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स्मृति शेष : शमशेर सिंह बिष्ट का एक पुराना और मौजूं इंटरव्यू

शमशेर सिंह बिष्ट उत्तराखण्ड राज्य निर्माण आन्दोलन के आन्दोलन की भी अग्रिम पंक्ति में थे. राज्य गठन के बाद वे नवगठित राज्य के स्वरूप से नाखुश थे. राज्य निर्माण के 10 साल पूरे होने पर उत्तराखण्ड लोक वाहिनी के अध्यक्ष की हैसियत से  अक्टूबर 2010 में उनसे नरेन्द्र देव सिंह द्वारा की गयी बातचीत आज भी उतनी ही मौजूं है.

 

उत्तराखण्ड राज्य के 10 साल पूरे होने पर आपका क्या कहना है?

उत्तर प्रदेश में जब हम थे तो वहां अपने अनुसार नीति बनायी जाती थी मैदानी क्षेत्रों की नीतियों को जबरन पहाड़ी क्षेत्रों पर थोपा जाता था इसलिए उत्तर प्रदेश से उत्तराखण्ड को अलग करने का प्रश्न उठा. आज राज्य में 80 प्रतिशत क्षेत्र पर्वतीय है. परन्तु जिस कल्पना को लेकर राज्य का गठन किया गया था उस कल्पना को समाप्त किया जा चुका है. जिसका परिणाम पहाड़वासी भुगत रहे हैं. इसलिए अब यह कहने में संकोच नहीं है इससे तो अच्छे हम उत्तर प्रदेश में थे.

ऐसी परिस्थितियां क्यों बनीं?

राज्य बनने से पहले पर्वतीय क्षेत्रों के लिए अलग से नीति बनती थी. एचएमटी फैक्ट्री को रानीबाग में लगाया गया था. पर्वतीय क्षेत्रों के लिए अलग से अनुदान मिलता था. राज्य बनने के बाद सबसे पहले देहरादून को राजधानी बनाकर धोखा दिया गया. इस समय जो लोग सत्ता में हैं उनमें से 90 प्रतिशत लोग राज्य आंदोलन से नहीं जुड़े थे इसलिए वे लोग लोगों की भावनाओं को नहीं समझ रहे हैं. रेता बिक्री का अवैध खनन करने वाले जन प्रतिनिधि बन गये हैं. जो सभासद नहीं बन सकते थे वे मंत्री बनकर घूम रहे हैं.

राज्य में बन रही अंधाधुंध बांध परियोजनाएं राज्य के अस्तित्व के लिए संकट खड़ी कर चुकी हैं. आपका इन परियोजनाओं पर क्या मत है.

18 अगस्त को सुमगड़ में बादल फटने से बच्चे नहीं मरे थे बल्कि उसके बगल में बनी सुरंग से यह आपदा आयी थी बड़े-बड़े बांध पूरे उत्तराखण्ड में बनाये जा रहे हैं और पूरी प्राकृतिक सम्पदा को लुटा जा रहा है. बांध के निर्माण से सरकार की जबरदस्त कमाई हो रही है. इसलिएय इन परियोजनाओं को नहीं रोकेंगे. सरकार को इन कम्पनियों से भारी चंदा मिलता है, इनके कार्यकर्ताओं को जबरदस्त कमीशन मिल रहा है. जबकि उत्तराखण्ड के लिए बड़े बांध अभिशाप हैं.

राज्य में औद्योगिक विकास नीति के तहत सिडकुल बनाया गया क्या वास्तव में इससे बेरोजगारों की समस्या दूर हुई है?

सबसे बड़ी बात यह है कि औद्यौगिक रियायत पहाड़ी राज्य होने की वजह से मिली है. पर उद्योग कहां खड़े हैं? उत्तराखण्ड की जनता के लिए कोई लेबर एक्ट लागू नहीं किया गया. पहाड़ का युवक पसीना बहाकर फैक्ट्री में मजदूर बना पड़ा है. उसे ढंग से 3000 वेतन भी नहीं मिल पा रहा है. फैक्ट्रियों का मैनेजमेंट वर्क दूसरे राज्यों से आये लोगों को हाथों में है. सिडकुल विकास का पैमाना नहीं है. उत्तराखण्ड बनने से उन लोगों का फायदा हुआ है जिनके व्यक्तिगत स्वार्थ उत्तर प्रदेश में दबे रह जाते थे. विधायकों की संख्या बड़ी है, इससे हर कोई जनप्रतिनिधि बनने का ख्वाब देख रहा है.

क्या प्रदेश सरकार भ्रष्टाचार से लिप्त है?

उत्तराखण्ड में जो सरकार चल रही है वह दिल्ली में बैठे लोगों के द्वारा निर्देशित होती है. यहां बीजेपी व कांग्रेस की ही सरकार रही है. आप देखेंगें कि पानी की टंकियां 10 बनी हैं लेकिन मोबाइल टावर 100 लग गये हैं. हमारे प्रदेश में भ्रष्टाचार का बाजार बन रहा है. क्योंकि सारी पार्टियां अपने हाईकमान के कहने पर ही चलती हैं. उत्तराखण्ड का मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड की जनता तय नहीं करती बल्कि दिल्ली में बैठे लोग तय करते हैं.

इन सरकारों की नीतियां क्या राज्य को विकास की तरफ ले जायेंगी?

कभी नहीं ले जायेगी चाहे वह कोई भी नीति हो. हमारे यहां औद्योगिक नीति हिमाचल की तरह होनी चाहिए. हिमाचल में कोई गैर हिमाचली जमीन नहीं खरीद सकता है. जमीन को लेकर इनकी कोई नीति नहीं है. दलितों की जमीन तक की खरीद फरोख्त हो रही है. सारे आईएएस और सारे नेता देहरादून में बैठे हुए हैं.

क्या स्थाई राजधानी का मुद्दा सुलझेगा?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जो लोग सत्ता में है वे इस मुद्दे पर बिल्कुल ध्यान नहीं दे रहे हैं. उक्रांद ने भी इस मुद्दे को लगभग छोड़ दिया है. उसको इस मुद्दे पर ईमानदारी दिखानी चाहिए थी. उक्रांद कहती कि पहले आप राजधानी का मुद्दा सुलझायें वरना हम सरकार के साथ नहीं रहेंगे. सरकारी तंत्र नौकरशाहों की सुविधाओं का ध्यान रख रहा है. इसलिए राजधानी को ऊपर (पर्वतों) में नहीं लाया जा रहा है.


आपदा प्रबन्धन में पैसों का दुरुपयोग हो रहा है?

लाशों को गांव वाले निकाल रहे हैं. सरकार के लोग 5-5 दिन तक भी प्रभावित क्षेत्रों में नही पहुंच पा रहे हैं. आज भी लोग स्कूल व जंगलों में रह रहे हैं. समाज का सबसे कमजोर वर्ग, दलित वर्ग, इस आपदा में सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है. सरकार इन लोगों के लिए क्या पुर्नवास नीति बनायेगी. इस सरकार के पास राज्य के लिए कोई भी नियोजित योजना नही है.

 

 

हल्द्वानी में रहने वाले नरेन्द्र देव सिंह एक तेजतर्रार पत्रकार के तौर पर पहचान रखते हैं. उत्तराखंडी सरोकारों से  जुड़ा फेसबुक पेज ‘पहाड़ी फसक’ चलाने वाले नरेन्द्र इस समय उत्तराँचल दीप के लिए कार्य कर रहे हैं. विभिन्न मुद्दों पर इनकी कलम बेबाकी से चला करती है.

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Sudhir Kumar

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