आइए बाघ को बाघ और चीते को चीता बोलें. यह क्या बात हुई? बाघ को बाघ और चीते को चीता ही बोलते हैं ना?
(International Tiger Day 2024)
बोलते हैं लेकिन सब नहीं बोलते. एक साथी जिम कॉर्बेट पार्क से लौटे तो उन्होंने मुझे बड़े उत्साह से बताया – इस बार लक अच्छा था, हमने शेर देख लिया. वह भी एक नहीं दो-दो शेर!
मैं चौंका – जिम कॉर्बेट पार्क में शेर?
इतना ही नहीं, हिंदी के एक अखबार में समाचार छपा था – जिम कॉर्बेट पार्क में पर्यटकों ने चीते देखे.
कई लोग खुश होकर जब रणथंभौर, ताडोबा, बांधवगढ़ और कई दूसरे बाघ अभयारण्यों यानी टाइगर रिजर्व से लौट कर यह बताते हैं कि वहां उन्होंने अपने सामने शेर या चीते देखे तो हैरानी के साथ दुख भी होता है. आपका नाम अरुण है और कोई आपसे कहे ‘और जितेन्द्र कैसे हो?’ तो कैसा लगेगा आपको? हालांकि नाम की यह विसंगति बचपन में मैंने अपने गांव में महसूस कर ली थी. हमारे गांव में हर आदमी का उपनाम रखने का रिवाज था. एक ही नाम के आदमियों को उनके उपनाम से ही अलग पहचाना जाता था. लेकिन, एक नाम ने मुझे चौंका दिया. नाम था ‘शेर सिंह’ और लोगों ने उनका उपनाम रख दिया ‘बाघ’! शेर सिंह कई थे इसलिए इनको ‘शेरदा बाघ’ कह कर पहचाना जाता था. अच्छा भला शेर लोगों ने बाघ बना दिया. मैं आज भी सोचता हूं भला शेर कैसे बाघ हो सकता है?
(International Tiger Day 2024)
आज अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस पर यह बात फिर याद आ गई. और, यह भी याद आ गया कि कई लोग शेर दिल आदमी को ही बाघ नहीं बना देते बल्कि असली शेर को भी बाघ या बाघ को शेर या चीता बना देते हैं! अन्यथा जिम कॉर्बेट पार्क के अच्छे भले बाघों को कोई शेर या चीता भला कैसे कह सकता है? है ना?
दोस्तो, जानते हैं इसका कारण क्या है?
इसका कारण है- जानने में अरुचि. कोई जिज्ञासा नहीं कि जिसे वे देख रहे हैं- वह असल में है कौन. यह तो वही बात हुई न कि –
“हैलो मिस्टर बनर्जी.”
“आइ एम नॉट बनर्जी, आइ एम मुखर्जी.”
“सॉरी मिस्टर चटर्जी!”
जब भी किसी नेशनल पार्क या अभयारण्य में जाएं तो वहां के बाशिंदों को अच्छी तरह पहचान लेना चाहिए. यह ज़रूर सोचना चाहिए कि अगर जिम कॉर्बेट पार्क में शेर हैं तो फिर गुजरात के गिर के जंगलों में बड़ी-सी अयाल वाले और अपनी दहाड़ से कलेजा कंपा देने वाले वे कौन से जानवर रहते हैं?
और, अगर चीते वहां हैं तो फिर मध्य प्रदेश के कुना पार्क में दूर नामीबिया देश से चीते क्यों मंगाने पड़े?
सच यह है दोस्तो कि जिम कॉर्बेट पार्क में केवल बाघ और लैपर्ड यानी तेंदुए हैं. लोग रणथम्भौर, ताडोबा, बांधवगढ़, बिंदापुर और नागरहोल भी बाघ ही देखने जाते हैं. खूबसूरत बंगाल टाइगर को देखने के लिए तो लोग पश्चिम बंगाल के सुंदरबन द्वीपों तक की यात्रा करते हैं.
बाघ, शेर, लैपर्ड और चीते में वैज्ञानिक दृष्टि से तो कई अंतर हैं लेकिन आप चाहें तो इन्हें एक नज़र में पहचान सकते हैं. बाघ, लैपर्ड और शेर तीनों ही बिल्ली कुल के प्राणी हैं लेकिन बिल्ली की तरह म्याऊं नहीं करते बल्कि अपनी दहाड़ से दिल दहला सकते हैं.
(International Tiger Day 2024)
बाघ की सबसे खास पहचान यह है कि उसकी हल्के नारंगी रंग की खाल पर काली, खड़ी पट्टियां होती हैं. लंबी, मोटी पूंछ पर गोलाई में काली पट्टियां दिखाई देती हैं. बिल्ली कुल के जानवरों में यह सबसे अधिक ताकतवर प्राणी है. इसका सिर भी बड़ा होता है. बाघ के तीखे नाखून पंजों से बाहर भी आ सकते हैं और भीतर भी जा सकते हैं. शिकार करते समय वह नाखून बाहर निकाल लेता है.
लैपर्ड यानी तेंदुए की पीली-सुनहरी खाल पर काली पट्टियां नहीं बल्कि काले ठप्पे यानी धब्बे होते हैं. लगता है जैसे गुलाब के फूल का ठप्पा लगा दिया गया हो. तभी तो इन धब्बों को अंग्रेजी में ‘रोजेटी’ कहते हैं. बाघ की तरह इसका बदन बहुत भारी नहीं बल्कि पतला और सुडौल होता है. यह अपने पंजों से से नाखून बाहर भी निकाल सकता है और उन्हें भीतर भी समेट सकता है. यह फुर्ती से पेड़ पर चढ़ जाता है. पंजों, बाजुओं और गर्दन की मांसपेशियां इतनी मजबूत होती हैं कि यह हिरन वगैरह को मार कर , उसे मुंह से पकड़ कर पेड़ में चढ़ जाता है. वहां किसी मोटी शाख पर शिकार को रख कर खाता है. वहीं विश्राम भी कर लेता है.
भारतीय चीता अब हमारे देश में नहीं पाया जाता, हालांकि कभी वे यहां हजारों की संख्या में पाए जाते थे. कहते हैं, मुग़ल सम्राट अकबर के पास कम से कम एक हजार चीते थे. उन्हें शिकार मारने के लिए प्रशिक्षित किया गया था. धीरे-धीरे घास के मैदान उजड़े, चीतों का आवास उजड़ा, वे शिकार के नाम पर मारे गए और उनकी संख्या घटती चली गई. सन् 1947 में जब सरगोधा के राजा रामानुज प्रताप सिंहजूदेव ने जब गोली से तीन चीते मार डाले तो पता लगा वे भारत के आखिरी तीन चीते थे. तब से केवल किताबों में भारतीय चीते की तस्वीरें देख रहे हैं और अपने बच्चों को बता रहे हैं कि देखो बच्चो, भारतीय चीता ऐसा होता था. कितनी बड़ी विडंबना है यह. हमारी ही करतूतों से भारत में चीता खत्म हो गया.
वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है, अगर हमने बाघ को बचाने की पुरजोर कोशिश नहीं की तो कल वह भी खत्म हो सकता है.
(International Tiger Day 2024)
अब रही शेर की बात. भारतीय गणतंत्र का प्रतीक चिह्न है- शेर. हमारा अपना शेर जो केवल गुजरात में गिर के जंगलों में रहता है. यह भी बिल्ली कुल का सदस्य है. इसकी पहचान है इसके सिर के चारों ओर लंबे बालों की अयाल. चौड़ा सीना, छोटा गोल सिर, गोलाकार कान और गहरे-भूरे रंग की खाल. पूंछ के आखिरी सिरे पर बालों का गुच्छा होता है. शेर भी अपने पंजों से तीखे नाखून बाहर भी निकाल सकता है और उन्हें भीतर भी समेट सकता है. शेर की खाल पर पट्टियां या धब्बे नहीं होते हैं. कमर पतली होती है. इस ओर शायद प्रसिद्ध कवि मलिक मुहम्मद जायसी का भी ध्यान गया होगा क्योंकि अपने प्रसिद्ध ग्रंथ पद्मावत में उन्होंने नाहर यानी शेर की पतली कमर का वर्णन किया है. लिखते हैं कि एक बार शेर ने पद्मिनी की पतली कमर क्या देख ली कि वह ईर्ष्या से कुपित होकर जंगलों में चला गया और आज तक क्रोध से मनुष्यों पर हमला करता रहता है!
लब्बे-लुबाब यह कि दोस्तो, अब जब कभी भी आप किसी अभयारण्य में जाएं तो पहले पता कर लीजिए कि आप वहां क्या देखने जा रहे हैं- बाघ, तेंदुवा या शेर. नामीबिया का चीता तो फिलहाल केवल मध्यप्रदेश में कुना पार्क के नए वातावरण में बसने की कोशिश कर रहा है.
आपको बता दूं दोस्तो कि मेरा बचपन बाघों और तेंदुवों के आसपास बीता है. हमारे दो गांव थे- एक ठंडे पहाड़ में और दूसरा थोड़ा गर्म जलवायु वाले भाबर के पहाड़ों में. वह इलाका अब नंधौर वन्यजीव अभयारण्य का हिस्सा हो गया है. वहां मैंने अपनी जंगल की पाठशाला में पढ़ने के दिनों घने जंगल से आता हुआ एक विशाल बाघ देखा था. रात को हम अपने पालतू जानवरों के साथ जिस बड़े से घास-पूस के गोठ यानी झोपड़े में रहते थे, उसके सामने की कच्ची सड़क से अक्सर बाघ दूसरे जंगल को जाते हुए दहाड़ कर जैसे आगाह कर जाता था कि सनद रहे यह हमारा इलाका है.
(International Tiger Day 2024)
वहां के गांव में एक मजेदार किस्सा सुनाया जाता था कि- एक घर में एक बार रात को दो बकरी चोर आए. अंधेरी रात थी. किसी तरह रास्ता खोजते वे मकान के गोठ के पास पहुंच गए. दरवाजा खाली उढ़का हुआ था, बंद नहीं किया गया था. घर के लोग ऊपर की मंज़िल में सो रहे थे. गोठ में उन्होंने अंधेरे में ही बकरियों पर हाथ फिराते हुए आपस में तय किया कि शिकार खाने के लिए मोटा, चिकना हेल्वान (बकरा) ले जाएंगे. अंधेरे में ऐसा ही मोटा-तगड़ा हेल्वान उनके हाथ लग गया.
उसे लेकर दोनों चोर बाहर निकले और अंधेरे में ही उसे ठेलते हुए अपने घर की ओर चल पड़े. सुबह होने को थी.
धीरे-धीरे उजाला फैलने लगा कि तभी उनकी नज़र बकरे पर पड़ी. उसे देखते ही वे चीखते हुए सिर पर पैर रख कर भाग खड़े हुए.
वह बकरा नहीं चिकना और मोटा-तगड़ा बाघ था ! खाली उढ़के हुए दरवाज़े से वह भीतर तो चला गया होगा लेकिन दरवाज़ा बंद हो गया तो बाहर निकल नहीं सका.
चलिए, अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस के मौके पर हमारी प्यारी पांच वर्षीय पोती मायरा का बनाया यह बाघ भी देख लीजिए.
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वरिष्ठ लेखक देवेन्द्र मेवाड़ी के संस्मरण और यात्रा वृत्तान्त आप काफल ट्री पर लगातार पढ़ते रहे हैं. पहाड़ पर बिताए अपने बचपन को उन्होंने अपनी चर्चित किताब ‘मेरी यादों का पहाड़’ में बेहतरीन शैली में पिरोया है. ‘मेरी यादों का पहाड़’ से आगे की कथा उन्होंने विशेष रूप से काफल ट्री के पाठकों के लिए लिखना शुरू किया है.
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