks ago