समाज

जब बंदर और लंगूर के शरीर से बना हुड़का गमकता है

उत्तराखंड के संगीत की बात हुड़के बिना अधूरी है. देवी-देवताओं के जागर हों या उत्सव हुड़का पहाड़ का मुख्य वाद्य हुआ. कुमाऊं के पूज्य देवता गंगानाथ की जागर में तो केवल हुड़का ही बजाया जाता है. पहाड़ों में लगने वाली 3 से 5 दिन की जागरों में हुड़का ही बजता है.
(Hudka Traditional Musical Instrument Uttarakhand)

हुड़का लकड़ी के एक खोखले भाग के दोनों सिरों पर बकरे के आमाशय की झिल्ली से बने पूड़े से मढ़कर बनाया जाता है. दोनों पूड़े डोर से कसे होते हैं. हुड़के लकड़ी वाला भाग नाली कहलाता है.

ऐसा माना जाता है कि खिन की लकड़ी से बना हुड़का सबसे शानदार गमकता है. अच्छे हुड़के की गमक विषय में पहाड़ एक कहावत कही जाती है जिसका मतलब है कि ऐसा हुड़का जिसकी नाली खिन की लकड़ी की बनी हो और दाई ओर लगी पुड़ी हो बंदर के शरीर से बनी और बांयी पुड़ी बनी हो लंगूर के शरीर से. ऐसे हुड़के पर जब जगरिये के हाथ की थाप पड़ती है तो इलाके के जितने भी डंगरिये हैं बिना निमंत्रण के नाचने लगते हैं.
(Hudka Traditional Musical Instrument Uttarakhand)

खिनौक हो हुडुक
देण पुड़ हो बानरौक
बौं पुड़ हो लंगूरौक्
जभत कै तौ हुड़क बाजौल्
उ इलाकाक् डंडरी बिन न्यूतियै नाचण लागाल्

लोक में कही जाने वाली यह बात अतिशयोक्ति पूर्ण लगती है क्योंकि बन्दर या लंगूर की पुड़ी बनाने के लिये उन्हें मारना पड़ेगा जो की पाप माना जाता है. हां खिन की लकड़ी से बने हुड़के की गमक की बात सोलह आने सच मानी जानी चाहिये.
(Hudka Traditional Musical Instrument Uttarakhand)

हुडके के विषय में अधिक जानकारी इस पोस्ट में पढ़ें –

हुड़का: उत्तराखण्ड का प्रमुख ताल वाद्य

काफल ट्री फाउंडेशन

Support Kafal Tree

.

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

Recent Posts

बजट में युवाओं के लिए योजना का ढोल है पर उसकी गमक गुम है

उत्तराखंड के आय व्यय लेखे 2026-27 को समझते हुए यह आशंका उभरती है की क्या…

2 weeks ago

जापान में आज भी इस्तेमाल होती है यह प्राचीन भारतीय लिपि

भाषाओं का इतिहास हमेशा रोचक रहा है. दुनिया की कई भाषाओं में ऐसे शब्द मिलते…

2 weeks ago

आज है उत्तराखंड का लोकपर्व ‘फूलदेई’

उत्तराखंड को केवल 'देवभूमि' ही नहीं, बल्कि उत्सवों की भूमि कहना भी बिल्कुल सटीक होगा. यहाँ साल भर…

2 weeks ago

द्वी दिना का ड्यार शेरुवा यौ दुनीं में : अलविदा, दीवान दा

‘यौ डाना कौ पारा, देख्यूंछ न्यारा-न्यारा’ दीवान सिंह कनवाल की आवाज़ में ये गीत पहली कुमाऊनी फ़िल्म…

3 weeks ago

हिमालय को समझे बिना उसे शासित नहीं किया जा सकता

कुमाऊं-गढ़वाल हिमालयी क्षेत्र के लिए भिन्न प्रशासन, विशेष नीति या मैदानी भागों से भिन्न व्यवस्था…

3 weeks ago

पहाड़ों का एक सच्चा मित्र चला गया

बीते दिन सुबह लगभग चार बजे एक ऐसी खबर आई जिसने कौसानी और लक्ष्मी आश्रम…

3 weeks ago